सिनेमा

फैमिली, सत्ता और ‘एंजेल ऑफ़ डेथ’ फैमिली मैन सीजन 2

 

बहु प्रतीक्षित फ़िल्म ‘द फैमिली मैन’ सीजन 2 नेटफ्लिक्स पर आते ही सुर्ख़ियों में छा गयी जो कि निर्माता, निर्देशक के मनोनुकूल है, मूल कथा सत्ता और अस्मिता के संघर्ष के समानांतर पारिवारिक द्वंद्व ने कथा में रोचकता ला दी है। फैमिली में सभी अपने-अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं और सभी को अपना पक्ष सही लगता है, सभी को लगता है कि उन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा जबकि हम घर के लिए कितना कुछ कर रहें हैं।

पति-पत्नी ‘फैमिली’ के नाम पर अपने वर्चस्व और अस्मिता के लिए जूझ रहें हैं तो बच्चे मान चुके हैं कि अब हम बड़े हो गये है ‘वी आर नॉट किड्स एनी मोर’ किशोर लड़की परिवार के झगड़ों के कारण भटक रही है, लड़का अपने ऊपर फुल अटेंशन चाहता है, पति को शिकायत और गुमान भी है कि परिवार और पत्नी को खुश रखने के लिए कितना बड़ा त्याग कर दिया उसने, तो पत्नी को लगता है इतने सालों उसने फैमिली के लिए जो किया उसकी कोई गिनती नहीं जबकि पति को एक साल में ही ‘हस्बैंड ऑफ़ द ईयर’ का अवार्ड चाहिए। यानी आधुनिक और अब डिजिटल युग में जो भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं उन्हें बहुत ख़ूबसूरती से मूल कथा में पिरोया गया है।  

प्रदर्शन से पहले यदि फिल्म विवादों में आ जाये, इससे अच्छा प्रचार क्या हो सकता है। रिलीज़ के पहले इस वेब सीरिज़ के कुछ संवादों पर आपत्ति जताई गयी और ट्विटर पर #FamilyMan2againstTamils हैशटैग की मुहिम चल पड़ी थी जो आम दर्शकों में जिज्ञासा-संवर्धन का कारण बनी और प्रदर्शन के साथ ही दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ लिया। कथा का केंद्र श्रीलंकाई तमिल विद्रोही आन्दोलन है, लेकिन इसका सबसे अधिक खूबसूरत पक्ष है कि सीरिज़ में, सत्ता से इस विद्रोह को एकपक्षीय ढंग से नहीं परोसा गया जोकि राष्ट्रप्रेम या देश भक्तिपूर्ण फिल्मों में अक्सर होता है।

तमिल विद्रोहियों के हाव-भाव उनके संवाद कहीं भी हमें शत्रु या खलनायक-से नहीं प्रतीत होते, फ़िल्मी भाषा में आप इसे आप ग्रे-शेड भी नहीं कह सकते। नायक श्रीकांत का संवाद-‘मैं जानता हूँ तुम्हारे अंदर भी इंसानियत जिंदा है राज़ी, मैं उसे मरने नहीं दूंगा’ और इंसानियत का यही तत्व हमारे भीतर राज़ी के लिए सहानूभूति जगाता है जो घायल हुआ है, लोभी सत्ताधारियों की बदनियती से। तमिल विद्रोही की केन्द्रीय भूमिका में राजी की आँखों के दर्द और क्रोध को महसूस करते हुए, श्रीकांत अपने सहयोगी से कहता है-“जब इंसान जानवर बन जाता है तो जानवर से भी बद्तर हो जाता है और उसमें पोलिटिक्स मिक्स कर दो तो पूरा हैवान” दरअसल सत्ताओं के आपसी टकराव के कारण नवयुवकों को बरगलाकर उन्हें राष्ट्र, जाति, संप्रदाय और भाषा के नाम पर मर मिटने के लिए तैयार किया जाता है फिल्म में एक गीत के बोल-“हम अपना जीवन आन्दोलन के लिए न्यौछावर कर देंगे, हम अपनी तमिल जाति की की रक्षा करेंगे”इसका उदाहरण है।

नेता इन लोगों की देशभक्ति का भावनात्मक शोषण करतें है, जिसमें न इंसान बचता है न ही इंसानियत। राष्ट्प्रेम और देशभक्ति में मूलत: प्रेम और भक्ति का अंतर है, प्रेम एकपक्षीय होता है जबकि भक्ति में प्रेम के साथ श्रद्धा का योग होता है। फैमिली मैन का नायक श्रीकांत, देश की रक्षा के लिए अपनी फैमिली को दांव पर लगाता है तो उसकी विपक्षी ‘राजी’ भी अपनी जाति और भाषा के रक्षा के लिए विद्रोह कर शहादत हासिल करती है, एक एपिसोड का नाम ही Martyrs यानी शहीद है। लेकिन ‘फैमली मैन’ इस संघर्ष को अति संवेदनशीता के साथ चित्रित करती है, सत्ता और विद्रोह की इस जंग में पूरी कोशिश की गयी है कि किसी की भी भावनाएं आहत न हो।

‘फैमिली मैन’ का दूसरा पक्ष श्रीकांत और उसकी फैमिली है जिस पर फिल्म का नाम ही है द फैमिली मैन में श्रीकांत अपने परिवार को समेटने की कोशिश में टास्क फोर्स की नौकरी छोड़कर प्राईवेट नौकरी कर रहा है, अपने से छोटे उम्र के बॉस की बात-बात पर नुक्ताचीनी यदि हमें हँसा रही है, तो यह भी तो यह भी अर्थ दे रही है कि बेचारा फैमिली मैन! लगता है कि निर्माता निर्देशक चाहते ही हैं कि उस पर तरस खाया जाए और पत्नी को घोषित-दोषी माना जाये और एकबार को तो हमें लगता है कि घर-फैमिली पत्नी की नौकरी के कारण ही घर बिखरा था क्या? हालांकि जॉब छोड़ने से पहले श्रीकांत की अनुपस्थिति में शुचि का प्रबन्धन बढ़िया रहा था, लेकिन वो अकेली पड़ गयी थी, और उसके अकेलेपन पर कथा में अलग से फोकस नहीं किया गया।

जब वह  दोबारा नौकरी की इच्छा जाहिर करती है तो फिर लगता है बेचारा फैमिली मैन कितना कोशिश कर रहा है और ये आजकल की स्वतन्त्र /स्वछंद स्त्री, घर यानी फैमिली बसाना ही नहीं चाहती। लेकिन शुचि का संवाद जो उसके पूर्व अनुभवों से निकला है कि ‘तुम नहीं थे तो मैंने सब कुछ संभाल लिया था, वापस संभाल लूंगी श्रीकांत, टास्क ज्वाइन कर लो’ “हस्बैंड ऑफ़ द ईयर का अवार्ड” सुनना श्रीकांत के साथ साथ दर्शकों को भी अखरता है तिस पर प्रतिक्रिया में श्रीकांत का परम्परागत रवैया ‘हमारे जैसे छोटे शहरों में, या तो शादी होती है या नहीं होती, कोई बीच का रास्ता नहीं होता’ और परम्परागत वैवाहिक और पारिवारिक संस्कारों की गहरी पैठ, पुंसवादी सोच के साथ एकदम से जाग जाती है, आपको कामकाजी महिलाओं के फैमिली-विरोधी व्यवहार पर गुस्सा आ जाता है और फैमिली मैन का नायकत्व सफलता के चरम पर पहुँच जाता है।

परिवार और पति-पत्नी के दायित्व सिर्फ एक छत के नीचे रहकर नहीं निभाए जा सकते, आपसी संवाद न हो तो सम्बन्ध कैसे सरल सहज और सुखद होंगे। बच्चे अलग से परेशान हैं कह रहें हैं ‘अब हम बच्चे नहीं रहे, बड़े हो रहें हैं, लेकिन तुम दोनों आपस में बात ही नहीं कर रहे, हमें सब समझ आता है अब यह झगड़ा कभी-कभी का नहीं रहा। ‘ उनके झगड़ों की वजह से टूटते विश्वास के कारण बेटी गलत हाथों में, और मुसीबत में पड़ जाती है,  बेटा सबकी अटेंशन लेने के लिए तरह-तरह की युक्तियाँ अपनाता है, अथर्व के असामान्य व्यवहार पर टीचर कहती भी है कि यह समस्या ADHD यानी Attention deficit hyperactivity disorder है।  यह आज वास्तव में घर-घर के बच्चों की समस्या है।

फैमिली मैन का मुखिया और न ही उसकी माँ और उसकी बहन कोई भी उस पर ध्यान नहीं दे रहा। माँ खाना बनाने में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रही है और श्रीकांत बच्चों को स्कूल ले जाने और छोड़कर आने में और कीमती गैजेट्स देने में अपना पारिवारिक कर्तव्य मान कर, पूरा कर रहा है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव के लिए दोनों क्या कर रहें हैं मनोवैज्ञानिक डॉ. का सहारा ले रहें है, हालांकि इसमें भी फैमली मैन नायक ही बाज़ी मार ले जाता है, यह कह कर कि ‘घर के झगड़े अब हम दूसरों से सुलझाएंगे’ शादीशुदा देवदास कहकर उसे और महान बना दिया जबकि मां शुचि को बेटी के अपहरण के लिए पछतावा हो रहा है, ऊपर से दिखाई पड़ रहा है कि मानो अकेले उसकी ही गलती है, क्योंकि बच्चों की जिम्मेवारी पत्नी माँ की ही होती है क्योंकि श्रीकांत ने कुछ ही घंटों के संघर्ष के बाद बेटी को सही सलामत खोज निकाला।

देश और परिवार को समर्पित हमारा फ़िल्मी नायक पितृसत्ता को दृढ़ करने का परम्परागत काम कर रहा है और क्योंकि नायिका एक माँ और पत्नी है जिसे घर सम्भालना है, चाहिए चाहे वो कितना ही पढ़ी-लिखी हो लेकिन नौकरी, वो भी कोर्पोरेट जगत में! नौकरी और घर दोनों संभाले तब तक ठीक, लेकिन जब अपनी जरूरतों का जिक्र भर कर देती है तो ग़ज़ब हो जाता है। और फैमिली मैन जो पहले से ही अपनी टास्क जॉब में वापस जाने के लिए लगभग बेचैन है तड़प रहा है, प्रतीत होता है पत्नी के व्यवहार से तंग होकर फैमिली से दूर जा रहा है, यहाँ तक कि बेटी भी माँ को ही दोष दे रही है कि माँ आपकी वजह से पापा घर से दूर गये। और एक हमारा फैमिली मैन जो फैमिली और देश दोनों के प्रति अपने कर्तव्य के लिए जान की बाज़ी लगा देता है। श्रीकांत खुद कहता है –“हम किसी नेता के लिए नहीं, उसके पद और पड़ की प्रतिष्ठा के लिए अपनी जान दांव पर लगा देते हैं” माता पिता दोनों के कामकाजी होने पर जो पारिवारिक वैवाहिक द्वंद्व और समस्याएँ ‘राई के पहाड़ की तरह’ बढ़ती जा रहीं है उनका सुंदर निदर्शन फिल्म में हुआ है।

विद्रोही यानी प्रतिपक्षी राजी की बात करें तो एंजेल ऑफ़ डेथ यानी 32 वर्षीय राजलक्ष्मी शेखर की, तो उसे सामंथा अक्किकेनी ने बखूबी निभाया है। उनका शानदार अभिनय, संवादों पर आश्रित नहीं, एक योद्धा का संकल्प, एक बेटी जिसके पिता की लाश भी न मिली, मानसिक संतुलन बिगड़ने के कारण माँ ने आत्महत्या कर ली, बहन का दर्द और बलात्कृत मासूम लड़की की आँखे जो सम्भवत: आंसुओं के लिए तरस रही है, हर पक्ष को एक साथ बिना किसी प्रयास के सहजता से निभाती चलती जाती हैं कहीं भी भावनाओं का कोई अतिरेक नहीं, कोई चूक या फ़िल्मी पूर्वाग्रह नहीं। इस योद्धा राजी की फैमिली जो सत्ता और आर्मी के अनदेखे अनजाने अत्याचारों से पीड़ित है उसका मार्मिक वर्णन राज़ी के एक संवाद में सिमट गया जो आपको भीतर तक से हिला देता है।

युद्ध संस्कृति में स्त्री का देह कैसे एक अभिशाप बन जाता है, इस पर बहुत कुछ लिखा गया, फिल्माया गया लेकिन यद्ध में आम परिवारों के साथ होने वाले अत्याचारों को एक संवाद में बहुत सहजता से राजी बता देती है “पिताजी की डेड बॉडी भी नहीं मिली, मैं 15 साल की थी, आर्मी ने 9 साल के भाई और दोस्तों को गोली मार दी  मुझे बीच पर ले गये, बारी बारी से…कितने लोग थे मुझे याद भी नहीं थालाईवर में मुझे बचाया “और फिर श्रीकांत की आँखों में झांककर सामना करती कहती है“और मेरी कहानी सच है” आपके भीतर एक बैचैनी उत्पन्न कर देती है। और दृढ़ता से कहना ‘जो करना है करो, मेरे अंदर एसिड डालो, रेप करो मैं कुछ नहीं बताउंगी” युद्ध की घिनौनी विभीषिकाओं की परत-दर-परत उघाड़ देती है जिसे वास्तव में हम देखना नहीं चाहते।

राजी ने न सिर्फ एक विद्रोही तमिल योद्धा का सफलता से निर्वाह किया बल्कि वह समाज की एक आम सीधी लड़की के दैनिक संघर्ष को भी बेबाकी से निभाती चलती है जब कहती है कि -‘अगर औरतें बोलना शुरू कर दें तो सारे मर्द जेल में होंगें’ सिर्फ छह महीने में बेस्ट पायलट की ट्रेनिंग करने वाली राजी चिड़िया से बाज बन गयी लेकिन सभ्य समाज में आकर फिर असहाय चिड़िया-सी नजर आती है, जिसके शिकार के लिए बहेलिये घात लगाये बैठें हैं। उसका बॉस संस्कृति के नष्ट होने की दुहाई देते हुए, आजकल की लड़कियों पर प्रहार करता है -“चेन्नई अब नरक बन गयी हैं लड़कियां अब ऐसे सिगरेट दारु पीती हैं जैसे आदमी हों, हमारी संस्कृति नष्ट हो रही है।”

यानी आदमी सिगरेट दारु पिए तो संस्कृति का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन संस्कृति का कलश क्योंकि स्त्री ने ही धारण किया हुआ है, जरा छलका कि भींगी। बॉस की बीबी एक रात के लिए बाहर गयी है, राजी के शरणार्थी होने का फायदा उठाना चाहता है “लोग अब शरणार्थियों से सहानुभूति नहीं रखते चिंता मत करो मैंने तुम्हारे बारे में पुलिसे को नहीं बताया…राजी मैं तुम्हारे साथ कोई जबरदस्ती नहीं कर रहा तुम्हारी मर्जी है न?…उस दिन जब मैंने पुलिस की बात की तो तुम्हारा चेहरा उतर गया था …तुम जाफना से कोई काण्ड करके तो नहीं भागी बोलो राजी डर गयी थी न …” और एक ढीठ, घिनौनी हँसी, जो सीधे निगल लेना चाहती है।

लेकिन हर रोज अपने मरे हुए भाई का उदास चेहरा देखने वाली राजी दर्द को भीतर तक संजोयें हुई है इसलिए तो कहती है-“ऐसा कुछ नहीं जो मैं खुद न संभाल सकूँ मिशन के लिए तैयार हूँ मेरे जीवन का मकसद ही यही है” और अपने मिशन को पूरा करते हुए शहीद हो जाती है। ‘महारानी’ सीरिज़ के राजनितिक माहौल में स्त्री विमर्श पर बहस करने वाले, विमर्शकार, राजी के सशक्त किरदार पर बात करने से क्यों कतरा गये मेरे लिए आश्चर्य का विषय है।

कुल मिलाकर फैमिली मैन सीजन 2 एक सफल सीरीज़ है रोमांच से भरपूर, जीवन के विविध पहलुओं को दर्शाती इस फिल्म को, अगर अधिक व्यस्त नहीं है, तो आप दो बैठकों में देख सकतें हैं और इसकी अगली सीरीज़ और भी रोचक वाली है क्योंकि अंतिम दृश्य संकेत दे गया है कि अगली जंग कोरोना की पृष्ठभूमि में है

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लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com

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