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उत्पीड़तों के रंगमंच का प्रस्थान बिन्दु

 

स्वदेश दीपक का ‘कोर्ट मार्शल’ नाटक साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा वर्ष 1990 में ‘मोहन राकेश सम्मान’ के लिए आमंत्रित नाटक प्रविष्टियों में सर्वोत्तम चयनित किया गया था। इस संबंध में अक्तूबर, 90 के तीसरे हफ़्ते में स्वदेश दीपक को साहित्य कला परिषद, दिल्ली के सचिव सुरेंद्र माथुर का पत्र प्राप्त हुआ था। साथ में यह सूचना भी दी गयी कि इसका प्रथम मंचन रंजीत कपूर के निर्देशन में करने का निर्णय परिषद ने किया है। डॉ. जयदेव तनेज़ा ने रंजीत कपूर को आलेख पढ़ने के लिए दिया। इस पुरस्कार के निर्णायकों का भी यही मत था कि जिस मिज़ाज का यह नाटक है, उसके लिए रंजीत कपूर ही बिलकुल उपर्युक्त निर्देशक हो सकते हैं। वैसे भी रंजीत कपूर की पहचान लीक से हटकर काम करने वाले निर्देशकों में जानी भी जाती है। लेकिन ‘कोर्टमार्शल’ एक ऐसा नाटक था जो जब तक मंचित नहीं हुआ था, नाटककार और निर्देशक दोनों के लिए एक चुनौती की तरह था। इस आलेख को निर्देशन करने का भार निर्देशक ने स्वीकारा होगा तो उसके दिलोदिमाग़ में सम्भवतः पहला प्रश्न यही आया होगा कि यह पारम्परिक नाटकों की तरह तो नहीं है। यह नाटक जाति के सवाल को उठाने के लिए किसी पौराणिक व मिथकीय कहानी का सहारा नहीं लेता है। सीधे जाति व्यवस्था पर हमला करता हुआ दिखता है। और सत्ता के उस तन्त्र पर जिसके बारे में एकमत से यही मान्यता है कि वहाँ कोई जातिभेद या जाति के नाम पर कोई छूआछूत-अस्पृश्यता नहीं है। रंजीत कपूर के बारे में नाटक की दुनिया के बारे में जाना जाता है कि ये विचार से प्रगतिशील हैं, तथा किसी पारम्परिक लीक से न बँधे होने के कारण नाटकों में नये-नये प्रयोग करते रहते हैं। विचारधारा के किसी संकीर्ण सोच में कभी फँसे हुए नहीं दिखते हैं। न रंगमंच की किसी धारा से अपने को जुड़ने से पीछे रहे हैं। दूसरा कोई निर्देशक होता तो इस नाटक को निर्देशित करने की स्वीकृति देने के पहले कई बार सोचता। रंजीत कपूर का ‘कोर्टमार्शल’ को करने का निर्णय लेना, कहीं न कहीं दलित-शोषित-उत्पीड़ित समाज के प्रति निश्चित किसी न किसी तरह की प्रतिबद्धता होगी तभी इस नाटक से जुड़े, इसकी संवेदना से जुड़े और इसे संप्रेषित करने में सफल रहे। अगर इस नाटक की वैचारिकता से सहमत नहीं होते तो इसकी ज़िम्मेदारी लेने से मुकर भी कर सकते थे। इस नाटक के बदले दूसरा नाटक चयन कर लेते।

स्वदेश दीपक का ‘कोर्टमॉर्शल’ उन दिनों के सामाजिक अन्तर्द्वंद्वों से निकला हुआ नाटक है। समाज में इस तरह की घटनायें घट रही थीं, उसी का प्रतिफल है यह नाटक। यह वही दौर है जब देश भर में जाति के आधार पर निम्न वर्ग के लोगों के साथ ग़ैर बराबरी का व्यवहार किया जा रहा था। सन् 1988 के आस-पास मण्डल आयोग आया था और उसने दलित और पिछड़ा वर्ग के अपने अधिकारों और सत्ता में हिस्सेदारी की माँग की थी। इसकी प्रतिक्रिया में कई तरह के जाति संगठन हिंसात्मक रूप से सामने आये। साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ भी इसकी लपट से अपने को महफ़ूज़ नहीं रह सकी। अख़बारों का भी चरित्र सामने आ गया। सब तरह से विरोध की जो हवाएँ चलीं, उसने घर जलाये, दुकानें लूटीं अन्ततः मण्डल के ख़िलाफ़ लड़ी जाने वाली पूरी लड़ाई कुछ ही वर्षों के अन्तराल में कमंडल में बदल गयी। उनका अश्वमेध रथ निकल पड़ा। यह केवल अश्व नहीं था। अश्व के साथ धर्म का पट्टा बँधा था जिसकी नकेल किसी और के हाथ में नहीं, ब्राह्मणवाद के हाथ में थी। अश्व को किधर जानना है, किन रास्तों से गुजरना है, ये ब्राह्मणवाद ही तय करता था।

मंडल की पूरी फसल को कमण्डल के अश्व ने रौंद दिया। और आज की तारीख़ में भी रौंदता रहा है। दलितों-पिछड़ों की एक बड़ी जमात जो धर्म को ध्वस्त करने के लिए निकली थी, कुछ ही वर्षों में कमंडल के भभूतों में बौराये हुए दिखने लगी। उन पर धर्म इतना हावी हो गया कि रथ के सबसे आगे नाचते-कूदते हुए दिखे। बाबरी मस्जिद को तोड़ने में सबसे बड़ी भागीदारी दिखी।

मस्जिद तो टूट गयी लेकिन जो सवाल उठा था, वह अधूरा ही रह गया। समाज में जो जात-पात का भेद था, जहाँ था वहीं रह गया।

स्वदेश दीपक ने रामचंदर के बहाने जो सवाल उठाया था, बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद भी अनुत्तरित रह गया। इसकी परवाह भी किसे थी? असल बात तो ये है कि कोई जाति-वर्ण को हटाना नहीं चाहता है। सब चाहते हैं, जैसा है वैसा ही रहे। कोई बदलना नहीं चाहता है। यथास्थिति बरकरार रखना चाहता है। बहुजन अभी भी संशय में है और समाज का जो प्रभु वर्ग है, वह सामाजिक परिवर्तन कर क्यों अपनी श्रेष्ठता गँवाने का प्रयास करेगा?

लेकिन किसी के चाहने से कोई बदलाव या परिवर्तन का चक्र नहीं रुक जाता है। समय और काल के सापेक्ष जो बदलाव होना होता है, हो के रहता है। वर्षों जिस पर चर्चा नहीं हुई, उस पर लोग बात करने लगे। या बात करने की ज़रूरत समझने लगे। कोई सोच भी नहीं सकता था कि फौज में जाति का ऐसा विद्रूप रूप भी देखने को मिल सकता है? हमेशा से फौज को इन सबसे ऊपर माना जाता था। जब स्वदेश दीपक का यह नाटक सामने आया तो लोगों की आँखें खुली की खुली रह गयी। बहुतों को तो आज भी इस कड़वी सच्चाई पर विश्वास नहीं होता है। आसानी से इस सच्चाई को स्वीकारने को तैयार नहीं होते हैं।

हिन्दी रंगमंच में ‘कोर्ट मार्शल’ ऐसा रंग द्वार है जहाँ से हम जाति के नाम पर निम्न जाति पर होने वाले शोषण की कराह सुन सकते हैं। नाटक की व्यथा कथा के माध्यम से समाज की नब्ज टटोल सकते हैं। मराठी की तुलना में हिन्दी नाटकों में दलित स्वर विलंब से सुनने का एक कारण ये भी था कि जिस तरह दलित आन्दोलन महाराष्ट्र के क्षेत्रों में देखने को मिलता है, हिन्दी प्रदेशों में कम मिलता है। ऐसा नहीं कि हिन्दी प्रदेशों में दलितों की संख्या कम है या महाराष्ट्र की अपेक्षा कम शोषण-उत्पीड़न है,बल्कि शोषण की घटनाएँ ज़्यादा ही हो सकती हैं। हाँ, इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता हैं कि जिस तरह महाराष्ट्र में दलित मुद्दों पर बड़े-बड़े आन्दोलन चलाये गये, जिस तरह ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गयी, हिन्दी प्रदेशों में इसे हाशिये पर रखा गया। राजनीति और साहित्य में अम्बेडकर की स्वीकृति आसानी से नहीं हुई। बहुत विवश होकर और विलंब से इसे अपनाया गया। नाटक की दुनिया में तो अब भी एक हिचक है। अम्बेडकर को ग्राह्य करने से संकोच होता है कि कहीं रंगमंच में जातिवाद न आ जाए। ये कैसी विडंबना है कि जो अम्बेडकर समाज को वर्गविहीन-वर्णवहीन बनाना चाहते हैं, उन्हीं पर शक किया जाता है कि उनके आने से रंगमंच में जाति का संक्रमण न फैल जाये।

स्वदेश दीपक का यह नाटक समाज में जाति व्यवस्था को समृद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि विनाश करने के लिए लिखा गया है। विनाश शब्द का प्रयोग कुछ अति लगता हो तो ये कहा जा सकता है कि यह जाति व्यवस्था पर टिप्पणी तो करता ही है। बिलकुल तटस्थ नहीं है यह नाटक। नाटक ख़त्म होने के बाद दर्शकों को शांति से जाने नहीं देता है। कई तरह के सवाल उनके अंदर खड़ा कर देता है। दर्शकों की सारी सहानुभूति रामचंदर के साथ जाती है। एक प्रतिशत दर्शक भी कैप्टेन कपूर के साथ खड़ा नहीं दिखता है। सभी लोगों की संवेदना रामचंदर के प्रति जुड़ी होती है। ऐसा एक नहीं, कई प्रदर्शनों में देखा गया है। ऐसे कई लोग भी रामचन्दर के पक्ष में दिख जाते हैं जो व्यवहार में ही नहीं, विचार से भी वर्ण व्यवस्था के प्रति आस्था रखते हैं। वे कहते भी है कि वर्ण व्यवस्था के विच्छिन्न होने से सामाजिक व्यवस्था खंडित हो जाएगी। इसलिए ऐसे लोगों में यह अन्तर्विरोध देखने को मिल जाता है जो वर्ण व्यवस्था को बचाये भी रखना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ भेदभाव को दूर भी करना चाहते हैं।

जाति और वर्ण को लेकर अम्बेडकर और गांधी में इसी तरह का मतभेद था और एक लंबे समय तक रहा। सन् 1936 में लाहौर में ‘जात-पात तोड़क समाज’ द्वारा आयोजित सम्मेलन में अम्बेडकर को भाषण देने के लिए बुलाया गया था, उसके लिए उन्होंने ‘जाति का विनाश’ नाम से एक विस्तृत लेख तैयार किया था। भले वो भाषण उन्हें नहीं देने दिया गया, लेकिन उसमें अम्बेडकर ने स्पष्ट लिखा था कि ‘अगर आप इस व्यवस्था को कहीं से भी भंग करना चाहते हैं, तो आप को वेदों और शास्त्रों में डायनामाइट लगा देना होगा, जो तर्कसंगतता की किसी भी भूमिका का निषेध करते हैं; वेदों और शास्त्रों को, जो नैतिकता की किसी भी भूमिका का निषेध करते हैं। आपको श्रुतियों और स्मृतियों के धर्म को नष्ट कर देना होगा।’ इसी संदर्भ में वे यह भी लिखते हैं कि ‘जाति के इर्द-गिर्द जो दीवार खड़ी की गयी है, वह अभेद्य है और जिस सामग्री से यह दीवार बनी है, वह ऐसा पदार्थ नहीं है, जिसे तर्कशीलता और नैतिकता जला सके। इसके साथ यह तथ्य भी जोड़िये कि इस दीवार के भीतर ब्राह्मणों की एक सेना बैठी हुई है, जो बौद्धिक वर्ग का निर्माण करती है। ब्राह्मण जो हिंदुओं के नैसर्गिक नेता हैं, ब्राह्मण जो न केवल वेतनभोगी सैनिक हैं, बल्कि अपनी मातृभूमि की रक्षा करने वाली वाहिनी की तरह हैं, तब आप को इस बात का थोड़ा अंदाज़ा हो पायेगा कि मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ कि हिंदुओं में जाति को समाप्त करना क्यों असंभव की तरह है। किसी भी तरह, जाति टूटेगी भी तो इसमें कई युग लग जाएँगे।’

इतने वर्ष गुजर जाने के बाद जाति समस्या जस की तस अपने जगह पर आज भी विराजमान है। कम होने के बजाए और भी मज़बूती से आसन्न है। और जब तक जाति रहेगी, अम्बेडकर की प्रासंगिकता किसी न किसी रूप में बनी रहेगी। बल्कि आज ज़्यादा समसामयिक हो गये हैं अम्बेडकर। राजनीतिक में और साहित्य में भी। भले जब नाटक लिखा गया हो तो उस समय जाति उन्मूलन को अम्बेडकर के बजाए मार्क्सवादी नज़रिए से देखने का प्रचलन ज़्यादा था। विशेष कर हिन्दी प्रदेशों में। इस नाटक को भी गौर से देखें तो स्वदेश दीपक जाति प्रश्न को बिकाश राय के बहाने एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण से हल करते हुए ज़्यादा नज़र आते हैं। अम्बेडकर के माध्यम से नाटक में उत्पन्न सवाल को सुलझाने की तरफ़ कोई इशारा दिखाई नहीं देता है। कैप्टेन कपूर के संवाद के माध्यम से नाटककार बताता भी है कि बिकाश राय का संबंध कहीं न कहीं नक्सलबाड़ी धारा से है। बिकाश राय का बड़ा भाई नक्सलाइट था जो पुलिस के हाथों एनकाउंटर में मारा गया। अपने क्लोजिंग स्टेटमेंट में बिकाश राय जो कहता है, उसका इशारा भी कहीं न कहीं क्लास स्ट्रगल की तरह ही ले जाता है। वो कहता है, ‘हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जो क़ानून और व्यवस्था पर टिका है। और समाज में एक व्यक्ति के विरोध और विद्रोह के लिए कोई स्थान नहीं। बिलकुल नहीं कोई स्थान।’ मार्क्सवादी परिभाषा में कहे तो स्वदेश दीपक व्यक्तिवादी क्रांति की अपेक्षा सामूहिक प्रतिरोध पर ज़्यादा बल देते हैं। वर्ग संघर्ष के पक्ष में ज़्यादा खड़े दिखते हैं। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी स्वदेश दीपक कभी भी राजनीतिक व सामाजिक संघर्षों से अपने को कभी अलग नहीं रखा। पंजाब में जिस तरह की राजनीतिक उथल-पुथल हो रही थी, उससे वे कभी तटस्थ नहीं रहे। उनके दूसरे नाटकों को देख कर कहा जा सकता है कि उन दिनों पंजाब में जिस तरह नक्सलबाड़ी आन्दोलन का ज़ोर था, उससे वे बिलकुल जुड़ा नहीं थे। कहीं न कहीं उस आन्दोलन को क़रीब से देखा था, इसलिए उनके नाटकों में किसी न किसी रूप में उभर कर आ ही जाता है। बिकाश राय उसी का प्रतिफल है। स्वदेश दीपक इस नाटक में इस करैक्टर के माध्यम से अपनी टिप्पणी रखना चाहते हैं। और शायद जाति समस्या को कैसे देखते हैं, अपने विचार रखने का प्रयास करते हैं।

जाति प्रश्न को मार्क्सवादी दृष्टि से देखने का अंजाम नाटक में देखने को मिलता है कि नाटक अन्त आते-आते कोई रेडिकल विचार तक दर्शकों को नहीं ले जा पाता है। रामचन्दर को सजा देने तक सीमित रख देता है। दो जजों ने उमर क़ैद की सजा सुनाई है तो दो ने फाँसी की। निर्णायक फ़ैसला कर्नल सूरत सिंह को देना है। वो भी उसके अंतिम संवाद से स्पष्ट हो जाता है कि वे रामचन्दर के पक्ष में अपना फ़ैसला रखने नहीं जा रहे हैं। रामचन्दर को बताते हैं कि ‘मैं कल तुम्हें सजाए-मौत दे रहा हूँ। तुम्हें देने के लिए मेरे पास सिवाय मृत्यु-दंड के और कुछ नहीं।’ रामचन्दर सीना तान कर इस निर्णय को स्वीकार लेता है। उसके बाद कर्नल सूरत सिंह रामचंदर को यह कहते हुए ग्लास देता है कि ‘क्या अब भी नहीं पिओगे आख़िरी जाम मेरे साथ।’ रामचंदर गदगद भाव से कहता है, ‘पियूँगा सर! ज़रूर पीयूँगा। थैंक्यू सर।’ उसके बाद कर्नल सूरत सिंह उसके ग्लास से अपना ग्लास टकराता है। रामचन्दर एक घूँट में ग्लास ख़ाली कर देता है।

जिस नोट पर नाटक ख़त्म होता है, दर्शकों के अंदर एक रिलैक्स का भाव छोड़ता है। इत्मीनान की एक लंबी साँस भर कर बाहर निकलता है। रामचन्दर के प्रति गहन सहानुभूति जगती है। कहीं से भी यह नाटक उस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति ग़ुस्सा, प्रतिकार की भावना उत्पन्न नहीं करता है। इस नाटक से किसी को परेशानी नहीं होती है। जो घनघोर जातिवादी मानसिकता का होता है या जिसकी वर्ण व्यवस्था पर अटूट आस्था होती है, उसे भी इस नाटक से कोई परहेज़ नहीं होता है। शायद इसकी वजह ये हो कि नाटक कहीं भी उस तन्त्र पर हमला करता हुआ नहीं दिखता है जो उच्च-नीच का भेद रखता है, जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ साबित करता है तो किसी को निम्न।

मराठी की तुलना में हिन्दी पट्टी में अम्बेडकर जरा देर से आये, शायद इसका एक कारण हो। मार्क्स की मौजूदगी थी, इसलिए उसी नज़र से इस मसले को देखा भी गया। अब अम्बेडकर का प्रवेश हो चुका है। अब किसी भी सामाजिक घटना को केवल मार्क्सवादी नज़रिए से ही नहीं देखा जा रहा है, वहाँ अम्बेडकरीय विचारधारा की भी उपस्थिति समान रूप से रहती है। यह किसी भी सांस्कृतिक आन्दोलन के लिए शुभ संकेत है। इसी का परिणाम हमें देखने को मिलता है कि आज के दलित नाटकों में ‘सहानुभूति’ की जगह ‘चेतना’ ने स्पेस ले लिया है।

अर्थात् स्वदेश दीपक का ‘कोर्ट मार्शल’ जो वांछितों-उत्पीड़ितों का प्रस्थान बिन्दु था, वही अब अब अपने महत्तम रूप में आ गया है...

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राजेश कुमार

लेखक भारतीय रंगमंच को संघर्ष के मोर्चे पर लाने वाले अभिनेता, निर्देशक और नाटककार हैं। सम्पर्क +919453737307, rajeshkr1101@gmail.com
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