ललित सर
शख्सियतसंस्मरण

उदात्त और कर्मठ व्यक्तित्त्व के धनी ललित सर

 

ललित सर नही रहें! कुछ दिन तक तो यह महसूस नहीं कर पाया, क्योंकि उनसे नियमित मुलाकात तो होती ही नहीं थी। मगर तीन-चार माह के अंतराल के लगभग मुलाकात हो जाती थी। पिछले आठ-दस वर्षों से यही क्रम रहा। अक्सर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, एप्सो, इंटेक या अन्य किसी साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच से वे बुलाते थे। हम लोग अक्सर जाते थे। संख्या कम-अधिक होते रहती थी। सर संतोष व्यक्त करते थे, कवर्धा से आये हैं। समयलाल भैया के कारण पिपरिया को कभी नहीं भूलते थे। कवर्धा-पिपरिया उनके लिए एक ही था।

लेकिन एक अहसास घर करता गया! लोगों के पोस्ट देखकर। सब उन्हें कितना चाहते हैं! उनके निधन के बाद पहली बार जब छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की बैठक हुई तब एक अजीब सी कमी महसूस हुई थी, क्योंकि पिछले आठ-दस वर्षों से जबसे मैं सम्मेलन से जुड़ा हूँ, ऐसा कभी नहीं हुआ था। लेकिन इस हक़ीक़त को दिल को स्वीकार करना ही पड़ा। अब तो उन्हें गुजरे एक साल हो गए हैं मगर फिर भी ऐसा लगता है अचानक उनका फोन आएगा और पूछेंगे “अजय कवर्धा से तुम लोग आ रहे न! “

ललित सर की जो सबसे बड़ी बात मुझे लगी वह है उनका उदात्त और सहज व्यक्तित्व। कार्यक्रमों में वे सबसे बिना ‘छोटे-बड़े’ के भेद के बात करते थे, उनका हाल पूछते थे। चाय-नाश्ता-खाना का पूछते थे। यहाँ तक कि उन्हें ध्यान रहता था कि हम लोग बस या कार से पांच बजे-छः बजे शाम के लगभग रायपुर से निकल रहे हैं तो नौ के आसपास कवर्धा पहुचेंगे, इसलिए वे उस समय फोन करके पूछते थे कि पहुंच गए या नहीं।

 कार्यक्रमों में बहुत व्यस्त रहते थे। कार्यक्रम शुरू होने का समय जैसे ही आता वे घूम-घूमकर सबको बैठने को कहने लगते। यही क्रम भोजन अथवा टी ब्रेक के बाद भी चलता। कार्यक्रम निर्धारित समयानुसार नहीं चलती तो उनके चेहरे में बेचैनी साफ दिखाई देने लगती।

ललित सर अनुशासन प्रिय थे। ख़ुद पालन करते थे और दूसरों से अपेक्षा भी रखते थे। धमतरी रचना शिविर (2017) की एक घटना मैं भूल नहीं पाता। वहाँ यह नियम था कि सब लोग भोजन, नाश्ता, चाय के बाद अपना बर्तन स्वयं साफ करें। सभी पालन कर रहे थे। एक दिन चाय के बाद किसी ने बिना कप धोए उसे बेसिन में रख दिया। ललित सर स्वयं थोड़े गुस्से में उसे धोने लगें। सब को पता लगा तो अवाक रह गए। कार्यक्रमों में कुर्सियां ठीक करते तो उन्हें कई बार देखा जाता था। खाना अक्सर लाइन के आख़िरी में रहकर लेते। ज़ाहिर है यह सब उनसे सहज ढंग से होता था, उनमें प्रदर्शनप्रियता की तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

मैं 1998-99 में अक्षर पर्व के एक दो अंक देखे थे। ललित सर का नाम पढ़ा रहा होऊंगा मगर याद नहीं है। सन 2005 तक मुझे उनकी कोई स्मृति नहीं है। इस अवधि में ‘हंस’ पढ़ता था, बाकी पत्रिकाएं यदि अंक मिल जाए तो पढ़ो ऐसा था। ‘हंस’ भी बहुत जुगाड़ से मिलता था, जिसे 2002 के लगभग से पढ़ना शुरू किया। अखबार में केवल दैनिक भास्कर देख पाता था। देशबन्धु से अनभिज्ञ था।

सन 2005 में मेरे मित्र उमेश पाठक ने बताया कि देशबन्धु (इंटैक) द्वारा ‘सकरी’ नदी यात्रा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमे हम लोगों को भी जाना चाहिए। याद नहीं की कोई फॉर्म भरे थे या नहीं मगर हम लोग, यानी मैं, राजेश और उमेश तैयार हो गए। यात्रा के एक दिन पहले रायपुर से दल सर्किट हाउस कवर्धा में आया कुछ भाषण हुए। हम लोगों को बैग और टी शर्ट दिया गया। वहाँ से शाम को चिल्फी ले जाया गया। जहाँ रात्रि विश्राम के बाद सुबह हमे चिल्फी रेंगखार में मुड़वाही के पास ले जाया गया, जहाँ से सकरी नदी का उद्गम माना जाता है। ललित सर मैम के साथ वहाँ तक आये थे, फिर हम लोग मुड़वाही से सकरी नदी के किनारे-किनारे शाम को भोरमदेव पहुंचे। वहाँ सर अपनी टीम के साथ उपस्थित थे। इस तरह तीन दिन तक पैदल सकरी नदी की यात्रा करते हम बेमेतरा जिला के ग्राम गोपालभौना पहुंचे जहाँ सकरी नदी और हाफ नदी का संगम है। इस पूरी यात्रा में सर लगातार अपनी टीम के साथ व्यवस्था में लगे रहते थे। पिपरिया क्षेत्र में समयलाल जी और डॉ. मनोहर चन्द्रवंशी भी सहयोगी रहे। वहाँ से रायपुर गए जहाँ समापन कार्यक्रम हुआ।

 इस यात्रा मे मुझे याद नहीं कि ललित सर से कुछ बात भी किया होऊंगा। आदत ही कुछ ऐसी बन गई है! इसके बाद फिर कोई सम्पर्क नहीं। इस बीच एक दो बार ‘अक्षर पर्व’ में प्रकाशन के लिए गज़लें पोस्ट किया मगर प्रकाशित नहीं हुई। एक बार रचना लौटकर आई तो साथ में एक दो लाइन की टिप्पणी थी “आपकी रचनाओं के विचार अच्छे हैं मगर प्रस्तुतिकरण पर अभी और मेहनत कीजिये और अच्छे शायरों को पढ़िए” कुछ इस तरह के भाव थे। ज़ाहिर है उम्र के उस पड़ाव में आहत अधिक होते हैं, अपनी कमियों पर ध्यान कम देते हैं।

 इसके बाद सन 2008 में छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य अधिवेशन भिलाई में हुआ। 2008 में ही जनवरी में रवि श्रीवास्तव जी एक कवि सम्मेलन में कवर्धा आए थे उसमे मैं भी शामिल हुआ था। सम्भवतः मेरे विचारों के कारण उन्होंने मेरा नम्बर नोट कर लिया था और जब प्रलेस का अधिवेशन हुआ तो मुझे आमंत्रित किया। वहाँ ललित सर को पुनः देखा, सफेद कुर्ता-पैजामा पहने वे एक सत्र का संचालन कर रहे थे। बहस का विषय सम्भवतः लोक पर संकट को लेकर था। वे हर जिले से बोलने के लिए प्रतिनिधि बुला रहे थे। कबीरधाम जिले से सम्भवतः केवल मैं ही गया था। डरते-झिझकते मैंने अपने नाम की चिट उन तक पहुँचा दिया। वे ख़ुश हो गए कि कवर्धा से कम से कम कोई तो आया है। मुझे बुलाया गया तो मुश्किल से दो-तीन मिनट बोला जिसमे मेरा मुख्य जोर लोक और नागर का विभाजन न कर सर्वहारा की बात करने की रही। इसमे मैंने डॉ रामविलास शर्मा का जिक्र किया था। सम्भवतः मैंने ठीक-ठाक बोला था क्योंकि अध्यक्षीय भाषण में खगेन्द्र ठाकुर जी ने मेरा दो बार जिक्र किया और बोलने के बाद मेरा पीठ थपथपाया था। यहाँ भी मैंने ललित सर से कोई बात नहीं की थी।

 मैं अपने ढंग से लिखता पढ़ता रहा। एक-दो लघु पत्रिकाओं में रचनाएं छपती भी रही। 2010-11 के लगभग मित्र सुनील गुप्ता ‘तनहा’ ने शारदा संगीत विद्यालय कवर्धा में साहित्यिक कार्यक्रम रखा था, जिसमे समयलाल विवेक जी पिपरिया से आये थे। यों तो उनसे 2005 में सकरी नदी यात्रा के समय मुलाकात हो गई थी मगर उनसे कोई सम्पर्क नहीं था। इस कार्यक्रम में उनसे बातें हुईं फिर मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हुआ। इस मुलाकात में समयलाल जी ने बताया कि वे जैसे मुझे ढूंढ रहे थे। कारण पूछने पर बताया कि ललित भैया मुझे अक्सर कहते हैं कि कवर्धा में एक अजय चन्द्रवंशी है, उनसे जरूर सम्पर्क करों। मुझे खुशी हुई कि ललित सर जैसा व्यक्ति मुझे याद रखते हैं। सम्भव है अक्षर पर्व में रचनाएं भेजने, एकाध लघु पत्रिका में छपने और प्रलेस के राज्य अधिवेश के कारण उनको मेरा ध्यान रहा हो।

 इसके बाद समयलाल जी के साथ हम लोगों का छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, एप्सिको, इंटेक के कार्यक्रम में रायपुर जाना प्रारम्भ हो गया। इसी बीच 2012 में शाक़िर अली जी भी कवर्धा आ गए जिससे कवर्धा के साहित्यिक कार्यक्रमों में गतिशीलता आयी। उनके साथ और सम्पर्क से भी हम लोग रायपुर, दुर्ग-भिलाई, बिलासपुर, जगदलपुर आदि जगह कार्यक्रमों में जाने लगें।

 रायपुर के कार्यक्रमों में लगातार जाते रहने से ललित सर से सम्पर्क बढ़ता गया। हमने कवर्धा में भी पाठक मंच का गठन कर लिया और पुस्तक पढ़कर उसकी रिपोर्ट भेजते रहे। छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य के सम्मेलनों में सर अक्सर खैरागढ़ और कवर्धा के पाठक मंच की सक्रियता की तारीफ़ करते थे।

 इस दौरान सर एक-दो बार जबलपुर से लौटते वक्त कवर्धा और पिपरिया में थोड़ी देर रुकते रहे जिससे उनके लगाव का पता चलता है। वे थोड़ी देर के लिए भी रुकते तो साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में ही बात करते और प्रोत्साहित करते।

 धीरे-धीरे मुझे सम्मेलन के कार्यक्रमों में कविता पढ़ने का अवसर मिलने लगा। शुरुआत में ग़ज़ल ही पढ़ा करता था, और मुझे इस रूप में ही लिया जाता रहा। फिर कविताएं पढ़नी शुरू की बहुत छोटी-छोटी हुआ करती थी।

मेरा आलोचनात्मक गद्य और भोरमदेव के इतिहास पर लगाव पहले से था, पढ़ता रहता था, लिखता कम था। इसका एक कारण छपने के लिए किसी मंच का न होना भी था। फेसबुक से जुड़ने से एक मंच मिला तो लिखता गया। पाठक मंच की किताबों पर भी लिखता रहा। कई लोगों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। ललित सर भी जब भी मिलते प्रोत्साहित करते। देशबन्धु और नवभारत के रविवारीय अंक में कई आलेख छपे। अक्षर पर्व में भी कविताएं और और आलेख छपें।

 ललित सर को इससे अवश्य ख़ुशी होती थी। वे लिखने पढ़ने वाले युवाओं को बहुत प्रोत्साहित करते थे। मेरी तरह और मुझसे पहले भी कई लोग थे जिनको उन्होंने खूब प्रोत्साहित किया। इस तरह मैं सम्मेलन से जुड़ता गया और मुझे 2019 का सम्मेलन का ‘राजनारायण मिश्र स्मृति पुनर्नवा पुरस्कार’ प्रदान किया गया।

जनवरी 2020 में सम्मेलन का यह पुरस्कार-सम्मान वितरण कार्यक्रम हुआ और मार्च के आते-आते कोरोना का तांडव शुरू हुआ। देशभर में लॉकडाउन हुआ। इस बीच सर ने एक बार मुझे फोन कर अपने आस-पास के जरूरतमंद लोगों की अपने ग्रुप के साथ मदद करने को कहा था। लॉक डाउन बढ़ता गया, फिर थोड़ी ढील मिली। हमेशा सक्रिय रहने वाला व्यक्ति को इस तरह ठहराव खलता है। वाट्सअप ग्रुप में सर ने एक-दो बार वृंदावन हाल में सीमित संख्या में कार्यक्रम करने की इच्छा जाहिर की थी, मगर यह हो न सका। फिर अचानक उनकी बीमारी और इलाज के लिए दिल्ली जाने की सूचना मिली। वे व्यक्तिगत रूप से भी वाट्सअप से अपने स्वास्थ्य लाभ की सूचना देते रहे और सम्मेलन के एक ऑनलाइन काव्य-गोष्ठी में वे स्वस्थ भी नज़र आये। फिर उसके बाद नवम्बर 2020 के आखिर में उनके अस्वस्थ होने की सूचना मिली और अंततः दो दिसम्बर को वह मनहूस घड़ी आ गई जब उनके निधन का समाचार मिला।

 ललित सर के साथ कई छोटे-बड़े कार्यक्रमों की स्मृतियां है। नवम्बर 2019 में वे और महेंद्र मिश्र जी एप्सिको के जिला ईकाई कबीरधाम के तत्वधान में गाँधी जी की महत्ता पर कार्यक्रम में आये थे और भाषण किए थे। यह कवर्धा में उनका आखिरी कार्यक्रम साबित हुआ।

 मेरा सम्पर्क सही रूप से उनसे पिछले आठ-नौ सालों से ही था। इस दौरान मैंने उनके व्यक्तित्व के विविध आयाम देखे। कई ऐसे लोगों को देखा जिन्होंने अपनी आत्मकथा अथवा कोई अन्य किताब सर के बार-बार प्रेरित करने पर लिखी है। उनके लगन और व्यक्तित्व को देखकर बहुत लोग कार्यक्रमों में सहयोग करते थे। वे बहुत कम संसाधन में जन सहयोग के कार्यक्रम करा लेते थे। लेकिन मैंने कभी नहीं देखा कि उन्होंने किसी प्रतिक्रियावादी विचारधारा के व्यक्ति को मंच दिया हो या उनसे सहयोग लिया हो। हाँ वे लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास रखते थे और व्यक्ति लोकतांत्रिक हो तो उससे गुरेज नहीं करते थे। उनके सारे कार्यक्रम कहीं न कहीं प्रगतिशील जीवन मूल्यों को आगे बढ़ाने वाले ही होते थे।

 सर नए लोगों को बेहद प्रोत्साहित करते थे। अपनी पीढ़ी का तो हमने देखा है, मगर उनके निधन के बाद उनसे सम्बन्धित संस्मरणों को पढ़ने से पता चलता है कि वे हमेशा से ऐसा करते रहे हैं। देशबन्धु और अक्षर पर्व में बहुतों को छापा, बहुतों को पत्रकारिता से जोड़ा और प्रशिक्षित किया। यही कारण है कि देशबन्धु को पत्रकारिता की पाठशाला कहा जाता है। उनके जाने के बाद उनके प्रति लोगों का प्यार अकारण नहीं है।

 उनका कार्यक्षेत्र बहुत विस्तृत था। वे बहुत प्रकार के लोगों और संस्थाओं से जुड़े थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने बहुत से कार्य किये होंगे। ज़ाहिर है इन सब के अलावा वे भी एक इंसान थे। जीवन के इस यात्रा में कई लोगों की उनसे सहमति-असहमति रही होगी, कुछ चुकें हुई होंगी। उनके मित्र, उनके सहकर्मी इसे बेहतर जानते होंगे, मगर उनके जीवन की सकारात्मकता इतना विशाल है कि लोग उनके उदात्त व्यक्तित्व को ही याद रखते हैं। आज जब वे नहीं हैं तो उनके दिखाए रास्ते और उनका विजन जो कि प्रगतिशील-लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे ले जाने का है, को आत्मसात करना और आगे ले जाना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी

 

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लेखक ‌कवर्धा (छ.ग.) में सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी हैं। सम्पर्क +91989372832, ajay.kwd9@gmail.com

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