उत्तरप्रदेश

यूपी : विधान परिषद चुनाव परिणाम के मायने

 

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के ठीक एक महीने बाद विधान परिषद के चुनाव में एक बार फिर यहाँ सारे विपक्षी दल औंधेमुंह धड़ाम, और भारतीय जनता पार्टी के शानदार जीत का परचम लहराया। कुल छत्तीस में तैंतीस सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एकतरफा जीत दर्ज कराई। दो जगह निर्दलीय और एक सीट पर जनसत्ता दल की जीत हुई। सपा, बसपा, कांग्रेस सरीखे यहाँ के प्रमुख राजनीतिक दलों का खाता तक नहीं खुला। चालीस साल बाद किसी दल के पास सदन का पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है। चर्चा छिड़ने पर प्रयागराज निवासी वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कृपा शंकर बाजपेई बताते हैं कि इसके पहले सन 1982 में कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत था।

…लेकिन मोदी जी की सीट ने दे दिया झटका

विधान परिषद चुनाव में एकतरफा आए शानदार परिणाम ने भले ही भाजपाइयों को गाजे बाजे के साथ नाचने झूमने, अबीर गुलाल उड़ाने, मिठाई बांटकर जश्न मनाने का मौका दिया पर काशी नगरी की करारी हार के अंदरूनी दर्द की टीस भी पांव में गड़े कांटे की तरह चुभती रही। खुद प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की सीट काशी में भाजपा प्रत्याशी सुदामा प्रसाद न सिर्फ हार गए बल्कि तीसरे नंबर पर चले गए। वाराणसी में बाहुबली बृजेश सिंह की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह ने जीत दर्ज कराई। वाराणसी के ही बगल आजमगढ़ जिले की सीट पर भी भाजपा खारिज हो गई। यहाँ बतौर निर्दलीय प्रत्याशी विक्रांत सिंह रिशु को जीत मिली। इसी प्रकार प्रतापगढ़ से रघुराज प्रताप सिंह राजा भइया के मौसेरे भाई अक्षय प्रताप सिंह गोपाल ने जीत का परचम फहराया।

विधान परिषद चुनाव के जनादेश ने एक बार फिर चौंकाने वाला सियासी संदेश दिया। इस संदेश के कई खास मायने भी निकाले जा रहे हैं। फिर से एक बार यह साबित करने की कोशिश की है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार अभी भी सबसे ज्यादा प्रभावी मजबूत और लोकप्रिय है। सत्ता का विरोध, सरकारी नीतियों से असहमति, राजनीतिक विचारधारा की पकड़ सरीखे मुद्दे यहाँ निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। यूपी में चार दशक से ज्यादा कांग्रेस ने एकछत्र  शासन किया तो चार बार बसपा की सरकार रही। पचासी पंद्रह का नारा देकर बसपा की मायावती मुख्यमन्त्री रहीं। समाजवादी विचारधारा की मजबूती के चलते कई बार मुलायम सिंह फिर उसके बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव भी यहाँ के मुख्यमन्त्री रहे। किसान आंदोलन, अगड़े पिछड़े वोटों के ध्रुवीकरण, सत्ता -शासन का विरोध जैसे मुद्दे निष्प्रभावी साबित हुए। दस मार्च को विधानसभा चुनाव परिणाम ने कई सियासी अटकल और कयासों पर पूर्ण विराम लगाकर एकतरफा चुनाव जीता था तो ठीक बत्तीस दिन बाद यानी 12 अप्रैल को छत्तीस सीटों के लिए स्थानीय निकाय विधान परिषद चुनाव में तैंतीस सीटों पर जीत का झंडा बुलंद कर योगी सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि भारतीय जनता पार्टी अभी भी इस राज्य की सबसे प्रभावी और मजबूत पार्टी है। छत्तीस में तैंतीस सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने अकेले दम पर जीत हासिल कर ली जबकि मुख्य विपक्षी दल के रूप दिखने वाली पार्टी समाजवादी पार्टी से लेकर कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी समेत किसी भी दल का इस चुनाव में खाता तक नहीं खुला। राजनीति के क्षेत्र में यह काफी दिलचस्प और चौंकाने वाला भी है। विधान परिषद चुनाव परिणाम में तैंतीस सीट पर भारतीय जनता पार्टी, दो पर निर्दलीय और एक सीट पर जनसत्ता दल की जीत हुई है। कांग्रेस, बसपा और सपा का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया। इन राजनीतिक दलों का इस बार एक भी सीट पर खाता तक नहीं खुला। बल्कि राजनीतिक दलों में जनसत्ता दल तेजी से उभरकर अपने को मजबूत साबित किया। जनसत्ता दल उत्तर प्रदेश के ही प्रतापगढ़ जिले की भद्री रियासत बेंती के कद्दावर नेता के रूप में पहचान रखने वाले रघुराज प्रताप सिंह राजा भइया का नवगठित दल है। करीब दो साल पहले ही इस दल का गठन हुआ है। प्रतापगढ़ की एकमात्र सीट जनसत्ता दल के प्रत्याशी अक्षय प्रताप गोपाल जी ने जेल में रहकर जीता है। सवाल यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीतिक दल इस कदर कमजोर और बिखरे हुए हैं? या फिर सत्तासीन भाजपा के चुनावी रणनीति के आगे इन दलों की दाल नहीं गल पा रही है?

इस तरह के सवाल तब और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, जब देश में दो साल बाद ही लोकसभा का चुनाव होने जा रहा हो?

गौरतलब है कि देश की राजनीति, खासकर सरकार गठन में उत्तर प्रदेश खास मायने रखता है। देश की राजनीतिक दशा और दिशा तय करने में उत्तर प्रदेश का सियासी मिजाज काफी मायने रखता है। उत्तर प्रदेश में एक महीने पहले विधानसभा चुनाव के एकतरफा परिणाम ने कई सियासी अटकल और कयासों पर पूर्ण विराम लगा दिया था। उसी के करीब एक महीने बाद विधान परिषद स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजे ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को मजबूत और यहाँ के अन्य विपक्षी दल कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को बेहद कमजोर साबित किया है।  

सियासी गलियारे में एक बार फिर सवाल उठाए जाने लगे हैं कि क्या देश में एक नए राजनीतिक युग का सूत्रपात होने जा रहा है? या दो साल बाद सन् 2024 में होने जा रहे देश के आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश नई इबारत लिखने जा रहा है? राज्य में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह उत्साहित है। सत्ता संभालते ही बतौर मुख्यमन्त्री की कमान संभालने वाले योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ कई फैसले लिए। योगी सरकार के एक्शन में आते ही संगठित और पेशेवर हार्ड कोर क्रिमिनल्स और बाहुबली माफिया टाइप अपराधियों में खलबली और दहशत का माहौल है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हिस्सा हो या पूर्वांचल पुलिस मुठभेड़ में अपराधी हताहत हो रहे हैं। इनके मकान, दुकान और संपत्तियों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं। नव निर्वाचित विधायक और मंत्रियों को सौ दिन का टारगेट दिया गया है। जनता के बीच रहकर उनकी सहानुभूति और निकटता हासिल करने का फरमान देकर साफ कर दिया गया है कि मेहनत और ईमानदारी होनी चाहिए और दिखनी भी चाहिए। जनता संतुष्टि और परिणाम दोनों चाहती है। प्रयागराज सम्हई के बुजुर्ग हरि नारायण ओझा, युवा अमित ओझा, लक्ष्मी, नीलम, पूनम, सोनम तिवारी से लेकर उदित ओझा तक चर्चा के दौरान साफ लहजे में कहते हैं कि मोदी और योगी देश-प्रदेश की पहली पसन्द हैं। बहरहाल, योगी फार्मूला अगर सफल साबित हो गया तो देश की सियासी गाथा लिखने में उत्तर प्रदेश की प्रमुख भूमिका होगी।

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लेखक सबलोग के उत्तरप्रदेश ब्यूरोचीफ और भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के प्रदेश महासचिव हैं| +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

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