gurkha regiment
देश

अदम्य साहस व बहादुरी की प्रतीक गोरखा रेजिमेन्ट

 

24 अप्रैल “गोरखा रेजिमेन्ट” के स्थापना दिवस पर विशेष

 

विश्व की बेहतरीन फ़ौजों में सुमार भारतीय फ़ौज की सबसे विध्वंसक व आक्रामक बटालियन के रूप में अपनी एक अलग पहचान रखने वाली “गोरखा रेजिमेन्ट” की स्थापना हिमाचल प्रदेश के सुबाथू में ब्रिटिश सरकार ने 24 अप्रैल को सन् 1815 को (1/1 जीआर) गुरखा राइफल्स बटालियन के साथ की थी। इस बटालियन को अब 1/3 गोरखा राइफल्स के नाम से जाना जाता है, जो आज भारतीय सेना का एक महत्वपूर्ण सैन्य-दल है। यह एक गोरखा इंफेंट्री रेजिमेन्ट है जिसमें 70 प्रतिशत नेपाली मूल के गोरखा सैनिक मुख्य रूप से शामिल हैं। मूल रूप से वर्ष 1815 में ब्रिटिश भारतीय सेना के हिस्से के रूप में इसका गठन किया गया था। लेकिन जिसने बाद में, प्रथम किंग जॉर्ज पंचम की खुद की गोरखा राइफल्स (मलऊन रेजिमेन्ट) के शीर्षक को अपना लिया गया।

वर्ष 1947 में, भारत की स्वतन्त्रता के बाद, इसे भारतीय सेना को हस्तांतरित कर दिया गया। सेना और 1950 में जब भारत एक गणराज्य बन गया, तो इसका नाम गोरखा राइफल्स (मलऊन रेजिमेन्ट) रखा गया। वर्तमान समय में यह भारतीय जवानों की ऐसी बटालियन है जिससे देश के दुश्मन इतना घबराते हैं कि वो कभी इस रेजिमेन्ट के सामने नहीं आना चाहते।

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गोरखा बटालियन को देश की सबसे खतरनाक रेजिमेन्ट कहा जाता है क्योंकि ये देश के किसी भी दुश्मन पर रहम नहीं करते हैं और उन्हें निर्ममता से मौत के घाट उतार देते हैं और यही वजह है कि दुश्मन इनका सामना नहीं करना चाहते हैं, इनको हमेशा दुश्मनों का काल कहा जाता है।

प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो हिमाचल के सुबाथू में स्थित रेजिमेन्ट के संग्रहालय में गोरखा सेना प्रमुख अमर सिंह थापा व अन्य सभी जाब़ाज गोरखा फ़ौज की बहादुरी के किस्से सुनहरे अक्षरों से स्वयं अपना परिचय दे रहे हैं। देश की आजादी से पहले व बाद के हर युद्ध में गोरखा फ़ौज ने वीरता के साथ हिस्सा लिया है। रेजिमेन्ट को हर तरह के मोर्चे पर जंग लड़ने का काफी लम्बा अनुभव है। और उसने आजादी से पहले कई औपनिवेशिक संघर्षों के साथ ही प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध सहित कई संघर्षों में भाग लिया। अंग्रेजों के लिए गोरखा सैनिकों ने दोनों विश्वयुद्धों में अपनी वीरता, अप्रतिम साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया था।

जानिए प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी कुछ ...

प्रथम विश्व युद्ध में लगभग दो लाख गोरखा सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से लगभग 20 हजार सैनिकों ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में भी लगभग ढाई लाख गोरखा जवान सीरिया, उत्तर अफ्रीका, इटली, ग्रीस व बर्मा आदि के युद्ध मोर्चे पर भी भेजे गए थे। उस विश्वयुद्ध में 32 हजार से अधिक वीर गोरखों ने अपनी शहादत दी थी। ब्रिटिश आर्मी और भारत के अलावा कई देशों की सेनाओं में गोरखा योद्धा आज भी भारी संख्या में मौजूद हैं। 

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भारत की स्वतन्त्रता के बाद के समय में भी वीर गोरखा जवानों ने अपनी वीरता का परिचय जंग के मोर्चे पर बार-बार दिया है।

वीरता इनकी पहचान, खुखरी इनकी शान, जब ...

वर्ष 1947 के बाद से रेजिमेन्ट विश्व के अलग-अलग देशों में संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न शान्ति अभियानों का हिस्सा रही है। वर्ष 1962 का चीन से युद्ध व वर्ष 1965 और वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध अभियानों में गोरखाओं ने जाब़ाजी के साथ भाग लिया था। पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हुई सभी लड़ाइयों में शत्रु के सामने अपने अदम्य साहस व बहादुरी का लोहा मनवाया था। “गोरखा रेजिमेन्ट” को इन युद्धों में वीरता के लिए अनेक पदक व सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें महावीर चक्र और परम वीर चक्र भी शामिल हैं। वर्ष 2015 तक रेजिमेन्ट को 3 परम वीर चक्र, 33 महावीर चक्र, और 84 वीर चक्र से सम्मानित किया चुका गया है।

आज 205 वर्ष बाद भी देश की रक्षा में 14 गोरखा प्रशिक्षण केन्द्र अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो उस समय ब्रिटेन, भारत व नेपाल सरकार के सहमति से गोरखा राइफल के कुछ सैनिक ब्रिटिश सेना में शामिल हुए और कुछ भारत में रह गए। प्रथम गोरखा राइफल और चतुर्थ गोरखा राइफल को मिलाकर 14 जीटीसी प्रशिक्षण केन्द्र बना है। देश की रक्षा में अपना जीवन कुर्बान करने वाले शहीदों ने इस सेंटर का नाम हमेशा गर्व से ऊँचा किया है।

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गोरखा सिपाही निडरता की ट्रेनिंग के बाद अजेय विजेता योद्धा बनते हैं। इस सेंटर से हर वर्ष बेहद कठिन प्रशिक्षण के बाद सैकड़ों अनुशासित जवानों को देश की रक्षा के लिए शपथ लेने के उपरान्त, देश सेवा के लिए बॉर्डर पर तैनात किया जाता है। जंग के मैदान में गोरखा फ़ौजियों का केवल एक ही लक्ष्य होता है कि दुश्मन का सफाया। इस रेजिमेन्ट के आदर्श वाक्य है “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो”, “शौर्य एवं निष्ठा” तथा “यत्राहम् विजयस्तत्रः।”

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जिसमें “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” का अर्थ है “कायर होने से मरना बेहतर है” जिसको सुनकर दुश्मन युद्ध के मैदान में थरथर काँप जाता है। “जय महाकाली आयो गोरखाली” के युद्धघोष के साथ हर वक्त दुश्मन व विरोधी सेना से लोहा लेने के लिए तैयार रहने वाली “गोरखा रेजिमेन्ट” का स्वर्णिम इतिहास हिमाचल प्रदेश के सोलन के सुबाथू से स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। गोरखा जंग के मैदान में जब अपने नारों का जयकारा लगाते हैं, तो उसको सुनकर ही दुश्मन भय से थरथर काँप उठता है। जब वीर गोरखा सेना जंग के मैदान में उतरती है, उस वक्त उन सब वीर जाब़ाज सैनिकों का केवल एक ही लक्ष्य होता है कि हर परिस्थिति में अपने आदर्श वाक्य पर कायम रहना है, “कायर होने से मरना बेहतर है।”

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भारतीय आर्मी के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल सैम मानेकशॉ ने एक बार कहा था कि “यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता, वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है।” “गोरखा रेजिमेन्ट” से सेना के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे जनरल दलबीर सिंह को जून 1974 को 4/5 जीआर (एफएफ) में कमीशन दिया गया था। वर्तमान में जनरल बिपिन रावत जो कि देश के पहले चीफ ऑफ डिफेन्स स्‍टाफ हैं। उन्हें 16 दिसम्बर, 1978 को 11 गोरखा रायफल्स की 5वीं बटालियन में कमीशन मिला था। आज “गोरखा रेजिमेन्ट” के स्थापना दिवस पर हम बटालियन के सभी वीरों को नमन करते हैं।

।। जय हिन्द जय भारत ।।

।। मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं। सम्पर्क +919999379962, deepaklawguy@gmail.com

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