शख्सियत

सत्य की खोज का नायाब पथिक : महापंडित राहुल सांकृत्यायन

आजाद भारत के असली सितारे – 33

“वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक सिर पर कुछ बाल बढ़ाना चाहता है, तो दूसरा दाढ़ी। एक मूँछ कतरने के लिए कहता है, तो दूसरा मूँछ रखने के लिए। एक जानवर का गला रेतने के लिए कहता है, तो दूसरा एक हाथ से गर्दन साफ करने को। एक कुर्ते का गला दाहिनी तरफ रखता है, तो दूसरा बाईं तरफ। एक जूठ-मीठ का कोई विचार नहीं रखता तो दूसरे के यहाँ जाति के भीतर भी बहुत-से चूल्हे हैं। एक ख़ुदा के सिवाय दूसरे का नाम भी दुनिया में रहने देना नहीं चाहता, तो दूसरे के देवताओं की संख्या नहीं। एक गाय की रक्षा के लिए जान देने को कहता है, तो दूसरा उसकी कुर्बानी से बड़ा सबाब समझता है।” 

“कहने के लिए इस्लाम शक्ति और विश्व-बंधुत्व का धर्म कहलाता है, हिन्दू धर्म ब्रह्मज्ञान और सहिष्णुता का धर्म बतलाया जाता है, किंतु क्या इन दोनों धर्मों ने अपने इस दावे को कार्यरूप में परिणत करके दिखलाया? हिन्दू मुसलमानों पर दोष लगाते हैं कि ये बेगुनाहों का ख़ून करते हैं, हमारे मंदिरों और पवित्र तीर्थों को भ्रष्ट करते हैं, हमारी स्त्रियों को भगा ले जाते हैं। लेकिन झगड़े में क्या हिन्दू बेगुनाहों का ख़ून करने से बाज आते हैं?”

“जापान में जाइए या जर्मनी, ईरान जाइए या तुर्की- सभी जगह हमें ‘हिन्दी’ और ‘इंडियन’ कहकर पुकारा जाता है। जो धर्म भाई को बेगाना बनाता है, ऐसे धर्म को धिक्कार! जो मजहब अपने नाम पर भाई का ख़ून करने के लिए प्रेरित करता है, उस मजहब पर लानत! जब आदमी चुटिया काट दाढ़ी बढ़ाने भर से मुसलमान और दाढ़ी मुड़ा चुटिया रखने मात्र से हिन्दू मालूम होने लगता है, तो इसका मतलब साफ़ है कि यह भेद सिर्फ़ बाहरी और बनावटी है।”

‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’- इस सफ़ेद झूठ का क्या ठिकाना है? अगर मज़हब बैर नहीं सिखलाता, तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हज़ार बरस से आज तक हमारा मुल्क़ पामाल (बर्बाद) क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गांवों में एक मज़हब वालों को दूसरे मज़हब वालों के ख़ून का प्यासा कौन बना रहा है? कौन गाय खाने वालों से गोबर खाने वालों को लड़ा रहा है? असल बात यह है- ‘मज़हब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का ख़ून पीना।’ हिन्दुस्तानियों की एकता मज़हबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मज़हबों की चिता पर होगी।”

उक्त अंश महापंडित राहुल सांकृत्यायन (9.4.1893-14.4.1963) की पुस्तक ‘तुम्हारी क्षय’ में संकलित लेख ‘तुम्हारे धर्म की क्षय’ का है। यह पुस्तक 1947 में प्रकाशित हुई थी। तबतक वे सोवियत संघ से लौट चुके थे। यानी, अपनी विचार-यात्रा की अन्तिम मंजिल पर थे। इस लेख में वे धर्म को इंसानियत से ऊपर रखने पर समाज को धिक्काते हैं और लिखते हैं कि, “अज्ञान का दूसरा नाम ही ईश्वर है।’’ वे इस बात को भी बार-बार रेखांकित करते हैं कि, “अज्ञान और असमर्थता के अतिरिक्त यदि कोई और भी आधार ईश्वर-विश्वास के लिए है, तो वह धनिकों और धूर्तों की अपनी स्वार्थ-रक्षा का प्रयास है। समाज में होते अत्याचारों और अन्यायों को वैध साबित करने के लिए उन्होंने ईश्वर का बहाना ढूंढ लिया है। धर्म की धोखा-धड़ी को चलाने और उसे न्यायपूर्ण साबित करने के लिए ईश्वर का ख्याल बहुत सहायक है।’’

महापंडित राहुल संकृत्यायन की जीवन- यात्रा अद्भुत है। यदि यह यथार्थ न होता तो विश्वास कर पाना कठिन होता कि उत्तर प्रदेश के एक गाँव के ब्राह्मण परिवार में जन्मा एक बालक किस तरह ग्यारह वर्ष की उम्र में घर से भाग जाता है और ज्ञान की खोज में दुनिया भर का चक्कर लगाते हुए महापंडित बनकर लौटता है। वह पहले सनातनी सन्यासी बनता है फिर आर्यसमाजी बनता है इसके बाद बौद्ध भिक्खु बनता है और अंत में कम्युनिस्ट। इस दौरान लगातार दुनियाभर के साहित्य का, धर्मों-संप्रदायों का, तीन दर्जन से अधिक भाषाओं का अध्ययन करता है, अध्यापन करता है, जनान्दोलनों में हिस्सा लेता है, लाठियाँ खाता है, जेल जाता है और इतना सब होते हुए भी बहुमूल्य डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकों का प्रणयन करता है।ऐसी मेधा, ऐसी जिजीविषा और लोकहित के प्रति ऐसा समर्पण अन्यत्र कहाँ मिलेगा?राहुल सांकृत्यायन | हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

राहुल सांकृत्यायन का जन्म आजमगढ़ जिले के पंदहा नामक गाँव के एक निम्नवर्गीय किसान-परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था। उनके पिता का नाम गोवर्धन पाण्डेय तथा माँ का नाम कुलवंती देवी था। बचपन में ही माँ का देहांत हो जाने के कारण केदारनाथ का पालन-पोषण ननिहाल में हुआ। 1898 में प्राथमिक शिक्षा के लिए इन्हें गाँव पंदहा के ही एक मदरसे में भेजा गया।

राहुल जी के नाना पण्डित राम शरण पाठक फ़ौज में नौकरी कर चुके थे। उनके  मुख से सुनी हुई फ़ौज़ी जीवन की कहानियाँ, शिकार के अद्भुत वृत्तान्त, देश के विभिन्न प्रदेशों का रोचक वर्णन, नदियों, झरनों के वर्णन आदि ने केदार पाण्डेय के मन में दुनिया को देखने की ललक पैदा कर दी। इसके अलावा दर्जा तीन की उर्दू किताब में उन्होंने एक शेर पढ़ा था,

“सैर कर दुनिया की गाफिल ज़िन्दगानी फिर कहाँ,
ज़िन्दगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ।”

 इस शेर ने केदारनाथ पाण्डेय के मन पर गहरा प्रभाव डाला। इस बीच ग्यारह वर्ष की छोटी उम्र में उनकी शादी कर दी गयी। इस शादी ने भी उन्हें घर छोड़ने में मदद की और केदारनाथ पाण्डेय एक दिन चुपके से घर छोड़कर दुनिया को देखने-जानने के लिए निकल पड़े। वे हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में विचरते रहे और वहाँ यायावरी का जीवन जिया।  हिमालय पर्यटन के बाद 1910 में संस्कृत के अध्ययन की आकाँक्षा ने स्वाभाविक रूप से केदारनाथ पाण्डेय को ज्ञान की नगरी काशी ले गयी। वहाँ ‘मोतीराम का बाग’ नामक आश्रम में उन्होंने चक्रपाणि ब्रह्मचारी के अंतेवासी के रूप में संस्कृत का अध्ययन शुरू किया।

काशी में रहते हुए इनकी भेंट छपरा जिले के परसा- मठ के महंत लक्ष्मणदास से हुई और वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में केदारनाथ पाण्डेय को परसा ले गये जहाँ पहुँचकर केदारनाथ पाण्डेय वैष्णव साधु रामउदार दास बन गये।

 रामउदार दास अब भक्ति के दार्शनिक स्रोत और पारंपरिक ज्ञान हासिल करने के लिए 1913 में दक्षिण चले गये। वहाँ तिरुमिशी शहर में रहकर उन्होंने विशिष्टाद्वैतवादी रामानुजीय वेदान्त के साथ न्य़ाय, मीमांसा आदि का गहन अध्ययन किया। परसा लौटने के बाद पूजा- पाठ के अलावा सामाजिक कामों में भी वे बराबर अपना योगदान करते रहते थे। इसी बीच अयोध्या के निकट प्रसिद्ध देवकाली मंदिर में बलि-प्रथा को बंद करने के लिए किये गये आन्दोलन में रामउदार दास ने सक्रिय रूप से भाग लिया। विवाद बहुत बढ़ गया था और मामला मारपीट तक जा पहुँचा। पुलिस आई और आर्यसमाजी पुलिस इंस्पेक्टर ने रामउदार दास का पक्ष लिया। इसके बाद रामउदार दास पर आर्यसमाज के प्रति गहरा आकर्षण पैदा हुआ और वे आर्य समाज का गंभीर अध्ययन करने लगे। 1915 में रामउदार दास ने अपना सनातनी का चोला उतार फेंका और आगरा के आर्य मुसाफिर विद्यालय में दाखिला ले लिया। आर्य समाज ने न सिर्फ रामउदार को वैचारिक मुक्तता की जमीन प्रदान की, बल्कि उनकी तार्किक प्रतिभा को निखरने का भी मौका दिया। इस दौरान केदारनाथ विद्यार्थी के नाम से उनके लेख अखबारों में छपने लगे थे। 1917 से लेकर 1920 तक का उनका काल-खण्ड आर्यसमाजी प्रचारक और अध्ययन की आकांक्षा में निरंतर भटकते रहने का काल खण्ड है। इस दौरान वे लाहौर से लेकर कलकत्ता और फिर 1920 में अध्ययन के लिए दुबारा दक्षिण गये।

इन्ही दिनों गाँधी जी का असहयोग आंदोलन तेजी से फैल रहा था। रामउदार दास ने उसमें बढ़ चढ़ करल हिस्सा लिया और जेल गये। इसी वर्ष उन्हें जिला कांग्रेस का मंत्री चुना गया। पटना में तथाकथित सरकार विरोधी भाषण देने पर उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और इस बार उन्हें दो वर्ष की जेल की सजा हुई। उन्हें इस बार हजारीबाग जेल में रखा गया और वे 18 अप्रैल 1925 को रिहा हुए।

जेल से मुक्त होने के बाद रामउदार दास हिमालय की ओर निकल पड़े। वे लेह, लद्दाख, तिब्बत और हिमालय के बर्फ से ढंके पहाड़ों में घूमते रहे। उन दिनों भारतीयों को तिब्बत की यात्रा की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने तिब्बत की पहली यात्रा एक भिखारी के छद्मवेश में की। वहाँ से लौटकर वे सारनाथ गये और उसके बाद बौद्ध-दर्शन के अध्ययन के लिए श्रीलंका चले गये।।

राहुल श्रीलंका में उन्नीस महीने (16.5.1927-1.12.1928) रहे। यहाँ रहकर उन्होंने अध्ययन-अध्यापन दोनो किया। उन्होंने पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानीएवं सिंहली भाषाओं का अध्ययन करते हुए सम्पूर्ण बौद्ध ग्रन्थों का मनन किया और त्रिपिटकाचार्य की सर्वश्रेष्ठ उपाधि प्राप्त की।

      एक बार और तिब्बत की यात्रा के उद्देश्य वे श्रीलंका से भारत लौट आए। जैसा कि पहले कहा जा चुका है तिब्बत की यात्रा उन दिनों आसान नहीं थी।किसी भी घुसपैठिए के पकड़े जाने पर उसे तिब्बती नियमों के अनुसार न केवल कारावास की सजा हो सकती थी, बल्कि पकड़े जाने पर मृत्युदंड भी मिल सकता था। फिर भी रामउदार दास तिब्बत गये और अनेक दुरूह स्थानो से होते हुए ल्हासा तक पहुँचे। वहाँ से अनेक दुर्गम स्थानों से होते हुए उन्होंने तमाम हस्तलिखित पोथियों का अनुसंधान और अध्ययन किया और प्रचुर सामग्री लेकर भारत आए। आठवीं तक पढ़े थे 30 भाषाओं के जानकार राहुल सांकृत्यायन - BBC News हिंदी

रामउदार दास एक बार फिर लंका की ओर कूच किये। इसबार श्रीलंका में जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये। वे ‘रामउदार दास’ से ‘राहुल’ हो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण ‘सांकृत्यायन’ कहलाए। उनकी अद्भुत तर्क-शक्ति और अनुपम ज्ञान- भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने उन्हें ‘महापंडित’ की उपाधि दी।  इस प्रकार बचपन के केदारनाथ पाण्डेय अब महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। उन्होंने ‘मज्झिम निकाय’ के सूत्र का हवाला देते हुए अपनी ‘जीवन यात्रा’ में बुद्ध का कथन उद्धृत किया है और लिखा है, “बड़े की भाँति मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह पार उतरने के लिए है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं-तो मालूम हुआ कि जिस चीज़ को मैं इतने दिनों से ढूँढता रहा हूँ, वह मिल गयी।”

5 जुलाई 1932 को आनंद कौसल्यायन के साथ राहुल समुद्री जहाज से यूरोप की ओर रवाना हो गये। वे पोर्ट सईद, क्रीट, सारदीनिया, कॉरसिका, मार्सेई, नोत्रदम होते हुए पेरिस पहुँचे। पेरिस से वे लंदन गये। कैम्ब्रिज और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों को देखा। आक्सफोर्ड के हाईगेट कब्रिस्तान में राहुल ने अपनी अगली चेतना के मूल सूत्रधार कार्ल मार्क्स की समाधि का दर्शन किया। तिब्बत से राहुल बहुत से चित्र भी लाए थे। उनमें से कुछ चुने हुए चित्रों को वे अपने साथ यूरोप ले गये। उनके इन चित्रों की प्रदर्शनी लंदन और पेरिस दोनो शहरों में आयोजित की गयी थी।

राहुल की यूरोप यात्रा का अगला पड़ाव जर्मनी था। फ्रैंकफुर्त से वे मारबुर्ग गये और फिर बर्लिन। उन्होंने बर्लिन में डॉ. पॉल डाल्के के बौद्ध बिहार में व्याख्यान दिया। जर्मनी में अपना क्रिसमस बिताने के बाद राहुल पानी के जहाज से ही कोलंबो लौट आए और वहाँ से 1933 में भारत।

1934 में भयंकर भूकम्प आया। बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं के साथ राहुल भूकम्प पीड़ितों की सेवा में तन मन धन से कूद पड़े। इसी वर्ष राहुल दूसरी बार तिब्बत गये। यह यात्रा पूरी तैयारी के साथ थी। ल्हासा में राहुल जिनके संपर्क में आए उनमें प्रमुख थे भोटविद्यामार्तंड गेशे शेरब। गेशे शेरब का वहाँ बहुत सम्मान था। उनके प्रयास से राष्ट्रीय सम्पत्ति की तरह गुप्त एवं मूल्यवान उन तमाम गुम्फाओं को राहुल के लिए खोल दिया गया जिनमें सदियों पुरानी मूल व अनूदित कृतियाँ संरक्षित की गयी थीं। राहुल ने दुर्गम प्रदेशों एवं बौद्ध-बिहारों की यात्रा की और दुर्लभ पाँडुलिपियाँ देखीं। उनमें से बहुतों की उन्होंने तस्वीरें लीं और बहुतों की प्रतिलिपि तैयार। इन्हीं में धर्मकीर्ति और दिड़्नाग के भी ग्रंथ थे। इस तरह दुर्लभ पाँडुलिपियों और चित्रों के साथ राहुल भारत लौटे।

1935 की गर्मियों में राहुल रंगून, सिंगापूर, हांगकांग, मलेशिया होते हुए जापान पहुँचे। जापान से वे कोरिया गये और वहाँ से मंचूरिया।  राहुल की हार्दिक इच्छा सोवियत संघ जाने की थी। आगे से ट्रेन में सफर करते हुए राहुल सोवियत संघ की सीमा में प्रवेश किये। ट्रेन में सोवियत संघ के विविध रूपों को देखते हुए लगभग छह दिन का सफर तय करके वे मास्को पहुँचे। वहाँ की समाजवादी व्यवस्था देखकर राहुल बहुत प्रभावित हुए। वहाँ से वे ईरान और अफगानिस्तान के रास्ते होते हुए भारत लौटे।

यह यात्रा बहुत कठिन थी। इस बीच अध्ययन-लेखन के कारण उनका स्वास्थ्य बुरी तरह खराब हो चुका था। उन्हें टायफायड हो गया। अपनी इस पहली बड़ी बीमारी का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है, “ 30 दिसम्बर से 3 जनवरी, पाँच दिन तक मैं बेहोश रहा…..। यह सुनकर बड़ी खुशी हुई कि मैंने राम या भगवान का नाम बेहोशी में भी नहीं लिया। मेरे नास्तिक होने का यह एक पक्का सबूत था।  मौत के लिए मुझे जरा भी हर्ष-विषाद नहीं था, लेकिन यह ख्याल जरूर आता था कि  धर्मकीर्ति के प्रमाणवार्तिक को पूरा संपादित करके मैं प्रकाशित नहीं कर सका।” ( मौत के मुँह में, पृष्ठ-236)

टायफायड से उबरने में राहुल को समय लगा। वे बहुत कमजोर हो चुके थे। किन्तु वे फिर से तिब्बत जाने का मन बना चुके थे। थोड़ा ठीक होने पर 1936 में वे फिर से तिब्बत की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ सा-क्या के प्रसिद्ध बौद्ध मठ में उन्हें दसवीं- ग्यारहवीं सदी की अनेक बहुमूल्य पोथियाँ मिलीं।यहाँ तीन महीने रहकर उन्होंने इन पोथियों का गंभीर अध्ययन किया।

तिब्बत से लौटने के बाद सोवियत संघ को देखने-जानने की अभिलाषा राहुल के भीतर फिर से बलवती हो उठी। 1937-38 में ईरान होते हुए वे फिर से सोवियत संघ पहुँचे। लेलिनग्राद में रहते हुए उन्होंने महासोवियत के विशाल चुनाव प्रचार को देखा। राहुल की भेंट वहाँ ‘रामचरितमानस’ का रूसी में अनुवाद करने वाले महान विद्वान वारान्निकोव से हुई। लेनिनग्राद के विश्वप्रसिद्ध संग्रहालय से वे जुड़ गये।  वहाँ उनकी सेक्रटरी बनीं रूसी विदुषी महिला एलेना नारवेरतोवना कोजेरोव्स्काया उर्फ लोला। लोला अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, मंगोल आदि भाषाएं जानती थीं। राहुल उन्हें संस्कृत पढ़ाने लगे। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के नजदीक आने लगे और फिर विवाह बंधन में बँध गये।

राहुल लोला को बहुत प्यार करते थे किन्तु उन्हें तिब्बत की एक और यात्रा करनी थी जिसके लिए बिहार सरकार ने छह हजार रूपए मंजूर किये थे। राहुल अपनी पत्नी से बिदा होकर उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान होते हुए 26 जनवरी 1938 को भारत पहुँचे। सोवियत संघ से लौटने पर राहुल पूरी तरह बदल चुके थे और कम्युनिस्ट बन चुके थे किन्तु अपना बौद्ध भिक्षु का चीवर उन्होंने नहीं छोड़ा था क्योंकि तिब्बत की यात्रा की सफलता के लिए अब भी बौद्ध भिक्षु का आडम्बर जरूरी था।

राहुल ने 1938 में चौथी बार तिब्बत की यात्रा की। इस बार की यात्रा में उन्हे श-लू बौद्ध बिहार से ज्ञानश्री के 12 ग्रंथ मिले। साथ ही ‘योगाचार भूमि’ का खंडित अंश एवं कई पुराने चित्रपट मिले जिनकी उन्होंने तस्वीरें लीं। इसबार तिब्बत वे कलकत्ता आए और आने के पहले ही दिन संवाददाताओं को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अब वे साम्यवाद प्रभावित सक्रिय राजनीति में भाग लेने जा रहे हैं।

उन्होंने लिखा, “मैंने ग्यारह वर्षों से राजनीतिक क्षेत्र को छोड़ रखा था। यह अच्छा ही हुआ जो कि मैंने अध्ययन, अनुसंधान और पर्यटन में इतना समय देकर अपनी एक बड़ी लालसा की पूर्ति कर ली। मैं पहिले भी राजनीति में अपने हृदय की पीड़ा दूर करने के लिए आया था। गरीबी और अपमान को मैं भारी अभिषाप समझता था। असहयोग के समय भी मैं जिस स्वराज की कल्पना करता था, वह काले सेठों और बाबुओं का राज नहीं था। वह राज था, किसानों और मजदूरों का, क्योंकि तभी गरीबी और अपमान से जनता मुक्त हो सकती है।” ( राहुल वाड़्मय, खण्ड—1, जिल्द-2, पृष्ठ-303)

अब राहुल एक कर्मयोगी योद्धा के रूप में किसान आन्दोलन में कूद पड़े। अमवारी किसान सत्याग्रह में उन्होंने हिस्सा लिया और लाठियाँ खाई। उनका सिर फट गया था जिससे जनता में व्यापक रोष था। 24 फरवरी से 10 मई 1939 तक वे जेल में बंद थे। इस बीच राहुल ने जेल में ही कई बार भूख हड़ताल की।  अब भी राहुल ने अपना चीवर नहीं त्यागा था। कारावास की सजा के दौरान ही 14 मार्च 1939 को सोवियत संघ से आचार्य श्चेरवात्स्की का पत्र मिला जिसमें लिखा था कि लोला ने एक स्वस्थ, सुंदर पुत्र को जन्म दिया है। पत्र के साथ फोटो भी था।

      20 अक्टूबर 1939 को बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी की पहली बैठक हुई। उस वक्त पार्टी गैरकानूनी थी इसलिए बैठक गुप्त रूप से गंगा के किनारे एक मकान में हुई। इसमें पाँच सदस्यों की एक राज्य कमेटी गठित हुई जिसके सदस्य थे- सुनील मुखर्जी, राहुल सांकृत्यायन, अली अशरफ, ज्ञान विकास मैत्र और विनोद बिहारी मुखर्जी। 1940 में राहुल प्रान्तीय किसान सभा के सभापति चुने गये। मोतीहारी में आयोजित इस सभा में स्वामी सहजानंद सरस्वती, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण आदि ने सम्बोधित किया था। पुलिस की निगाह में राहुल सबसे खतरनाक व्यक्ति बन चुके थे और अंत में उन्हें भारत रक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया।

      इस बार राहुल को 29 महीने की जेल हुई। पहला कारावास उनका हजारीबाग जेल में बीता और 1941 में अपने कुछ साथियों के साथ वे देवली कैंप में ले जाए गये। इन 29 महीनों के कारावास के दौरान राहुल ने‘मेरी जीवन यात्रा’,‘दर्शन दिग्दर्शन’, ‘मानव समाज’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘विश्व की रूपरेखा’, ‘बोल्गा से गंगा’ और इसके अलावा आठ नाटक लिखे।23 जुलाई 1942 को वे रिहा हुए।

राहुल अपने विचारों से कभी भी समझौता करने वाले व्यक्ति नहीं थे। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के पश्चात शीर्ष किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्र ‘हुंकार’ का उन्हें सम्पादक बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं में चार अंकों हेतु ‘गुण्डों से लड़िए’ शीर्षक से एक विज्ञापन जारी किया। इसमें एक व्यक्ति गाँधी टोपी व जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था। राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इन्कार कर दिया। मगर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानन्द ने इसे छापने पर जोर दिया। अन्तत: राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन से ही अलग कर लिया। इसी प्रकार सन् 1940 में ‘बिहार प्रान्तीय किसान सभा’ के अध्यक्ष के रूप में जमींदारों के आतंक की परवाह किये बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतरकर और हाथ में हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे थे, जहाँ ज़मींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार करके उन्हें लहूलुहान कर दिया था। मगर वे हिम्मत नहीं हारे। कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य रहते हुए भी राहुल अपनी वैचारिक दृढ़ता पर कायम रहे। सन् 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छपे भाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया था एवं जो भाषण दिया था, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। परिणामस्वरूप पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा, परन्तु उनके तेवर कभी नहीं बदले।

अपने जीवन के पचास साल पूरे होने पर 12 अप्रैल 1943 को बाबा नागार्जुन के साथ राहुल अपने गाँव के लिए रवाना हुए। वे घूम- घूम कर अपने बचपन से जुड़ी स्म़ृतियों का साक्षात्कार करना चाहते थे। राहुल का कठिन हृदय गाँव के परिचितों के बीच पहुँचते ही द्रवित हो उठा।आंखों से आँसू झरने लगे। उन्होंने लिखा है, “ नेत्रों को सूखा रखने और स्वर को ठीक करने के लिए भारी प्रयत्न करना पड़ा। ….पंदहा में घुसने पर परिचित मिले वृद्ध लौहर नाना। अश्रुगद्गद कंठ से ‘कुलवंती के पूत-केदार’ कहना और फिर गले से लिपट जाना मेरे धैर्य पर जबरदस्त प्रहार करने के लिए काफी था…..। कुलवंती के पुत्र, रामशरण पाठक के नाती केदारनाथ को देखने के लिए गाँव के लोग आने लगे। “(राहुल वाड़्मय,खण्ड-1, जिल्द-2, चौंतीस साल बाद जन्मग्राम में, पृष्ठ-381)

दूसरे दिन राहुल अपने पितृग्राम कनैला गये। कनैला के लोगों को राहुल के आने की सूचना हो चुकी थी। वे राहुल को हाथी पर बैठाकर ले जाने के लिए आए थे। राहुल ने दोपहर का भोजन अपने अनुज श्यामलाल पाण्डेय के यहाँ किया। भोजन समाप्त होते समय राहुल की प्रथम पत्नी पास आकर रोने लगीँ। राहुल बहुत असहज हो गये थे।

अब राहुल के भीतर अपनी रूसी पत्नी और बेटे को देखने की लालसा हिलोरें मार रही थीं।  इसी बीच लेलिनग्राद विश्वविद्यालय से राहुल को प्रोफेसर का पदभार सम्हालने का आमंत्रण मिला। राहुल ने अपनी स्वीकृति भेज दी। इस बार वे ईरान के रास्ते सोवियत संघ गये। द्वितीय विश्व-युद्ध के कारण सोवियत संघ का वीजा मिलना कठिन था। उन्हें तेहरान में 7 नवम्बर 1944 से 2 जून 1945 तक बीजा की प्रतीक्षा के लिए रुकना पड़ा। इस बीच 3 मई 1945 को बर्लिन में हिटलर ने आत्महत्या कर ली। परिस्थितियां तेजी से बेहतर होने लगीं और  अंतत: 3 जून को राहुल विमान से  मास्को पहुँचे। लेलिनग्राद विश्वविद्यालय में राहुल अध्यापन करने लगे। सोवियत संघ में रहने के दौरान ही भारत की आजादी की खबर राहुल को मिल रही थी। राहुल आजाद भारत को देखना चाहते थे। अंतत: 17 अगस्त 1947 को राहुल भारत लौट आए।

इस तरह राहुल का पूरा जीवन घुमक्कड़ी में बीत गया। घुमक्कड़ी के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा है कि घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। घुमक्कड़ों के काफिले न आते- जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती। अमेरिका अधिकतर निर्जन सा पड़ा था। एशिया के कूपमंडूक को घुमक्कड़ धर्म की महिमा भूल गयी, इसलिए उन्होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं गाड़ी। दो शताब्दियों पहले तक आस्ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन, भारत को सभ्यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अक्ल नहीं आयी कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते।

राहुल जहाँ भी वे गये वहाँ की भाषा व बोलियों को सीखा और इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज व साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया। तिब्बत और चीन के यात्रा काल में उन्होंने हजारों ग्रंथों का उद्धार किया और उनके सम्पादन और प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त किया, ये ग्रन्थ पटना संग्रहालय में है। 1948 में ही हिमाचल का भविष्य बता चुके थे राहुल सांकृत्यायन - In Himachal | इन हिमाचल |

1947 से ही राहुल के भीतर मधुमेह के लक्षण दिखाई देने लगे थे। 1949 में कलिंगपोड़् में रहते हुए राहुल के जीवन में टाइपिस्ट के रूप में कमला जी आईं और बाद में वे सहधर्मिणी हो गयीं। 1950 में कमला जी से उन्होंने विवाह कर लिया। इसके बाद कमला जी के साथ वे मसूरी में स्थाई रूप से रहने लगे। यहीं 1953 में उनकी बेटी जया और 1955 में बेटे जेता का जन्म हुआ।

1961 से राहुल के भीतर स्मृति-भ्रंशता के लक्षण दिखाई देने लगे। भारत में इलाज से उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। उन्हें सोवियत संघ ले जाया गया। वहाँ लोला और इगोर उन्हें देखने आए किन्तु राहुल उन्हें पहचान न सके। अंतत: उन्हें भारत लाया गया और 23 मार्च 1963 को यह अनोखा महापंडित दार्जीलिंग में सदा-सदा के लिए सो गया।

      राहुल राष्ट्र के लिए एक राष्ट्र भाषा के प्रबल हिमायती थे। वे राष्ट्रभाषा तथा जनपदीय भाषाओं के विकास व उन्नति में किसी प्रकार का विरोध नहीं देखते थे। इतना ही नहीं, उर्दू की भी वे उतनी ही कद्र करते थे। वे कहते हैं, ’’सौदा और आतिश हमारे हैं। गालिब और दाग हमारे हैं। निश्चय ही यदि हम उन्हें अस्वीकृत कर देते हैं तो संसार में कहीं और उन्हें अपना कहने वाला नहीं मिलेगा।

हिन्दी आदिकालीन साहित्य का अनुशीलन करके राहुल हिन्दी साहित्य के इतिहास को लगभग दो सौ साल पूर्व ले गये। इसी तरह ‘दक्खिनी हिन्दी काव्यधारा’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य के दायरे को विस्तृत किया। 

राहुलजी अद्भुत वक्ता थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने राहुल जी की भाषण-कला की प्रशंसा करते हुए कहा था, “मैं गोष्ठियों, समारोहों, सम्मेलनों में वैसे तो बेधड़क बोलता हूँ लेकिन जिस सभा, सम्मेलन या गोष्ठी में महापंडित राहुल सांकृत्यायन होते हैं, वहाँ बोलने में सहमता हूँ। उनके व्यक्तित्व एवं अगाध विद्वत्ता के समक्ष अपने को बौना महसूस करता हूँ।” उन्हें ‘मध्य एशिया का इतिहास’ नामक ग्रंथ पर 1958 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तथा 1963 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से विभूषित किया।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की लगभग डेढ़ सौ पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें प्रमुख हैं, ‘सतमी के बच्चे’, ‘वोल्गा से गंगा’, ‘बहुरंगी मधुपुरी’, ‘कनैला की कथा’, (कहानियाँ) ‘बाईसवीं सदी’, ‘जीने के लिए’,’सिंह सेनापति’, ‘जय यौधेय’, ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’, ‘मधुर स्वप्न’, ‘राजस्थान निवास’, ‘विस्मृत यात्री’, ‘दिवोदास’ (उपन्यास) ‘मेरी जीवन यात्रा’ ‌‌‌‌‌(आत्मकथा) ‘सरदार पृथ्वीसिंह’, ‘नए भारत के नए नेता’, ‘बचपन की स्मृतियाँ’, ‘अतीत से वर्तमान’, ‘स्तालिन’, ‘लेनिन’, ‘कार्ल मार्क्स’, ‘माओ-त्से-तुंग’, ‘घुमक्कड़ स्वामी’, ‘मेरे असहयोग के साथी’, ‘जिनका मैं कृतज्ञ’, ‘वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली’, ‘सिंहल घुमक्कड़ जयवर्धन’, ‘कप्तान लाल’, ‘सिंहल के वीर पुरुष’, ‘महामानव बुद्ध’ (जीवनियाँ) ‘लंका यात्रावली’,‘मेरी यूरोप यात्रा’,‘जापान’, ‘ईरान’, ‘किन्नर देश की ओर’,‘घुमक्कड़ शास्त्र’, ‘एशिया के दुर्गम खंडों में’,‘चीन में क्या देखा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘रूस में पच्चीस मास’, ‘विश्व की रूपरेखा’, ‘दार्जीलिंग परिचय’, ‘कुमाऊं’, ‘गढ़वाल’, ‘नेपाल’, ‘हिमालय प्रदेश’, ‘जौनसागर देहरादून’ (यात्रा साहित्य) ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘बौद्ध दर्शन’ (दर्शन) ‘शासन शब्दकोश’, ‘राष्ट्रभाषा कोश’ (कोश) ‘साम्यवाद ही क्यों’, ‘दिमागी गुलामी’, ‘क्या करें’, ‘तुम्हारी क्षय’, ‘सोवियत न्याय’, ‘राहुल जी का अपराध’, ‘सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास’, ‘मानव समाज’, ‘आज की समस्याएं’, ‘आज की राजनीति’, ‘कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं’। (राजनीति), ‘वादन्याय’, ‘प्रमाणवार्तिक’, ‘अध्यर्धशतक’, ‘विग्रहव्यावर्तनी’, ‘प्रमाणवार्तिकभाष्य’, ‘प्र.वा. स्ववृत्ति टीका’, ‘विनयसूत्र’ (संस्कृत धर्म- दर्शन /संपादन) ‘विश्व की रूप रेखा’, ‘तिब्बत में बौद्ध धर्म’, ‘पुरातत्व निबंधावली’, ‘आदि हिन्दी की कहानियाँ’, ‘दक्खिनी हिन्दी काव्यधारा’, ‘सरल दोहा कोश’, ‘मध्य एशिया का इतिहास’, ‘ऋग्वैदिक आर्य’, ‘भारत में अंग्रेजी राज के संस्थापक’ (साहित्य और इतिहास) आदि। इसके अलावा उन्होंने लगभग एक दर्जन पुस्तकों का अनुवाद किया है।

       हमारा समाज पूज्य का पूजन नहीं करता, दानवों, दैत्यों, गुंडों और हत्यारों का पूजन करता है। राहुल को यथोचित सम्मान नहीं मिला। फिर भी उनकी परंपरा खत्म नहीं हुई है। हम महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जन्मदिन पर उनके अद्भुत व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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