मणिपुरशख्सियत

रंगकर्मी रतन थियम और मणिपुरी समाज

 

मैं साल 2009 में मणिपुर विश्वविद्यालय गयी थी। इक्कीस दिन रही वहाँ। उस वक्त प्रोफ़ेसर देवराज वहाँ हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे। उन्होंने हमें एक दिन रतन थियम जी से उनके नाट्य-भवन में मिलवाया। प्रकृति कला के उस मन्दिर में मानो नृत्य कर रही थी। कमल के फूलों से सजे बाग़ में पंछियों का कलरव भयरहित वातावरण में एक काव्य रच रहा था। दो एकड़ की जमीन में उन्होंने कलाकारों के साथ अपनी एक दुनिया खड़ी कर रखी थी यहाँ। यहीं पर सभी कलाकार रहते हैं। सब्जियां भी यहीं उगाते खाते हैं। एक थियेटर में तीन सौ लोग बैठ सकते हैं।

रतनजी से मिलने से पहले हमें एक नाटक “चक्रव्यूह” दिखाया गया। महाभारत की ‘अभिमन्यु-चक्रव्यूह’ प्रवेश वाला प्रसंग को मणिपुर के तात्कालिक परिस्थिति को उजागर करने के उद्देश्य से खेला गया नाटक था यह। अर्जुन चक्रव्यूह भेदते हुए भीतर प्रवेश का तरीका बता रहे हैं। माता सुभद्रा के गर्भ में अभिमन्यु ध्यान से सुन रहा है। चक्रव्यूह के भीतर अर्जुन प्रवेश हो गये हैं। माता धीरे-धीरे नींद की आगोश में जा रही है। चक्रव्यूह से बाहर निकलने का तरीका सुने बिना ही वह सो गईं हैं। अर्जुन बोलते-बोलते चुप हो जाते हैं। शिशु पुकारता है, “माता-माता ! सोना मत ! मुझे सुनना है।”

शिशु का माता के गर्भ में तड़पना, पुकारना गहन पीड़ा उत्पन्न करता है। और अचानक उस पौराणिक कथा का दृश्य बदल जाता है। मणिपुर का जर-जर होता शहर और गाँव। ऊबड़-खाबड़ सड़कों-गलियों में आधुनिक हथियारों से लेस फौजियों का चलना। लोगों का भागना-दौड़ना, लाशों का गिरना, चीखना-चिल्लाना और फौजियों के पद्छापों से भय उत्पन्न करने वाला संगीत। एक तनाव सा माहौल पैदा हो जाता है। मणिपुरी लोगों के पूर्वज चक्रव्यूह में प्रवेश कर गये और सो गये। उनके सो जाने से उनकी संतानें मुक्ति का मार्ग ढूँढ रही हैं।

इसके पहले मैंने कभी इस तरह नाटक के विराट स्वरूप को जाना नहीं था। एक ही मंच पर रंग और संगीत तथा छाया और प्रकाश का अद्भुत खेल। नदी और उसका किनारा, किनारों पर खड़े पेड़-पौधे, लहरों और नीले आकाश का भ्रम उत्पन्न करते विशालकाय कपड़े। पात्रों का आंगिक लय, ताल, शब्दों का उच्चारण और उसका उतार-चढ़ाव देखते ही बनता था। भाषा इतनी कलात्मक ढंग से नाच उठती है यह मैंने उस वक्त अनुभव किया।

साहित्य में अनेक विधाएँ होती हैं ; नाटक, एकांकी, संस्मरण, कविता, कहानी इत्यादि। सभी समाज और मनुष्य के सम्बन्धों को ही प्रतिबिम्बित करते हैं। समाज को ही केन्द्र में रखा जाता है। समाज की कमियों को, विद्रूपताओं को सामने लाते हुए वे उनके समाधान का मार्ग दिखाते हैं। न्याय की रौशनी में किस तरह मनुष्यता को पहचाना जाए? इसके लिए जरुरी होता है वे अपने समय के महत्वपूर्ण मुद्दों को समाज के सामने ले आएँ। समाज को सोचने पर मजबूर कर दें। रतन थियम के नाटकों में ये सभी गुण मौजूद हैं। वे कवि भी हैं। उनका ह्रदय कविता में भी धड़कता हैं।

रचनाएँ मात्र पाठकों, दर्शकों अथवा श्रोताओं को ही मदद नहीं पहुँचाती, बल्कि रचनाकार स्वयं भी अपनी रचनाओं की मदद से अपनी आत्मा की विद्रूपताओं से मुक्ति का मार्ग खोजते हैं। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड ने एक साक्षात्कार में कहा था, “मुझे जादुई कल्पनाओं में बहुत रूचि हैं। काश कि मैं एक जादूगर होता। जादू हमें इस बात का विश्वास दिलाती है कि एक बेहद ही सुन्दर और अद्भुत दुनिया का निर्माण या कल्पना संभव हैं।”

रचनात्मकता इसी कल्पना का ही तो प्रत्येक्ष रूप है। एक ऐसे समाज निर्माण का सपना ; जहाँ न्याय हो, ज्ञान हो, विज्ञान हो, समता हो, समानता हो, सभी भयमुक्त हों। यहाँ तक कि ईश्वरों और शैतानों के नाम से भी लोग मुक्त हों। कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर ने भयमुक्त समतामूलक समाज का सपना देखा और कविता पर कविता रच डाला। रचनाएँ कल्पनाओं के इसी अद्भुत जादुई दुनिया से ही तो पैदा होती हैं।

कला और साहित्य से भाषा का सौन्दर्य, उसकी गहराई और उसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। रतन थियम ने स्वयं एक साक्षात्कार में कहा था, “भले ही हम अपनी ही भाषा में एक-दूसरे से बातचीत करें, तो भी कई तरह की दूरियां तो रहती ही हैं। यदि आप भाषा और कला को समझते हैं तो यह महत्वपूर्ण बात है। क्योंकि तब आप जो नहीं कहा गया है उसे भी समझ सकते हो। और नाटक कलात्मक अभिव्यक्ति है – भाषा में जो सीधा-सीधा कहा नहीं गया है, उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम। तब भाषा मात्र भाषा ही नहीं रह जाती। वह कुछ अधिक गहरी हो जाती हैं। यदि भाषा ही मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम होती तो मैं कला को क्यों बीच में ले आता? मैं लिख देता और आपको थमा देता और कहता – पढ़ लो ! मुझे कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं होती। लिखित ही सबकुछ दे देता तो क्या आप इससे संतुष्ट हैं? आपको गहन तरीके से अभिव्यक्त होना होता है। प्रभावी ढंग से बातों को सामने रखना होता है। इसीलिए कला अस्तित्व में आती है। और यह हमेशा सभी दर्शकों के लिए नहीं होती। यह एक सर्जनशील कलाकार की आत्मिक संतुष्टि के लिए भी होती है। यह अधिक जरुरी है कि आप सही ढंग से स्वयं को अभिव्यक्त कर पाये या नहीं।”

1948 में जन्मे रतन थियम भारत में ही नहीं, विश्व में ख्यात रंग-कर्मी हैं। उनको समझने के लिए धीरज और संयम चाहिए। मणिपुर में व्याप्त बेचैनी को समझना होगा। यहाँ के इतिहास को समझना होगा। बहुत सारी असहमतियाँ हो सकती हैं, किन्तु संवाद से ही हल निकलेगा। एक सजग और श्रेष्ठ सर्जक इन बेचैनियों का जब आकलन करता है तो उसके मायने होते हैं।

वह एक अशांत समय का रचनाकार है। उन्हें अपनी जमीन की नब्ज पता है। ब्रिटेन जैसे विकसित देश की सरकार और वहाँ की महारानी ने उन्हें अपनी नागरिकता प्रदान करने की इच्छा से कई बार पत्र लिखा, किन्तु उन्होंने अपने ह्रदय की सूक्ष्म आवाज को ही सुनने का फैसला किया। उनको कला और साहित्य का महत्व पता है। वह जानते हैं कि मणिपुर को उनकी अधिक जरूरत है। भारत के विकसित शहर उनका स्वागत करते हैं। उन्हें हर वह सुविधाएँ मिल सकती हैं जिनकी कल्पना हर आदमी करता है पर उन्होंने जार-जार होते मणिपुर में रहने को ही स्वीकार किया। जगह-जगह जाकर यहाँ नाटक खेलना अब खतरे से खाली नहीं हैं ; इसके बावजूद रंगकर्म की लौ को जलाए रखना अत्यंत जोखिम का काम है।

प्रोफेसर देवराज मणिपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में कई वर्ष काम करते रहे हैं।  उन्होंने मणिपुरी समाज और साहित्य को समझने का सफल प्रयास किया। कई सामाजिक आन्दोलनों में भी हिस्सा लिया। अपने एक आलेख ‘मणिपुर: हिन्दी के रचनात्मक सरोकार’ में वे लिखते हैं –“ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमण के फलस्वरूप राजनैतिक अशान्ति तथा सांस्कृतिक संघर्ष का जो वातावरण निर्मित हुआ, उसके चलते उत्तर भारत से बड़ी संख्या में सामान्य जनता ने इधर-उधर पलायन किया। धर्म रक्षा के लिए चिन्तित ब्राह्मणों और पुरोहितों की संख्या अधिक थी। वे अनेक स्थानों पर गये। उसी क्रम में वे मणिपुर भी आ गये। जो पहले आए थे, उन्होंने अपने नाम के पूर्व ‘अरिबम’ (प्राचीन) तथा जो बाद में आए, उन्होंने ‘अनोबम’ (नया) शब्द जोड़ लिया।

आगे चलकर अरिबम और अनोबम वंश के नाम-प्रतीक की भाँति प्रयुक्त होने लगे। इन ब्राह्मणों ने मणिपुरी भाषा को सीख लिया, और वे स्थानीय परिवेश का अंग बन गये। साथ ही उन्होंने अपनी मूल धार्मिक आस्थाओं व कर्मकांड का पालन भी अपने घरों में जारी रखा। अपनी भाषा हिन्दी को भी बनाए रखा। इसी से मणिपुरी लोगों का हिन्दी से परिचय हुआ होगा। भाषा के साथ सांस्कृतिक सम्पर्क की शुरुआत हुई। वैष्णव धर्म का प्रवेश इनके कारण हुआ। चूँकि धार्मिक कृत्य ब्राह्मणों ने संपन्न किया, इससे संस्कृत भाषा का भी प्रवेश हो गया। 18 वीं सदी के आते-आते मणिपुर के मन्दिरों में ‘ब्रजबुलि’ के नाम से पदों का गायन होने लगा था। ये पद मैथिल-कोकिल विद्यापति के थे।” और इस प्रकार वर्ण व्यवस्था का भी प्रचलन होने लगा।

वे आगे लिखते हैं , “प्रतीक-व्याख्या तथा महाभारत आदि के विविध प्रमाणों के आधार पर मणिपुरी संस्कृति को विशाल हिन्दू संस्कृति की धारा का एक अंग सिद्ध किये जाने की परम्परा रही है। जब राष्ट्रीय एकता जैसी शब्दावली का बहुतायत से प्रयोग शुरू हुआ तो एतिहासिक से अधिक इन्हीं पौराणिक आधारों की छाया में भारत और मणिपुर के बीच एकत्व की खोज भी की जाने लगी। एक समय वह भी आया, जब यह प्रयास अतिवाद की सीमाएँ छूने लगा और प्राचीन मैतई संस्कृति को एक स्वतंत्र इकाई मानने वालों में इसकी उतनी ही घोर प्रतिक्रिया भी हुई। उस समय 1972 में लिखी पुस्तक ‘मणिपुरी संस्कृति’ में पंडित अतोंबापू शर्मा वाली प्रतीक-व्याख्या को ब्राह्मणवाद के आक्रमण के रूप में देखा गया।”

जाहिर है इस प्रदेश की नई पीढ़ी अपनी वास्तविक पहचान के प्रति चिन्तित अवश्य रहती होगी। एक तरह की तड़प और पीड़ा का अनुभव भी करती होगी। और इसीलिए इतिहास को खोजने का काम करती होगी। यही कारण हैं कि प्रत्येक समाज की वर्तमान पीढ़ी को किसी बड़ी संस्कृति अथवा धर्म में विलय हो जाने से पहले सतर्क होना चाहिए। क्योंकि भविष्य की पीढ़ियों को उसके द्वारा निर्मित कर्मों के साथ संघर्ष करना पड़ता है। यह बहुत ही मुश्किल संघर्ष होता है।

भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार से घिरा एक छोटा सा राज्य है मणिपुर। नृत्य, कला, संगीत और युद्ध कलाओं के लिए प्रख्यात। मणिपुरी नृत्य विश्व प्रसिद्ध है। इन सबके बावजूद इस राज्य के भीतर और बाहर निरन्तर एक द्वंद्व चल रहा है। हजार प्रश्न मुँह बाएँ खड़े हैं। रतन थियम कहते हैं, “विज्ञान और तकनीकी विकास करने के बावजूद हम तेजी से पीछे जा रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि हमारा आध्यात्मिक और मानसिक संतुलन खोता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र और मानव अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं के बावजूद हिंसा और युद्ध बढ़ रहे हैं। मानव के भीतर बुरे गुण, शान्ति और धैर्य जैसे अच्छे गुणों को पराजित करने में सफल हो रहे हैं।”

उन्होंने कई नाटकों की रचना की और उनका सफल मंचन किया – उरुभंगम, इम्फाल, चक्रव्यूह, छिंगलोन मापान, कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर लिखित नाटक ‘किंग ऑफ़ द डार्क चेंबर’ आदि। इनमें युद्ध, उसकी विभीषिका और महिलाओं की समस्याओं को केंद्र में रखा गया है। समस्याओं का हल वह रचनात्मक दृष्टि से खोजते हैं। इसलिए उनके साहित्य और कलाओं पर अधिक से अधिक चर्चा जरुरी है।

मणिपुर को अशांत राज्य घोषित किया गया है। यहाँ अफस्पा कानून लागू है। 1947 में आजादी के समय इसे प्रिंसली स्टेट घोषित किया गया था। 1949 में इसे भारत का अभिन्न हिस्सा बनाया गया। उस समय भारत सरकार से समझौता हुआ था कि यहाँ के आदिवासियों की संस्कृति को तथाकथित मुख्यधारा में लाने के नाम पर उनकी पहचान नहीं छीनी जायेगी। उनसे जबरदस्ती नहीं की जायेगी। लेकिन यहाँ के नागाओं (आदिवासियों) को हमेशा लगता है कि उस समझौते का पालन राज्य सरकार नहीं कर रही है।

 यह राज्य भौगोलिक दृष्टि से जातीय और सांस्कृतिक दो भागों में बंटा हुआ है। पहाड़ों में नागा आदिवासी लोग रहते हैं। इन में बहुत से लोगों ने अब इसाई धर्म को अपना लिया है। जो आदिवासी आज भी अपनी पुरखा-पहचान के साथ ही रहते हैं, उनके और इन ईसाइयों तथा हिन्दुओं के बीच एक तरह का संघर्ष चलता रहता है। घाटी में रहने वाले लोगों में अधिकतर हिन्दू हैं जिन्हें ‘मैतई’ भी कहा जाता है – जो वैष्णवी हैं। इनकी संख्या अधिक हैं। सरकार में, नौकरशाही में, पुलिस में इनके लोग अधिक हैं। मणिपुर में लोग हिन्दी भाषा का विरोध करते हैं। हिन्दी फिल्मों पर रोक भी लगा रखी है। चूँकि मणिपुर पूर्ण रूप से आदिवासी राज्य नहीं हैं, अत: यहाँ ‘इनर लाइन का कानून’ भी लागू नहीं किया गया है। इसीलिए भी ये लोग असुरक्षित महसूस करते हैं, और मणिपुर से बाहर के लोगों से भी इनका संघर्ष चलता रहता है।


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अग्रेजों ने आदिवासियों को 1871 से लेकर 1941 तक जनगणना के प्रपत्र में अलग से कॉलम कोड दिया। हमें यह याद रखना होगा कि आजादी के बाद 1951 में जब आदिवासियों से उनकी पहचान अर्थात नाम को जनगणना के महत्वपूर्ण कागजात से हटा दिया गया, उसी समय से यह लोग अपनी पहचान को लेकर भ्रमित होने लगे थे। वे कभी खुद को हिन्दुओं से जोड़ने लगे तो कभी किसी और धर्म की तरफ देखने लगे।

मार्टिन लूथर किंग ने एक बार कहा था, “ सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटना यह नहीं हैं कि बुरे लोगों द्वारा कमजोरों का उत्पीड़न हो रहा है, बल्कि उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात तब है, जब अच्छे लोग ऐसी घटनाओं को देखकर खामोश रहने को ही स्वीकार करते हैं।”

यही बात रतन थियम अपनी तरह से कहते हैं। वे कहते हैं, “आदिवासियों के जीवन को जब मैं अपने नाटकों में उतारने का प्रयास करता हूँ तो इस बात का ख्याल रखता हूँ कि उसमें किसी भी तरह का मात्र मनोरंजन अथवा दिखावटी का भाव न आने पाए। व्यापारिक भाव से काम नहीं कर सकता मैं। उन्हें देखो और सुनो, वे अभी और इसी वक्त में जीते हैं। बिलकुल प्रकृति की तरह। यहीं से उनका साहित्य और कला जन्म ले रही है। उनका नृत्य, गीत मनुष्य और प्रकृति के बीच का संवाद हैं। यह जरुरी है,भौतिक विकास के इस दौर में आदमी अपनी जड़ों को न भूल जाए। सभ्यता के नाम पर प्रकृति और स्वभाव का दोहन जिस तरह हो रहा हैं,वह चिन्ताजनक है। हमारा संवाद प्रभावपूर्ण होना चाहिए, ताकि सन्देश तीर की तरह लग जाए। इसकी जिम्मेदारी रचनात्मक लोगों को लेनी ही होगी।”

उन्होंने आदिवासी इलाकों में भी जाकर नाटकों का मंचन किया। आदिवासी कला और कलाकारों के लिए उन्होंने अपना दरवाजा खोल दिया। प्रत्येक आदिवासी आन्दोलनों को उन्होंने साथ दिया। एक त्यौहार ‘आदिबिम्ब’ नाम से उन्होंने मनाना शुरू किया। इसका उद्देश्य आदिवासियों को समाज के मुख्य मंच पर लाना रहा है। इस त्यौहार में भिन्न-भिन्न राज्यों के आदिवासी कलाकरों को आमंत्रित किया जाता है।

आदिवासियों के दर्द और अन्य समाज, संस्कृति और धर्म के साथ सतत चलने वाले युद्ध को वे जानते हैं। इसी समझ से सृजनात्मकता जन्म लेती है। संवेदना की गहराई के बिना साहित्यकार, कलाकार अथवा विचारक कैसा? इस दृष्टि से मुझे रंगकर्मी रतन थियम बेहद प्रिय हैं। उन्होंने प्रत्येक पहलू को छूने का प्रयास किया। वंचित, उपेक्षित समाज के प्रति सदा संवेदनशील रहे। यह ज्ञात रहे, कि कला और साहित्य का क्षेत्र उन लोगों के लिए है जो हमेशा प्यासे और खोजी हैं।

रतन थियम लोक-साहित्य पर भी खूब रीझते हैं। इस पर वह कहते हैं, “इसका दायरा बहुत ही विस्तृत हैं। इसमें मिथक, गीत, गुंजार सब कुछ शामिल हैं। और ये सब मेरे प्रेरणा के स्रोत रहे हैं….मेरे लिए परम्परा का मतलब कोई मरी हुई चीज नहीं हैं। ये बहते हुए पानी की तरह हैं। ये हमारी सांस्कृतिक सभ्यता के वे रूप हैं जो अर्थहीन नहीं हैं, उनमें बहाव है, प्रसार है। इसमें देश की सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक सारे पहलू शामिल हैं। लोक परम्परा के गीतों में जो चित्रात्मकता है, गुंजार है, वह सब मेरे लिए बहुत रचनात्मक और कल्पनात्मक है। ये सब साहित्य के किसी भी रूप के महत्व को बढ़ाने के लिए, समृद्ध करने के लिए बहुत ही जरुरी होते है।”

रतन थियम थियटर के चित्रकार हैं। रंगों के प्रति गहरा लगाव रखते हैं। वे कहते हैं, “मेरे काम में रक्त जैसा लाल रंग सबसे महत्वपूर्ण है। मैं अपने प्रत्येक नाटकों में स्थाई पृष्ठभूमि का उपयोग नहीं करता हूँ। प्रत्येक दृश्य के लिए भिन्न पृष्ठभूमि होती है जो दृश्य को भव्य बनाती है।”

मणिपुरी रंग-जगत में उन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया है, जो अविल्कपनीय हैं। उनके नाटकों के कलाकार मार्शल आर्ट के सघन प्रशिक्षण प्राप्त लोग होते हैं। इससे उनके आंगिक शौष्ठव कौशल में प्रभाव उत्पन्न होता है। एक तरह की शारीरिक लयात्मकता देखने को मिलती है। उनके नाटकों की भाषा कलाकारों के आंगिक संवाद में दिखाई देती है। पात्र उन्हें अपने आंगिक क्रिया-कलापों के नृत्यमूलक गतियों के साथ प्रस्तुत करते हैं। संगीत का उपयोग भी बहुत ही कलात्मक ढंग से करते हैं। मणिपुरी भाषा में ही हमने ‘चक्करव्यूह’ नाटक को देखा था। भाषा समझ में नहीं आती थी, लेकिन एक-एक चीज समझ में आ रही थी। यह एक श्रेष्ठ रंगकर्मी की पहचान है

कला के महत्व और सौन्दर्य को मुझ नासमझ के मन के अन्तरतम तक पहुँचाने वाले महान रंगकर्मी, उत्तर-पूर्व के गौरव – रतन थियम को शत-शत नमन।

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जोराम यालाम नाबाम

लेखिका राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, रोनो हील्स दोइमुख, पापुम-पारे, अरूणाचल प्रदेश में एसोसियेट प्रोफ़ेसर (हिन्दी विभाग) हैं। सम्पर्क Joram.yalam@rgu.ac.in
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