सत्ता वापसी के निहितार्थ
उत्तरप्रदेश

यूपी में सत्ता वापसी के निहितार्थ

 

उत्तर प्रदेश में 18 वें विधानसभा चुनाव में इस बार कई रिकार्ड टूटे। आवाम ने राजनीतिक दलों को साफतौर पर संदेश दिया है कि बहुत हो चुका, अब जाति बिरादरी में बांटकर अपना उल्लू सीधा करने की फितरत कत्तई नहीं चलने वाली। केवल चुनाव के वक्त लुभावने वादों की मुलम्मेबाजी भी अब नहीं चलेगी। महज कागजी आंकड़े नहीं, जमीनी स्तर पर जनहित के कार्य दिखने भी चाहिए, और यह भी कि जाति- बिरादरी वाली राजनीति के दिन अब लद चुके हैं। बहुत हो चुका, अब यह सब कत्तई नहीं चलेगा। आवाम ने साफ बता दिया है कि ऐसा करने वाले दलों का जनाजा निकालने में जनता देर नहीं करेगी।

इस बार विधानसभा चुनाव का जनादेश स्पष्ट है। इसके निहितार्थ भी स्पष्ट हैं। समय साक्षी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने बतौर मुख्यमन्त्री यूपी में चार बार सत्ता संभाला। इस बार महज एक सीट पर सिमट जाना पड़ा। बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से उमाशंकर तीन बार से जीतते आ रहे हैं। पूरे प्रदेश में एकमात्र रसड़ा से बसपा जीत पाई है। इस बार की यह जीत बसपा की कम, प्रत्याशी की जीत ज्यादा समझी जा रही है। इसी प्रकार कई दशक  प्रदेश में एकछत्र शासन करने वाली काँग्रेस को महज दो सीट पर ही संतोष करना पड़ा है। चुनाव परिणाम का यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। सवाल है, क्या उत्तर प्रदेश में विपक्ष बेहद कमजोर है?

सत्ता वापसी के निहितार्थ

अमूमन सत्ता के विरोध में रहने वाला वोट क्या फिर सत्तासीन दल भाजपा के खाते में रिटर्न हो गया? सवाल यह भी हो रहे हैं कि क्या बेहद कमजोर दिखने वाली बसपा, काँग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत अन्य तमाम विरोधी दलों के वोट दुबारा वापस भाजपा की झोली में चले गए? जानकर लोग कहते हैं कि यह सामाजिक बदलाव है। प्रयागराज के जोंधवल में रहने वाले हाईकोर्ट स्टैंडिंग काउंसिल रवि शंकर साफ तौर पर ‘सबलोग’ से कहते हैं – यह सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही स्तर पर बदलाव है, इसे स्वीकार करना ही होगा।

प्रयागराज गंगापार भाजपा किसान मोर्चा के कार्यालय प्रभारी राकेश कुमार मिश्रा बाबूजी और पूर्व मंडल अध्यक्ष संजय सिंह इसे मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ के सुशासन की वजह बताते हैं। …तो क्या वास्तव में उत्तर प्रदेश में यह नए राजनीतिक युग का सूत्रपात है? इस बार विधानसभा के चुनाव में टूटने वाले कई रिकार्ड में एक यह भी कि सैंतीस साल बाद कोई राजनीतिक दल यूपी की सत्ता में लगातार दूसरी बार रिपीट हुआ। वर्ष 1980 के बाद 1984 में काँग्रेस यहाँ दुबारा सत्ता में आई थी। साढ़े तीन दशक से ज्यादा समय के बाद भाजपा लगातार दूसरी बार रिपीट हुई है। इसी प्रकार लगातार दूसरी बार रिपीट होने वाले योगी आदित्यनाथ यूपी के शायद पहले मुख्यमन्त्री हैं। 

नहीं गली दाल, माननीय न बन सके बाहुबली

इस बार वोटरों ने कई चर्चित बाहुबलियों को सिरे से खारिज कर दिया। राज्य के  चर्चित बाहुबलियों में शुमार धनंजय सिंह (मल्हनी) विजय मिश्रा (ज्ञानपुर) यशभद्र सिंह उर्फ मोनू (इसौली) से लेकर उम्रकैद की सजा काट रहे कारागार में बंद अमरमणि त्रिपाठी ने अपने बेटे अमनमणि त्रिपाठी को चुनाव मैदान में उतारा था। गौरतलब है कि जनता ने इन सभी बाहुबलियों को हराकर इस बार ठिकाने लगा दिया। साफ तौर पर यह संदेश दिया कि शासन – प्रशासन थोड़ा भी सख्ती बरते तो जनता इनकी ‘ सियासी -ताबेगीरी’ करने के बजाए इनको हैसियत में रखेगी। दुर्भाग्य है कि बाहुबलियों को टिकट देकर प्रत्याशी बनाने में इस बार भी किसी दल ने परहेज नहीं किया पर वोटरों ने समझदारी दिखाई, इनको कोई भाव न दिया। 

धरी रही चालाकी, स्वामी को नहीं मिला ‘सत्ता का प्रसाद’

चुनाव के ऐन मौके पर सियासी पैंतरेबाजी दिखाकर चर्चा में आए स्वामी प्रसाद मौर्य को भी मतदाताओं ने सिरे से खारिज किया है। पाँच साल भाजपा में कैबिनेट मन्त्री रहकर सत्ता की मलाई छकने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने बेटे को टिकट न दिए जाने पर मन्त्री – विधायक समेत चौदह लोगों के साथ चुनाव के वक्त न सिर्फ भाजपा को धोखा देकर सपा का दामन थामा बल्कि ‘अपचनीय’ बयानों से भाजपा की जबर्दस्त घेराबंदी भी शुरू कर दी। भाजपा को सांपनाथ, आरएसएस को नागनाथ और खुद को नेवलानाथ बताते हुए शुरू के पाँच – छह दिन जमकर हाई प्रोफाइल ड्रामा किया। हम जहाँ पैर रखते हैं, वहाँ से पार्टी और सरकार शुरू हो जाती है – सरीखे दंभपूर्ण बयान देकर मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाले  स्वामी प्रसाद मौर्य ने बयानों के जरिए खूब लंबी चौड़ी फेंकी। 

भाजपा को जड़ से मिटा देने, हमेशा के लिए नाम तक दफन कर देने सरीखे दंभपूर्ण व जहरीले बयानों की झड़ी लगा दी। स्वामी प्रसाद मौर्य ने पहले गोरखपुर की पडरौना सीट से दावेदारी की। वहाँ आरपीएन सिंह के मैदान में आने के बाद श्री मौर्य वहाँ से भाग खड़े हुए। कुशीनगर जिले की फाजिलनगर सीट से चुनाव लड़े, सरकार बनवाना कौन कहे खुद अपनी सीट नहीं बचा सके। श्री मौर्य को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जमीन के बजाय थोड़ा भी ऊपर उठकर राजनीति करने वाले कई वरिष्ठ नेताओं को मतदाताओं ने नहीं बख्शा।

पहला चुनाव लड़ने वाली डॉ. पल्लवी पटेल को सिराथू के मतदाताओं ने जिताकर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व मौजूदा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को इस बार खारिज कर दिया। केशव प्रसाद मौर्य भाजपा के कद्दावर नेता माने जाते हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा की तगड़ी लहर थी, फिर भी पूरे प्रयागराज कमिश्नरी में महज एक सीट सिराथू से जीतने में केशव प्रसाद मौर्य कामयाब रहे। इसके बाद 2014 में फूलपुर लोकसभा सीट से रिकार्ड वोटों से जीतकर कद्दावर नेता की पहचान बनाई थी। केशव प्रसाद मौर्य न सिर्फ अपनी सीट हारे बल्कि कौशांबी जिले की सभी सीट हार गए। यहाँ की तीनों सीट सपा के खाते में चली गई। किसान आन्दोलन, ब्राह्मणों की नाराजगी, सरकारी संस्थानों का निजीकरण, बड़ी तादाद में फसलों का नुकसान करने वाले निराश्रित मवेशी, मंहगाई, बेरोजगारी जैसे तमाम मुद्दे विरोधी दल के नेताओं के लिए ‘भोथरे’ साबित हुए। 

इतिहास बनने की ओर अग्रसर बसपा 

पिछले एक दशक से बसपा के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फेल होता जा रहा है। वर्ष 2017 में 19 सीट पाने वाली बसपा को 2022 के चुनाव में महज एक सीट पर संतोष करना पड़ा। बसपा के मजबूत गढ़ के रूप में पहचान रखने वाले अंबेडकर नगर जिले में पाँच विधानसभा सीटें हैं। पिछले चुनाव में बसपा यहाँ की कटेहरी, जलालपुर और अकबरपुर सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। कटेहरी से चुनाव लड़ने वाले लालजी वर्मा और अकबरपुर से चुनाव लड़ने वाले राम अचल राजभर जैसे कद्दावर नेताओं को मायावती ने पार्टी से बाहर निकाल दिया। इस बार यहाँ की सभी पाँच सीटों पर नए प्रत्याशियों पर बसपा ने दांव लगाया, पर पांचों सीटों पर उसे तगड़ी हार मिली। इस बार यहाँ बसपा का खाता नहीं खुला।

बसपा ने जिन स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी की थी, उनमें आधे से ज्यादा स्टार प्रचारक मैदान में नजर ही नहीं आए। यहाँ तक कि बसपा सुप्रीमो मायावती के भाई आनंद कुमार भी किसी रैली में नहीं दिखाई दिए। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि खुद मायावती भी इस मर्तबा ना जाने क्यों इतना ज्यादा सक्रिय नहीं दिखीं। हालांकि, मायावती की इस निष्क्रियता को लेकर सियासी इलाके में कई तरह के कयास भी लगाए जाते रहे हैं। कई विरोधी दलों द्वारा बसपा को भाजपा की ‘बी- टीम’ के रूप में प्रचारित भी खूब किया गया। बसपा के संस्थापक सदस्य रहे राजबहादुर ने एक निजी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि प्रदेश में चार बार सत्ता संभालने वाली बसपा की इस दुर्गति को देखकर हम बेहद दुखी हैं। राजबहादुर ने कहा कि पार्टी संस्थापक कांशीराम अक्सर कहा करते थे कि जिनसे संघर्ष, उनसे समझौता कदापि नहीं पर इसके विपरीत बसपा लगातार विरोधी दलों से गठबंधन कर पार्टी के वजूद को खत्म करने में लगी हैं।

1985 से 50 सीट को तरसी काँग्रेस

यूपी में कई दशक तक एकछत्र शासन करने वाली काँग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है। इस बार तो महज दो सीट पर सिमट कर रह गई। पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी की निष्क्रियता के बाद राहुल गाँधी ने पार्टी में सक्रियता दिखाई जरूर पर उनको सफलता नहीं मिली। काँग्रेस लगातार कमजोर होती गई और पार्टी के नेता संगठन से दूर होते चले गए। सोनिया के बेटे राहुल की नाकामी के बाद सोनिया गाँधी की बेटी प्रियंका गाँधी वाड्रा ने यूपी संभालने की कोशिश की। पार्टी महासचिव की जिम्मेदारी संभालने के बाद से ही प्रियंका ने सुस्त काँग्रेस में प्राण फूंकने की काफी कोशिश की पर उनका यह प्रयास भी काँग्रेस को मजबूती न दे सका। ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ वाला स्लोगन वोट नहीं दिला सका।

प्रियंका गाँधी वाड्रा

इसके विपरीत महिला वर्ग का सबसे ज्यादा वोट मोदी – योगी के पक्ष में चला गया। आंकड़े गवाह हैं कि इस मर्तबा महिला वर्ग खासकर, युवा उम्र की लड़कियों का अच्छा खासा वोट भाजपा को मिला। गौरतलब है कि 1985 में 269 सीटों पर विजय पताका फहराने वाली काँग्रेस को इसके पाँच साल बाद के चुनाव वर्ष 1991 में 46 सीटों पर संतोष करना पड़ा। वर्ष 1996 में 33 सीटें मिलीं। इसी प्रकार 2002 में 25, वर्ष 2007 में 22, वर्ष 2012 में 28 और वर्ष 2017 में महज सात सीट ही मिली। इस बार मिली दो सीटों में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास सीट ऐसी है जिस पर प्रदेश के कद्दावर कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी का पिछले कई दशक से वर्चस्व है। नौ बार लगातार इस सीट से प्रमोद तिवारी विधायक रहे। पिछले दो बार से उनकी बेटी आराधना उर्फ मोना का यहाँ कब्जा बरकरार रहा है। 

 गौरतलब यह कि किसान आन्दोलन, कोरोना आपदा, सरकारी संस्थानों का निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी जैसे तमाम मुद्दे धरे के धरे रह गए। कमजोर विपक्ष आखिर तक संभल न सका। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने थोड़ा दमदारी दिखाई पर सियासी-चक्रव्यूह में फंसे रह गए। बुलडोजर बाबा, चिलम बाबा, बाबा को मठ भेज देने जैसे अतिरेक बयान, सियासी जुमलेबाजी ज्यादा साबित हुए। कड़ा शासन, गरीबों को राशन, और मोदी-योगी के भाषण ने भाजपा के लिए संजीवनी का कार्य किया। कटु सत्य यह भी कि इस बार पार्टी और प्रत्याशी नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जीते हैं। बहरहाल, देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में इस बार विधानसभा चुनाव का यह जनादेश दो साल बाद होने जा रहे लोकसभा चुनाव को कितना प्रभावित कर सकेगा, यह भविष्य के गर्भ में है

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लेखक सबलोग के उत्तरप्रदेश ब्यूरोचीफ और भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के प्रदेश महासचिव हैं| +918840338705, shivas_pandey@rediffmail.com

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