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देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अच्छे दिन कब आएंगे ?

‘देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुए हमलों की भरोसेमंद जांच कराने या उन्हें रोकने में मोदी सरकार पूरी तरह से नाकाम रही है।’अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ने हाल ही में साल 2018 की ‘वर्ल्ड रिपोर्ट’ जारी करते हुए ये बात की है। 643 पन्नों की वर्ल्ड रिपोर्ट के 28वें संस्करण में ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ने 90 से ज्यादा देशों में मानवाधिकारों की स्थिति का जायजा लिया और इस नतीजे पर पहुंचा कि सभी भारतीयों के बुनियादी अधिकारों की कीमत पर सत्तारूढ़ बीजेपी के कुछ नेता हिंदू श्रेष्ठता और कट्टर राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं।

सरकार की सरपरस्ती में बीते साल भी कट्टरपंथी हिंदू समूहों ने मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ कई हमले किए। साल 2017 में कम से कम ऐसे 38 हमले हुए और इनमें दस लोग मारे गए। रिपोर्ट कहती है कि जिन लोगों के ऊपर पीड़ितों को बचाने या उनका संरक्षण करने की जिम्मेदारी है, वे भी अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभाते। हमलावरों पर फौरन कानूनी कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने गोहत्या पर पाबंदी लगाने वाले कानून के तहत पीड़ितों के खिलाफ ही शिकायतें दर्ज कीं। इस तरह के उदाहरण यह बतलाते हैं कि पुलिस अधिकारी एवं प्रशासन धार्मिक अल्पसंख्यकों और खतरे का सामना कर रहे अन्य समूहों पर लगातार हो रहे हमलों से उन्हें बचाने में अनिच्छुक है।

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’की भारत से संबंधित इस रिपोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार के हनन और कानून व्यवस्था लागू करने के नाम पर भारत में इंटरनेट सेवाएं बंद करने का चलन का मुद्दा भी उठाया गया है। राज्य सरकारें हिंसा या सामाजिक तनाव रोकने के नाम पर पूरी तरह से इंटरनेंट बंद करने का सहारा लेती हैं, ताकि कानून व्यवस्था को लागू रखा जा सके। पिछले साल नवंबर तक तकरीबन 60 बार इंटरनेट सेवाएं ठप की गई हैं, जिनमें 27 मामले हिंसा और आतंकवाद से ग्रसित जम्मू और कश्मीर राज्य के हैं। रिपोर्ट इस बात का भी इशारा करती है कि बीते साल अगस्त में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का दर्जा दिया था। अदालत ने अपने इस फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के शासन और सत्ता के दबंग बर्ताव के खिलाफ गारंटी पर जोर दिया था। बावजूद इसके सरकारी नीतियों या उसकी गतिविधियों की आलोचना करने वाले कार्यकर्ताओं, अकादमिक जगत के लोगों और पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मानहानि और राजद्रोह के मुकदमे दर्ज किए गए। उन्हें बिला वजह परेशान किया गया।

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’की सालाना रिपोर्ट, उन्हीं चिंताओं की तरफ सरकार का ध्यान खींचती है, जिसका जिक्र बार-बार देश के बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार और विपक्षी पार्टियां सरकार से पिछले कुछ सालों से करते आए हैं। इस बात की तस्दीक, देश के पूर्व नौकरशाहों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हाल ही में लिखा एक पत्र भी करता है। इस पत्र में 67 पूर्व नौकरशाहों जिसमें पूर्व स्वास्थ्य सचिव केशव देसीराजू, के सुजाता राव, सूचना प्रसारण मंत्रालय के पूर्व सचिव भास्कर घोष, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबउल्लाह, पूर्व आईटी सचिव बृजेश कुमार, हर्ष मंदर आदि शामिल हैं, ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हो रहे हमलों के प्रति अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। पत्र में बाकायदा अल्पसंख्यकों पर हुई पांच बड़ी हिंसा की घटनाओं का भी हवाला दिया गया है। मीडिया में आई मुसलमान समुदाय को प्रॉपर्टी न बेचने या उन्हें किरायेदार न रखने की खबरों का जिक्र करते हुए इन पूर्व नौकरशाहों ने पत्र में आगे कहा है कि रोजाना ऐसे कई रूपों में मुसलमान ऐसी बातों का सामना करते हैं, जिससे इस धार्मिक समुदाय के माहौल में गुस्सा बढ़ना तय है, जिससे पहले से ही जहर भरा माहौल और खराब होगा। पत्र में मध्य प्रदेश के सतना में हुई एक घटना का भी जिक्र किया गया गया है, जहां एक गायक समूह को ‘कैरोल’(क्रिसमस पर गाए जाने वाला गाना) गाने से रोक दिया गया था।

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’और पूर्व नौकरशाहों की यह चिंताएं बेजा नहीं हैं। मोदी हुकूमत के दरमियान देश में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं, जिनसे भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी नुकसान पहुंचा है। तथाकथित गो-रक्षक समूहों ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के ऊपर हिंसा की। बेगुनाह लोगों पर हमला किया और उन्हें परेशान किया गया। मोहम्मद अखलाक से लेकर पहलू खान तक एक लंबी फेहरिस्त है, जो तथाकथित गो-रक्षक समूहों की हिंसा के शिकार हुए। उत्तर प्रदेश में शहरी आबादी से लगे बिसाहड़ा गांव में वहशी भीड़ ने मोहम्मद अखलाक की इसलिए हत्या कर दी कि उन्हें यह शक था कि उसके घर में गौमांस बना था।

मोदी हुकूमत में न तो अल्पसंख्यक महफूज हैं और न ही दलित एवं आदिवासी। इनके साथ अत्याचार का सिलसिला मुसलसल जारी है। मोदी सरकार इन पर हमले रोकने में पूरी तरह से नाकामयाब रही है। कई राज्यों में दलितों को कुछ खास जगहों पर जाने से रोका जाता है। सार्वजनिक जगहों पर भी उनके साथ भेदभाव किया जाता है। ज्ञान के मंदिर विश्वविद्यालयों तक में उनके साथ भेदभाव के मामले सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में अनुसूचित जाति के साथ अपराध के 45,000 और अनुसूचित जातियों के साथ 11,000 मामले दर्ज हुए हैं। यह आंकड़े खुद ही गवाही देते हैं कि देश में अनुसूचित जाति-जनजातियों के हालात ठीक नहीं। इनके साथ बड़े पैमाने पर भेदभाव और उत्पीड़न होता है।

मोदी हुकूमत में सबसे ज्यादा हमले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हुए हैं। न सिर्फ मानव अधिकार संगठन और कार्यकर्ताओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है, बल्कि कॉलेज के विद्यार्थी भी उत्पीड़न और हमलों से नहीं बच पाए हैं। जेएनयू मामला हो या फिर रामजस कॉलेज का मामला मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों, प्राध्यपकों, वकीलों और पत्रकारों को सरकारी और सत्ताधारी पार्टी से जुड़े संगठनों से हमले और धमकियों का सामना करना पड़ा है। उनके साथ सरे आम मारपीट की गई और पुलिस मूकदर्शक बनकर तमाशाई बनी रही। इस दौरान एक बार नहीं, बल्कि कई बार ऐसा हुआ जब अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए सरकार ने देशद्रोह कानून का गलत इस्तेमाल किया। बीते चार साल में लोकतंत्र के पहरुए पत्रकारों पर भी हमले बढ़े हैं। उन्हें अपने काम से रोका जा रहा है। रिपोर्टिंग पर दवाब या पाबंदी लगाई जा रही है। देश के पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति खासी खराब है। साल 2016 में कश्मीर के अंदर महीनों कर्फ्यू लगा रहा, जिसकी वजह से जाने-अनजाने यहां के निवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ। इस दौरान निजी कंपनियों की संचार सेवाएं ठप कर दी गईं। कर्फ्यू से लोगों को जरूरी चीजें भी नहीं मिल पाईं। सुरक्षा बलों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल से कई बार बेकसूर लोगों को नुकसान पहुंचा और उनमें से कई की आंखें चली गईं। मणिपुर में भी महीनों चली आर्थिक नाकाबंदी से यहां के निवासियों की जिंदगी दुश्वार हो गई।

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ने अपनी हालिया रिपोर्ट में भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की जो तस्वीर पेश की है, वह हकीकत के काफी करीब है। देश में आज वाकई धार्मिक अल्पसंख्यकों के हालात ठीक नहीं है। समाज में उन्हें शक की निगाह से देखा जाता है। उन्हें चाहे जब पूर्वाग्रह और साम्प्रदायिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। वे हर दम उग्र हिंदूवादी समूहों के निशाने पर रहते हैं। भारतीय संविधान में हर आधुनिक संविधान की तरह संप्रभु व्यवस्था की इकाई व्यक्ति को माना गया है। देश की आजादी का मतलब हर व्यक्ति की आजादी है। इस आजादी पर हमला, चाहे सरकार की तरफ से हो, या पुलिस-प्रशासन या फिर किसी चरमपंथी उग्रवादी समूह की तरफ से कुल मिलाकर वह समान रूप से संविधान की मूल भावना का उल्लंघन है।

जब धर्माधं या चरमपंथी संगठन इस स्वतंत्रता का हनन करते हैं, तो सरकार से यह उम्मीद होती है कि वह अपने नागरिकों के बुनियादी हुकूकों की हिफाजत करे। लेकिन जब राज्य और उसका पूरा तंत्र ही अपने नागरिकों में धर्म या क्षेत्र के आधार पर फर्क करे तो, निश्चित रूप से यह खतरनाक स्थिति है। एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का संवैधानिक दायित्व होता है कि वह अपने सभी नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करे। खास तौर से अपने धार्मिक अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के संरक्षण करे। उनके मानवाधिकारों का जब उल्लंघन हो, तो कसूरवारों को समय पर सजा के दायरे में लाया जाए। अफसोस ! मोदी सरकार अपने इस संवैधानिक दायित्व से ही सबसे ज्यादा विमुख है।

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लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं। सम्पर्क +919425489944, jahidk.khan@gmail.com

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