शख्सियत

आजाद भारत के असली सितारे – 23

कानून के जाल में करुणा : डॉ. बिनायक सेन

डॉ. बिनायक सेन पर लिखते समय मुझे बीएचयू के एक दूसरे बंगाली डॉक्टर टी.के. लहरी (डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी) याद आ रहे हैं। बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल से रिटायर होने के बाद उनकी योग्यता, अपने पेशे के प्रति ईमानदारी और समर्पण को देखते हुए बीएचयू प्रशासन ने उन्हें इमेरिटस प्रोफेसर बनाया। वे अविवाहित हैं और बीएचयू द्वारा उपलब्ध कराए गये कैम्पस के मकान में आज भी संत की तरह रहते हैं। चौकी पर सोते हैं। नियत समय पर घर से चैम्बर पैदल जाते हैं और मरीज देखते हैं। अपने पेंशन का भी एक हिस्सा बीएचयू को दान दे देते हैं। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया है। बनारस के लोग उन्हें देवता की तरह मानते हैं।

वे इतने स्वाभिमानी और राजनीति आदि से निर्लिप्त हैं कि जनवरी 2018 में अपने प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ से भी उन्होंने मिलने से मना कर दिया था और कहा था कि “मैं तो एक डॉक्टर हूँ। अगर एक मरीज की तरह मिलना हो तो मुझसे वे मेरे चैम्बर में मिल सकते हैं। घर पर मैं मरीज नहीं देखता।” निस्संदेह आज के युग में जब ज्यादातर डॉक्टर मरीजों को लूटने के लिए ही पैदा हो रहे हैं, टी.के.लहरी जैसे डॉक्टर एक अपवाद है।

किन्तु मैं जिस दूसरे बंगाली डॉक्टर बिनायक सेन पर लिखने जा रहा हूँ वे भी अपने पेशे के प्रति उतने ही निष्ठावान और ईमानदार हैं। जहाँ डॉ. टी.के. लहरी अपने चैम्बर को छोड़कर अन्यत्र कहीं नही जाते वहाँ डॉ. बिनायक सेन गरीब, बेसहारा और जरूरतमंद मरीजों के इलाज के लिए आदिवासी क्षेत्र के निवासियों और मजदूरों के बीच उस इलाके में गये जहाँ दूसरे डॉक्टर जाने को तैयार नहीं होते। बिनायक सेन उन्ही के बीच जाकर बस गये। किन्तु इस त्याग, पेशे के प्रति निष्ठा और समर्पण के बदले डॉ. बिनायक सेन को पद्मश्री नहीं, आजीवन जेल की सजा मिली है। क्या वे इसके हकदार हैं?बिनायक सेन की रिहाई के आदेश का स्वागत - binayak sens release order welcomed - AajTak

       डॉ. विनायक सेन एमबीबीएस, एम.डी. हैं। खुद भी ग्रामीण की तरह रहते हैं। खादी का बिना प्रेस किया हुआ कुर्ता-पैजामा और साधारण स्पोर्ट्स शू उसका पहनावा है। किसी भी तरह से सताए गये लोगों की मदद और अन्याय का प्रतिरोध उसका स्वभाव है। डॉ. बिनायक सेन आईपीसी की धारा 124 (ए) के तहत राष्ट्रद्रोह के दोषी पाए गये हैं और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी है। यद्यपि उनके पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ है, किसी पर हमला करते या किसी को गाली देते हुए भी वे नहीं देखे गये। 14 मई 2007 को माओवादियों के लिए कूरियर का काम करने के आरोप में बिलासपुर से उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल भेज दिया गया। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद 24 दिसम्बर 2010 को रायपुर सेशन कोर्ट ने उन्हें राष्ट्रद्रोह का दोषी पाया। इसके बाद उन्हें हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा और वहाँ से 15 अप्रैल 2011 को जमानत मिली। उल्लेखनीय है कि इसी देश में हत्या, लूट, बलात्कार आदि के आरोपी ऐसे सैकड़ों नेता हैं जो संसद और देश की विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं और अनेक तो माननीय मन्त्री भी हैं।

       अपनी लम्बी कानूनी लड़ाई के दौरान बिनायक सेन लगातार अपने को निर्दोष कहते रहे। उनके क्षेत्र की जनता भी उनके ऊपर लगे आरोपों को सिरे से नकारती है और उन्हें मुक्त करने की माँग करती है। उनकी गिरफ्तारी से लेकर आजीवन कारावास की सजा और फिर सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के दौरान उनकी रिहाई के लिए देश विदेश के अनेक मानवाधिकार संगठनों ने गुहार लगाई।Outlook India Photo Gallery - Binayak Sen

डॉ. बिनायक सेन को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक सम्मान मिल चुके हैं। वे पीपुल्स यूनियंस फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और छत्तीगढ़ इकाई के महासचिव रहे हैं। उन्होंने और उनकी पत्नी ईलिना सेन ने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा द्वारा संचालित शहीद हॉस्पीटल की स्थापना और संचालन में केन्द्रीय भूमिका निभाई थी। स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर उनके शोध पत्र ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ (12 फरवरी 2011) में प्रकाशित हो चुके हैं। मजदूरों तथा गाँवों की गरीब जनता की सेवा के लिए उन्हें 2004 में क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लौर का ‘पॉल हरिसन अवार्ड’ मिल चुका है। 2007 में इंडियन एकैडमी ऑफ सोशल साइंस की ओर से उन्हें ‘आर.आर. केतन गोल्ड मेडल’ मिल चुका है जिसमें उन्हें “भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिकों में से एक” कहा गया है। उसमें कहा गया है कि “द अवार्ड इज फॉर हिज आउटस्टैंडिंग कॉन्ट्रीब्यूशन टू द एडवान्समेंट ऑफ साइंस ऑफ नेचर-मैन-सोसाइटी एंड हिज ऑनेस्ट एंड सिंसियर अप्लीकेशन फॉर द इंप्रूवमेंट ऑफ क्वालिटी ऑफ लाइफ ऑफ द पूअर, द डाउनट्रोडेन एंड द अप्रेस्ड पीपुल ऑफ छत्तीसगढ़।” उन्हें दक्षिण कोरिया से दिया जाने वाला मानवाधिकार का 2011 का ‘ग्वांगजु पुरस्कार’ भी मिल चुका है। इतना ही नहीं, डॉ. सेन को ‘गांधी अंतरराष्ट्रीय शान्ति पुरस्कार’ से भी नवाजा जा चुका है। यद्यपि कोर्ट में पासपोर्ट जमा होने के नाते वे गाँधी अंतरराष्ट्रीय शान्ति पुरस्कार ग्रहण करने के लिए लंदन नहीं जा सके थे।

डॉ. बिनायक सेन को वैश्विक स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में किये गये असाधारण कार्य के लिए 2008 का प्रतिष्ठित ‘जोनाथन मान अवार्ड’ मिला। इस अवार्डको ग्रहण करने के लिए जब उन्हें अमेरिका जाना था और वे जेल में बंद थे तो उनकी रिहाई के लिए दुनिया के 22 नोबेल पुरस्कार पाने वाली महान हस्तियों ने भारत के राष्ट्रपति और प्रधान मन्त्री को पत्र लिखकर आग्रह किया था। डॉ. बिनायक सेन की गिरफ्तारी के एक साल बीतने पर 14 मई 2008 को भारत के दिल्ली, चेन्नई, मुंबई, बंगलौर और कोलकाता तथा विदेशों में लंदन, पेरिस, स्टॉकहोम, टोरंटो, न्यूयार्क आदि शहरों में व्यापक प्रदर्शन हुए। 9 जून 2007 को ब्रिटिश मेडिकल जरनल ने डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी की आलोचना करते हुए लेख प्रकाशित किये और उन्हें शान्ति व सद्भाव सहित गरीबों के स्वास्थ्य के लिए समर्पित अंतरराष्ट्रीय स्तर का सम्मानित डॉक्टर कहा और उन्हें शीघ्र रिहा करने की माँग की। नॉम चाम्स्की सहित दुनिया के अनेक बुद्धिजीवियों ने 16 जून 2007 को एक प्रेस रिलीज करके उन्हें रिहा करने की माँग की।नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी उनकी गिरफ्तारी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।मंत्री हंसराज अहीर की नक्सली वाली टिप्पणी में एकदम फिट बैठता है ये डॉक्टर - Binayak Sen life imprisonment judgment is recalled in the light of current political scenario: Hansraj Ahir ...

डॉ. बिनायक सेन ने आरम्भ में ही छत्तीसगढ़ के ग्रामीण आदिवासी क्षेत्र की गरीब जनता के स्वास्थ्य के लिए काम करना शुरू किया था। वे जब छत्तीसगढ़ सरकार के सहयोगी के रूप में जनस्वास्थ्य को लेकर काम कर रहे थे तो उस दौरान उन्होंने नक्सलियों के खिलाफ सरकार द्वारा चलाए गये अभियानों की ज्यादतियों को देखा और मानवाधिकारों के उलंघन की घटनाओं की कड़ी आलोचना की। पीयूसीएल से जुड़ने के बाद वे बराबर मानवाधिकारों के लिए प्रयत्नशील रहे उन्होंने नक्सलवादियों के खिलाफ चलाए गये ‘सलवा जुडूम’ की ज्यादतियों का प्रबल विरोध किया था। वे बार-बार कहते हैं कि नक्सलियों का वे समर्थन नहीं करते लेकिन राज्य की ग़लत नीतियों का जमकर विरोध करते हैं। उन्होंने इन ज्यादतियों को राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचाने का भी काम किया।

यहाँ ‘सलवा जुडुम’ को भी समझने की जरूरत है। ‘सलवा जुडुम’ एक आदिवासी शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘शान्ति का कारवाँ’। यह छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार द्वारा चलाया गया एक तथाकथित सफाई अभियान था। इस अभियान में माओवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए ग्रा‍मीणों की फोर्स तैयार की गयी थी। ग्रामीण आदिवासियों को हथियार देकर उन्हें स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बनाया गया और उसके द्वारा नक्सलियों का सफाया करने के नाम पर आम निर्दोष लोगों पर भी भीषण जुल्म ढाए गये। महेन्द्र कर्मा नाम के एक स्थानीय कांग्रेसी नेता की इसमें केन्द्रीय भूमिका थी। मीडिया में आई खबरों के अनुसार 2005 में माओवादियों के खिलाफ शुरु हुए सलवा जुडूम के कारण दंतेवाड़ा के 644 गाँव खाली हो गये। उनकी एक बड़ी आबादी सरकारी शिविरों में रहने के लिये बाध्य हो गयी। कई लाख लोग बेघर हो गये। सैकड़ों निर्दोष मारे मारे गये। नक्सलियों से लड़ने के नाम पर शुरू हुए सलवा जुडूम अभियान पर आरोप लगने लगे कि इसके निशाने पर बेकसूर आदिवासी हैं। कहा गया कि दोनों तरफ़ से मोहरे की तरह उन्हें इस्तेमाल किया गया। यह संघर्ष कई सालों तक चला। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम मामले में सरकार की कड़ी आलोचना की। 5 जुलाई 2011 को अपना फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र द्वारा विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) को हथियारबंद करने पर रोक लगा दी और पांच हजार सदस्यों वाले इस बल को ‘असंवैधानिक’ करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश समाजविज्ञानी नंदिनी सुंदर व इतिहासकार रामचंद्र गुहा आदिकी ओर से दायर याचिका पर दिया।

सलवा जुडुम द्वारा की गयी ज्यादतियों की आलोचना तथा पीयूसील के महासचिव की हैसियत से मानवाधिकारों के उलंघन का लगातार विरोध करते रहने के कारणछत्तीसगढ़ सरकार और वहाँ की पुलिस की वक्र दृष्टि डॉ. बिनायक सेन पर लगातार बनी रही।Binayak Sen's appeal - The Hindu

मई 2007 में जेल में बंद तथाकथित नक्सलवादी नेता नारायण सान्याल का सन्देश लाने-ले जाने के आरोप में डॉ. बिनायक सेन को गिरफ्तार किया गया था। प्रिंट मीडिया में उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार पीयूष गुहा नामक एक व्यक्ति को 6 मई 2007 को रायपुर रेलवे स्टेशन के निकट गिरफ्तार किया गया था जिसके पास प्रतिबंधित माओवादी पैम्फ्लेट, एक मोबाइल, 49 हजार रूपये और नारायण सान्याल द्वारा लिखित तीन पत्र मिले जो डॉ बिनायक सेन ने पीयूष गुहा को दिए थे। पीयूष गुहा एक मामूली तेंदूपत्ता व्यापारी है जो नक्सलियों के आतंक से निज़ात पाने के लिए स्वयंभी नक्सल विरोधी सरकारी कामों का प्रशंसक था।

अब भी हमारे देश की जनता को न्यायालयों पर पूरा भरोसा है। किन्तु माननीय न्यायाधीश तो कानून और साक्ष्य को देखकर ही फैसला सुनाएंगे। देश के नागरिकों के सामने मुख्य रूप से यह विषय आना चाहिए कि डॉ. बिनायक सेन को जिस आईपीसी की धारा 124-ए यानी राजद्रोह के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी है वह कानून गुलामी के दौर में अंग्रेजों द्वारा सन् 1860 में बनाया गया था जिसका मकसद अंग्रेजों को अपने शासन के विरोधियों को सजा देना था। एक प्रसिद्ध वकील वी कृष्ण अनंत का कहना है कि ”1860 की मूल भारतीय दंड संहिता में 124-ए थी ही नहीं। इसे तो अंग्रेजों ने बाद में जब देश में स्वाधीनता आन्दोलन जोर पकड़ने लगा तो अभिव्यक्ति कि आजादी को दबाने के लिए 1897 में बालगंगाधर तिलक और कुछ साल बाद मोहनदास करमचंद गाँधी को जेल में बंद करने, जनता कि मौलिक अभिव्यक्ति कुचलने के लिए तत्कालीन वायसराय द्वारा अमल में लाइ गयी ” (प्रवक्ता.कॉम में प्रकाशित श्रीराम तिवारी का आलेख से उद्धृत)

इसी कानून के अंतर्गत सबसे पहले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को 6 साल की सजा हुई थी और बाद में ‘यंग इंडिया’ में एक लेख लिखने के कारण हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी गिरफ्तार किया गया था और उन्हें भी जेल की सजा हुई थी।

जब हमारा संविधान बना तो यह कानून भी उसमें यथावत शामिल कर लिया गया। इस कानून में परिवर्तन के नाम पर सिर्फ इतना ही हुआ है 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले के दौरान स्वीकार किया कि नारेबाजी करना देशद्रोह के दायरे में नहीं आता है। प्रश्न यह है कि जब हमारे संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत भारत के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकारमिल चुका है तो दूसरी ओर अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने वाला अंग्रेजों के जमाने का यह कानून आज तक क्यों बना हुआ है? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस कानून की क्या आवश्कता है? मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना गलत कैसे है कि इस कानून की आड़ में सरकार अभिव्यक्ति की आजादीको प्रतिबंधित करती है? भारत जैसे लोकतंत्र में जहाँ अनेक राजनीतिक दल हैं, सत्ता में बैठे किसी विशेष राजनीतिक दल की नीतियों का विरोध या आलोचना करना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में भला कैसे आ सकता है?विनायक सेन मामले में कब क्या हुआ? - BBC News हिंदी

सच यह है कि आजादी के बाद भी देश की सरकारों ने इस कानून को अपने हित में इस्तेमाल करने के लिए बचाकर रखा है और समय-समय पर इसका दुरुपयोग करती हैं।

वर्ष 2012 में तमिलनाडु सरकार ने कुडनकुलम परमाणु प्लांट का विरोध करने वाले 7 हजार ग्रामीणों पर देशद्रोह के कानून की यही धारा लगाई थी। राजद्रोह की परिभाषा यदि यही है,जिसके तहत डॉ. बिनायक सेन गिरफ्तार हुए हैं तो भारत में देशभक्त ढूँढे नहीं मिलेंगे। बिनायक सेन बताते हैं कि छत्तीसगढ़ की विभिन्न जेलों में ऐसे हजारों लोग जमानत मिलने के बाद भी वर्षों से केवल इसीलिए सड़ रहे हैं, क्योंकि 200-500 रुपये की उनकी जमानत लेने वाला भी कोई नहीं है। उनके लिए इंडिया गेट तो छोड़िए, रायपुर के जयस्तंभ चौक में धरना देने वाला कोई नहीं है।

4 जनवरी 1950 को जन्म लेने वाले प. बंगाल के रानाघाट (जिला- नाडिया) के मूल निवासी डॉ. बिनायक सेन की शिक्षा ब्वायज स्कूल कलकत्ता (कोलकाता) तथा क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लौर से हुई। उन्होंने एमबीबीएस, एम.डी. (पीडियाट्रिक्स) की डिग्री हासिल की। उनका परिवार ब्रह्म समाज में आस्था रखता था। उनके पिता सेना में थे और माँ रवीन्द्र संगीत में गहरी रुचि रखने वाली एक आदर्श गृहिणी थीं। स्कूल की शिक्षा हासिल करने के बाद 1966 में उन्होंने क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। वे वहाँ बिताए गये दस साल के अपने जीवन को सर्वोत्तम काल मानते हैं। 1976 से 1978 तक दो साल उन्होंने जेएनयू में एसोसिएट फेलो के रूप में बिताया। इसी दौरान जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन चल रहा था। बिनायक सेन इस आन्दोलन के एक संगठन छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की ‘मेडिको फ्रेन्ड्स सर्किल’ से जुड़ गये। (बिजनेस स्टैंडर्ड, 20 जनवरी 2013, ब्रेकफास्ट विथ बीएस, देवजोत घोषाल के लेख से,)विनायक सेन को क्षमादान या दण्ड - Pravakta.Com | प्रवक्‍ता.कॉम

बिनायक सेन गरीबों के बीच काम करना चाहते थे। वे मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इसाई समुदाय (क्वेकर्स) द्वारा संचालित एक छोटे से अस्पताल में काम करने लगे। जहाँ वे खासकर टीबी का इलाज करने लगे। यहाँ पर उनकी भेंट कोर्कू नाम के 30 वर्षीय आदिवासी युवक से हुई जो उनसे टीबी के इलाज के लिए आया था। इस युवक से भेट के कारण डॉ. बिनायक सेन के जीवन की दिशा में बड़ा परिवर्तान आया। उसके बारे में वे बताते हैं, “मैंने उसे टीबी की दवा दी और हिदायत दी कि दूसरे खुराक के लिए उसे निश्चित समय पर यहाँ आना होगा। किन्तु वह हर बार देर से आया। जब तीसरी बार भी वह लेट आया तो नाराज होकर मैंने उसे बहुत डाँटा। वह दुखी होकर हमारी क्लीनिक से बाहर निकल गया। मैं उसे बाहर जाते देखकर उसके पीछे दौड़ा। उसने मुझे बताया कि यहाँ आने के लिए मेरे पास बस का भाड़ा नहीं था। मैंने उसे बताया कि मैं उसे बस का भाड़ा दे दिया करूँगा। किन्तु उसने कहा कि मुझे उसे डाँटने का कोई अधिकार नहीं है और वह चला गया और फिर दुबारा नहीं आया। वह घटना मुझे कभी नहीं भूलती।” (बिजनेस स्टैंडर्ड, 20 जनवरी 2013, ब्रेकफास्ट विथ बीएस, देवजोत घोषाल के लेख से,)

इसके बाद डॉ. बिनायक सेन भारत के सबसे पुराने और बड़े मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) से जुड़ गये। यह 1981-82 का समय था जब वे भिलाई स्टील प्लांट के समीप स्थित दल्ली राजहरा कस्बे में उस क्षेत्र के ट्रेड यूनियन नेता शंकरगुहा नियोगी से मिलने गये। इसके बाद अगले दस साल तक खानों में काम करने वाले उस क्षेत्र के दस हजार मजदूर और उनके परिवार ही उनका कर्मक्षेत्र बन गया। वे श्रमिकों के लिए बनाए गये शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएँ देने लगे। वे छत्तीसगढ़ के विभिन्न ज़िलों में लोगों के लिए सस्ती चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के उपाय तलाश करने के लिए भी काम करते रहे। डॉ बिनायक सेन सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार करने के लिए बनी छत्तीसगढ़ सरकार की एक सलाहकार समिति के सदस्य रहे और उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि डॉ सेन के सुझावों के आधार पर सरकार ने ‘मितानिन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरु किया। इस कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार की जा रहीं हैं।

1991 में उन्होंने रायपुर में एक छोटा सा घर लिया। धामताड़ी में उन्होंने प्रेक्टिस शुरू की जो खास तौर पर मलेरिया से प्रभावित क्षेत्र था। इसी दौरान पीयूसीएल कार्यकर्ता के रूप में वे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों, टार्चर, बलात्कार, इनकाउन्टर आदि की जाँच के लिए भी जाने लगे। जब 2005 में सलवा जुडुम शुरू हुआ तो पीयूसीएल की ओर से मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में वे दक्षिण बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी गये। यहीं प्रेक्टिस करते हुए 2007 में उनकी गिरफ्तारी भी हुई।बिनायक सेन को उम्र कैद देने वाला 'बनाना रिपब्लिक' | HASTAKSHEP

जेल के अनुभवों के बारे में बिनायक सेन बताते हैं कि “मैंने देखा कि सैकड़ो क्या हजारों लोग थे जिन्हे अवैध रूप से और लम्बे समय से जेलों में बंद कर दिया गया था। उनका परिवार और उनका जीवन नष्ट हो चुका था।” (उपर्युक्त) दरअसल आदिवासी तो सदियों से जंगल में ही रहते आए हैं। जंगल के उत्पादों से ही उनका गुजर बसर होता है। भारत ही नहीं, दुनियाभर के पूंजीपतियों की गिद्ध दृष्टि इन्हीं जंगलों और इनमें दबे खनिजों पर है। जब जंगल काटे जाते हैं और उनमें रहने वाले आदिवासियों को उजाड़ा जाता है तो वे हथियार उठा लेते हैं। उन्हें नक्सली या माओवादी कहा जाता है। वे विरोध का गांधीवादी तरीका नहीं जानते। इसीलिए समाज के किसी भी हिस्से से उन्हें सहानुभूति नहीं मिलती। किन्तु दुखद यह है कि जब शासक वर्ग उनका दमन करता है तो ज्यादातर निर्दोष और निरीह लोग इसके शिकार होते हैं। किसी भी नेक इंसान की तरह डॉ. बिनायक सेन भी यह सब देखकर चुप न रह सके। जेल में रहते हुए उन्होंने जेल में बंद अनेक निर्दोष आदिवासियों को देखकर ‘इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ के लिए पहला लेख लिखा।  

डॉ. बिनायक सेन अपना बाकी जीवन अपनी पत्नी और अपनी दो बेटियों के साथ बिताना चाहते थे। कानूनी लड़ाई से आजिज आकर उनकी पत्नी अपनी बेटियों के साथ कहीं दूर चले जाने की बात करने लगी थीं। बिनायक सेन भी जेल की जिन्दगी और मानसिक उत्पीड़न के चलते हृदय सम्बन्धी बीमारियों से ग्रस्त हो गये।

 बाद में उन्होंने कुछ दिन म.गा.अं.हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में अध्यापन भी किया। किन्तु इसी बीच 2019 में कैन्सर से उनका निधन हो गया। बिनायक सेन के ऊपर अब एक नयी जिम्मेदारी भी आ पड़ी है। उनके ऊपर अब अपनी दो बेटियों का भी भार है। वे आज भी यह कहते हुए अफसोस करते हैं कि उनकी अपनी माँ की तरह छत्तीसगढ़ की सैकड़ों माएँ इलाज के लिए आज भी उनकी बाट जोह रही हैं, किन्तु वे विवश हैं। वे राष्ट्रद्रोह के आरोपी जो हैं।

जन्मदिन के अवसर पर हम डॉ. विनायक सेन के सुस्वास्थ्य व सक्रियता की कामना करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि वे शीघ्र अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त हों जाएँगे और निसहाय लोगों की सेवा में पूर्ववत लग जाएँगे।

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x