देश

शिक्षक ही बना सकते हैं विश्व गुरु

 

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में हमने स्पष्ट रूप से इस बात को मान है कि देश की शिक्षा में अगर आमूल चूल परिवर्तन सकता है तो वह शिक्षकों के द्वारा ही संभव होगा। एनईपी 2020 ने शिक्षकों के लिए उनकी वर्तमान उदासीन क्रियाकलापों और सेवा विमुख शर्तों को हटाने और समय समय पर उनके कौशल विकास पर बल दिया है है। एनईपी 2020 अप्रशिक्षित और उत्साही भारतीय शिक्षक की वास्तविकता को स्वीकार करता है और कार्यकाल, वेतन और पदोन्नति की एक मजबूत योग्यता-आधारित संरचना बनाने के लिए शिक्षण पेशे को पूरी तरह से बदलने हेतु संकल्पित है। एक ऐसा तंत्र जो उत्कृष्ट शिक्षकों को प्रोत्साहित और मान्यता प्रदान करता है।

गुरु के विषय में स्वामी विवेकानंद ने बताया कि ” गुरु को मुझे पढ़ाना चाहिए और मुझे प्रकाश में ले जाना चाहिए, मुझे उस श्रृंखला में एक कड़ी बनाना चाहिए जिसकी वह स्वयं एक कड़ी है। गली का आदमी गुरु होने का दावा नहीं कर सकता। गुरु एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसने वास्तव में ईश्वरीय सत्य को जान लिया हो, वास्तव में महसूस कर लिया हो, स्वयं को आत्मा के रूप में अनुभव कर लिया हो। केवल बोलने वाला गुरु नहीं हो सकता। मेरे जैसा बातूनी मूर्ख बहुत बोल सकता है, पर गुरु नहीं हो सकता। एक सच्चा गुरु शिष्य से कहेगा, “जाओ और पाप मत करो”; और न तो वह पाप कर सकता है, न उस मनुष्य में पाप करने की शक्ति रह जाती है।

देश, समाज, विश्व उत्थान के लिए शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस शिक्षा का केन्द्र बिन्दु हमारे शिक्षक हैं। सौभाग्य से डॉ.अब्दुल कलाम का सानिध्य मुझे मिलता रहा, डॉ. अब्दुल कलाम ने शिक्षकों के लिए लिखा है कि -‘‘शिक्षक शिक्षा एक महान पेशा है जो चरित्र, योग्यता और भविष्य को आकार देता है। अगर लोग मुझे अच्छे शिक्षक के रूप में याद करते हैं तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।’’ देश के पूर्व राष्ट्रपति और सर्वोत्कृष्ट वैज्ञानिक रहे डॉ. कलाम के विचारों को जानकर मन में यह ढांढस जरूर बंधता है कि आज भी हमारे समाज में गुरुओं के प्रति अगाध सम्मान है। पुराने कालखण्ड में भारत को विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने का श्रेय यदि किसी को देना हो तो निश्चित रूप से अपने गुरुओं को दे सकते हैं। गुरुकुलों की श्रेष्ठ परम्परा, ज्ञान-विज्ञान अर्जित करने के लिए उनका समर्पण ही हमारी समृद्धि का मुख्य आधार था। प्रधानमंत्री जी के नव भारत के निर्माण का विषय हो या भारत को पुनः विश्व गुरु स्थापित करने का संकल्प हो, या इसकी आधारशिला आप लोग ही हैं।

नई शिक्षा नीति के सफल क्रियान्वयन की जिम्मेवारीः-

       यशस्वी प्रभानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व वाली सरकार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारत को वैश्विक शक्ति बनाने के लिए कृतसंकल्पित हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का यह प्रारुप हमारे सामने है। इस प्रारुप में विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापरक, व्यवहारिक, प्रोद्योगिकीयुक्त, रोजगारोन्मुख, नवाचारयुक्त, संस्कारयुक्त मूल्यों पर आधारित शिक्षा पर हमारा ध्यान केन्द्रित है। यह तभी सम्भव है जब हमारे पास सर्वोत्कृष्ट अध्यापक होंगे इसीलिए श्रेष्ठ मानकों के आधार पर विश्वस्तरीय अध्यापकों को तैयार करने हेतु प्रशिक्षण की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। उन्हें सॉफ्ट स्किल्स सिखाने की बात की गई है। चाहे स्कूली या उच्च शिक्षा हो दोनों में समयबद्ध तरीके से अध्यापकों में क्षमता विकास प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण माना गया है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं नवाचार को मुख्य आधार बनाते हुए शोध को बढ़ावा देते हुए विश्व प्रतिस्पर्धा में अपनी प्रभावी भूमिका स्थापित करने के लिए हम कृतसंकल्पित हैं।

में शिक्षक दिवस

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा- ‘‘हमारा लोकतंत्र अज्ञानता, अनुशासन और अरुचि के कारण भ्रमित हो गया है। शैक्षिक संस्थाएं हैं पर उनका सांस्कृतिक स्तर नहीं है। हमें लिखना-पढ़ना तो सिखाया जाता है पर सोचना नहीं सिखाया जाता, जो बेहतर जानते हैं, बोलने से डरते हैं।’’ सोचने का प्रशिक्षण हमें हमारा अध्यापक देगा पर अगर उसमें सोचने की क्षमता नहीं होगी फिर तो बच्चों की क्षमता का विकास करना असंभव है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अत्यन्त भव्य और उत्साहपूर्ण है, परन्तु इसका व्यवहारिक रूप से क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित होगा। यह एक चुनौती है इस सब के लिए योग्य गुरुजनों की आवश्यकता है। ऐसे गुरुओं की आवश्यकता है जो न केवल प्रखर हों बल्कि अपने कत्र्तव्य के प्रति समर्पित हों। अपने विदेशी प्रवासों के दौरान कई विद्यालय, विश्वविद्यालयों को नजदीकी से देखने का मौका मिला एक बात समझ में आई कि चाहे फिनलैण्ड हो, दक्षिण कोरिया हो, जापान, कनाड़ा हो, नार्वे, जर्मनी, अमेरिका हो इन देशों की समृद्धि और सफलता का मूल कारण उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षा है। अगर आप उच्च गुणवत्तायुक्त शिक्षा की बात करें तो उसका आधार स्तम्भ सर्वोत्कृष्ट अध्यापक है और सर्वोत्कृष्ट अध्यापक बनने के लिए सर्वोत्कृष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। हमारा यह निश्चय है कि हमारे अध्यापक विश्व स्तरीय अध्यापक हों और पूरे विश्व में भारतीय कीर्ति को फैलायें।

हम चाहते हैं कि अध्यापक स्वेच्छा से अध्यापन को चुने, मजबूरी में अध्यापक न बने। अध्यापक बनना हमारी प्राथमिकता हो। दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में इंजीनियर, वैज्ञानिक, डॉक्टरों की तर्ज पर अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाता है और उनका आर्थिक, सामाजिक स्तर इन्हीं लोगों के बराबर होता है। राष्ट्र के भविष्य के निर्माण को जो सम्मान मिलना चाहिए उसे दिलाने के लिए हम कृतसंकल्प हैं। वहीं हमारे अध्यापकों को अपनी गरिमा का पूरा ध्यान रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है।

मैं, शिक्षकों के प्रति हार्दिक आभार सम्मान व्यक्त करता हूं। भावी पीढ़ियों को जिम्मेदार नागरिक और अच्छे व्यक्ति बनने में सहायक उनके सफल प्रयास का प्रतिफल है कि भारत आज एक वैश्विक शक्ति है समाज के लिए किये गए अमूल्य योगदान हेतु मैं अपने गुरुजनों के प्रति हमेशा कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं।

कैम्ब्रिज, हार्वर्ड और मिशिगन सहित दुनिया के 100 से अधिक शीर्ष संस्थानों द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विश्लेषण किया गया।  सभी लोगों द्वारा नीति के विभिन्न पक्षों की व्याख्या करते हुए इसे ऐतिहासिक, परिवर्तनकारी और अत्यंत व्यावहारिक बताया । व्यावहारिकता और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए हमें सम्पूर्ण विश्व के संस्थानों से सराहना मिली । मैं इस नीति के सफल निर्माण का सबसे अधिक श्रेय अपने अध्यापकों को देता हूँ अपने जिन्होंने दिन-रात की मेहनत से इस नीति को साकार किया।

मैं वास्तव में इस बात से प्रभावित था कि हमारे शिक्षकों ने कोविड-19 महामारी से सफलतापूर्वक कैसे निपटा है। मुझे खुशी है कि शिक्षकों ने महामारी के दौरान दीक्षा, सामुदायिक रेडियो, शिक्षा वाणी, स्वयंप्रभा, एनआरईओआर और कई अन्य नवीन तरीकों का उपयोग किया है।

 मुझे विश्वास है कि जिस प्रकार हमारे शिक्षकों ने नीति-निर्माण में अभूतपूर्व सहयोग दिया, उसी प्रकार वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित करने में हमारी मदद करेगा । हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि “शिक्षक अनंत काल को प्रभावित करते हैं; कोई नहीं बता सकता कि उनका प्रभाव कहाँ समाप्त होता है” (हेनरी ब्रूक्स एडम्स)

रमेश पोखरियाल “निशंक”

(लेखक भारत के पूर्व शिक्षा मंत्री एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री हैं)

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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