साहित्य

भारत की भौगोलिक सीमा में ‘अंग्रेज़ी राज’ और भारतीय भाषा हिन्दी का प्रश्‍न

 

(संदर्भ : नागालैण्ड में एक दशक पूर्व हुई हिन्दी की गोष्ठी और हिन्दी चिंतन)

 

भौगोलिक वैविध्य के साथ–साथ भाषाई वैविध्य भारत के लिए अभिशाप से कम नहीं है। राजनैतिक स्वार्थ सेप्रचारित–प्रसारित वैविध्य ने भारत को निरंतर खंडित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी है। अंबेडकर ने ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट’ में तार्किक दृष्टि से लिखा है –“ऐसा लगता है कि भगवान ने भारत और भारतीयों को भयंकर श्राप दिया है, ‘हे भारतीयों, तुम हमेशा विभाजित रहोगे और तुम हमेशा गुलाम रहोगे!’… जब बंटवारा हुआ तो मुझे लगा कि भगवान अपने श्राप को हटाने और भारत को एक, महान और समृद्ध बनाने के लिए तैयार हैं।

लेकिन मुझे डर है कि कहीं यह श्राप दोबारा न पड़ जाए। क्योंकि मैं देखता हूँ कि जो लोग भाषाई राज्यों की वक़ालत कर रहे हैं, उनके दिल में क्षेत्रीय भाषा को अपनी राजभाषा बनाने का आदर्श है।” (बी. आर. अंबेडकर, ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट’, 1955, पृ. 8) अंबेडकर इस दृष्टि से दार्शनिक और भविष्य दृष्टा साबित हुए हैं। मज़हब के बाद भाषाई विभाजन भारत को खंड–खंड करने वाला दूसरा श्राप है। जब ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे चर्चित हुए तो अंबेडकर की बात रह–रहकर स्मरण हो आयी कि’हे भारतीयों, तुम हमेशा विभाजित रहोगे।’

एक राज्य तक सीमित होकर देखें तो नागालैण्ड में वैभिन्न्य के स्तर और भी गहरे हैं। भाषाई दृष्टि से देखें तो प्रत्येक जनजाति की अपनी एक विशिष्ट बोली है और जब कभी प्रसंग विशेष में सभी जनजातियाँ एकत्रित आती हैं तो ‘नागामिज़’ बोलते हैं। नागामिज़ बंगला, असमिया, मैथिली और कमोबेश खड़ीबोली हिन्दी से मिश्रित बोली (लोकभाषा) है। ‘नागामिज़’ शब्द में ‘मिज़’ सेनागाओं पर अंग्रेज़ी के प्रभाव का आकलन किया जा सकता है।

ऐसा बहुत कम ही हो पाता है कि यहाँ की भिन्न–भिन्न जनजातियाँ सहज ही एकत्रित आएँ। लड़ाके और योद्धा कहलाने वाली ये जनजातियाँ केवल दिसंबर माह में होनेवाले ‘हार्न बिल फेस्टिवल’ के समय कोहिमा में एकत्रित आती हैं। जबकि उस समय भी वे अपने–अपने विशिष्ट रंग–रूप एवं विशिष्ट अंदाज़ में अर्थात् वैभिन्न्य के साथ ही देखने को मिलती हैं। तात्पर्य यह कि आंतरिक (वैचारिक) एवं बाहरी (वेशभूषा-भाषा) पृथकत्व सहजवत दृष्टिगोचर होता है। इसके अतिरिक्त इनकी एकजुटता के उदाहरण कम ही मिलते हैं।

नागाओं की कुल 16जनजातियाँ बतायी जाती हैं और प्रत्येक समूह की बोली में प्रचुर मात्रा में भिन्नता है। वैसे, भारतीय ही नहीं, वैश्विक संदर्भ में भी भाषिक वैभिन्न्यनयी और अज्ञात बात नहीं है। भारत के प्रत्येक व्यक्ति को बचपन से यही बताया जाता रहा है कि भारत में हर तीस कोस पर बोली बदल जाती है– ‘कोस–कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।’ यही बातन्यूनाधिक रूप में नागाओं के संदर्भ में भी लागू होती है।

इसी वैभिन्न्य से पृथकत्व उभरता है और यही पृथकत्व आगे अस्मिता का रूप लेकर विखंडन की ओर अग्रसर होता है। इसी भाषाई वैभिन्न्य एवं पृथकत्वके कारण नागा ‘बोली’ से आगे बढ़कर ‘भाषा’ तक का सफ़र तय नहीं कर सके। बहुभाषाओं के कारण अथवा कहें किभाषाई अस्मिताओं के टकराव तथा अंतर्गत राजनीतिक कलह के कारण अभी तक राष्ट्रभाषा का स्थान रिक्त ही रह गया है। इस राज्य विशेष में बहुबोलियों के प्रचलन के कारण राज्य की कोई स्थानीय भाषा राज्यभाषा नहीं बन पायी है। इसका लाभ ईसाई मशनरियों के प्रभाव से फली-फूली अंग्रेज़ी भाषा को हुआ और वह राजभाषा बन गई।  भारत के प्रत्येक प्रांत ने अपनी भाषाको ही प्राधान्य दिया है, जो कि संविधान सम्मत भी है। परन्तु, अपनी–अपनी भाषा (बोली) को श्रेष्ठ साबित करने की जद्दोज़हद के कारण वैशिष्ट्य एवं लोक स्वीकार्यता की दृष्टि से हिन्दी वास्तविक स्थिति में राष्ट्रभाषा होने के बावजूद, उसे वह स्थान प्राप्त नहीं हो सका है।

यह भी विचारणीय है कि भारत में किसी–न–किसी रूप में पृथकत्व में विश्वास करने वाले सत्ताधिकारियों का शासन बहुत लम्बे समय तक रहा है। 1920 में नागपुर में हुए कांग्रेस के एक अधिवेशन के दौरान गांधीजी ने भाषा–आधारित प्रांत–रचना के मुद्दे को स्वीकार किया था। इसका एक प्रमाण यह भी है कि “कांग्रेस की प्रांतीय समितियाँ ब्रिटिश भारत की कृत्रिम सीमाओं की अपेक्षा भाषाई क्षेत्रों पर आधारित थीं।” (भारतीय इतिहास के कुछ विषय– भाग 3, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2007, पृ. 354) अंबेडकर ने भाषाई प्रांत–रचना पर एक अलग विचार रखा था कि क्या “एक भाषा के लिए एक ही राज्य होना चाहिए?” (बी. आर. अंबेडकर, थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट, 1955, पृ. 9) अर्थात् उन्होंने एक भाषा के लिए अनेक राज्यों की कल्पना की थी। इस दृष्टि से भाषा के आधार पर होने वाले विखंडन को रोका जा सकता था।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने से बहुत पहले भाषाई आधार पर राज्यों की मांग विकसित हो गई थी। भारत में 1895 में पहला भाषाई आन्दोलन वर्तमान ओडिशा में आरंभ हुआ था। बाद के वर्षों में वर्तमान बिहार और उड़ीसा प्रांत को विभाजित करके एक अलग उड़ीसा प्रांत बनाने की मांग के साथ भाषाई आन्दोलन ने गति पकड़ी। उड़िया राष्ट्रवाद के जनक मधुसूदन दास के प्रयासों के कारण आन्दोलन को अंततः 1936 में सफलता मिली और इस प्रकार स्वतंत्रता से पहले उड़ीसा प्रांत भाषाई आधार पर बनने वाला पहला भारतीय राज्य बना।

फिर भाषा के आधार पर मद्रास राज्य के तेलगु–भाषियों ने अपने लिएअलग राज्य की माँग की और  इस प्रकार आंध्र प्रदेश बना (1953) फिर वहीं आंध्र प्रदेश भाषा और सांस्कृतिक वैभिन्न्य के आधार पर पुनः बँटा और तेलंगाना बना (2014)। मराठी एवं गुजराती भाषियों के बीच हुए संघर्ष को कौन भूल सकता है? इसी संघर्ष के कारण बम्बई राज्य महाराष्ट्र एवं गुजरात नामक दो राज्यों में बँटा (1960)। नागा आन्दोलन का मूल आधार घूम–फिरकर भाषाई एवं सांस्कृतिक पृथकत्व ही था। इस प्रकार असम को विभाजित कर नागालैण्ड बना (1963)। पंजाब को पंजाबी भाषा एवं हरियाणा को हरियाणवी हिन्दी के आधार पर विभाजित किया गया (1966)।

हम जानते ही हैं कि भाषा के आधार पर देश विभाजन भी हुआ। इस प्रकार बिखराव लाने वाली पृथकत्व एवं वर्चस्ववाली भावना ने राष्ट्रभाषा के निर्धारण और भारत के अखंडत्व में बाधाएँ उत्पन्न की हैं। नागालैण्ड में चूँकि आरंभ से ही बोलियों के पृथकत्व के कारण एकत्व की भावना का विस्तार नहीं हो सका। अतः बोलियों में बिखराव की ओट लियेअंग्रेज़ी ने ईसाई मिशनरियों के ज़रिए अपनी जड़ें अत्यंत गहराई तक पहुँचा दीं।

साम्राज्य विस्तार में धर्म के साथ–साथ भाषाई निर्भरता महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभरा। इधर नागाओं ने अपनी भाषा के लिए यदि उत्साहपूर्वक कदम उठाये भी हैं और अपनी भाषा का नामकरण ‘टिनिडी’ के नाम से किया है, तो लिपि के लिए पुनः रोमन/लैटिन वर्णमाला पर ही आश्रित हैं। आज भारत के इस प्रांत में अंग्रेज़ी प्रमुख भाषा के रूप में प्रचलित है। यही राजभाषा भी है। नागालैण्ड का पूरा सरकारी कामकाज अंग्रेज़ी में ही होता है। केन्द्र सरकार के राजभाषा अधिनियम के अंतर्गत आनेवाला ‘द्विभाषिकता’ का नियम यहाँ लागू नहीं होता है। वास्तव में अंग्रेज़ी भारतीय भाषाओं में पुल का काम नहीं कर सकती। परन्तु, दुर्भाग्य कि अंग्रेज़ी ही आधार भाषा के रूप में विकसित हुई है और भारत उसी पर आश्रित हो गया है।

वर्ष 2010 के अक्तूबर माह में संसदीय राजभाषा समिति ने नागालैण्ड में स्थित केन्द्रीय संस्थानों का राजभाषा कार्यान्वयन निरीक्षण किया था। इस समिति के दौरे में केवल नागालैण्ड विश्‍वविद्यालय का निरीक्षण यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया था कि राजभाषा नियमों का यथोचित पालन नहीं हो रहा है। चूँकि विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो. के. कन्नन ने सांसदों को भाषा के प्रश्न पर बुरी तरह घेर लिया था। सांसदों को उनके प्रश्न नागवार गुज़रे और निरीक्षण निरस्त हो गया। परन्तु, प्रसंगवश विचारणीय है कि नागालैण्ड ही क्यों किसी भी राज्य के संस्थानों में क्या राजभाषा नियमों का वास्तविक तौर पर पालन किया जा रहा है? हिन्दी का कार्यान्वयन सुनिश्चित कराने में ऐसी समितियों का क्या योगदान है? इनके निरीक्षण दौरों के वैशिष्ट्य एवं उपयोगिता के संबंध में सब भलीभाँति परिचित हैं। हिन्दी के नाम पर व्यय नहीं, अपव्यय अधिक होता है। इससे हिन्दी का ही नहीं, अपितु किसी भी भाषा का भला नहीं हो सकता।

इसी क्रम में 3–4 मई 2011 को नागालैण्ड विश्‍वविद्यालय में हिन्दी के युवा आलोचक डॉ. आनंद पाटील के संयोजन में ‘हिन्दी की विभिन्न भूमिकाएँ’ विषय पर दो–दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठीका आयोजन किया गया था। प्रो. राजेन्द्र कुमार (प्रयागराज), डॉ. प्रेमचन्द्र (इब्राहिमपत्तनम–तेलंगाना), जी. पी. मिश्र (बनारस), सुरेश पंडित (अलवर–राजस्थान), बी. पी. केसरी (राँची), गिरिधारी राम गौंझु (राँची), अशोक पागल (राँची), ओमप्रकाश पाण्डेय (सिलीगुड़ी) इत्यादि संगोष्ठी में सारस्वत वक्ता के रूप में उपस्थित थे।

दो दिनों का हिन्दी का वह आयोजन नहीं, बल्कि उत्सव कहा जाए, अनेकानेक कारणों से विशिष्ट, अनोखा एवं सुखद था। विशिष्ट, अनोखा एवं सुखद इसलिए कि ऐसे दूर–दराज़ हिन्दीतर भाषी क्षेत्र में, वह भी ‘अंग्रेज़ी राज’ में हिन्दी का भव्य–दिव्य आयोजन अकल्पनीय था। परन्तु, कुलपति प्रो. के. कन्नन एवं युवा आलोचक डॉ. आनंद पाटील की पहल पर यह कल्पना यथार्थ रूप ले सकी। आयोजकों केसाथ–साथ अतिथियों के लिए भी यह अत्यंत अनूठा एवं अकल्पनीय अनुभव था। ऐसे विशिष्ट आयोजन विशेष महत्व रखते हुए भी समाचारों का हिस्सा नहीं बन पाते।

इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के डॉ. राजेन्द्र कुमार ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि “हिन्दी ‘सरकारी’ नहीं ‘असरकारी’ भाषा होनी चाहिए। भाषा से ही मनुष्य के स्वभाव की परख़ होती है। मूलतः भाषाओं का मूल धर्म इन्सान को जोड़ना है जबकि आजकल इनका प्रयोग तोड़ने के लिए किया जा रहा है। इन्सान को बाँटने वाली भाषा अधार्मिक है। हिन्दी ने अपना धर्म निभाया है। वह जनता की जुबाँ पर खेलते हुए बढ़ी है। यदि हमें इक्कीसवीं सदी का भारतीय होना है, तो अंग्रेज़ी बढ़ेगी ही परन्तु हिन्दी के विस्थापन के मूल्य पर क़तई नहीं। हिन्दी के शब्दों को विस्थापित करने वाली भाषा हमें मान्य नहीं। विस्थापन का दर्द हम नहीं झेलेंगे।”

उन्होंने ‘ग्लोबल विलेज’ को रेखांकित करते हुए कहा कि “आज हम लोग ‘विलेज’ से कट गये हैं। यदि कोई ख़तरा है, तो सारा ख़तरा संवेदनाओं का है। संवेदना का ही संकट है।” (विस्तार के लिए देखिए, सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 37–41 पर राजेन्द्र कुमार का लेख ‘हिन्दी : विविध रूप, विविध समस्याएँ’) जिस प्रांत की आधिकारिक भाषा अंग्रेज़ी हो, वहाँ हिन्दी के लिए ऐसी संवेदनाओँ का व्यक्त होना निश्चय ही विचारणीय है। दो राय नहीं कि आज एक दशक के बाद भी हम यह अनुभव करते हैं कि हिन्दी औपनिवेशिक शिकंजे में जकड़ी हुई है। बल्कि जकड़न का यह भाव अधिक गहरा होता जा रहा है। “भाषाओं का प्रयोग तोड़ने के लिए किया जा रहा है।” यह भाव अंबेडकर के उक्त पुस्तक में उल्लिखित विचारों को प्रकारांतर से उजागर करता है।

उन दिनों नागालैण्ड विश्‍वविद्यालय के कुलपति कृष्णमूर्ति कन्नन हुआ करते थे। वेदक्षिण भारतीय होने के बावजूद इस बात पर ज़ोर देते रहे कि नागालैण्ड जैसे हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाने की दृष्टि सेहिन्दी गीत–संगीत सर्वोत्तम माध्यम हो सकते हैं। यदि हम हिन्दी फ़िल्म एवं गीत–संगीत को हिन्दी के प्रचार–प्रासार का ज़रिया बनाते हैं, तो ऐसे प्रांतों को अपनी भाषाओं को साथ रखते हुए भी मुख्यधारा में लाने में आसानी हो सकती है। नागालैण्ड की युवा पीढ़ी में गीत–संगीत के प्रति गहरा लगाव है और वे बेहतर गा सकते हैं।

वरिष्ठ लेखक स्व. सुरेश पंडित (अलवर–राजस्थान) ने हिन्दी लेखन का जायज़ा देते हुए कहा कि “हिन्दी जहाँ विस्तार में सार्वभौमिक हो रही है, वहीं उसका लेखन भी बहुआयामी बन रहा है। वह समय की हर मांग को पूरा करने की कोशिश कर रही है। आज उसमें विभिन्न अनुशासनों में आधुनिकतम शोध और उनके निष्कर्षों का मौलिक या अनूदित रूप प्रचुरता से मिलता है।” वहीं उन्होंने हिन्दी शब्दकोशों पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि “अंग्रेज़ी के शब्दकोश हर साल संशोधित व संवर्धित होकर बाज़ार में आते हैं क्योंकि उसी दौरान दुनिया की भाषाओं के सैंकड़ों शब्द उसमें शामिल कर लिये गये होते हैं। इसी तरह हिन्दी में भी स्थानीय और विश्व स्तरीय भाषाओं के शब्द आते–जाते हैं, लेकिन उनके बारे में कोशों में प्रायः कोई जानकारी नहीं मिलती। इस ओर अभी सक्रियता से काम करने की ज़रूरत है।” (विस्तार के लिए देखिए, सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 23–30 पर सुरेश पंडित का लेख ‘समय में असरदार हस्तक्षेप करता हिन्दी लेखन’)

राँची विश्‍वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. बी. पी. केसरी ने झारखण्ड की भाषाएँ और हिन्दी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि “हिन्दी–अंग्रेज़ी के माध्यम से ही इस क्षेत्र की भाषाओं को सारस्वत जगत से जुड़ने का अवसर मिला। आज भी ये मुख्यतः हिन्दी के माध्यम से ही अपनी भाषिक और साहित्यिक उपलब्धियों को व्यापक जन–गण तक पहुँचा पाती हैं। इनके द्वारा ही ये भाषाएँ नयी साहित्यिक चिंतन–धाराओं, प्रविधियों और तकनीकों को आत्मसात कर स्वयं को समृद्ध कर रही हैं।

संप्रति भारत में एक ऐसी भाषा–नीति की आवश्यकता है, जिसमें आंचलिक या क्षेत्रीय भाषाओं के साथ राजभाषा और राष्ट्रभाषा को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया जा सके। विदेशी भाषाओं को ज़रूरत के अनुसार पाठ्यक्रमों में स्थान दिया जा सकता है। इस भाषा–नीति से राष्ट्र की एकता और उन्नति का पथ प्रशस्त होगा।” (विस्तार के लिए देखिए, सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 208–213 पर बी. पी. केसरी का लेख ‘झारखंड की भाषाएँ और हिन्दी’) एक दशक पूर्व की हुई कामना आज नई शिक्षा नीति के माध्यम से पूर्ण होगी, ऐसी आकांक्षा की जा सकती है।

‘नया परिदृश्य’ के संपादक डॉ. ओमप्रकाश पाण्डेय ने भूमण्डलीकरण के बदलते परिप्रेक्ष्य में हिन्दी पर विस्तृत चर्चा की और कहा कि “भाषा मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। वह मानव समाज की भागीरथी एवं आधार है।  वह केवल सम्प्रेषण का साधन मात्र नहीं है। उसके पीछे जीवन जगत तथा धरती के स्पन्दन का सांस्कृतिक तत्व भी है। भाषा सोच, सभ्यता और संस्कृति का मूल होती है। भाषा देश की पहचान तथा अस्मिता होती है। वह समूची संस्कृति को स्पष्ट करने वाला दर्पण है। जब कोई जाति, साहित्य, बाज़ार और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध की भाषा के रूप में अपनी भाषा का व्यवहार छोड़ देती है, तो वह विश्व में अपनी पहचान खो देती है और उसके सांस्कृतिक मूल्यों को वह दूसरी भाषा निगल जाती है, जो उनके बाज़ार और शिक्षित जनता की साहित्यिक–सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती है।

भूमण्डलीकरण का दबाव तेज़ी से हर क्षेत्र पर पड़ा है। इसने व्यापार तथा मीडिया ही नहीं भाषा, साहित्य, संस्कृति को भी काफ़ी प्रभावित किया है। इसने हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के सामने विषम संकट पैदा किया है। आज मुक़ाबला हिन्दी बनाम तमिल, हिन्दी बनाम मैथिली और यहाँ तक कि अंग्रेज़ी बनाम हिन्दी का न होकर भूमण्डलीकरण बनाम भारतीय भाषाओं के बीच है। भारतीय भाषाओं में हिन्दी सबसे ज़्यादा बोली, समझी और पढ़ी जानेवाली भाषा है। अतः हिन्दी को ही न केवल उसका सबसे ज़्यादा हमला झेलना पड़ेगा, बल्कि पलट कर जवाब भी देना होगा।” (विस्तार के लिए देखिए, सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 91–114 पर ओमप्रकाश पाण्डेय का लेख ‘भूमण्डलीकरण के बदलते परिप्रेक्ष्य में हिन्दी’)

राँची विश्‍वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गिरिधारीराम गौंझू ने झारखण्ड की संस्कृति और हिन्दी की भूमिकाके संबंध में बात रखते हुए कहा कि “झारखण्ड में तीन भाषा परिवार की नौ प्रमुख भाषाएँ चलती हैं। आर्य कुल में नागपुरी, पंचपरगनियाँ, खोरठा, कुरमाली, आग्नेय कुल में कुडुख़ (उराँव) भाषाएँ आती हैं। इनकी भाषा निस्संदेह भिन्न हैं, पर उनकी भावनाएँ, उनकी आत्मा एक है। इसका अनुपालन यदि हिन्दी भाषा में इसके साहित्य में प्रवेश पा जाए तो हिन्दी समृद्ध होगी। हिन्दी वालों के जीने की व्यक्तिवादिता सामूहिकता में परिणत हो सकेगी।” इस दृष्टि में सामासिक संस्कृति का स्मरण कराने वाला स्वर पूरी तान के साथ विद्यमान है। हिन्दी पर यह भी ज़िम्मेदारी थोप दी गई है कि वह सबको साथ लेकर विकसित हो, भले ही कोई उसे अपने साथ, आस–पास ना ले। निस्संदेह हिन्दी ने सभी भाषाओं को आत्मसात कर इस दशक में व्यापक विकास एवं विस्तार किया है।

रंगकर्मी अशोक पागल ने हिन्दी नाटक एवं रंगमंच के संदर्भ में हिन्दी भाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि “हिन्दी किसी क्षेत्र विशेष की जनभाषा नहीं है। हिन्दी बोलने वालों की मातृभाषा अथवा लोकभाषा भिन्न है। इसीलिए हिन्दी में व्यक्त भावों–विचारों को हम मस्तिष्क से ग्रहण करते हैं, जबकि लोकभाषाओं को हम हृदय से ग्रहण करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हृदय द्वारा ग्रहण किये गये भावों–विचारों से रस–निष्पत्ति पहले हो जाती है। मातृभाषा में ग्रहण किया गया साहित्य ज़ल्द ही रस दशा में पहुँचा देता है। हिन्दी में अभिव्यक्ति के लिए हाथ भाँजने, कूल्हे मटकाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।” (विस्तार के लिए देखिए, सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 191–197 पर अशोक पागल का लेख ‘हिन्दी रंगमंच के संदर्भ में भारत के अन्तर्सूत्र की भाषा : हिन्दी’)

डॉ. प्रेमचन्द्र (इब्राहिमपत्तनम्, तेलंगाना) कहते हैं कि “भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जहाँ भाषिक विविधता की भरमार है। यह विविधता देश की विविधता है। भारत के प्रान्तों के विभाजन का आधार उस क्षेत्र की भाषाएँ रही हैं। आज भारतीय संविधान में अनुसूचित 22 भाषाएँ हो गयी हैं। नयी भाषाओं में मैथिली, संथाली, डोगरी और बोडो शामिल हैं।” (सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 180)

प्रेमचन्द्र जी ने उक्त पुस्तक में संकलित लेख ‘हिन्दी की वैश्विकता : स्थापना, प्रतिभागिता और प्रतिद्वंद्विता’ के संबंध में कई सवाल उठाए हैं और मॉरिशस, फीजी, सूरीनाम और गयाना में हिन्दी की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए हिन्दी के विकास में गिरमीटियों (अनुबंध पर गए भारतीय मज़दूर) के योगदान को रेखांकित किया है। प्रगत राष्ट्रों में (विशेषतः अमरिका, कनाडा, यूके इत्यादि) प्रवासी भारतीयों द्वारा हुए हिन्दी के प्रचार–प्रसार एवं विकास पर विस्तार से बात की है। परन्तु भारत में नागालैण्ड जैसे राज्यों में हिन्दी का प्रचार–प्रसार नहीं हो पाया है। इससे भारतीय भाषा के प्रति कम अनुराग की भावना दृष्टिगोचर होती है। (विस्तार के लिए देखिए, सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 176–190)

यद्यपि नागाओं में भारतीय भाषाओं के प्रति अनुराग की भावना कम ही दिखाई देती है, तथापि हिन्दी में रचे-बसे कवि का मन अपनी भूमि के इस अमूल्य हिस्से को कैसे देखता है, इसका एक उदाहरण राजेन्द्र कुमार द्वारा नागालैण्ड यात्रा के दौरान तत्काल लिखी कविता में देखा जा सकता है। कविता का शीर्षक है –’नागालैण्ड : पहाड़ की प्रतिज्ञा’ – रहेंगे जहाँ भी हम/ रहेंगे अपनी ज़मीन के ही/ पर, /अनछुआ/ रहने दें क्यों/ हम अपने आकाश को !”

यह विचारणीय पक्ष है कि “हिन्दी अंग्रेज़ी का पक्ष ले इसकी बजाय यह वातावरण बनाना है कि सभी भारतीय भाषाएँ अंग्रेज़ी का स्थान लें।” (सं. आनंद पाटील, हिन्दी : विविध आयाम, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली 2012, पृ. 203) और हिन्दी दिवस मनाने के बजाय भारतीय भाषा दिवस मनाया जाए ताकि भारतीय भाषाओं में उत्पन्न विद्वेष का भाव धीरे-धीरे कम हो सके और ‘भारत एक है’ की भावना बलवती हो सके। हमें भाषा के आधार पर राजनीतिक दबाव में हो रहे विखंडन की स्थिति से देश को बचाने की आवश्यकता है।

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लेखिका केन्द्रीय विद्यालय, तिरुवारूर में हिन्दी की पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) हैं। स्वतंत्र रूप से लेखन करती हैं। समपर्क : anitapatil.hcu@gmail.com

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