विशेष

सावन को आने दो…

 

आधुनिक जीवनशैली और बाहरी चकाचौन्ध में हम अपने वास्तविक जीवन मूल्यों को भूलते जा रहें है। लेकिन हम भले ही आधुनिकता का चोला क्यों न ओढ़लें पर प्रकृति हमें हमारी संस्कृति से जोड़ने का कार्य करती है। हम ज़िन्दगी को जिस नजरिये से देखते हैं जिन्दगी हमें वैसी ही नजर आने लगती है। यह हमारी आस्था और मन का विश्वास ही तय करता है कि हमें ज़िन्दगी को किस चश्मे से देखना है। जीवन में आशा-निराशा, सुख-दुःख और जीवन-मरण की प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहती है।

वहीं निर्वाद सत्य यह भी है कि अगर आज सुख है, तो निश्चय ही कल दुःख भी आएगा, क्योंकि जीवन छणभंगुर है और इससे बचकर कोई नहीं रह पाता है। चाहे वह राजा हो या रंक। इस भौतिक संसार में जो भौतिकता से परे है। वह शिव है और शिव ही आदि और अनन्त। भगवान शिव को ‘देवों का देव महादेव’ कहा जाता है। वे ज्ञान, वैराग्य के परम आदर्श हैं। कहते हैं ईश्वर सत्य है,  सत्य ही शिव है और शिव ही सुन्दर है। इसलिए भगवान शिव का एक रूप सत्यम, शिवम और सुन्दरम है। शिव के बिना प्रकृति की कल्पना आधारहीन है और प्रकृति के बिना मनुष्य के जीवन का कोई आधार नहीं।

यूँ तो हमारे देश में हर त्योहार को प्रकृति के साथ ही जोड़कर देखा जाता है। वर्षा ऋतु से त्योहार शुरू हो जाते हैं जिनका पालन सभी धर्म जाति के लोग अपनी श्रद्धा अनुसार करते हैं। हिन्दू धर्म में हर त्योहार में प्रकृति के प्रेम की झलक दिखती है। हमारा गौरवशाली इतिहास न केवल हमें प्रकृति से प्रेम करना सीखाता है, बल्कि प्रकृति का संरक्षण करना भी जरूरी है। हमें यह भी बताता है। शिव ही प्रकृति है। प्रकृति नहीं तो जीवन नहीं। शिव प्रकृति के प्रेम का प्रतीक है। एक ऐसा प्रेम जो स्वार्थ से परे है। शिव जीवन है, तो प्रकृति आत्मा है और इसी आत्मा से परमात्मा के मिलन से ही सुन्दर रूप का साक्षी “सावन माह” है। सावन जिसमें प्रकृति अपने यौवन अवस्था में होती है। सारा संसार भक्तिमय हो जाता है। भक्ति का दूसरा रूप ही प्रेम है। शिव और शक्ति के मिलन का ही प्रतीक सावन है।

जिस तरह विरह की वेदना में तरसती प्रियतमा पर जब प्रेम रूपी वर्षा होती है तो उसका श्रंगार ही अलग होता है। मानो कस्तूरी मृग अपने प्रेम की खुशबू से प्रकृति को महका रही हो। पेंडो पर फूलों की बहार आ जाती है। प्रेमिका अपने प्रेमी से मिलन गीत गा रही होती है। सावन के झूले अपने मन के अन्दर चल रहे भावों को प्रकट करते है। लताएँ पेड़ो को अपने अन्दर समाहित करने को आतुर हो उठती हैं। भौरों की गुंजन ऐसे प्रतीत होती है मानो कोई प्रेमी अपने प्रेम का सन्देश अपनी प्रेमिका के लिए भेज रहा है।

वहीं भक्ति, प्रेम के रूप अलग-अलग हैं। एक भक्त अपनी भक्ति की शक्ति से अपने आराध्या के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करता है। एक प्रियतमा अपने प्रिय के प्रति अपने प्रेम को दर्शाती है। सावन इसी प्रेम का प्रतीक है। माँ शक्ति ने इसी पवित्र माह में अपनी भक्ति से भगवान को प्राप्त किया था। पौराणिक कथा के अनुसार सावन के महीने में ही समुद्र मन्थन किया गया था। समुद्र से प्राप्त रत्नों को देवताओं ने ग्रहण कर लिया। इस मन्थन से निकले विष को प्रकृति की रक्षा के लिए भगवान शिव ने धारण किया। भगवान शिव का त्याग अनुपम है। शिव योग और वैराग्य के देवता हैं। ब्रह्माजी सृष्टि के निर्माता है। विष्णुजी पालन करता और शिव सृष्टि के संहारक है। शिव से बड़ा कोई योगी नहीं है। शिव ही शक्ति है और शक्ति ही शिव है। भगवान महादेव ने इसीलिए अपना अर्धनारीश्वर रूप धारण किए हुए है। भगवान शिव ने ही यह बताया है कि किस तरह पुरुष के बिना नारी और नारी के बिना पुरुष अधूरा है ठीक उसी तरह जिस तरह प्रकृति के बिना मानव जीवन अधूरा है।

आधुनिकता की चकाचोन्ध ने भले मानव को अपनी संस्कृति अपने संस्कारो से दूर कर दिया हो। सावन के झूले अब दिखाई नही देते हो। घर में आंगन की परम्परा अब नही रही हो। आंगन के पेड़ों की जगह अब गगन को छूती इमारतें रह गई हैं। आधुनिकता की दौड़ में इंसान ने प्रकृति को नष्ट कर दिया है और प्रकृति के संग जीने की परम्परा थमती सी जा रही है। त्योहारों की रौनक फीकी हो गई है। अब सावन के झूले और झूलों पर गीत गाती महिलाएं सिर्फ यादों और कहानी किस्से में सिमट कर रही गई हैं। लेकिन ऐसा समय जरूर वापस आएगा जब ये सभी फ़िर से अपने वास्तविक स्वरूप में लौटकर आएंगे। ऐसा इसलिए भी क्योंकि कोरोना ने फ़िर से हाथ जोड़ना सीखा दिया। गले मिलने और हाथ मिलाने की परम्परा पश्चिम से आईं और फिर दूर भी जा रही।

ऐसे में जो कुछ वैज्ञानिकता के नज़दीक है। वह सनातन है और सनातन भारतीय संस्कृति में झूला झूलने की परम्परा वैदिक काल से ही चली आ रही थी। भगवान श्री कृष्ण राधा संग झूला झूलते और गोपियों के संग रास रचाते थे। झूला झूलना प्रकृति के प्रेम का प्रतीक होता है। आज पेंडो पर वे झूले अब दिखाई नही देते। महिलाओं की चूड़ी की खनक उनके गीतों की महक सुनाई नही देती है, और पेड़ की डाल पर पड़े झूले अब कहाँ दिखते हैं? पहले सावन आता था और बेटियाँ अपने ससुराल से मायके आ जाती थीं। अब वह प्रथा नही रही। सावन ने अपना रूप बदल लिया है। अब वास्तविक सावन बीती यादों का अहसास बनकर रह गया है। प्रकृति अपना रूप स्वयं सँवारती है और वह एक न एक दिन सावन को उसी रूप में लाने के लिए मनुष्य को मजबूर अवश्य करेगी

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लेखिका सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर स्वतन्त्र लेखन करती हैं। सम्पर्क sonaavilaad@gmail.com

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