मुद्दा

‘माहुल’ पुनर्वास स्थल, राज्य प्रायोजित जनसंहार

 

  • बिलाल खान

 

माहुल पुनर्वास सम्बन्धित जो भयावह बातें आज सामने आ रही हैं, उसकी शुरुआत 2009 में तब हुई जब ‘जनहित मंच’ नामक एक एनजीओ ने एक जनहित याचिका दायर कर तनसा वाटर पाइप-लाईन के इर्द-गिर्द बसी 30 से 50 वर्ष पुरानी झुग्गियों की बस्ती को हटाये जाने की मांग की और आरोप लगाया कि ये बस्तियाँ मुम्बई शहर को पानी पहुँचाने वाली पाईप लाईन के लिए खतरा हैं। इस पर मुम्बई उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि इस पाइप-लाईन के 10 मीटर के घेरे में बसी झुग्गियों को हटाया जाय और पात्र-विस्थापितों का पुनर्वास किया जाय। माहुल अपने जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों एवं जहरीले वातावरण के लिए जाना जाता है, इसलिए झुग्गीवासियों ने इस आदेश का पुरजोर विरोध करते हुए अन्यत्र बेहतर पुनर्वास की माँग की। भाजपा ने 2017 के निगम-चुनाव के समय वादा किया था कि तनसा झुग्गीवासियों का पुनर्वास माहुल में न कर पुनर्वास के लिए वैकल्पिक स्थल खोजेगी। यह स्पष्ट है कि भाजपा अपने वादे से मुकर गयी और इन झुग्गीवासियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध माहुल में ही बसाया गया।

माहुल की बसावट (डेमोग्राफी) ऐसी है कि वहाँ बसने वाले ही वहाँ से भागना चाहते हैं। माहुल एक सघन औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें लगभग 16 कारखाने चल रहे हैं। भारत-पेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, टाटा जैसी कई बड़ी कम्पनियों की उपस्थिति के कारण ‘माहुल’ स्वास्थ्य की दृष्टि से मानवीय बसावट के लिए उपर्युक्त नहीं है, जैसा की राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने 2015 में इसे घोषित भी किया है। इंसानों के साँस लेने के लिए यहाँ की तीक्ष्ण वायु एवं सघन उत्सर्जन उपर्युक्त नहीं है। इसके कारण माहुल में लाकर बसाये गये तीस हजार लोगों को गम्भीर स्वास्थ्य एवं पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

देखने में आता है कि दूषित वातावरण के चलते गले एवं फेफड़ों के संक्रमण के साथ चर्मरोगों में वृद्धि हो रही है। यहाँ के निवासी टीबी, दमा, कैंसर, हृदय रोग, बाल-झड़ना, त्वचा-रोगों के शिकार हो रहे हैं। कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं प्रदूषित हवा से बच्चे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

आईआईटी मुम्बई की अन्तरिम रिपोर्ट यहाँ के निवासियों की इस शिकायत की पुष्टि करती है कि उनको हो रही जलापूर्ति में पानी के ऊपर तेल की परत होती है। ये हालात यहाँ के निवासियों के लिए प्राण-घातक सिद्ध हो रहे हैं। अबतक प्रदूषण-जनित बीमारियों से 200 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

स्वास्थ्य समस्याओं में बढ़ोतरी के साथ ही यहाँ के निवासियों को आजीविका की क्षति भी हो रही है। माहुल में शहर के दूसरे हिस्से से लाकर बसाये गये परियोजना प्रभावित लोगों के लिए यातायात की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्रों तक पहुँचने में कम से कम 100 रुपये का खर्च एक तरफ से होता है, जो इनको भारी पड़ता है । समुचित स्वास्थ्य सहायता एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी आधार-भूत संरचना की कमी एवं प्रदूषित वातावरण के चलते तेजी से बढ़ती बीमारियों के कारण काफी जानें गयी हैं। यहाँ के निवासियों की समस्याएँ सिर्फ वातावरणजनित ही नहीं बल्कि अधिकारियों की उपेक्षा एवं गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का भी नतीजा हैं।

वास्तव में यह आश्चर्य की बात है कि यह भलीभाँति जानते हुए भी कि यहाँ का वातावरण रहने लायक नहीं है फिर भी यहाँ क्यों पुनर्वास स्थल बनाया गया है? क्या इसका सिर्फ यही उद्देश्य था कि लोगों को यहाँ लाकर पटक दिया जाय और पुनर्वास की जिम्मेवारी से मुक्त हो जाया जाय? या यह उद्देश्य था कि शहरी झुग्गीवासियों को यहाँ लाकर क्षरण और मौत की ओर ढकेल दिया जाय?

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के नजरिये और प्रथम दृष्टया यहाँ रहने के हालात के मद्देनजर 8 अगस्त 2018 को मुम्बई उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि किसी भी परियोजना प्रभावित व्यक्ति को माहुल में बसने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने निर्देश दिया कि जो माहुल पुनर्वास-स्थल पर बसा दिये गये हैं, सरकार उनको या तो अन्यत्र आवासित करने की संभावना तलाशे या उन्हें पर्याप्त किराया दे ताकि वे अपने रहने की व्यवस्था खुद कर सकें। न्यायालय एवं माहुल के लोगों के लिए यह चकित करने वाली बात थी जब सरकार ने अपने जवाब में कहा कि वह न तो वैकल्पिक आवास दे सकती है न ही किराया। न्यायालय ने सरकार के इस रवैये को अत्यन्त शर्मनाक बताया । सरकार ने परियोजना प्रभावितों के लिए बने वे एक लाख से ज्यादा घर देने से भी मना कर दिया जो उनके ही निमित्त थे। माहुल के लोगों एवं आन्दोलनकारियों द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत दाखिल आवेदन के जवाब में परियोजना प्रभावित लोगों के आवास सम्बन्धी यह जानकारी प्राप्त हुई।

इसके बाद की कार्यवाई में न्यायालय के आदेश के बाद आईआईटी मुम्बई द्वारा दाखिल दो अन्तरिम रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की कि माहुल में रहने के हालात सोचनीय हैं और इस बात को उजागर करती है कि माहुल के निवासियों के जीवन को कई तरह के खतरे हैं।

परिणामस्वरूप यहाँ के लोग सरकार से न्यायालय के बाहर भी आन्दोलनरत है। अम्बेडकर नगर में विद्या-विहार झुग्गी के मूल निवासी 28 अक्टूबर 2018 से धरने पर बैठे हैं। मुम्बई की भीषण गर्मी एवं कड़ाके की ठण्ड के बावजूद सड़कों पर बैठे ये प्रदर्शनकारी मांग करते रहे हैं कि उन्हें बेहतर स्थान पर अविलम्ब पुनर्वासित किया जाय। नवजात से लेकर वृद्ध तक को उनके धवस्त कर दिये गये घरों के सामने इस उम्मीद में बैठे देखा जा सकता है कि उन्हें सुरक्षित आवास उपलब्ध होगा। वे लोग उस जगह से अपने उजड़ने की दास्तान बयां करते हैं, जहाँ वे लगभग 50 वर्षों से रहते आये हैं और अब उस जगह रहने को मजबूर हैं जहाँ हर वक्त उनके सर पर बर्बादी एवं मौत का साया मँडरा रहा है। नवम्बर में माहुल के प्रदर्शनकारियों ने एक कार्यक्रम में चेम्बुर स्थित फाइन-आर्ट्स कल्चरल सेन्टर आये महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री  देवेन्द्र फड़णवीस के सामने तख्तियों के साथ प्रदर्शन किया। दिसम्बर 2018 में विद्याविहार में एक जनसंख्या में आन्दोलनकारियों ने अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर तीन किलोमीटर लम्बी मानव-श्रृंखला बनाकर इस बात पर विरोध जताया कि सरकार के पास माहुल के प्रभावित लोगों की समस्या के समाधान के लिए कोई कार्य योजना ही नहीं है । यहाँ के लोगों ने प्रभावी तरीके से अपने को एकजुट कर उन लोगों पर, खासकर जो राज्य में सत्तासीन हैं, दबाव बनाया है । इन लोगों के लगातार आन्दोलन के फलस्वरूप महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फड़णवीस को वार्ता शुरू करने के लिए बाध्य होना पड़ा। पर उन्होंने भी आवास-निर्माण विभाग एवं अन्य सम्बन्धित विभागों के उच्चाधिकारियों की एक समिति के गठन की ही बात कही जिससे बेकार नौकरशाही प्रक्रिया में इस मामले का गला घोंट दिया जाय एवं उनके कन्धों से यह जिम्मेवारी उतर जाय। यह समिति की दो देर से हुई परिणाम रहित बैठकों से स्पष्ट हो गया। परियोजना प्रभावित लोगों के लिए उपलब्ध आवास भण्डार से आवास उपलब्ध कराने के लिए सहमत होने की बजाय इस समिति ने कभी-कभी नियमों की सीमा के परे भी ऐसी हर सम्भव वजह ढूँढ़ने में लगी रही, जिससे इन्हें आवास न देना पड़े और अपना आवासीय भण्डार की सूचना दिखाई जा सके। सभी आवासीय एजेन्सियों ने यह दावा किया कि उन्होंने उनके पास उपलब्ध सम्पूर्ण आवासीय भण्डार इस समिति को उपलब्ध करा दिया है लेकिन वह इसे माहुल के निवासियों को देने के लिए इसलिए तैयार नहीं क्योंकि वे सोचते हैं, ये आवास भण्डार भविष्य की योजनाओं से प्रभावित लोगों के लिए आरक्षित रखे जाएं, जबकि सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत प्राप्त सूचना से यह बात सामने आयी है कि सभी आवासीय एजेन्सियों के दावों से ज्यादा आवासीय भण्डार उपलब्ध है।

शुक्र है कि न्यायालय ने हाल में यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार को उसके द्वारा दिये गये दो विकल्पों में से किसी एक को अगली तिथि के पूर्व तय करना होगा अन्यथा न्यायालय सरकार पर बाध्यकारी आदेश पारित करेगा।

अब केवल न्यायपालिका ही सरकार का क्रियाशील अंग है, अन्य सभी अंगों को रवैया ढुलमुल है, जिसकी कीमत माहुल के लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। वह जरूरी है कि बिना देर किए तत्काल कोई कदम उठाये जाय ताकि माहुल की निराशाजनक स्थिति को अब भी किसी सकारात्मक बदलाव का इन्तजार है। नहीं तो एक समय ऐसा भी आयेगा जब यह कहना अनुचित नहीं लगेगा कि यह वाकया समाज के गरीब तबकों का राज्य प्रायोजित नर-संहार था। हम यह न भूलें कि ‘देर से मिला न्याय, न्याय न मिलना ही है’।

अंग्रेजी से अनुवाद-बलराम सिंह

लेखक घर बचाओ घर बनाओ आन्दोलन एवं एनएपीएम मुम्बई के कार्यकर्ता हैं|

सम्पर्क – +919958660556, bilalkhan3639@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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