सिनेमा

प्रीत में हवा, पानी का ‘नमक’ घोलती

 

{Featured In IMDb Critics Reviews}

 

लेखक, निर्देशक – तनुज व्यास
स्टार कास्ट – नेमीचंद, पूजा जोशी, अफ़ज़ल हुसैन
नैरेटर/ कथानक – अन्नू कपूर

जब पानी को सूरज की किरणें पड़ती हैं तो वह सूख कर नमक बन जाता है। लेकिन हमारे आंखों के आंसुओं को कौन सी धूप लगाई जाए। या कौन से सूरज की किरणें उसे दिखाई जाएं ताकि वह भी सूख कर नमक बन सके। वही नमक जो पानी में आसानी से घुल जाता है। वही नमक जो हम मनुष्यों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। उसी नमक वाले गाँव की कहानी है यह फ़िल्म।

देश की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील के पानी में बसे खारेपन तथा जिस जगह यह झील है यानी राजस्थान के खारपुर में एक चल रही प्रीत की कहानी को लेकर आगे बढ़ती है। राजनीति, निजीकरण, सरकार की अस्पष्ट नीतियां और उनके बीच प्रीत की ये छियापताई राजस्थानी भाषा में खूबसूरत बन पड़ी है। हालांकि इस स्थान को काल्पनिक बताया गया है जो तर्कसंगत नहीं लगता। क्योंकि देश में दूसरी सबसे बड़ी झील खारे पानी की आंध्रप्रदेश में है। हालांकि राजस्थान में जिस जगह यह फिल्माई गई है वह राजस्थान की ही सबसे बड़ी खारे पानी की झील है।

फिर भी जैसा कि फ़िल्म देखने के दौरान हमें पता चलता है जिस एक जगह के बारे में वह बताती है। वह है – राजस्थान के एक छोटे से गाँव खारपुर में एक काल्पनिक जगह, वहीं पर आधारित है इसकी कहानी,  जहां खारे पानी की झील से प्रचुर मात्रा में नमक का उत्पादन होता है।  गाँव के बारे में यह धारणा है कि इसकी हवा और पानी में भी खारापन है और इसमें जो लवणता बाहरी रूप से है वह आज इस जगह रहने वाले लोगों के भीतर भी जमा हो गई है। उनके भीतर एक ऐसा खारापन आ गया है जो कभी खत्म नहीं होगा। इसलिए एक जगह डायलॉग आता है राजस्थानी में जिसका हिन्दी में अर्थ है ‘पानी तो सूख कर नमक बन जाता है। लेकिन आँसू भी तो खारे होते हैं।’ बिल्कुल वैज्ञानिकों के शोध का निष्कर्ष भी इस बात को सही मानता है कि मनुष्य के अश्रु बिंदु का स्वाद भी खारा ही होता है।

बहरहाल नमक और दारू व्यापारियों के मेल में कुछ राजनीतिक अड़ंगे आने के कारण नमक व्यापारियों की नजरें शेष बची झील पर है। यह समाज में फैले खारेपन को तो दिखाता है लेकिन दूसरी ओर प्रेम में जब खारापन आ जाए, जब आदमी के मन में खार पैदा हो जाए तो लुगाई की क्या औकात और क्या बिसात रह जाती है। जब फ़िल्म की शुरुआत में अन्नू कपूर की आवाज में नरेशन हमें सुनाई देती है – ‘अठे री हवा पाणी में खार है। क्योंकि अठे री जमीन माथे नमक बणे है।’ तब यह और भी सोचने पर मजबूर करती है। 20 लाख टन नमक पैदा करने वाली इस जगह तथा राजस्थान का सफेद रेगिस्तान कही जाने वाले इस भूभाग में जब नमक के इस गाँव में प्रेमी जोड़े के संवाद कानों में पड़ते हैं कि यहां इस खारे गाँव की हवा में हम प्रीत घोल देंगे तो ऐसा क्या हुआ कि उनकी प्रीत में ही खारापन आ गया। और फिर वह खारापन या उस खारे नमक को कैसे घुलनशील बनाया गया ये तो फ़िल्म देखकर आपको पता चलता है।

‘ओमकारा’ फ़िल्म में रेखा भारद्वाज की आवाज में गाया गया ‘नमक इश्क का’ इस फ़िल्म को सार्थक करता है और उस गीत को भी सार्थक करता है जो रेखा ने गाया था। यह फ़िल्म हमें उस इश्क के नमक से भी रूबरू करवाती है। फ़िल्म में लोकगीत ‘थारी म्हारी प्रीत रे’ इसकी रूह है। अभिनय के मामले में भैंरु के किरदार में नेमीचंद, दुर्गा के किरदार में पूजा जोशी जमकर अपने संवादों के जरिए जो उन्हें दिए गए और जो किरदार उन्हें दिया गया उसके साथ न्याय करते नजर आते हैं। बल्कि उनमें अभिनय की भूख तथा उसके प्रति ललक भी नजर आती है। मोरुडा के रूप में अफ़ज़ल हुसैन कम समय नजर आते हैं लेकिन उनका किरदार फ़िल्म को सशक्त बनाता है।

सबसे बड़ी खूबसूरती इस फ़िल्म की अन्नू कपूर की आवाज के रुप में नजर आती है। एडिटिंग करते हुए तनुज व्यास, बुद्दा दास, ध्रुव सांखला के द्वारा की गई मेहनत भी नजर आती है। युक्ति के लिरिक्स, विजय देशपांडे का साउंड तथा 100 के लगभग लोगों की मदद से बनी यह फ़िल्म सार्थक प्रयास है। निर्माताओं में मुख्य रूप से सचिन तैलंग, धुव्र सांखला, हेमंत तथा निर्देशक का खुद का निर्माता होना भी एक राजस्थानी सिनेमा के नाम पर पड़ी लंबी रिक्तता तथा हमारे उस क्षेत्रीय सिनेमाई विलाप को भी शांत करता है, अपनी प्रेम की थपकी से उसे दुलारता है। तनुज व्यास ने इससे पहले कुछ शॉर्ट फिल्म का निर्देशन भी किया है तथा अन्नू कपूर के लिए मशहूर रेडियो शो ‘सुहाना सफ़र विद अन्नू कपूर’ के लिए भी लेखन किया है।

हालांकि फिल्म में कमियां भी नजर आती हैं, कमियों से अछूती नहीं है यह फ़िल्म बावजूद इसके क्या इस बात के लिए सराहना नहीं कि जानी चाहिए कि कोई तो है जो वास्तव में राजस्थानी सिनेमा के लिए अथक प्रयास कर रहा है। फ़िल्म कुछ चुनिंदा फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी है। महामारी के दौर में ऑनलाइन भी दिखाई गई थी। जिनमें ‘लिफ्ट ऑफ’ फ़िल्म फेस्टिवल, ‘कलाकारी फ़िल्म फेस्टिवल’, सिने सुमपज़/सुमापज़ फेस्टिवल शामिल हैं। ऐसे अच्छे क्षेत्रीय सिनेमा तथा अच्छी कहानियों का सदा स्वागत करना चाहिए। ऐसी फिल्में हमें कम से राजनीति, प्रीत तथा अन्य कई बातें मौन-मूक रूप से दे जाती हैं।

फ़िल्म की शुरुआत में चार्ली/शार्ली पत्रिका की फाउंडर 

जोज़ेफिएन डेलेमन्स का एक कथन आता है अंग्रेजी में अनुवाद कुछ यूं है – ‘क्राउडफंडिंग मात्र रुपए/धन का संग्रहण करना नहीं होता। यह कुछ मुमकिन करने के लिए है उन लोगों के सहयोग से जो विश्वास रखते हैं कुछ करने में।’ यह फ़िल्म भी उसी क्राउडफंडिंग का खूबसूरत नतीज़ा है। राजस्थान में इस तरह की कहानी भी पहले नहीं कही गई है और न ही इस अंदाज़ में, न ही इस तरह के निर्देशन के साथ कही गई है।

अपनी रेटिंग – 4 स्टार

(एक अतिरिक्त स्टार इस फ़िल्म के माध्यम से राजस्थान के सिनेमा में फिर से प्राणवायु फूंकने की कोशिश करने वालों के लिए)

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तेजस पूनियां

लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क +919166373652 tejaspoonia@gmail.com
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