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तीसरी घंटी

रंगमंच में स्त्री के लिए जगह

 

हड़पने की संस्कृति का इनदिनों जिस तरह विकास हुआ है, वो कम होने का नाम नहीं ले रहा है, उल्टे और तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह केवल एक क्षेत्र में नहीं है, इस तरह के ट्रेंड दूसरी जगह भी सहज रूप से देख सकते हैं। कोई खाली जगह देखी नहीं कि मन कब्जाने के लिए अकुलाने लगता है। ऐसी ही एक जगह रंगमंच की है। राजनीति, साहित्य की तरह ही एक अलग कोना। सबों के अपेक्षाकृत रंगमंच ही वो कोना है जिस पर कम चर्चा होती है। आधी दुनिया जो स्त्रियों की है, रंगमंच पर आधी क्या, दस प्रतिशत भी दिख जाये तो बहुत बड़ी बात है। राजनीति में चुनाव के दौरान सीटों का बंटवारा होता है तो हर पार्टी इसे उपलब्धि के रूप में लेती है कि महिलाओं की कितनी हिस्सेदारी दी है।

भले लोक सभा में महिलाओं को आरक्षण देने को अभी तक अमलीजामा न दिया गया हो, लेकिन सैद्धान्तिक रूप से कोई पार्टी असहमत नहीं दिखती है। संस्कृति की दुनिया में ऐसी कोई हलचल नहीं है। न कोई जगह देने की बात करता है, न इसके पक्ष में कोई खड़ा होता हुआ दिखाई देता है। एक नजर रंगमंच पर डाले तो सरकारी नाट्य संस्थान हो या कोई निजी नाट्य संस्था, बतौर निर्देशक–अभिकल्पक–लेखक–मंच सज्जाकार–संगीतकार के रूप में बहुत कम महिला हैं। हिन्दू शास्त्रों–ग्रंथों में जैसे शूद्र के साथ स्त्री को जोड़कर मान्यताएं, स्थापनाएं दर्ज हैं, उनके सम्बन्ध में दिशा–निर्देश जारी किए गए हैं, वही हाल वर्तमान में संस्कृति की दुनिया में स्त्री के साथ हैं। संख्या के रूप में पूरी दुनिया में स्त्रियां आधी हैं, लेकिन सत्ता–संस्कृति–साहित्य में इनकी हिस्सेदारी ढूंढने लगे तो, आश्चर्यजनक तथ्य सामने आएंगे। विकसित देशों के आंकड़े देख कर शायद कुछ संतुष्ट भी हो जाये, लेकिन तीसरी दुनिया पर दृष्टि डालेंगे तो न केवल आपको झटका लगेगा, बल्कि सोचने के लिए भी विवश हो जाएंगे।

हमारा देश जो ऊपर से लोकतांत्रिक दिखता है, व्यवहारिक रूप से वर्णवादी तौर–तरीके से ही चलता है। हजारों साल से वर्णवादी व्यवस्था यहाँ की जड़ में व्याप्त है। अगर यहाँ संविधान को मान्यता प्राप्त है तो समानांतर रूप से ब्राह्मणवादी आचार–विचार भी पराम्परागत रूप से व्यवहार में है। ब्राह्मणवादी साहित्य के पन्ने उलटने की कोशिश करें तो हजारों श्लोक अगर शूद्रों के विरोध में पायेंगे तो स्त्रियों के बारे में सैकड़ों श्लोक-सूक्तियां पढ़ने को मिल ही जायेंगे। कह सकते हैं कि स्त्रियों का हाल शूद्रों से ज्यादा तो नहीं, लेकिन बहुत कम भी बुरा नहीं है। कई जगहों पर तो दोनों को बराबर ही देखा जा सकता है। रंगमंच पर जो हैसियत एक शूद्र की है, कमोबेश स्त्री की भी वही है। कहने को कह ले कि देवताओं ने ब्रह्मा से ये कहा था कि ‘हम मनोविनोद का ऐसा साधन चाहते हैं जो दृश्य भी हो और श्रव्य भी। यह वेद व्यवहार शूद्र जाति के लोगों को तो सुनाया नहीं जा सकता, इसलिए आप एक अन्य पांचवां वेद रचिये, जो सभी वर्णों के लिए हो।

‘नाट्यशास्त्र के पहले अध्याय के 10-11 श्लोक से यह तो स्पष्ट है कि उनदिनों चारों वेद शूद्र वर्ण के लोगों के लिये पढ़ने–लिखने के लिए निषिद्ध था। बल्कि कई ब्राह्मण शास्त्र में कड़ी सजा का प्रावधान अंकित है। देखा जाय तो नाट्यशास्त्र जिसे पांचवां वेद कहा गया है, शूद्रों के लिए ही विशेष कर लिखा गया था। कायदे से उनके हवाले भी कर देना चाहिए था। लेकिन उस शूद्र शास्त्र पर किस तरह ब्राह्मणों का अन्य वेदों की तरह कब्जा हो गया, नाट्यशास्त्र के अन्य श्लोकों का अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाता है। नाट्यशास्त्र की रचना करने के बाद ब्रह्मा ने देवराज इंद्र को बुलाया और कहा कि अब तुम स्वयं, अन्य देवताओं को लेकर इसका प्रयोग करो। उन्होंने देवराज को यह भी परामर्श दिया कि उन्हें उन्हीं देवताओं को यह काम देना चाहिए जो कुशल, विदग्ध, प्रगल्भ तथा विशेष रूप से श्रमशील हो।

ब्रह्मा के इस निर्देश को सुनकर देवराज ने कहा, ‘हे भगवन ! इस नाट्यवेद को ग्रहण करने, समझने तथा प्रयोग करने की सामर्थ्य देवताओं में नहीं है। किंतु सभी वेदों के रहस्यों के ज्ञाता, उत्तम व्रतों के पालनकर्ता ऋषि हैं, वे ही इस नाट्यवेद को ग्रहण, धारण और प्रयोग करने की सामर्थ्य रखते हैं।’ इंद्र के इन शब्दों को सुनकर ब्रह्मा ने भरतमुनि से कहा, ‘हे निष्पाप और प्रिय मुनि, तुम्हीं अपने पुत्रों के साथ इस नाट्य के प्रयोग के कर्ता बनो।’ ब्रह्मा के इस आदेश को सुनने के अनंतर, भरतमुनि ने लिखा है कि उन्होंने सामान्य जनों की गुण–ग्राहकता को ध्यान में रखते हुए, अपने सौ पुत्रों को उनकी अलग–अलग योग्यता के अनुसार नाट्य प्रयोग के कार्य में लगा दिया।

अब सवाल यह उठता है कि इस नाट्य प्रयोग के लिए देवराज ने जब देवताओं को अयोग्य ठहराया तो यह जिम्मेदारी भरतमुनि के सौ पुत्रों को देने के बदले उन शूद्रों को क्यों नहीं दिया जिनके लिए विशेष कर ब्रह्मा ने अलग से पांचवां वेद रचा था? जो न वेद सुन सकते थे, न बोल सकते थे, उन्हीं के लिए तो यह वेद लिखा गया था। अगर उन्हें सम्मलित करने योग्य नहीं समझते थे तो फिर इस वेद को लिखने का क्या औचित्य था? चारों वेद क्या पर्याप्त नहीं थे? यही भेदभाव इन्होंने स्त्री के साथ भी किया। समुचित अभ्यास के अनंतर भरतमुनि ने ब्रह्मा के सम्मुख अपना प्रदर्शन किया। प्रदर्शन को देख कर ब्रह्मा की प्रतिक्रिया थी कि इन वृतियों के साथ ‘कैशिकी’ वृति का भी प्रदर्शन होना चाहिए। ‘कैशिकी’ से उनका तात्पर्य सौंदर्य चेतना को लेकर सुकुमार भावनाओं के प्रदर्शन से था।

भरतमुनि ने कहा कि उन्होंने श्रृंगार रस से उतपन्न, सुंदर वेशभूषा से सज्जित, नृत्य की विभिन्न मुद्राओं एवं अंगहारों से परिपूर्ण इस वृति को, शिव के नृत्य में देखा तो है, लेकिन उसका प्रदर्शन तो स्त्रियों द्वारा ही सम्भव है। भरत मुनि के इन शब्दों को सुनकर अपने मानसिक संकल्प से नाट्य प्रयोग की शोभा वृद्धि के लिए, चतुर अप्सराओं की रचना की और फिर उन्हें भरतमुनि को प्रदान कर दिया। गौरतलब है कि यहाँ भी जो जगह स्त्री को देनी चाहिए, वो उन्हें नहीं दिया। ऐसा तो नहीं होगा कि भरत मुनि के वंशज में कोई स्त्री नहीं होंगी? भरत का परिवार स्त्री विहीन होगा? नाट्यशास्त्र में भरत मुनि के सौ पुत्रों की चर्चा है। जरूरी नहीं कि ये सारे उनके पुत्र ही होंगे, सम्भव है उनके शिष्य भी हो सकते हैं। भरतमुनि की नाट्य संस्था से वैचारिक रूप से जुड़े वे रंगकर्मी भी हो सकते हैं जो इनके साथ नाट्यशास्त्र की रचना, शोध में अभिन्न रूप से जुड़े हुए हों। आश्चर्य की बात ये है कि इनमें किसी स्त्री अभिनेता की चर्चा नहीं मिलती है। कोई शक नहीं कि पंचम वेद को धार्मिक रूप से ‘शूद्रों का नाट्यशास्त्र’ कहे जाने के कारण ब्राह्मण वर्ग ने अपने वर्ण की स्त्रियों के लिए प्रवेश वर्जित कर रखा हो।

रंगमंच में सवर्ण स्त्री के जाने से उनके निम्न होने का भय सता रहा हो। अप्सराओं से ब्राह्मण वर्ण को कोई धर्मिक संकट उतपन्न नहीं हो रहा था। किसी वर्ण, जाति का न होने के कारण अप्सरा को रंगमंच में जगह देने पर कोई धर्मसंकट नहीं खड़ा हो रहा था। और रंगमंच की पवित्रता पर कोई आंच भी नहीं आने का खतरा था। स्वर्ग पर आधिपत्य होने के बाद राजा नहुष ने जब उन्होंने अप्सराओं के साथ पृथ्वी पर नाट्य प्रयोग की इच्छा व्यक्त की तो वृहस्पति को आगे करके देवताओं ने कहा कि ‘चाहे तो भरतमुनि पृथ्वी पर जाकर नाट्य प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन अप्सराओं का मनुष्यों से मेल सम्भव नहीं है।’ इस प्रस्ताव से भरत मुनि के पुत्रों या कहिये शिष्यों को तो प्रसन्नता हुई क्योंकि ब्राह्मणों और ऋषियों के शाप से जो शूद्र होने का कलंक ढो रहे थे, इससे मुक्त हो जाएंगे। लेकिन अप्सराओं के न आने से रंगमंच में स्त्री की जगह रिक्त हो गयी, आखिर उसे भरा कैसे गया? नाट्यशास्त्र के छत्तीसवें अध्याय के 27 वें श्लोक में लिखा है कि स्त्री की खाली जगह को अन्तःपुर की स्त्रियों से भर कर भरत मुनि और उनके शिष्यों ने नाटक के भविष्य को बचा पाने में सफल हुए। कौन हैं ये अन्तःपुर की स्त्रियां?

किसी को इस भरम में नहीं रहना चाहिए कि स्वर्ग से नाटक जब पृथ्वी पर आया और राज दरबार-मंदिर के प्रांगण में शरण लिया तो होने वाले संस्कृत नाटकों में समाज के हर तबकों की भागीदारी होती थी। जब मंदिरों में शूद्रों के प्रवेश के लिए मनाही थी तो स्त्री भूमिका के लिए अवर्ण स्त्री के लिए कोई संभावना ही नहीं थी। वैसे इन जगहों पर जो संस्कृत नाटक होते थे, वैचारिक रूप से सामन्तों के महिमामंडन करनेवाले ही होते थे। उच्च वर्ण के किसी राजा–महाराजा को ही नायक बनाया जाता था। उन्हीं के माध्यम से राजा का गुणगान किया जाता था। ऐसे नाटकों में अवर्ण लोगों व स्त्री जात के लिए कोई विशेष जगह नहीं होती थी। फिर भी संस्कृत जैसे ब्राह्मणवादी नाटक में स्त्री भूमिकाओं के लिये जहाँ अवर्ण स्त्रियों अस्पृश्य थी, रास्ता निकालने के लिए ‘देवदासी’ जैसा बीच का रास्ता निकाला। मंदिरों की रखरखाव–देखभाल व सफाई के लिए बचपन से ही अवर्ण लड़की को मंदिर के लिए दान देने की ऐसी धार्मिक व्यवस्था बनायी कि रंगमंच पर नृत्य–अभिनय करने का कोई संकट खड़ा नहीं होता था। कुछ ऐसी ही व्यवस्था अन्तःपुर में भी थी। राजा की सहस्त्रों रानियों की देखभाल के लिए ब्राह्मण–क्षत्रिय–वैश्य स्त्रियों को रखने से धर्मशास्त्र की संहिताएं गड़बड़ाने की संभावना से बचने के लिए मंदिरों की ‘देवदासी’ की तर्ज पर ही अवर्ण स्त्रियों को कोई ऐसा नाम दे दिया गया जिससे कि साँप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे।

संस्कृत नाटक का तटस्थता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि इन नाटकों में जो ब्राह्मण, क्षत्रिय जैसे उच्च वर्ण के जो पात्र होते थे, अभिनय के क्रम में संस्कृत का प्रयोग करते थे। लेकिन जो निम्न वर्ण के जो पात्र होते थे, उनके लिये समानता नहीं बरती जाती थी। शूद्रों के लिए संस्कृत निषिद्ध था ही, स्त्रियों को भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। ऐसा क्यों? स्त्रियां अगर उच्च जाति से संबंधित होती तो भाषा की कोई समस्या आती ही नहीं। अन्तःपुर की स्त्रियां हो या मंदिर की देवदासी, इनका सम्बन्ध निम्न जाति से होने के कारण भाषा में जो स्पेस मिलना चाहिए था, ब्राह्मणवादी सोच के कारण मुहैया नहीं होता था। वे अपना काम शूद्रों की तरह प्राकृत, पाली भाषा से चलाते थे। प्राकृत-पाली भाषा का प्रयोग इनके लिए इसलिए करते थे कि दोनों का सम्बन्ध कहीं न कहीं बौद्ध धर्म से था और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध बौद्ध धर्म निम्न वर्ण के साथ मिलकर उनदिनों जिस तरह की वैचारिक लड़ाई लड़ रही थी, सनातनियों के लिए यह प्रतिकार स्वरूप था। निम्न वर्ण के प्रति वर्णवादी लोगों का इतना पूर्वाग्रह था कि संस्कृत नाटकों में कभी भी कोई ऐसा नाटक नहीं रचा गया जिसका नायक जन सामान्य के बीच का हो। स्त्रियों को केंद्रित कर कोई नाटक लिखा भी गया तो ख्याल रखा गया कि उसका कुल उच्चवर्णीय हो।

अगर कभी रंगमंच में अपनी प्रतिभा और नई सोच से कोई स्त्री जगह बनाने की कोशश की तो उसे हर तरह से हतोत्साहित करने का ही प्रयास किया गया। स्त्री के लिए जगह और सम्मान देने की बात तो दूर, अगर कोई पुरुष भी गर उनकी भूमिका को निभाने के लिए मंच पर आ जाता था तो उसकी आलोचना, भर्त्सना करने से बाज नहीं आते थे। ‘महाभाष्य ‘ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले अभिनेताओं की पत्नियों को गिरी नैतिकता का माना गया और ब्राह्मणों को सलाह दी गई कि वे उनसे दूर रहे। नाटक करने वालों की स्त्रियां एक प्राचीन श्लोक के अनुसार पराये पुरुषों के साथ इस प्रकार लगी हुई रहती हैं, जिस प्रकार वर्णों के साथ मात्राएं। उसी तरह उपनिषद काल में भी स्त्रियों की भूमिका वर्जित मानी गयी थी। और उनकी भूमिका के लिए बालकों को रखने की परंपरा थी, जिन्हें ‘भ्रंकुश’ कहा जाता था। ऐसे नाटक करने वाले कोहलीय सम्प्रदाय के लोग होते थे और अपने को भरत मुनि का वंशधर कहा करते थे। ये लोग भारती वृति (शब्दों के द्वारा भाव प्रगट करना) को मानने वाले थे और कैशिकी वृति (स्त्रियों के अभिनय के लिए स्त्रियों को उतारने की वृत्ति) के विरोधी थे। इनका मानना था कि स्त्रियों के रंगमंडप में सजधज के उतरने से अधर्म की वृद्धि होती है।

हजारों वर्षों के बाद भी पंचम वेद के बारे में उच्च वर्ण की मानसिकता में कोई विशेष बदलाव नहीं देखने को मिलता है। शहरी–महानगरीय रंगमंच से जुड़े अभिजात्य वर्ग ने भले समाज में एक प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली हो, लेकिन लोक रंगमंच के स्त्री–पुरुष अभिनेता अभी भी इनकी नजरों में सम्मानीय नहीं है। बोल-चाल में इनके लिए ‘नौटंकी’ शब्द ही प्रयुक्त होता है। स्त्रियों के लिए तो ये समाज और भी निष्ठुर है। लोक नाटकों की छोड़िए, शहरों-महानगरों में नाटक करने वाली स्त्रियों को हमेशा शंकित नजरों से देखा जाता है।

हजारों साल पहले इनके चरित्र के बारे में जिस तरह सन्देह किया जाता था, आज वो सिलसिला खत्म नहीं हुआ है। जिसका परिणाम यह देखने को मिलता है कि जो अभिनय के क्षेत्र में आना भी चाहती हैं, वो सामाजिक परिस्थितियों के कारण थोड़े समय के बाद दूर होते जाती हैं। संस्थाओं का भी जोर होता है कि ये नाटक किये जायें जिसमें स्त्री पात्र न हो, या अगर हो भी तो कम संख्या वाले हों। एनएसडी और भारतेंदु नाट्य अकादमी जैसे नाट्य संस्थानों में हर वर्ष प्रशिक्षण के लिए छात्रों का चयन करते भी हैं तो लड़कों की तुलना में लड़की की संख्या बहुत कम होती हैं। और जब प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद जब व्यवहार की धरातल पर आती हैं तो उनमें कुछ ही आगे बढ़ पाती हैं। अधिकतर पारिवारिक दवाब के कारण कुछ वर्षों के बाद या तो अपने को सिकोड़ लेती हैं या फिर किसी तरह अभिनय की गाड़ी घिसटती रहती हैं।

सुरेखा सीकरी, उत्तरा बावकर, जोहरा सहगल, त्रिपुरारी शर्मा, अनुराधा कपूर, हेमा सिंह, सीमा विस्वास, कीर्ति जैन, तृप्ति मित्र, सांवली मित्र, उषा गांगुली, उमा झुनझुनवाला, हिमानी शिवपुरी, नादिरा बब्बर, अमाल अल्लाना, शिला भाटिया, नीलम मानसिंह, शांता गांधी, अनामिका हक्सर, विजया मेहता, सुधा शिवपुरी, विभा मिश्र, माया राव जैसे कुछ नाम हैं जो रंगमंच पर स्त्री के रूप में कुछ जगह बनाती हुई दिखती हैं, लेकिन इतनी बड़ी दुनिया में जितनी कि वे हिस्सेदार हैं, अभी भी उनको नहीं मिला है। शूद्रों की तरह स्त्री भी समाज के हाशिए पर हैं। कुछ मुल्कों में यह लड़ाई तेज है। अलबत्ता हमारे यहाँ थोड़ा कम है। शायद इसका कारण ये भी हो कि मुल्क आजाद होने के बावजूद यहाँ जड़ में ब्राह्मणवाद कुंडली मार कर बैठा हुआ है। जब तक पितृसत्ता के खिलाफ मिलजुल कर नहीं लड़ेंगे, वाजिब जगह नहीं मिलेगी। बिना लड़ें, कोई आपको कुछ भी नहीं देनेवाला। इसलिये लड़ना जरूरी है

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