झूठे तारे
सिनेमा

विज्ञान और कविताओं के ‘झूठे तारे’

 

{Featured In IMDb Critics Reviews}

 

1935 के अगस्त महीने के पहले रविवार को अमेरिका सरकार ने एक आदमी को फांसी दे दी। उसके अगले ही दिन उसके सबसे प्रिय मित्र ने आत्महत्या कर ली। उनकी मित्रता की गहराई देख अमेरिका सरकार ने मित्रता दिवस मनाने की घोषणा कर दी उनके सम्मान में।

ओशो जिन्हें इस दुनिया के आधे से ज्यादा लोग सैक्सगुरु के नाम से जानते हैं। लेकिन उनके विचारों को शायद ही कोई ठीक से समझ सकता होगा। उनकी लिखी किताबें खासी चर्चित भी रही हैं युवाओं ही नहीं हर वर्ग के लोगों के बीच। उन्हीं ओशो के कुछ विचार, कुछ विज्ञान की बातें और कुछ कविताओं की बातों मसाला मिलाकर लेखक, निर्देशक तनुज व्यास ने शॉर्ट फ़िल्म बनाई नाम रखा ‘झूठे तारे’ (the lying stars)

विज्ञान और साहित्य, कविताओं की बातें एक साथ एक ही फ़िल्म में अमूमन देखने को नहीं मिलतीं। इसीलिए शायद फ़िल्म का एक पात्र जो बच्चा है उसे भी विज्ञान झूठी लगती है क्योंकि वो हमेशा खुद की बातें करती हैं। उसकी बात अगर कोई करता है तो वो है तारे और कविताएं। जिनमें वो अपने खो चुके अम्मी-अब्बू को ढूंढता है, उनसे बातें करता है। इसलिए कहता भी है एक कविता

सुनो इस आसमान के तारे,
आदमी है सारे के सारे
जैसे हम सबमें चमकता है एक तारा,
वैसे ऊंचे आसमान में झलकता एक आदमी।

तारों के आंगन में वह बच्चा अपना सरमाया ढूंढता है तो लगता है जैसे फ़िल्म का लेखक, निर्देशक भी अपनी फिल्म के लिए सरमाया ढूंढ रहा है ओटीटी का।

साल 2016 में बनकर तैयार हुई और करीब आधा दर्जन फेस्टिवल में दिखाई गई यह फ़िल्म जितनी ऊपरी-ऊपरी दिखती है उतनी ही गहरी बात भी करती है। लेकिन बावजूद इसके यह बच्चों के लायक ज्यादा लगती है। लेकिन अपने भीतर छुपे संदेश के साथ यह बड़ों को भी अच्छी लगेगी।

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विश्व की सबसे बड़ी सिनेमा की वेबसाइट आईएमडीबी पर राजस्थानी फिल्म की कैटेगरी को उसमें जुड़वाने वाले और ‘नमक’ जैसी लीक से हटकर फ़िल्म बनाने वाले निर्देशक तनुज व्यास का निर्देशन ठीक है। अब बेचारे चंद रुपए के बजट में फिल्में बनाने वाले इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स से कितना हाई-फाई क्लास का फ़िल्म बनाने की उम्मीद आप करेंगे। बावजूद इसके 15 हजार रुपए में बनकर तैयार हुई इस 20 मिनट की फ़िल्म में बच्चे अकरम के रूप में रोहित यादव , उसका एक दोस्त जयेश कुमार धीरज के रूप में, ओशो के प्रवचन सुनने वाले पुष्कर बाबा के रूप में अफ़ज़ल हुसैन अपना स्वाभाविक अभिनय करते नजर आते हैं। मंजीत महिपाल का वॉइस ओवर, विजेंद्र जोशी का म्यूजिक, के डी चारण, कैस जौनपुरी, प्रदीप अवस्थी की कविताएं इन सबका मिश्रण फ़िल्म को दर्शनीय बनाता है।

विज्ञान एक सुंदर शब्द है… इसका मतलब है जानना, विवेक – ‘ओशो’ के इस वाक्य से खत्म होने वाली, साउथ अफ्रीका, कनाडा, न्यू जर्सी, लखनऊ, गुवाहाटी आदि के आधा दर्जन फेस्टिवल्स में दिखाई गई यह फ़िल्म जब कभी भी किसी भी ओटीटी पर आए तो बिना कहे लपक सकते हैं।

अपनी रेटिंग – 3.5 स्टार

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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