स्त्रीकाल

हौसलों की उड़ान

 

साहित्य समाज का दर्पण है। समाज में हो रही हलचलों के अनेक प्रतिबिम्ब साहित्य में स्थान पाते हैं। समाज के अनेक पक्षों पर साहित्यकारों की लेखनी चलती है–आम जन को स्थितियों की बहुकोणीय जानकारी रागात्मक रूप से देने का महत्त्वपूर्ण कार्य साहित्यकार के कंधों पर ही होता है। बहुत सी स्थितियों के सूक्ष्म व अलक्षित पक्षों से आम जन को वही परिचित कराते हैं, जिनसे सामान्य जन प्राय: अनभिज्ञ होते हैं। साहित्यकार अपनी रचनाओं के द्वारा आम जन के मानस को भी प्रभावित करते हैं। यह तो सर्वविदित है ही कि बड़े से बड़े परिवर्तन अथवा क्रांतियों की शुरुआत सर्वप्रथम मन या सोच से ही होती है। किसी भी कार्य को क्रिया रूप में परिणत करने से पहले उसे परिणत करने का संकल्प लिया जाता है जो मन में घटित हो रहा होता है।

इतना मूल्यवान रचने के बावजूद, उन्हें रचने वाले ये लेखक व साहित्यकार इस लोक के ही प्राणी होते हैं। खूबियों और खामियों से लैस। जैसी वृत्तियाँ और कार्यकलाप समाज में घट रहे होते हैं उनसे हमेशा अप्रभावित रहना साहित्यकार के लिए भी सम्भव नहीं होता। साहित्य के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान बनाने और लम्बे समय तक उसे यथावत बनाए रखने के लिए लेखन के अतिरिक्त भी विभिन्न स्तरों पर क्रियाशील होना पड़ता है। मेलजोल और परस्पर घनिष्ठता स्थापित करने के विभिन्न आयाम, एक–दूसरे के हितों का पोषण और भी न जाने क्या–क्या?

अपने जीवन और अपने आस–पास घट रहे समाज के सत्यों को लेखन के द्वारा वाणी देना मेरे वश में था, पर अपने युग जीवन के अनुरूप विभिन्न समीकरणों में स्वयं को समेट सकना मेरी प्रकृति में न था।

साहित्यिक कार्यक्रमों में गठजोड़ स्थापित करने के सुअवसर होते हैं। यहाँ लोग प्रभावशाली एवं चर्चित साहित्यकार के ज्यादा से ज्यादा निकट रहने की चेष्टा करते हैं, ताकि उससे सम्बन्ध स्थापित कर भविष्य में लाभ उठा सकें। फोन पर बातचीत के दौरान आत्मीयता प्रकट करने वाले कई परिचित इन कार्यक्रमों में साक्षात मिलने पर कतराते हुए से प्रतीत हुए, वास्तव में उस समय वह सत्ता और प्रभाव के लिए अन्यों से गठजोड़ स्थापित करने में व्यस्त होते थे, साधारण और कम प्रभावी लेखकों के लिए समय नहीं था उनके पास। भावना यहाँ नगण्य थी लाभ के समक्ष। ऐसे माहौल में मैं बहुत असहज हो जाती थी, तनिक उदास और निराश भी।

कई बार ऐसे आयोजनों में, मैं गयी तो बहुत उत्साह से हूँ कि लेखकों से भेंट भी हो जाएगी व कुछ नवीन जानने को भी मिलेगा, पर अक्सर दोनों मनोयोगों के निष्फल हो जाने के कारण वापस लौटी हूँ किंचित अनमनी व क्षुब्ध। बहुत बार संगोष्ठियों में विषय के अनुरूप कुछ भी नया जानने को नहीं मिलता। वक्ता या तो हजार बार पहले से सुना हुआ सिद्धान्त निरूपण करते हैं या विषय से इतर बोलते हैं। मुझे अनुभव होता कि वहाँ न ज्ञान में इजाफा हुआ, न किसी से स्नेहिल मुलाकात ही कि लोगों से भेंट मुलाकात का सुख ही मिला हो। धीरे–धीरे साहित्यिक कार्यक्रमों में जाना मैंने कम कर दिया। एक बात और, ऐसे आयोजनों में मुख्यधारा के साहित्यकार दलित लेखकों से उतने अनौपचारिक नहीं हो पाते, व्यवहार के स्तर पर दलित लेखकों का हृदय से स्वीकार अभी दूर की बात है।

दूसरी ओर दलित आयोजकों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में वरिष्ठता, लोकप्रियता एवं प्रभाव के अनुसार लेखकों को महत्ता मिलती थी। नये और अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय लेखक स्वयं को वहाँ उपेक्षित–सा प्रतीत करते थे।

प्रकट में बहुत छोटी दिखने वाली इन घटनाओं ने मेरे मन पर बहुत नकारात्मक असर डालना शुरू कर दिया। मैं भीतर से निर्जीव और उत्साहहीन होने लगी, किसी एक भी आत्मीय जन की उपस्थिति के अभाव में मेरा जीवन वृक्ष धीरे–धीरे मुरझाने लगा।अपने दायरे के लोगों से मिली छोटी–छोटी चोटें, अस्वीकृति के एहसास, औपचारिक स्नेहहीन सम्बन्ध मुझे अन्दरूनी तौर पर खण्डित करते चले गये। भावनात्मक स्तर पर निरन्तर पराजयों का सामना करता हुआ मेरा मन निराशाओं के भँवर में डूबने–उतराने लगा।

समसामयिक परिवर्तित होती हुई स्थितियों और युगबोध से परिचित होने के बावजूद मैं बदली हुई स्थितियों से सामंजस्य नहीं बिठा पा रही थी। युग से अनुकूलता स्थापित कर तारतम्य बिठा पाने में असफल हो रही थी, प्रैक्टिकल हो कर मैं सोच ही न पाती थी।

मन की भीतरी तहों में कहीं ये भाव बहुत गहरे से पैठने लगा था कि मेरी खुशी अथवा दुख से किसी को कोई सरोकार नहीं है–– कोई एक भी ऐसा नहीं जिसकी आंखों से मेरे लिए दुख या खुशी के आंसू बहें।

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एक अन्य अनुभव ने मेरे मन पर बहुत नकारात्मक असर डाला। मैं प्रति वर्ष जुलाई माह में आयोजित होने वाली हंस की सालाना गोष्ठी में जाती थी। हंस कार्यालय से सदैव मुझे निमन्त्रण मिलता था। कार्यक्रम वाले दिन आयोजन स्थल पर स्नेहसिक्त मुस्कान सहित बड़ी गर्मजोशी से राजेन्द्र यादव स्वागत करते थे-इतने भर से वहाँ जाना सार्थक हो जाता था तब। उनके निधन के बाद आयोजित संगोष्ठी में कुछ ऐसा संयोग बना कि जाना सम्भव नहीं लग रहा था, पर कार्यक्रम वाले दिन एक साहित्यकार ने वहाँ आने का विशेष आग्रह किया। उनके आग्रह को टालना मेरे लिए सम्भव न था। बहुत तिकड़में भिड़ा किसी तरह कुछ देर के लिए वहाँ जाने का समय मैंने निकाल ही लिया, पर वहाँ जाने पर पाया कि जिनके आग्रह पर इतनी मुश्किल से मैं वहाँ आ पाई हूँ उनके पास मुझसे बात करने के लिए एक मिनट का भी समय नहीं है। यह देख मेरा मन बहुत दुखी हो गया। क्या मात्र दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए मुझे वहाँ बुलाया गया था। क्या मैं इतनी तुच्छ और महत्त्वहीन हूँ कि अपने जीवन के अन्य सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों को छोड़ दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाऊँ।

जहाँ तक लेखन व प्रकाशन की बात है–हंस, कथादेश, पाखी, अन्यथा जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानी, लेख आदि प्रकाशित होने पर देश के विभिन्न प्रान्तों से फोन काल और ईमेल के माध्यम से मुझे प्रतिक्रियाएँ मिलती, पर अपने परिचित लेखक, मित्र एवं कॉलेज के जानने वाले इन अवसरों पर मुँह सिल लेते,मेरा मन बुझने लगा, लिखने के उत्साह पर भी इन सबने बहुत ही नकारात्मक असर डाला। शरीर के किसी भी अमूल्य अंग के पूर्ण अथवा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त होने पर जीवन जीना बहुत दुष्कर है। पर शारीरिक रूप से अक्षमता की पीड़ा को झेलने से भी बहुत ज्यादा कष्टकर और त्रासदायी है समाज से उपेक्षा के एहसास की पीड़ा को झेलना।

कमला नेहरू कॉलेज और साउथ कैंपस में पढ़ाई के दौरान सम्पर्क में आए लोगों का नितान्त औपचारिक व्यवहार और अजनबीपन मेरी दुखद यादों में से एक है। वो दौर तो स्वयं को अध्ययन में व्यस्त करके मैंने झेल लिया, पर आज जब जीवन में स्थायित्व आ चुका है, अन्यों का मुझसे असम्पृक्त रहना मुझे बहुत व्यग्र और विकल कर देता है। ऐसा प्रतीत होता है काँच की एक बारीक अदृश्य दीवार मेरे और समाज के बीच आ गयी है जो उन्हें मुझसे और मुझे उनसे जुड़ने नहीं देती। मैं नहीं जानती कि कब और कैसे मैं इस दीवार को गिरा पाऊँगी। 

मैं यह भी नहीं जानती कि मेरे विकलांग और दलित होने से इस दीवार का कितना सम्बन्ध है। पर दीवार के इस पार से नितान्त एकाकी रहते हुए दीवार के उस पार की दुनिया की रंगीनियों को, कोलाहल को और जीवंतता को मात्र दर्शक बन कर देखना बहुत दुखप्रद है। बचपन से अब तक स्नेहहीन परिवेश में रहते हुए, अनेक शारीरिक व्याधियों के साथ अंत:–बाह्य संघर्षों और चुनौतियों से जूझती मैं अब स्वयं को भीतर से बिलकुल निर्जीव और रिक्त महसूस करने लगी थी। जीवन रूपी वृक्ष को स्नेह सरोकार के जल से सींचने वाला कोई न था मेरे पास-न परिजन, न पति, न मित्र।

सांध्यकालीन कॉलेज में नौकरी के कारण समय मेरे पास यथेष्ट होता था, सुबह आठ बजे तक सतीश व उनसे पहले बच्चे क्रमश: ऑफिस और स्कूल के लिए प्रस्थान कर चुके होते थे। अपने रुचिकर कार्यों को करने के लिए मैं सुबह आठ बजे के बाद से दोपहर ढाई तक खाली होती थी। घरेलू काम सब बाई करती, मुझे सिर्फ भोजन बनाना होता था जो ज्यादा से ज्यादा सिर्फ एक घंटे का खेल था मेरे लिए।

यह सच है कि मुझे किताबें पढ़ने का शौक है। किताबों ने मेरी सोच और समझ को बदलते हुए सदैव मुझे सही दिशा दिखाई, पर किसी आत्मीय जन से वार्तालाप का पर्याय पुस्तकें नहीं हो सकतीं, आत्मीय मित्र परिचित या रिश्तेदार से वार्तालाप के द्वारा किसी को जो स्नेह, सन्तोष और आत्मीयता प्राप्त होती है वह किताबें नहीं दे सकतीं। पर ऐसी आत्मीय बातचीत सम्प्रेषित करने वाला कोई भी न था मेरे पास। निरन्तर समाज से उपेक्षित व असंपृक्त रहते–रहते कब मेरे कदम अवसाद की ओर बढ़ने लगे, मैं जान ही न पाई। एक निष्क्रिय जड़ता मुझ पर छा गयी, हर समय दिल उचाट रहता, किसी काम में मन न लगता, कहीं बाहर जाने के अवसर बोझ समान लगते।

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इतने दुर्बल मन के साथ और घर में किसी आत्मीय की कुशल देखभाल के अभाव में, मैं शारीरिक तौर पर भी अक्सर अस्वस्थ रहने लगी थी। मन के घावों पर स्नेहलेप लगाना सतीश के वश में न था उनकी घर में उपस्थिति बस एक रोबोट के समान थी। जितना कहोगे उतना कर देंगे। अपनी समझ से रत्ती भर भी कुछ करने को वे तत्पर न होते थे। मन के छाले देख–समझ पाने लायक न उनमें संवेदना थी न समझ।

शारीरिक बीमारियाँ तो इलाज से ठीक हो जातीं, पर मन ज्यों का त्यों बना रहता–उदास व असम्पृक्त।कई बार मनोचिकित्सक के पास जाने की मैंने ठानी, पर जा न पाई। आश्चर्य होता था मुझे स्वयं पर–पहले के समान अब क्यों नहीं मैं सोचे हुए को क्रिया में परिणत कर पाती। इन स्थितियों से निजात पाने के लिए क्यों नहीं मैं मनोचिकित्सक के पास जाती।

अपने आप को व्यस्त रखने के लिए कुछ करने को भी मेरा मन तत्पर न होता था, खुद को व्यस्त रखना मनोरोगो का सबसे अच्छा उपचार है, पर न मेरा मन टी.वी.में रमता, न संगीत सुनने में। पुस्तकों से तो अरुचि सी हो गयी थी।

इन परिस्थितियों में कभी–कभी आत्ममंथन करती हुई मैं स्वयं को बहुत धिक्कारती भी थी कि सब कुछ पा कर भी मैं क्यों इस दशा में पहुँचगयीहूँ। आखिर क्या चाहता है मेरा मन, सब कुछ तो है मेरे पास–नौकरी, पति, बच्चे, घर, जो जैसा जितना भी है क्यों नहीं उसे स्वीकार कर मैं खुश होती। बार–बार स्वयं को मैं ये सब समझाती, कुछ समय के लिए मन ठहर भी जाता पर कुछ दिन बाद फिर लौटकर निराशा, उदासी और अवसाद की उन अंधी गुफाओं में भटकने लगता।

उन्हीं दिनों एक दिन मैंने यू ट्यूब पर ब्रह्मकुमारी सिस्टर शिवानी का लेक्चर सुना, विषय था-हाउ टू कंट्रोल योर माइंड अर्थात मन को कैसे काबू में रखें। ये विषय बिलकुल मेरे मनोनुकूल था। मैं भी अपने मन के कारण परेशान थी, मन अप्राप्य को पाने के लिए विकल रहता था। विकलांगता के कारण जो जीवन में सम्भव न था, उसे सोच–सोच परेशान रहता था। हजार मनाने से भी न मानता था।

सिस्टर शिवानी का लेक्चर सुन मुझे बहुत अच्छा लगा। ‘ओम शान्ति म्यूजिक डॉट नेट’ नामक वेबसाइट पर रिलेशनशिप, डिप्रेशन, लाइफ स्क्लि, हैप्पीनेस, एडिक्शंस, जैसे तमाम विषयों पर शिवानी और विख्यात मनोचिकित्सक गिरीश पटेल की बातचीत पर आधारित ऑडियो टेप उपलब्ध हैं।

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मानव मनोवृत्तियों, मानव के परिवार और समाज से सम्बन्धों, मनोग्रन्थियों पर जैसी बातचीत मैं किसी घनिष्ठ मित्र से करना चाहती थी वैसी विश्लेषणपरक, गंभीर वार्ता बहुत रोचक शैली में मैंने इन आडियो टेपों में सुनी। रिलेशनशिप वाली श्रृंखला में पति–पत्नी सम्बन्ध, माता–पिता–सन्तानसम्बन्ध, दोस्ती के सम्बन्ध, ऑफिस के लोगों से सम्बन्ध–इन सब पर इतनी गहन विश्लेषणपरक रोचक चर्चा यहाँ सुनने को मिली कि मेरी शंकाएं दूर होती सी प्रतीत होने लगीं।

पुन: मन एक नवीन उत्साह से भर गया। अब समय मिलते ही मैं इन टेपों को सुनने लगती–कभी–कभी खाना बनाते हुए हाथ काम कर रहे होते और कान और मन डॉ– गिरीश त्यागी, शिवानी और कार्यक्रम की एंकर कनुप्रिया की बातों में रमा होता।

एक अनन्य आत्मीय मित्र, स्नेही परिजन की भांति इनकी बातचीत से मुझे सम्बल मिला। प्रस्तुत आत्मकथा तीन वर्ष पहले ही लिख ली गयी थी। पर उसे सुधार परिष्कार कर पुस्तकाकार रूप देने के लिए मेरा मन तत्पर ही न हो पाता था। तीन वर्ष तक पाण्डुलिपि धूल फाँकती रही। अब मन के बदलते ही मैं अपने इस अधूरे काम को पूरा करने में जुट गयी। पुन: अध्ययन और लेखन से खुद को जोड़ा। साहित्यिक कार्यक्रमों में आना–जाना शुरू किया।

इतना स्पष्ट करना चाहूँगी कि ब्रह्मकुमारीज के सामाजिक सम्बन्धों, मनोवृत्तियों और मानव जीवन को अन्त:–बाह्य से प्रभावित करने वाली चर्चा से मैं प्रभावित हुई। ब्रह्मकुमारीज के आत्मा–परमात्मा, शिव धाम और अध्यात्मक वाले लेक्चरों को मैंने नहीं सुना, न मैं उन पर कोई टिप्पणी करना चाहती हूँ। मानव मन और सामाजिक सम्बन्धों की व्याख्या वाले लेक्चर मेरे मनोनुकूल थे, उन्हें मैंने सुना और जो मेरे लिए उचित था उसे ग्रहण करने की कोशिश की। 

पहली दलित विकलांग स्त्री की आत्मकथा ‘टूटे पंखों से परवाज तक’ का एक अंश। प्रस्तुति: संजीव चन्दन

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लेखिका श्यामलाल कॉलेज,दिल्ली में हिन्दी की प्राध्यापिका हैं। सम्पर्क +919650466938, drsumitra21@gmail.com

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