देशशिक्षा

इस सदी में विश्वविद्यालय

 

  • अशोक वाजपेयी 

इस  सदी में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में परिवर्तन का क्या एजेंडा हो इस पर विचार करने के लिए जो सम्मलेन शान्ति निकेतन में हुआ उसमे कई तरह की दृष्टियाँ प्रकट हुईं| एक छोर पर यह कि अगली सदी भारत की होने जा रही है और हमें इस विश्व-दायित्व को ठीक से निभाने के लिए हर स्तर पर तैयार होना चाहिए| दूसरे पर यह कि संसार के ज्ञान-विज्ञान का पश्चिमी वर्चस्व और उसके द्वारा नियमित प्रविधियाँ और सशक्त और विराट होने वाली है जिनके प्रतिरोध की कोई बौद्धिक  समझ या तैयारी हमारे यहाँ नहीं है| भाषाओँ, दर्शन, इतिहास जैसे विषयों की अलोकप्रियता लक्षित की गई और यह कहा गया कि पारम्परिक विषयों की रूढ़ियाँ ताज कर हमें नए अनुशासनों पर या उनमे से कई को अपने में गूंथे हुए समाजोपयोगी विषय खोलने चाहिए ताकि हम अप्रासंगिक न हो जायें| एक ओर यह भाव था कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय भारतीय उच्च शिक्षा समाज में विप्र हैं जिन्हें दूसरों के लिए उदाहरण बनना चाहिए| दूसरी ओर यह तथ्य है कि आज अधिकांश केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति ऐसे व्यक्ति हैं जो स्वयं किसी केन्द्रीय विश्वविद्यालय से पढ़े हुए नहीं हैं|

मुझे लगा कि हमें विश्वविद्यालयों को भारत के सभ्यता उपक्रम के अंग के रूप में देखना चाहिए और तब हम पाएंगे कि जब आधुनिक विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी तो वे ज्ञान और सत्य की खोज के साथ-साथ भारत के ओपनिवेशिकीकरण और आधुनिकीकरण के उपकरण के रूप में भी स्थापित किये गए थे| देश के पश्चिमीकरण में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है| यह आकस्मिक नहीं हैं कि जिस तरह की भारत केन्द्रित आधुनिकता रवीन्द्रनाथ और महात्मा गाँधी ने विन्यस्त की उसे हमारी विश्वविद्यालय-व्यवस्था ने कभी नहीं अपनाया| उन्होंने ज्ञान विकास और प्राविधि के जो मॉडेल पोसे-बढ़ाये उनमे सामाजिक विकल्प बनने की न कभी आकांक्षा थी, न ही क्षमता| यह एक जगजाहिर सी बात है कि नई से नई, बारीक़ से बारीक़ और जटिल से जटिल प्रविधियों पर अधिकार पाने में भारतीय दुनिया में पहली पंक्ति में हैं| पर ऐसा क्यों है कि ये प्रविधियाँ बौद्धिक मुक्ति का नहीं दस्ता का ही उपकरण है| ऐसा क्यों है कि हमारे परिसरों में भारतीय ज्ञान और मीमांसा की परम्पराओं की इतनी अवज्ञा हुई है कि साधारण पढ़ा-लिखा यही जनता-समझता है कि सब कुछ पश्चिम में ही हुआ या हो सकता है| समय आ गया है कि हम अपने ज्ञान-विज्ञानं के नए मानचित्र बनाएँ : इतिहास के ओपनिवेशिक पथ और उसके सम्प्रदायवादी अभिप्रायों से मुक्त कर उसे उन सबाल्टर्न अभिप्रायों से पढ़े-समझें जो पिछले कुछ दशकों में भारतीय वंशों या राजाओं के इतिहास के स्थान पर भारतीय जन के इतिहास के रूप में खोजे-बखाने गए हैं| विश्वविद्यालय को अपनी विकल्प-मूढ़ता के कारणों को पहचानने के लिए अपनी विफलताओं का निर्मम आकलन करना होगा| अपनी आकांक्षाओं का नया भूगोल अंकित करना होगा| कुछ शुरुआत शान्ति निकेतन में हुई ऐसा आभास ज़रूर मिला|

लेखक प्रसिद्ध कवि, आलोचक और संस्कृतिकर्मी हैं|

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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