चर्चा मेंस्त्रीकाल

किसान आन्दोलन और महिलाएँ

 

बहुत दिनों बाद अन्यान्य कारणों से एक विराम लेकर स्त्रीकाल का यह कॉलम पुनर्जीवन ले रहा है। देश की खेती किसानी का  70% काम महिलाओं के द्वारा सम्पादित होता है लेकिन उनका इसपर मालिकाना हक मात्र 3% बताया जाता है। इसके बावजूद देश की राजधानी में कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आन्दोलन में महिलाओं का उत्साह देखते बनता है। – संजीव चन्दन

बचपन से हम छवियों के जरिये मानस निर्माण करते हैं। जैसे राम स्कूल जाते हुए और सीता माँ का हाथ बंटाती हुई हम सबके मानस में बालपोथी से ही छवि ले चुके होते हैं। एक और छवि बचपन से घर करती है किसानों की मैली धोती में हल-बल लिये किसान की।

वर्तमान किसान आन्दोलन में भी महिलाओं की भागीदारी को अगर मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया में नज़र आईं तस्वीरों के माध्यम से समझें तो सबसे पहले जो तस्वीर जेहन में आती है,  जो मीडिया रिपोर्ट्स में भी अक्सर दिखाई देती है, वह है सिन्धु बॉर्डर पर उनके द्वारा रोटियाँ बनाती हुई तस्वीरें, जिससे छवि यह बनती है कि आन्दोलन में उनकी भागीदारी खाने पीने की और उन्ही कामों की व्यवस्था सम्भालने तक सीमित है जो वे घरों में करती हैं।उत्तर प्रदेश में श्रमिक आंदोलन: सवाल महिला भागीदारी का

रूढ़ छवि से अलग किसान आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी हो रही।  एक तस्वीर काफी  इन्ही दिनों सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुई,  62 वर्षीया मनजीत कौर की तस्वीर, जिसमें वे अन्य महिलाओं के साथ पटियाला से जीप चलाकर किसान आन्दोलन के समर्थन में सिन्धु बॉर्डर पहुँची। यह तस्वीर कहीं न कहीं किसान आन्दोलन में महिला शक्ति की एक पहचान के तौर पर उभरी जो कि उनकी घरेलू आन्दोलनकारी छवि से पृथक थी। इस तस्वीर से उनकी आत्म निर्भरता, नेतृत्व और पहलक़दमी की छवि बनती है। 

फिर एक पूरी रिपोर्ट रवीश कुमार ने अपने प्राइम टाइम में दिखायी जिसमें उन्होंने भारतीय किसान यूनियन की उपाध्यक्ष जसबीर कौर से हमारी मुलाक़ात करायी थी जो कि न सिर्फ़ मंच संचालन करती हैं बल्कि वहाँ की पूरी अर्थव्यवस्था भी सम्भालती हैं। जसबीर कौर के जरिये हमारा परिचय उस पूरी तरह विकसित महिला नेतृत्व क्षमता से होता है जो न सिर्फ़ राजनीतिक चेतना से समृद्ध है बल्कि आन्दोलन सञ्चालन के वे विभाग भी सम्भालती हैं जो कि आमतौर पर पुरुषों के कार्यक्षेत्र माने जाते हैं। हालाँकि पिछले वर्ष ही इस नागरिकता कानून विरोधी आन्दोलन में महिलाओं द्वारा आन्दोलन को पूरे देश ने देखा-समझा जिसे साजिश पूर्वक कुचल दिया गया।

इसके सिवा कुछ तस्वीरें टिकरी और चिल्ला बॉर्डर पर बैठी उन महिलाओं की भी हैं जो सुबह सवेरे अपने घर के काम निबटा के बच्चों सहित धरने में शरीक होती हैं। ये महिलाएँ राजनीतिक और सामाजिक तौर पर उतनी जागरूक भले न हों मगर इस आन्दोलन का मुद्दा जिनसे उनका जीवन यापन, घर और बच्चों का भविष्य जुड़ा है उसे बख़ूबी समझती हैं। 

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इनके अलावा बहुत सी महिलाएँ हैं जो आन्दोलन की तस्वीरों में कम दिखाई देती हैं मगर बेहद महत्त्वपूर्ण कामों में व्यस्त हैं।  दरअसल जबकि पंजाब के ज़्यादातर पुरुष किसान सिन्धु बॉर्डर पर इस आन्दोलन की फ्रंट लाइन पर हैं और आन्दोलन का मुखर चेहरा हैं,  महिलाएँ आन्दोलन की रीढ़ की तरह उसका एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम बनी हुई हैं। वे घर सम्भाल रही हैं, खेत सम्भाल रही हैं,  मण्डी में आना जाना भी सम्भाल रही हैं। वे बीमारों की देखभाल कर रही हैं, रुपये पैसों का प्रबन्ध देख रही हैं और ज़रूरत पड़ने पर सिन्धु बॉर्डर आकर आन्दोलन का मोर्चा भी सम्भाल रही हैं।

वे ख़ुद भी जागरूक हैं और अन्य लोगों को भी इस मुद्दे के लिये जागरूक कर रही हैं। हरियाणा की सर्व खाप महिला पंचायत ने गाँव गाँव जाकर लोगों को किसान आन्दोलन के मुद्दे पर जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। 

देश के आन्दोलनों में महिलाओं की भागीदारी पर नज़र डालें तो कई स्त्री अस्मिता के आन्दोलन याद आते हैं, जैसे गुलाबी गैंग आन्दोलन, सबरीमाला मन्दिर प्रोटेस्ट, मणिपुरी महिलाओं का सेना के ख़िलाफ़ नग्न आन्दोलन, निर्भया आन्दोलन, स्टॉप एसिड आन्दोलन, पिंजरा तोड़ आन्दोलन या सोशल मीडिया पर चलाया गया ‘मी टू’ आन्दोलन आदि। मगर महिलाओं की भागीदारी महज अपनी अस्मिता के संघर्ष से जुड़े आन्दोलनों तक सीमित नहीं है। देश के सबसे बड़े आन्दोलन स्वतन्त्रता संग्राम में भागीदारी करती कई माहिलाएँ जेहन में उभरती  हैं, लक्ष्मी बाई, बेग़म हज़रत महल, लक्ष्मी सहगल, सुचेता कृपलानी, सरोजनी नायडू, कस्तूरबा, अरुणा आसफ़ अली जैसे प्रमुख नामों के अलावा बहुत सी महिलाएँ जो घर, परिवार सम्भालती हुई भी क्रन्तिकारी अभियानों और आन्दोलनों में हिस्सा लेती रहीं। वहीं देश में चिपको आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, मुन्नार टी प्लांट आन्दोलन, सेवा आन्दोलन, जागमती सागवान खाप पंचायतों के ख़िलाफ़ आन्दोलन और विभिन्न राज्यो में हुए शराब के ख़िलाफ़ आन्दोलन और हाल के नागरिकता कानून विरोधी शाहीन बाग़ जैसे कई आन्दोलन महिलाओ के नेतृत्व में हुए जिनमें उन्होंने सामाजिक मुद्दों और जन,जंगल,  ज़मीन और नागरिकता बचाने के संघर्ष में अगुआई की। 

इस समय दुनिया भर में पर्यावरण के मुद्दे पर ध्यान खींचने और उसे सबसे महत्त्वपूर्ण बनाए जाने के आन्दोलनो का प्रमुख चेहरा 17 वर्षीय स्वीडिश एक्टिविस्ट ग्रेटा थम्बर्ग हैं, और हाल ही में अमेंरिका में हुए ब्लैक लाइव्स मैटर्स की नींव डालने वाली भी अलीशिया गार्ज़ा, ओपल टोमेंटी, और पैट्रीशे नामक तीन महिलाएँ हैं।Black Lives Matter | Definition, Goals, History, & Influence | Britannica

दरअसल संसार का कोई भी संघर्ष महज आधी आबादी के बलबूते पर नहीं किया जा सकता, उसमें समाज के हर वर्ग का सम्पूर्ण योगदान चाहिये होता है। स्त्रियों की बौद्धिक और नेतृत्व की क्षमता पर सवाल करने वालों के जवाब में अनगिनत उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि प्रतिकूल सामाजिक स्थितियों में भी स्त्रियों ने अपनी अस्मिता और सामाजिक-प्राकृतिक मुद्दों से जुड़े आन्दोलनों को अंजाम दिया है।  जिस समाज में स्त्रियों की स्थिति ठीक नहीं होती, जो समाज अपनी स्त्रियों की महत्ता को नहीं समझता, जो समाज समानता और समता को महज आदर्श मूल्य मानकर ख़ारिज करता है और उसके व्यवहारिक पक्ष को ध्यान देने योग्य नहीं मानता,  अपनी आधी शक्ति को पहचानने से इनकार करता है अन्ततः उसकी अपने मुद्दों के लिये संघर्ष की क्षमता कमज़ोर होती जाती है। 

 शैव परम्परा में भी अर्धनारीश्वर की धारणा को स्थान दिया गया है, जहाँ पुरुष को मानव की और स्त्री को प्रकृति की उपमा दी गयी है। यह महज पुरुष और स्त्री के समाज  में सन्तुलन की तस्वीर नहीं बल्कि मानव और प्रकृति के सन्तुलन की तस्वीर भी है। इको फेमिनिज्मभी समाज में स्त्री की तुलना प्रकृति की स्थिति से करता है, जिसमें मानव समाज और प्रकृति के सन्तुलन को प्राथमिकता दी गयी है। 

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यहाँ यह भी स्पष्ट करना ज़रूरी लगता है कि किसी भी आन्दोलन में अक्सर यह कहा जाता है कि महिलाएँ पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं, यहाँ तक मीडिया रिपोर्ट्स भी किसान आन्दोलन में महिला भागीदारी को इसी तरह की हैडलाइन के साथ छापती हैं। मगर इसमें गड़बड़ यह है कि ज्यों ही हम ऐसी बात कहते हैं वहाँ पुरुष प्राथमिक हो जाता है और स्त्री दोयम। इसी आन्दोलन की बात करें तो यह आन्दोलन महज पुरुष किसानों का नहीं है, पुरुष किसान कहें कि स्त्री किसान, यह आन्दोलन किसानों का है,  और प्राथमिकता पर पुरुष नहीं किसानों का मुद्दा है। इसलिये कहा यह चाहिये कि इस आन्दोलन को स्त्री और पुरुष किसान कन्धे से कन्धा मिलाकर अंजाम दे रहे हैं। स्त्री का समाज और सामाजिक आन्दोलनों में योगदान पुरुष के बरक्स नहीं है, बल्कि प्रकृति और समाज हर मुद्दा उसका भी मुद्दा है, हर आन्दोलन उसका भी आन्दोलन है। 

किसान आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी पुनः एक शुभ संकेत हैं। लेकिन काश खेती किसानी के श्रम के अतिरिक्त महिलाओं का जमीन पर मालिकाना हक भी बढ़ता! मालिकाना हक के साथ बोध गया आन्दोलन के बाद महिलाओं ने खेती से खुशहाली प्राप्त की थी। गौरतलब है कि बोध गया आन्दोलन एशिया का पहला आन्दोलन था जिसमें मुक्त जमीनें महिलाओं के नाम रजिस्टर हुईं। खेती ही क्यों सम्पत्ति में महिलाओं का मालिकाना बढ़ना जरूरी है, जो फिलहाल पूरी दुनिया में महज एक प्रतिशत बताई जाती है।

 

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कनुप्रिया

लेखिका सामाजिक राजनीतिक मुद्दों की टिप्पणीकार हैं। सम्पर्क +918920255488, joinkanu@gmail.com
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