पुस्तक-समीक्षा

21वीं सदी के भारतीय लोकतन्त्र में पहचान की राजनीति की पड़ताल ‘सुलगन’

 

संविधान लागू हुए बहत्तर साल होने को है। सकारात्मक विभेद (positive discrimination) के जरिए मुख्यधारा के वंचित समाज और आदिवासियों के सामाजिक अधिकार को सुनिश्चित करने का वादा अबतक जुमला ही साबित हुआ है। दलितों और आदिवासियों पर जुल्म अबतक जारी है। हिंसा की घटनाओं की खबर तो हो जाती है। लेकिन, जाति और नस्ल को लेकर जो मानसिक ढाँचा बना हुआ उसका असर रोज होने वाले हिंसा की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा है।

आज भी उत्तर भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में जातिवादी कहावतें धड़ल्ले से सार्वजनिक तौर पर प्रयोग किए जाते हैं। गंदगी को ‘हरिजन’ से जोड़ा जाता है। इसके लिए मगध के ग्रामीण इलाकों में प्रायः यह सुनने को मिल जाएगा ‘करोगे हरिजन जैसा’ या ‘नहाते क्यों नहीं हो, एकदम हरिजन हो?’ ‘हरिजन’ मतलब ‘दलित’। आश्चर्यजनक बात यह है कि यह कहावत दलितों के यहाँ भी बात-बात में कही जाती है। इसी से आप मानसिक अनुकूलन (mental conditioning) का अंदाज़ा लगा सकते हैं। इसी तरह बिहार के सरकारी दफ्तरों में जातिवादी टिप्पणी और अप्रत्यक्ष गुटबंदी को सहज ही अनुभव किया जा सकता है।

2019 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित कैलाश वानखेड़े की कहानी संग्रह ‘सुलगन’ इन्हीं सूक्ष्म शोषण की मानसिकता को चमत्कृत कर देने वाली भाषा से पाठक के सामने रखती हैं। इस संग्रह की कहानियों का रचना समय 2012 से 2017 है। इसी संग्रह की सबसे खास बात है भाषा का प्रवाह। ऐसा प्रवाह जिसके वाक्य विन्यासों में गप्प रस है। इस आत्मकथात्मक गप्प में क्रमबद्ध तरीके से समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दे आते-जाते हैं और जब गप्प खत्म होने को आता तब अचानक से पहचान की राजनीति से हमारा सामना होता है। पाठक को अंत में जाकर मूल बात का बता चलता है कि अच्छा! कहानीकार यह कहना बताना चाहते थे। व्यक्तिपरक गप्प धीरे-धीरे वंचित समूह का सामूहिक पहचान का स्वरूप बनकर पाठक के सामने आता है।

 अस्मितावादी कहानियों की भाषा शैली पर अनगढ़ता और तारतम्यता के अभाव का आरोप लगते रहे हैं। कैलाश जी का यह संग्रह इस आरोप का प्रतिउत्तर के तौर पर पढ़ा जा सकता है। अपने आसपास बिखरे वस्तुओं से कहानी बुनने की कला है कैलाश जी के पास वह भी भाषा के महीन बुनावट के साथ। जैसा कि ललित निबंधों में होता है कि लेखक कल्पना की उड़ान भरता जाता है और अंत में वह उनका कल्पनाओं के योग से मूल बात निबन्ध के अंत में प्रस्तुत करता है।

कैलाश जी के कहानी की भाषा में बस अंतर इतना है कि कल्पना के स्थान पर यहाँ तत्कालीन भारतीय लोकतन्त्र के हलचलों की उड़ान है। यह होना लेखक के कहानी योजना का हिस्सा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अस्मितावादी विमर्श के दशा-दिशा का अनिवार्य सम्बन्ध लोकतांत्रिक राजनीति में नित घटने वाली घटनाओं और उसके प्रभाव से जुड़ा हुआ है। इसको समझने के लिए ‘जस्ट डांस’ कहानी का यह अंश देखिए:-” सौमित्रा को एंकर बंगाली बताता है। भारत माता बनकर करती है डांस, गाने के शुरुआत में गूँजती है आवाज, हमारी भारतमाता जकड़ी है आतंकवाद, भ्रष्टाचार, तानाशाही में, आरक्षण में..” भारतमाता बनी हुई सौमित्रा ने देशभक्ति की लहर फैला दी। ये किसकी भारत माता है जो आरक्षण में जकड़ी है? सवाल दिमाग में घूम रहा है।”

हर कहानी बदलते हुए भारत के कस्बों और शहरों से जुड़ा हुआ है। 1990 ई. के बाद भारत में उदारवादी नीतियों के कारण पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचार हुआ। लेकिन, व्यक्ति का नॉस्टैल्जिक मन द्वंद्व में बना रहा और आजतक है। तिसपर यह कि जातीय श्रेष्ठताबोध का ह्रास न हो सका। ‘यादों’ का सांस्कृतिक अध्ययन हिन्दी जगत में कम हुआ है। होना चाहिए इसपर काम। ‘उन्नति जनरल स्टोर्स’ पुरानी स्मृतियों और नया बन रहा शहर के द्वंद्व के बीच ‘जातीय अस्मिता’ की स्थिति की पड़ताल करती है। ‘मेमोरी’ का बेजोड़ सांस्कृतिक अध्ययन है यह। ‘उन्नति’ वह लड़की है जिससे वह प्यार करता था। लेकिन उस लड़की के जीवन में उन्नति का कोई नामोनिशान नहीं है। कपड़ा सुखाते-सुखाते उसका जीवन रस भी सूखा दिया गया है। वह लड़की भी उससे प्यार करती है। ‘जाती’ ने एक नहीं होने दिया। समय बीतता है, शहर बदलता है। ‘उन्नति जनरल स्टोर्स’ भी बदल गया है। लड़का भी अफसर हो गया है। उन्नति का बाप उसके पास आता है काम करवाने। तब वह सोचता है ‘वह आदमी जिसने मुझे इंसान माना ही नहीं वह आज आदमी नहीं रहा।’

    ‘जस्ट डांस’ कहानी व्यंग्यात्मक शब्द युग्म है। ‘बहुत तनाव लेते हो जी देश-दुनिया की,चिल्ल रहा करो’ इस चलताऊ विचार पर कटाक्ष है यह कहानी। जिसने अपने जाति और नस्ल पर कभी खतरा महसूस न किया हो, आर्थिक असमानता का दंश न झेला हो वह जस्ट डांस और जस्ट चिल के विचार के साथ ही जीते हैं। कहानी ‘जस्ट डांस’ रियलिटी शो के बहाने आरक्षण, जाति, पद्मनाभन मंदिर का मुद्दा, अंधविश्वास, प्रेम, जाति जनगणना और सवर्ण जाति के मानसिकता को पकड़ती है। पद्मनाभन मंदिर के मुद्दे पर भूरिया सोचता है ‘जिस मंदिर में महानायक अपने बेटे के वैवाहिक जीवन के लिए मन्नत माँगता है। डरा हुआ महानायक पैदल चलता है।…..डरे हुए, डराए हुए समाज में प्रेम डर का नाम बन गया..।’

जाति जनगणना भारत में बहस का प्रमुख मुद्दा रहा है। वोट बैंक की राजनीति ने इसे और विवादस्पद बनाया है। सवर्ण जातियाँ और दक्षिणपंथी ताकतें इसका विरोध करते रहे हैं। आदिवासियों के ईसाई धर्मांतरण को हाइप देकर प्रायः हिन्दू धर्म में धर्मांतरण को छिपाने की कोशिश की जाती रही है। प्रायः सुनने में आता रहा है कि जनगणना के समय आदिवासियों की भाषा ‘हिन्दी’ और धर्म ‘हिन्दू’ लिख दिया जाता है। कहानी में शिक्षक आकाश भूरिया के साथ भी यही करता है। तब आकाश आत्मबल से इसका प्रतिरोध करते हुए कहता है कि मेरी भाषा ‘भीली’ है और मैं ‘आदिवासी’ हूँ। उसका बॉस उसे अपनी कार कीचड़ से निकलवाने उसे घर पर बुलाता है और फ़ोन पर दूसरे से उसे ‘नालायक भूरिया’ कहता है। आकाश उसकी नजर में झाबुआ का एक आदिवासी है जो मजदूरी करने के लिए है। आकाश कार निकालने से मना करके अपना प्रतिरोध दर्ज करता है। ‘जस्ट डांस’  ताकतवर लोगों के इशारे पर नाचते रहने का प्रतिरोध है।

इस संग्रह में तीन कहानियाँ सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की समस्या पर है। ‘जिन्दगी और प्यास’ राशन कार्ड के मुद्दे को पकड़ती है। ‘खापा’ प्राइवेट स्कूलों में ‘शिक्षा के अधिकार’ के तहत दलित और वंचित समुदाय के विद्यार्थियों के कोटे को लागू होने के व्यावहारिक समस्या को दिखाती है। ‘हल्केराम’ निवास प्रमाण पत्र, वोटर आईडी और आधार कार्ड जैसे पहचान पत्रों की जरूरत सरकारी विद्यालयों में बच्चों के प्रवेश के लिए अनिवार्य करने के सम्बन्ध में है। ज्यां द्रेज ने अपनी किताब ‘भारत और उसके विरोधाभास’ में लिखा है कि ‘भारत में सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वयन और जवाबदेही की है’। योजनाएँ लागू होती हैं पर क्रियान्वयन नहीं हो पाता है। राशनकार्ड, एपीएल, बीपीएल कार्ड, इंदिरा आवास योजनाओं में धांधली से हमसब परिचित हैं।

‘जवाबदेही’ सुनिश्चित नहीं होने का एक बड़ा कारण है कि योजनाओं को लागू करने वाले ज्यादातर अफसर, मुखिया, वार्ड और अन्य प्रतिनिधि जातीय द्वेष से भरे पड़े हैं। नतीजा होता है कि जिसे जरूरत है उसको लाभ नहीं मिल पाता। मिलता भी है तो काफी चिरौरी और घूस देने के बाद। आरटीई (RTE) की हालत बेहद खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग इससे लगभग अनभिज्ञ हैं। जो जानते हैं वो प्राइवेट स्कूलों के डायरेक्टर के रवैये और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के कारण हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। ‘खापा’ कहानी में इसी के प्रतिरोध में समर खापा को स्कूल और मैडम समझकर कहता है “इसका तो भूसा बनाना बेहतर होगा।”

वंचित समुदायों के लिए लागू योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन के लिए दो बातें जरूरी हैं। पहला, जागरूकता जिससे व्यक्ति अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ सके और प्रतिरोध दर्ज कर सके। दूसरी जरूरी बात है प्रशासन और पंचायती राज व्यवस्था में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़े। राजनीतिक और प्रशासनिक आधार मजबूत होगा तो योजनाओं को सही व्यक्ति तक पहुँचने में मदद मिलेगी। ‘हल्केराम’ कहानी में दो मुद्दे हैं। एक तो अप्रवासी होने का दंश और दूसरा जरूरी कागजात को जुटाने की समस्या। भारत का दलित और वंचित तबका बड़े शहरों में रोजी-रोटी के लिए मजदूर बनता है। वह अपने ही गाँव-कस्बों के लिए प्रवासी हो जाता है। इसके कारण जनगणना, पहचान पत्र और अन्य जरूरी कागजात से वंचित होता रहता है। नागरिकता को सिद्ध करने वाले ये कागजात प्रायः आर्थिक अभाव और जाति द्वेष के कारण गरीब परिवार को हासिल नहीं होता है। इसके अभाव में उनकी पीढ़ियाँ प्रभावित होती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी वे नागरिकता और मनुष्य होने के अधिकार के दायरे से बाहर हो जाते हैं। इसलिए जब महिला बच्चे के एडमिशन के लिए हल्कू को प्रोत्साहित करते हुए कहती है कि ‘वो (मास्टर) नहीं मानेंगे तो शिकायत करेंगे’ तो विशाल को लगता है कि ‘ये (महिला का हौसला और निश्चय) इतना गर्म उबलता हुआ तेल है जिसमें कुछ भी डालो वो उसे तल देगी।’

‘जाति’ के कारण सवर्ण स्त्रियों का ऑनर किलिंग भारत में सामान्य घटना सी हो चुकी है। ‘उस मोड़ पर’ कहानी उसकी जड़ों को पकड़ती है। मध्यवर्गीय सवर्ण परिवार पर समाज की नैतिकता इतना हावी होता है कि उससे बाहर वह सोच ही नहीं पाता है। आर्थिक स्थिति भले खराब हो पर जातीय श्रेष्ठताबोध में मताया हुआ सवर्ण पुरुषवादी बाप अपनी बेटी और पत्नी को इज्जत के नाम पर हत्या करने में भी जरा नहीं हिचकता है। पूजा के साथ अच्छी बात यह है कि वह आर्थिक रूप से स्वतन्त्र है, कॉलेज में पढ़ाती है। जब उसका बाप विकास से शादी के लिए तैयार नहीं होता है क्योंकि वह तथाकथित नीची जाति का है, तब पूजा कोर्ट मैरिज करने का निर्णय लेती है। माँ उसकी बीमार है और पूजा से बहस होती है। बाप उसकी माँ को इनसब का जिम्मेदार मानता है। उसे फाँसी लटकाकर मार देता है। हॉस्पिटल में पोस्टमार्टम नहीं करने देता। भावनात्मक ब्लैकमेल का सहारा लेता है। बेटी को पता है कि बाप का हाथ में अगला गला उसी का होगा। इसलिए वह दृढनिश्चय होकर पोस्टमार्टम के लिए अड़ी रहती है। आर्थिक स्वतन्त्रता वह रास्ता है जो महिलाओं को अपने अधिकार के लिए सबल बनाती है।

इस संग्रह की सबसे मजबूत कहानी ‘गोलमेज’ है। आम तोड़ने के दृश्य को वो आम आदमी की कहानी बनाकर पेश करते हैं। यह कहानीकार की भाषिक और शिल्पगत विशेषता हुई। दृष्टि इतनी पैनी है कि इस पूरे दृश्य को उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर और गाँधी के गोलमेज वार्ता का संदर्भ बना दिया। ब्अमीरों के मोहल्ले में दलित बच्चे आम तोड़ रहे हैं। एक बूढ़ा उनको डांट रहा है। बात बनते नहीं देख तोल-मोल कर रहा है। वहीं एक बच्ची जो उसके यहाँ काम करती है, दलित है और पढ़ाई में प्रतिभाशाली है बूढ़े से कहती है कि बाकी अमीर लोग तोड़कर ले जाते हैं आम तब तो नहीं कहते कुछ। बूढ़े के जिद के सामने झुकने का मतलब था आम से हाथ धोना और अपने अधिकार से भी। इसलिए लड़की कहती है “तब दया की थी हमारे बाबा ने और आपने धोखा। ये गोल टेबल नहीं है कि बात ही करते रहेंगे।” यहाँ बूढ़ा व्यक्ति गांधी का प्रतीक है और लड़की बाबा साहेब का।

इस तरह इस कहानी संग्रह में कहानीकार ने अपने आसपास के परिवेश से छोटे-छोटे वस्तुओं को अपनी कहानी का पात्र बनाकर अस्मितावादी स्वर को मजबूत वैचारिक ढाँचे में रखते हैं। भाषा की सूत्रात्मकता और समसामयिक मुद्दों का अनिवार्य सम्बन्ध दलित-आदिवासी चेतना से जोड़कर वृहत वैचारिक संकुल बनाना इस कहानी संग्रह की उपलब्धि है

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महेश कुमार

लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में स्नातकोत्तर (हिंदी विभाग) छात्र हैं। सम्पर्क +917050869088, manishpratima2599@gmail.com
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