देश

आज़ादी के पछत्तर साल और हमारे गाँव

 

(विशेष संदर्भ : पूर्वी उत्तरप्रदेश)

यूँ तो दुनिया सतत परिवर्तनशील है, लेकिन जितने परिवर्तन भारत वर्ष ने अपनी आज़ादी के इन 75 सालों में देखे हैं, कभी पहले नहीं देखा गया। इसका सबसे बड़ा भोक्ता रहा है भारत का गाँव। और संयोगन यही समय हमारे होने का भी रहा है। अत: अमृत-महोत्सव के अवसर पर एक स्मृति-यात्रा के रूप में अपने अनुभवों के गुड़, स्मृतियों के रस और विडंबनाओं की चासनी के साथ इस बदलाव का एक मुख्तसर सा आकलन करना शायद ग़ैरमौजूँ न होगा।

हम आज़ाद भारत में पैदा हुए, जब 1951-52 के दौरान इस गणतंत्र देश में प्रथम चुनाव हो रहा था…। फिर दूसरे चुनाव 1957 तक इतने बाहोश हुए कि पैडिल रिक्शे पर माइक लिये हुए प्रचार करने लोग आते, तो उनके पीछे-पीछे भागना हमारे लिए बड़ा दिलचस्प नजारा हुआ करता था…। उन्हीं दिनों हमारा स्कूल जाना शुरू हुआ…प्रार्थना के बाद रोज़ भारतमाता व महात्मा गांधी की जय बोली जाती। 15 अगस्त व 26 जनवरी को झंडा-वंदन होता, सबको लड्डू मिलते। हम बच्चे ख़ाकी हाफ़ पैंट पर सफ़ेद बुशर्ट पहने, डंडों में काग़ज़ का झंडा लगाये क़तार में गाँव-गाँव जाकर प्रभात फेरी करते…। अध्यापक साथ होते, बीच-बीच में जय के नारे बोलवाते…। पूरा माहौल खाँटी  राष्ट्रीयता से सराबोर होता…।

तब गाँव की दीवालें मिट्टी की हुआ करती थीं। उन पर गेरू से बने स्वस्तिक होते… ‘सत्यमेव जयते’ व ‘अहिंसा परमो धर्म:’ …जैसे सूत्र लिखे होते। लेकिन पहले चुनाव से ही उन पर चुनावी  नारे लिखे जाने लगे…। आज तो सब दीवालें पक्की हो गयी हैं और गाँव के मन भी सीमेंट-बालू की बनी दीवालों जैसे ही कठोर हो गये हैं। इस कठोरता में आज़ादी का कोई योगदान भले नहीं, लेकिन उन सांस्कृतिक आस्थाओं-आचारों के ऐसे राजनीनीति व व्यवसायीकरण ने 75 वर्षों में बाह्य जीवन को असीम विकास तो दिया, अंतस को घुन की तरह चाल के खोखला कर दिया है – भरपाई दोनो की नहीं हो सकती…।

उन दिनों से आज तक सोचते हुए जो मोटी बात छनकर निकलती है, वह विकास की दिशा को ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ सिद्ध करती है। आज़ादी के साथ ही शुरुआत हुई – एकता के बदले विभाजन से – देश के दो भाग हो गये। दो प्रमुख दल थे – कांग्रेस और जनसंघ। उनके निशान (चुनाव-चिह्न) होते थे – ‘दो बैलों की जोड़ी’ और ‘दीपक’। कम्युनिस्ट पार्टी भी ‘हँसिया-हथौडा’ लिये मैदान में डटी थी। तब ये दल होते थे देश व जनता के लिए – जन-तंत्र का यही मतलब भी था। लेकिन तभी से इसका क्षरण शुरू हो गया…। देश के विभाजन की परम्परा दलों के लगातार विभाजन में आज तक पलती-बढ़ती जा रही…। आगे चलकर उन दो–चार दलों में से जाने कितने नये दल निकले-बने…पुराने दलों के कितने नाम बदले…कितने निशान बने व बदले गये…। और ये बनाव-बँटवारे कभी व्यक्तियों के कारण हुए । जैसे – कांग्रेस से  ‘कांग्रेस आइ.’ हो या ‘जन कांग्रेस’ एक व्यक्ति का हो। फिर हिंदी का ‘इ’ नहीं, ‘आइ’ लगा – अंग्रेज़ी भी राजा से प्रजा में आनी शुरू हुई। भारत से ज़्यादा प्रचलित ‘इंडिया’ है। ‘जन कांग्रेस’ भी  ‘भारतीय क्रांति दल’ होते ही ‘बीकेडी’ हो गया। जनसंघ से बनी भाजपा भी आज ‘बीजेपी’ ही है। यह रथ आगे बढ़ा, तो व्यक्ति से किसी जाति या कुछ जातियों का नेतृत्व करने लगा। सो, आज़ादी के पहले सोपान पर ही चार वृत्तियाँ जल्वागर हुई – बँटवारा, व्यक्तिवाद, अंग्रेजियत  और जातिवाद – गोया ‘निसि तम घन खद्योत बिराजा, जनु दम्भिन्ह कर मिला समाजा’। ये ही इन 75 सालों में गाँवों से लेकर राजधानियों तक निर्णायक-नियंता हुए हैं, मूल्य बन गये हैं।

फलत: मेरे छोटे से गाँव में सात घर बरई (चौरसिया लोग) थे, आज सत्रह घर और 27 चूल्हें हो गयी हैं। पाँच घर राजभर पचीस हुए, चूल्हें तो 40-45 हो गयीं हैं। अंग्रेजियत का हाल यह कि ‘स्कूल-क्लास-क्लास रूम-पेन-बुक’, ही नहीं हुए, हमारे पोते अब बताते हैं कि वे ‘फ़ोर सिस्टर-ब्रदर’ हैं। गाँव के लोग तो क्या, खेत में काम करते मज़दूर के भी अपने चाचा-मौंसा-फूफा…आदि तक सब ‘अंकल’ हो गये हैं। जातियों के अनुसार तो टोले-मुहल्ले पहले भी थे, आज प्रधानी से लेकर सांसद तक के चुनावों में उनके वोट अपनी जाति में ही पड़ने तय हैं। राजनीतिक दल भी इसी चुनावी क्षेत्रों की जातिगत आबादी के अनुसार ही अपने प्रत्याशी चुनते हैं और फिर सरकारों के दिये फ़ायदे-नुक़सान भी जातिगत होते हैं। मौजूदा सरकार अपने मैदान अन्य तरीक़ों से सुरक्षित करके इन धर्म-जाति के समीकरण तोड़ने के लिए प्रयत्नशील है…। लेकिन अभी तक तो समीकरण-तोड़क चेतना गाँवों तक पहुँची भी नहीं है।

तकली कात के आज़ादी दिलाने वाले गांधीजी का किसान-चरखा आज़ादी की लड़ाई में तोप-तलवार जैसा कारगर हुआ था और यंत्र के विरुद्ध ज़ेहाद व स्वावलम्बन का अगुआ बना था। राष्ट्रीय तिरंगे में जहां आज अशोक चक्र है, वहाँ कभी गांधीजी की राय से चरखा था। आज़ादी के साथ तमाम कुटीर-उद्योगों की योजनाएं आयीं। कल-कारख़ानों की यांत्रिकता, उनकी शहर-जीविता के मुक़ाबिल सिर्फ़ चरखा-योजना ही अम्बर चरखे के रूप में गाँवों तक पहुँची – काफ़ी दिनों तक फली-फूली भी। बहनों के काते सूत खादी-आश्रमों में बेच-बेच कर हमने खूब कपड़े ख़रीदे-पहने। लेकिन यांत्रिक प्रभुता के सामने इसे भी उच्छिन्न होना ही था। जैसे अल्प-काल में ही शहरों-क़स्बों के यात्किंचित कुटीर-उद्योगों की भ्रूण हत्या हो गयी, वैसे ही एक-दो दशकों में गाँव के चरखे भी संग्रहालयों की वस्तु बन गये। अब तो खादी आश्रमों में भी मशीन के बने कपड़े बिराजे हैं। खादी के नाम से देहों की शोभा बने हैं। गांधीजी की अवधारणा में राष्ट्रीयता, देशभक्ति और स्वावलम्बन की प्रतीक खादी आज अमीरी व अभिजात फ़ैशन की वस्तु बन गयी है। आज़ादी की चेतना व प्रतीक ऐसे ही चहुँ ओर खप-बह-बिला गये हैं।

कोरोना महामारी

हमारे होश के पहले तो गाँवों में हैज़ा-तावन (कॉलरा-प्लेग) जैसी तमाम बीमारियाँ व्यापतीं और देहातों में हज़ारों की संख्या में लोग मरते। अजादी के बाद हमारे बचपन में भी गर्मियों में चेचक के प्रकोप और लू (सन स्ट्रोक) आदि से मिलाकर पाँच-पचास मौतें तो हर गाँव में होतीं…। इनके लिए एक तरफ़ पूरे गाँव के सामूहिक पूजा-पाठ होते, दूसरी तरफ़ माली-ओझा-सोखा के निकारे-टोने-टोटके, जादू-मंतर भी किये जाते।

लेकिन आज़ादी के साथ ग्रामीण विकास की तमाम योजनाएँ आयीं। इसके तहत जो विद्यालय योजना बड़ी बाज़ारों-तहसीलों तक सीमित थी, गाँवों तक पहुँची और सरकारी अस्पताल ज़िलों-तहसीलों से हर 15-20 किमी. के अंतराल पर स्थित बाज़ारों तक फैल गये। इन सबके साथ स्वास्थ्य-सुधार की याजनाओं में घर-घर जाकर दिये जाते चेचक के टीके ऐसे कारगर हुए कि सारी बीमारियों के सामूहिक विनाश बंद हो गये। उस समय आज़ाद भारत के गाँवों के लिए यह सबसे बड़ी उपलब्धि सिद्ध हुई। लेकिन पूजा-पाठ व जादू-टोना 1970 के दशक तक बदस्तूर चलते रहे। चलते आज भी हैं, लेकिन कुछ रूदिवादी संस्कार वालों के अलावा अब उसमें वैसी आस्था-विश्वास की भावना नहीं, समाज-धर्म के उत्थान व सत्कर्म की चेतना तो बिलकुल भी नहीं। ज़्यादातर परिपाटी निभाने की रस्म भर है। हाँ, एक नया विकास अवश्य हुआ है कि इसमें भ्रष्टाचारों से कमाये धन व माफिया-गुंडई के अपराध-बोध से निजात पाने की कदर्थना भर उठी है। इसीलिए अब ये अनुष्ठान पूरे गाँव के समक्ष दिन में पुण्य-कार्य की तरह नहीं, बल्कि छिप-छिपा के रातों को काले कारनामों की तरह होने लगे हैं…।

उक्त स्वास्थ्य-सुधारों से समूह-विनाश रुक गया, तो जनसंख्या का संकट आया। पता चला कि बीमारियों के सामूहिक विनाश बढ़ती आबादी के संतुलन की प्रकृति-चेतना का वरदान भी थे। विज्ञान ने अपनी क्षमता में मानवीयता की जानिब से एक तरफ़ उसे छेड़ दिया, तो इधर टाइचून…आदि जैसे नये धानों व नरमरोजा-आई.आर.8…आदि गेहूं की प्रजातियों तथा डाई-यूरिया-पोटाश…आदि रासायनिक खादों के बावजूद ग़रीबी का आलम यह कि बड़े-बड़े किसान भी 1960-70 के दशक में सरकारी अनाज में बाजरी तक लेने के लिए क़तारों में खड़े पाये गये। अमेरिका के बचे-सड़े गेहूं के राष्ट्रीय आयात भिखमँगाई की तरह हुए। उधर जिस तरह बीमारी से आती मृत्यु को रोका गया, उसी वैज्ञानिक शोधों से संतानोत्पत्ति को रोककर नया संतुलन बनाने की खोज हुई और परिवार-नियोजन शुरू हुआ। एक बार फिर दीवालें ‘हम दो, हमारे दो’…आदि नारों से भर गयीं। इस नारे के प्रमाण बने तुलसी –

  दुइ सुत सुंदर सीता जाये, लव-कुस बेद-पुरानन गाये।

दुइ-दुइ सुत सब भाइन केरे, भये रूप-ग़ुन-सील घनेरे’।

लेकिन उस समय तक प्राचीन भारतीय संस्कारों से आच्छादित जन मानस इस आधुनिक वैज्ञानिक सोच को समझ व पचा नहीं पा रहा था। दूसरे, थोड़ा बाद में नसबंदी का अंधाधुंध-अमानवीय लागूकरण सत्ता के सामने संकट बनकर पेश हुआ। इसके साथ मां-बेटे के व्यक्तिवाद के चरम के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष से बचाव-कवच बनकर ‘आपात-काल’ जैसा विगर्हणीय मंज़र भी सामने आया। सबके हस्र के रूप में पहली बार कांग्रेस का सत्ता-पलट हुआ और सभी दलों की मिली-जुली ‘जनता दल’ की सरकार बनी, तो लगा – गोया राम राज्य ही आने वाला हो। लेकिन पद-बँटवारे से ही जो व्यक्तित्वों की टकराहट शुरू हुई कि ढाई साल में ही रामराज्य का सपना चूर-चूर हो गया और घूम-फिर कर वही ‘बैतलवा डार पर’ पुन: आ गया। इस केंद्रीय उठा-पटक के दौरान गाँव लगभग भूला ही रह गया।

उन्नीस सौ साठ-सत्तर के दशक का वह दौर हमारी पीढ़ी का ही था, जब किशोर होते ही तत्कालीन नयी पौध महानगरों की तरफ़ भागने लगी। इसके एक दशक पहले हमने विद्यालय में समूह गान (कोरस) गाया था – ‘छोड़ि दा नोकरिया के आसा, मन खेतिया में लगावा।

पुष्ट-पुष्ट बैल राखा, मेस्टन हल राखा…घने-घने खेतवा जोतावा मन खेतिया में लगावा’…।

पहले भी हर गाँव से दो-चार लोग कहीं शहर जाते थे। वे भी बसते नहीं थे। तब गाँवों में नारे की तरह लोकगीत गाया जाता था – रेलिया ना बैरी, जहज़िया ना बैरी, उहै पैसवा बैरी हो…

                       पिया के देसवा में घुमवले उहे पैसवा बैरी हो’

लेकिन जब छुट्टी में गाँव आते थे, तो उनकी फ़िन्ले की धोती, अद्धी का कुर्ता व पम्प शू देखके हमारे बचपन को बड़ा रश्क व हसरत होती थी। हमें क्या पता था कि किशोर होते ही परदेसी होने का चलन चल जायेगा…। कारण बना वही  शिक्षा का प्रसार, जिसने शिक्षित बेरोज़गारों की पलटन खड़ी कर दी। असल में विदेशी पद्धति की नौकर बनाने की नीयत वाली शिक्षा ने ‘उत्तम खेती, मद्धम बान, निषिध चाकरी भीख निदान’ की भारतीय ग्रामीण धारणा को बदला नहीं, ख़त्म ही कर दिया। युवा वर्ग की किसानी न करने की नियति तय कर दी। शहर जाने की इस प्रमुख तत्कालीन धारा को साहित्य में ‘नगरों की ओर प्रयाण’ के रूप में उजागर किया गया। साठ के दशक में आये चार महाकाव्यात्मक उपन्यासों (अलग अलग वैतरणी, राग दरबारी, जल टूटता हुआ और रीछ) ने इस जीवन-वास्तव को जमकर उजागर किया। ‘रिहाई’ जैसी फ़िल्मों के साक्ष्य पर गाँव के गाँव ख़ाली हो गये। छप्पर उठाने जितने लोग भी गाँवों में न रहे। और इसका ज़लज़ला आज ऐसा है कि कभी ‘कृषि-प्रधान देश’ के रूप में ख्यात-आदृत भारत में अब नव शिक्षितों के लिए किसानी करना तौहीनी का सबब बन गया है। अपनी भावी पीढ़ी को देखकर भीषण समस्या हमारे सामने मुँह बाये खड़ी हो गयी है कि हमारे खेतों का क्या होगा…!!

जबकि हक़ीक़त यह है कि 75 सालों की आज़ादी के पिछले बीस सालों में जीवन के हर रूप के साथ खेती भी यंत्र-परिचालित और सरकारी-ग़ैर सरकारी साधनों-सुविधाओं से युक्त हो गयी है, जिसके चलते खेती करना बेहद आसान तो हो ही गया है, योजनाबद्ध ढंग से करने पर अच्छी आमदनी भी हो सकती है। जहां आज़ादी के 40-45 सालों बाद तक भी कार्त्तिक (रबी की फसल – जौ-गेहूं-चना-मटर-सरसो…आदि) की जो बुवाई हल-बैल से दो महीने चलती थी, पिछले 15-20 सालों से ट्रैक्टर द्वारा दो दिन में हो जाती है। जिस एक खेत की सिंचाई तालाबों-कूओँ से 10-12 आदमी मिलकर या रहट-बैल से तीन लोग तीन दिन में करते थे, अब सरकारी नहर के पानी से दो घंटे में हो जाती है। इसका शुल्क भी काफ़ी रियायती है। 1960 के दशक में सरकारी नलकूप (ट्यूब्बेल) की योजना भी चली थी। वह गाँव-गाँव पहुँच न पायी और दस-एक सालों में फेल भी हो गयी। तब हाथ-हँसिया से फसलों की कटाई और बैलों से दँवाई (दाना-भूसा अलग करना) दो-तीन महीनों में पार पाती थी, अब कुछ घंटों या एक दिन में हो जाती है। लेकिन लागत इतनी बढ़ गयी है कि बचत का अनुपात आधे से कम हो जाता है।  

इन सब विकासों-उपलब्धियों के बीच पुरानी ग्राम-संस्कृति एवं कृषि-संस्कृति ख़त्म हो गयी। मुख़्तसर में बानगी देखें, तो – चकबंदी ने सबको एक-एक जगह केंद्रित कर दिया। सारे सिवानों में सबका आना-जाना छूट गया। बैल-हल, घंटी की टुन-टुन, रोपनी-बोवनी-हलवाही के गीत, पुआल-भूसा, गन्ने-गुड़, गेंड़ा-पंताड़, उखभोज-धनभोज, लावा-कच्चा रस…आदि सब ग्रामीण समृद्धि ख़त्म हो गयी। गर्मी भर खलिहानों में सोने और एक दूसरे के गीत-क़िस्से सुनने-सुनाने के अवसर न रहे। परदेसों के पैसे आये और घर सबके पक्के हो गये। अपने शौचालय-स्नानघर हो जाने से पनघट लुप्त हुए। तालाबों-कूओँ के सामूहिक स्नान ख़त्म हुए। मिट्टी-खपरैल के घर नदारद हुए, तो बारिश के पहले घर छवाए जाने की रौनक़ गयी। अब तुलसी चौरे पर दिये नहीं जलते। घर के सामने न नीम के पेड़ रहे, न झूले पड़ते। महीने भर कजरी नहीं होती। पूरा गाँव मिलकर होली नहीं खेलता। फगुआ नहीं गाता। शादी-व्याह भी दो घंटे के जमावड़े रह गये। जंगल-बगीचे उजह गये। कहीं छाँव नहीं रही। बगीचों की हवा पंखों में सिमट गयी। अब बनारस रहो या गाँव, जीवन एकरस हो गया। इस तरह चकबंदी व यंत्र-आधारित खेती ने गाँव की सहकारिता ख़त्म की, तो सामूहिकता भी व्यक्तिवादिता में बदल गयी।

लेकिन उक्त सब कुछ तो शायद प्रगति-विकास की दिशा की अनिवार्य दशा बनी। व्यवस्था का वांछित था, हुआ। लेकिन सबसे बड़ा घातक यह हुआ कि गाँव जो अपने में पूर्ण थे, जिन पर आधारित होते थे – शहर व देश… अब शहर-बाज़ार के मुखापेक्षी हो गये। आज़ादी के शुरुआती काल के मेरे बचपन में वैद्य से लेकर नाई-धोबी-लोहार-कंहार…सब गाँव में हमारे घर आते थे। सारे अनाज व गुड़ – याने खाने की सारी चीजों के लिए बनिये बोरे लिये हुए घर-घर घूमते थे। सिर्फ़ हल्दी, जीरा-मेथी, काली मिर्च व मिट्टी के तेल के लिए महीने-पंद्रह दिनों में किसान बाज़ार जाता था। अब मोटे तौर पर सिर्फ़ गेहूं और धान हम बेचते हैं। बाक़ी हर चीज़ के लिए दौड़ के बाज़ार जाते हैं। किसान-बच्चे का एक पाँव घर होता है, दूसरा बाज़ार में। और धान-गेहूं बेचना भी किसान की साँसत का सबब है। सरकारी दर जितना बनिया देता नहीं और सरकारी व्यवस्था में ट्रैक्टर पर अनाज रखके क़तार में लग जाओ, तो सप्ताह से दस दिन की रखवाली। उस पर बारिश हुई, तो भींगने का डर भी…लेकिन इतनी बड़ी सरकार, जो अफ़सरों-मंत्रियों को आधे दर्जन सेवक दे सकती है, वह अनाज व उसे पैदा करके देश का पेट भरने वाले किसान के लिए हर बाज़ार में दो-चार ख़रीदी-स्थल नहीं खोल सकती…।

कुल मिलाकर शहर-गाँव का अंतर मिटता जा रहा है। पहले गाँव के हर घर, हर व्यक्ति के दुःख-सुख, नफ़े-नुकसान से हर आदमी परिचित होता था, लेकिन यंत्रों से परिचालित जीवन व सीमेंट-बालू से बने घरों में रहता गाँव भी आज अजनवीयत की यात्रा में शहरों के उसी मुक़ाम की ओर अग्रसर है कि फ़्लैट की खिड़की से आते सिगरेट के धुएँ से बग़ल वाला जान पाता है कि वहाँ कोई रहता है। गांधीजी के नारे ‘गाँव की ओर चलो’ से आज़ाद भारत की यात्रा शुरू हुई थी, आज पछत्तर सालों बाद गाँव ही शहर हो गये हैं…, तो अब कैसे कह सकते हैं –  

अहा ग्राम जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका मन चाहे…!!

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सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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