शख्सियत

आजाद भारत के असली सितारे – 26

 

समाजवाद के सजग प्रहरी : जननायक कर्पूरी ठाकुर

1952 में बिहार विधान सभा का पहली बार चुनाव जीतने के बाद कभी चुनाव न हारने वाले,एक बार उपमुख्यमन्त्री, दो बार मुख्यमन्त्री बनने वाले और बाकी अधिकाँश समय विरोधी दल का नेता रहने वाले कर्पूरी ठाकुर (24.1.1924—27.2.1988) जब दिवंगत हुए तो उनके बैंक खाते में पाँच सौ रुपये से भी कम थे। उनके नाम से गाँव में केवल पुस्तैनी खपड़े का एक मकान था। उन्होंने अपने कार्यकाल में न तो कहीं कोई जमीन खरीदी और न मकान बनवाया।

मुख्यमन्त्री रहते हुए भी उनके पास अपनी गाड़ी नहीं थी और वे रिक्शे तथा अन्य सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करते थे। उनके निधन के बाद हेमवंतीनंदन बहुगुणा उनके गाँव गये थे और उनका घर देखकर रो पड़े थे।

कहा जाता है कि मुख्यमन्त्री बनने के बाद उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गये और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गये। उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिये और कहा, “जाइए, उस्तरा आदि ख़रीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरम्भ कीजिए।” पहली बार विधायक बनने के बाद यूगोस्लाविया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में उनका चयन हुआ। उनके पास कोट नहीं था तो एक दोस्त से कोट माँगा गया। वह भी फटा हुआ था। कर्पूरी ठाकुर वही कोट पहनकर चले गये। वहाँ यूगोस्लाविया में मार्शल टीटो ने देखा कि कर्पूरी जी का कोट फटा हुआ है, तो उन्हें नया कोट गिफ्ट किया गया।

वे जब पहली बार मुख्यमन्त्री बने तो अपने बेटे रामनाथ को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने सीख दी कि “तुम इससे प्रभावित मत होना। कोई लोभ लालच देगा, तो उस लोभ में मत आना। मेरी बदनामी होगी।”

जब बहुगुणा कर्पूरी ठाकुर की पुश्तैनी झोपड़ी देख कर रो पड़े थे- बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को याद करने का दिन - Forum4 1977 में जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमन्त्री थे, जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन में शामिल होने के लिए वे फटा कुर्ता ही पहनकर चले आए थे। उसमें चंद्रशेखर और नानाजी देशमुख जैसे नेता भी शामिल हुए थे। उनकी दशा देखकर चंद्रशेखर ने वहाँ उपस्थित नेताओं से मुख्यमन्त्री के कुर्ता-फंड में दान माँगा, लोगों ने कुछ न कुछ दिया। रुपये लेकर उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को थमाया और कहा कि, “इससे अपना कुर्ता-धोती ही खरीदिये। कोई दूसरा काम मत कीजिएगा।” चेहरे पर बिना कोई भाव लाए कर्पूरी ठाकुर ने कहा, “इसे मैं मुख्यमन्त्री राहत कोष में जमा करा दूंगा।”

      कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर (बिहार) के एक गाँव पितौझिया (संप्रति कर्पूरीग्राम) में नाई जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुल ठाकुर तथा माता का नाम रामदुलारी देवी था। इनके पिता गाँव के गरीब किसान थे तथा अपना पारंपरिक पेशा नाई का काम करते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ताजपुर के प्राथमिक विद्यालय और समस्तीपुर के बहुउद्देश्यीय तिरहुते एकैडमी उच्च विद्यालय से हुई। पितौझिया से समस्तीपुर की आठ किलोमीटर की दूरी वे पैदल जाकर तय करते थे। जब उन्होंने माध्यमिक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया तो उनके पिता अपनी खुशी बाँटने के लिए उन्हें अपने गाँव के जमींदार के पास ले गये और उनसे कहा कि,“सरकार, यह मेरा बेटा फर्स्ट डिवीजन पास हुआ है।” जमींदार ने यह सुनकर अपना पैर सामने की मेज पर रखते हुए कहा, “अच्छा, फर्स्ट डिवीजन पास हुए हो तो मेरा पाँव दबाओ।”

माध्यमिक के बाद कर्पूरी ठाकुर दरभंगा स्थित चंद्रधारी मिथिला कॉलेज में पढ़ने गये। उनके घर से कॉलेज की दूरी पंद्रह किलोमीटर थी। इसे भी उन्हें पैदल तय करना पड़ता था। आर्थिक परेशानियों के कारण पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्हें टुयूशन करना पड़ा। जब वे बी.ए. में पढ़ रहे थे, तभी सन् 42 के आन्दोलन में शामिल हो गये और आगे की पढ़ाई छूट गयी। 28 सितम्बर 1943 को उनकी पहली गिरफ्तारी हुई। वे 26 महीने जेल में रहे। वे अबतक कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ चुके थे और दरभंगा इकाई के सचिव बना दिये गये थे। वे 1947 तक इस पद पर रहे।

इसके बाद वे हिन्द किसान पंचायत की बिहार इकाई के महासचिव बने। 1948 में कर्पूरी ठाकुर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी छोड़कर नवगठित सोशलिस्ट पार्टी की बिहार शाखा के संयुक्त सचिव बने और इस पद पर ढाई साल रहे। सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में ही उन्होंने 1952 में पहली बार ताजपुर से चुनाव लड़ा और विधायक बने। उसके बाद कर्पूरी ठाकुर कभी कोई चुनाव नहीं हारे। 1964 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई और कर्पूरी ठाकुर उससे जुड़ गये।ब्रिटिश शासन के दौरान कृषक आन्दोलन Peasant Movement during the British rule | Vivace Panorama

तत्कालीन बिहार की राजनीतिक- सामाजिक परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए लेखक और राजनीतिक चिन्तक प्रेमकुमार मणि लिखते हैं, “उनका सूबा बिहार स्वाधीनता आन्दोलन के साथ अन्य कई तरह के आन्दोलनों का केन्द्र था। स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसानों का मुक्ति संघर्ष चल रहा था, तो पिछड़े वर्गों का ‘त्रिवेणी संघ’ अभियान भी जारी था। 1934 में पटना में ही जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गयी थी। 1939 में इस सूबे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना हो गयी थी। ऐसे में स्वाभाविक था, कर्पूरी जी वन्दे मातरम् छाप स्वाधीनता आन्दोलन से न जुड़कर, उद्देश्यपूर्ण समाजवादी समझ वाली आज़ादी की लड़ाई से जुड़े। उनके राजनैतिक संघर्ष का लक्ष्य समाजवादी समाज की स्थापना था।

आज़ादी के बाद सोशलिस्ट लोग कांग्रेस से अलग हो गये। कर्पूरी जी धीरे-धीरे समाजवादी पार्टी और आन्दोलन के प्रमुख नेता बने। 1952 में भारतीय गणतन्त्र के प्रथम आमचुनाव में ही वह समस्तीपुर के ताजपुर विधान सभा क्षेत्र से बिहार असेम्बली के लिए चुने गये। तब वह इकतीस साल के थे और संभवतः बिहार विधानसभा के सबसे युवा सदस्य थे। संसदीय कार्यकलापों में तो उनने दक्षता दिखलाई ही, समाजवादी आन्दोलन को ज़मीन पर उतारने का भी उनने भरसक प्रयास किया।

बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बाद बिहार में इस आन्दोलन को बचाये रखना और विकसित करना बहुत कठिन था। मुट्ठी भर लोगों को लेकर लोहिया प्रयोग अवश्य कर रहे थे, लेकिन बातें बन नहीं पा रही थीं। कर्पूरी ठाकुर लोहिया के साथ नहीं थे। 1964 में लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के एक धड़े जिसका नेतृत्व कर्पूरी जी कर रहे थे, का विलय हुआ और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी, जिसे संक्षेप में संसोपा कहा गया। यही वह समय था जब इस पार्टी ने नारा दिया – ‘संसोपा ने बाँधी गाँठ, पिछड़ा पावें सौ में साठ।’ समाजवादी राजनीति ने सामाजिक न्याय के एजेंडे को अपना लिया था। इसके साथ एक नयी समाजवादी राजनीति की शुरुआत हुई। लोहिया और कर्पूरी ठाकुर इसके दो सितारे थे।”

1967 में पहली बार बिहार सहित देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ। महामाया प्रसाद बिहार के मुख्यमन्त्री बने। उनके मंत्रिमंडल में कर्पूरी ठाकुर शिक्षा मन्त्री और उपमुख्यमन्त्री बने। कर्पूरी ठाकुर काफी समय से अनुभव कर रहे थे कि अंग्रेजी के नाते गाँवो और कस्बों के लड़के-लड़कियाँ बड़ी संख्या में परीक्षाओं में फेल हो रहे हैं। उनकी पढ़ाई के मार्ग में अंग्रेजी एक बड़ी बाधा बनी हुई थी। कर्पूरी ठाकुर ने माध्यमिक में अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त कर दी। यह बाधा दूर होते ही गाँवों के विद्यार्थी भी उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर होने लगे। Former CM of Bihar Jan Nayak Karpoori Thakur birth anniversary special story his book Kitna Sach Kitna Jhooth Karpoori Thakur or Kapti Thakur जननायक कर्पूरी ठाकुर जयंती: कर्पूरी ठाकुर और कपटी ठाकुर,

1970 में कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमन्त्री बने। यद्यपि उनका यह कार्यकाल सिर्फ 163 दिनों का था किन्तु अपने इस सीमित कार्यकाल में उन्होंने कई ऐतिहासिक फ़ैसले लिये। वे देश के पहले मुख्यमन्त्री थे, जिन्होंने अपने राज्य में सबके लिए माध्यमिक तक की शिक्षा मुफ्त कर दी। उनकी कोशिशों के चलते ही मिशनरी स्कूलों ने हिन्दी में पढ़ाना शुरू किया। उर्दू को उन्होंने दूसरी राजभाषा का दर्ज़ा दे दिया। किसानों को बड़ी राहत देते हुए उन्होंने गैर लाभकारी जमीन पर मालगुज़ारी खत्म कर दी। पाँच एकड़ तक जमीन वालों को इस सुविधा का लाभ मिला। मुख्यमन्त्री सचिवालय की इमारत की लिफ्ट चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के लिए भी सुलभ करा दी। राज्य के सभी विभागों में हिन्दी में काम करने को अनिवार्य बना दिया।

जब कर्पूरी ठाकुर 1977 में दूसरी बार मुख्यमन्त्री बने तो उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग के अनुरूप पिछड़ों और अति-पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए सरकारी आरक्षण का प्रावधान कर दिया। बिहार, इस तरह का आरक्षण लागू करने वाला देश का पहला प्रान्त बना। 11 नवम्बर 1978 को उन्होंने महिलाओं के लिए तीन (इसमें सभी जातियों की महिलाएँ शामिल थीं), ग़रीब सवर्णों के लिए तीन और पिछडों के लिए 20 फीसदी यानी कुल 26 फीसदी आरक्षण की घोषणा की।

 मुंगेरीलाल आयोग का गठन 1970 में तत्कालीन मुख्यमन्त्री दारोगा प्रसाद राय ने किया था। यह दिलचस्प बात है कि वे जब इसे लागू करने वाले थे तो भारतीय क्रांति दल के राष्ट्रीय नेता और भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह मुंगेरीलाल आयोग के आरक्षण के प्रावधानों को अक्षरशः लागू करने के खिलाफ थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बड़ी जनसंख्या वाली पिछड़ी जातियों ने कर्पूरी ठाकुर के इस कदम का विरोध किया था। लेकिन समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए चिंतित होने वाले कर्पूरी ठाकुर ने भारत में पहली बार पिछड़ों को दो भागों में विभाजित कर आरक्षण को लागू कर दिया।

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इसी समय भारत में अति-पिछड़ा वर्ग की नींव रखी गयी और उनके लिए आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया गया। हालाँकि, इसके लिए उन्हें आरक्षण विरोधियों का बहुत अधिक विरोध झेलना पड़ा। लोग उनकी माँ-बहन-बेटी-बहू का नाम लेकर भद्दी गालियाँ देते थे। किन्तु दलितों और गरीबों ने उन्हें अपने माथे पर बैठा लिया। इसके बाद वे 1984 के अलावा कभी चुनाव नहीं हारे।

कर्पूरी ठाकुर ने सत्ता प्राप्त करने के लिए चार सूत्रीय कार्यकम बनाया था।

(1) पिछड़ा वर्ग का ध्रुवीकरण

(2) हिन्दी का प्रचार प्रसार

(3) समाजवादी विचारधारा और

(4) कृषि का सही लाभ किसानों तक पहुँचाना।

उन्होंने आजीवन इनपर अमल किया और बिहार की जनता के चहेंते नेता बने रहे।

कर्पूरी ठाकुर का अपनी वाणी पर कठोर नियन्त्रण था। उनका भाषण, चिन्तनपरक, आडम्बरहीन और ओज से भरा हुआ होता था। प्रतिपक्ष पर चोट करने में वे माहिर थे। किन्तु वे किसी को अपमानित नहीं करते थे। उनमें हमेशा संयम बरकरार रहता था। विषम से विषम परिस्थितियों में भी शिष्टाचार और मर्यादा का उन्होंने कभी भी उलंघन नहीं किया। karpoori thakur birth anniversary: Nawal kishore rai article Bihar Former CM - जयंती विशेष: सामाजिक योद्धा थे कर्पूरी ठाकुर, चार दशक पहले ही दिया था महिलाओं, गरीब सवर्णों को ...

बिहार के इस पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमन्त्री ने अपने दो कार्यकाल में कुल मिलाकर सिर्फ ढाई साल के मुख्यमन्त्रीत्व काल में जिस तरह की छाप बिहार के समाज पर छोड़ी, उस तरह का कोई दूसरा उदाहरण कहीं दिखाई नहीं देता। प्रेमकुमार मणि के शब्दों में, “पूरे उत्तर भारत में कर्पूरी ठाकुर एक ऐसे समाजवादी नेता के रूप में याद किये जाते हैं, जिनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नही था। उनकी सादगी और ईमानदारी का लोहा उनके राजनीतिक विरोधी भी मानते थे। जो लोग राजसत्ता में होते हैं, मन्त्री-मुख्यमन्त्री बन जाते हैं, वे प्रायः जनता से दूर हो जाया करते हैं, लेकिन कर्पूरी ठाकुर अपवाद थे। वह हरदम भीड़ से घिरे होते थे। उन्हें भीड़ का आदमी कहा जाता था। आज जिस सामाजिक न्याय की चर्चा पूरे देश में हो रही है, उसे उत्तर भारत में विकसित करने का श्रेय कर्पूरी ठाकुर को जाता है।…….समाजवादी राजनीति और चेतना को बिहार जैसे अर्द्धसामंती और पिछड़े प्रान्त में उन्होंने जमीन पर उतारा। यह चुनौती भरा कार्य था। लेकिन इसे उन्होंने संभव बनाया था।…………..

जब भी वह सत्ता में आये अपनी ताकत का इस्तेमाल गरीब-गुरबों के लिए किया। किसान मज़दूरों के नज़रिये से राजनीति को देखा। ‘जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफ़ान रहेगा’ और ‘कमाने वाला खायेगा, लूटने वाला जायेगा’ जैसे नारे तब समाजवादी आन्दोलन के नारे होते थे। राजनीति की धुरी को मेहनतक़श तबकों पर केंद्रित करना ही समाजवादियों का लक्ष्य था। कम्युनिस्ट मेहनतक़शों की तानाशाही चाहते थे, समाजवादी उनका जनतन्त्र। दोनों का यही फर्क था। मेहनतक़श तबकों का अर्थ था दलित पिछड़ी जातियों के लोग।”

उनकी चिंता के केन्द्र में हमेशा गरीब, पिछड़े, अति पिछड़े और समाज के शोषित-पीड़ित-प्रताड़ित लोग रहे हैं। शायद यही वजह रही है कि उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए कर्पूरी ठाकुर ने सदैव लोकतांत्रिक प्रणालियों का सहारा लिया। मसलन, उन्होंने प्रश्न काल, ध्यानाकर्षण, शून्य काल, कार्य स्थगन, निवेदन, वाद-विवाद, संकल्प आदि सभी संसदीय विधानों-प्रावधानों का इस्तेमाल जनहित में किया। उनका मानना था कि लोकतन्त्र के मंदिर में ही जनता-जनार्दन से जुड़े अहम मुद्दों पर फैसले लिए जाएँ।

हालांकि प्रेमकुमार मणि के शब्दों में, “बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर पर दल-बदल करने और दबाव की राजनीति करने का आरोप भी ख़ूब लगाया जाता रहा है। उन पर ये आरोप भी लगता रहा कि वे राजनीतिक छल-कपट में सिद्धहस्त हैं, जातिगत समीकरणों को देखते हुए चुनावों में उम्मीदवार तय करने की उनकी भूमिका पर लोग सवाल उठाते रहे लेकिन कर्पूरी बिहार की परंपरागत व्यवस्था में करोड़ों वंचितों की आवाज़ बने रहे।”  कर्पूरी ठाकुर : एक राजनीतिक योद्धा जिसने अपमान का घूंट पीकर भी बदलाव की इबारत लिखी | BHARATIYA SAIN MAHASANGH

बिहार के युवा पत्रकार नवल किशोर कुमार लिखते हैं, “आखिर किस मिट्टी के बने थे, जननायक जिन पर विरोधियों के तीखे हमलों का भी असर नहीं होता था? वे अपने विचारों और फैसलों से डिगते नहीं थे। उनका जीवन कैसा था और किस माहौल से निकलकर वे बिहार की सत्ता के शीर्ष तक पहुँचे? यही जानने की इच्छा लिए मैं वर्ष 2016 में उनके गाँव पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) पहुँचा। उनके गाँव में ब्राह्मण-राजपूत जाति के लोग भी रहते हैं। कुछ तो उनके पड़ोसी भी हैं। गाँव में घुसने के बाद जब जननायक के घर के बारे में पूछा तो मालूम चला कि गाँव के आखिरी छोर पर उनका घर है जो कागजी तौर पर तो संग्रहालय है लेकिन वहाँ उनके परिजन रहते हैं। उनका घर पक्का का बन गया है। यह देख मुझे आश्चर्य हुआ। उनके पड़ोसियों ने बताया कि जबतक जननायक जिंदा थे, तबतक उनका यह घर कच्चा ही था। खपड़ैल का था।”

नवल किशोर कुमार आगे लिखते हैं, “उन्होंने (उनके बेटे रामनाथ ठाकुर) बताया कि वे अपनी बहन की शादी का जिक्र करना चाहते हैं। उनके मुताबिक, उनके पिता यानी जननायक तब मुख्यमन्त्री थे। बहन की शादी डा. रमेशचंद शर्मा से राँची में तय हुई थी। पहले यह तय हुआ था कि शादी देवघर मंदिर में होगी। लेकिन बाद में परिजनों का फैसला हुआ कि शादी गाँव से ही हो। पहले तो पिताजी (जननायक) ने इनकार किया, लेकिन बाद में मान गये।

शादी के पाँच दिन पहले वह पितौंझिया आए। सरकारी गाड़ी उन्होंने गाँव की बाहरी सीमा पर ही छोड़ दिया। अफसरों को भी खास निर्देश दे दिया कि जब तक शादी खत्म नहीं हो जाती है, तब तक कोई सरकारी अधिकारी गाँव में नजर नहीं आएंगे। उन्होंने बिहार सरकार के सरकारी हेलीकॉप्टर के उपयोग पर भी पाबन्दी लगा दी थी। उन्हें अहसास था कि उनके कबीना सहयोगी शादी में आ सकते हैं। यह सोचकर उन्होंने किसी को भी आमंत्रित नहीं किया था।

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रामनाथ ठाकुर के साथ उनके गाँव में घूमते हुए मुझे एक और बेचैन करने वाली जानकारी मिली। रामनाथ ठाकुर ने बताया कि जब पिताजी पहली बार सीएम बने थे तो उनके पिता को यानी मेरे दादाजी को इसी कोठी में (एक टूटे हुए बड़े मकान की ओर इशारा करते हुए) छड़ी से पीटा गया था। मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पिताजी के सीएम बनने की खुशी में बड़ी संख्या में आसपास के लोग उनके पैतृक घर आ गये थे। दादाजी सबकी आगवानी में लगे रह गये। इस कारण उन्हें एक स्थानीय सामंत के यहाँ जाने में देरी हो गयी। वे तब दाढ़ी-बाल बनाते थे। स्थानीय सामंत ने उन्हें (जननायक के पिता) को छड़ियों से पीटा। 

इस घटना की जानकारी पिताजी (जननायक) को मिली। वे गाँव आए। उनके आने की सूचना मिलते ही पुलिस ने सामंत की कोठी को घेर लिया था। सभी को लग रहा था कि स्थानीय सामंत को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। खूब भीड़ जुट चुकी थी। पिताजी (जननायक) आए तो उन्होंने स्थानीय सामंत से कहा कि मेरे पिताजी वृद्ध हो गये हैं। आप कहें तो मैं आपकी हजामत बना दूँ।”Abdul Bari Siddiqui found corona postive in Bihar | बिहार: RJD के दिग्गज नेता हुए कोविड पॉजिटिव, लोगों से की यह अपील...| Hindi News, बिहार एवं झारखंड

नवल किशोर कुमार ने कर्पूरी ठाकुर के घनिष्ठ मित्र अब्दुल बारी सिद्दिकी से उनके बारे में बातें कीं। अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कर्पूरी टाकुर के बारे मं बहुत सी जानकारी दी और उनसे जुड़ी वस्तुएँ दिखाईं। वे लिखते हैं, “वे जननायक के बारे में बताते जा रहे थे। आवश्यक बातें मैं नोट भी कर रहा था। वे अचानक रूके। उनके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गयी। कहने लगे – लिजीये, आपका काम इससे हो जाएगा। वह जननायक का पासबुक था। उसमें अंतिम इंट्री 1987 के अगस्त माह की थी। कुल जमा राशि पाँच सौ रुपए से कम।

जननायक कितनी सादगी से अपना जीवन जीते थे, इसका एक उदाहरण बताते हुए सिद्दीकी साहब ने कहा कि एक बार वे एक कार्यवश दिल्ली गये। साथ में सिद्दीकी साहब भी थे। दिन भर कई मीटिंग के बाद वे (सिद्दीकी साहब) थक गये। बिहार निवास पहुँचने के बाद उन्हें लगा कि अब जननायक आराम करेंगे। रात भी अधिक हो चुकी थी। सिद्दीकी जननायक के बिछावन पर लेट गये। लेटते ही उन्हें नींद आ गयी।

जब यह बात सिद्दीकी साहब बता रहे थे, उनकी आँखें नम हो गयीं। कहने लगे कि सुबह उठने पर देखा कि जननायक स्वयं फर्श पर सो रहे हैं।”

बिहार में भूमिसुधार तथा सबके लिए समान और अनिवार्य शिक्षा कर्पूरी ठाकुर की भावी परियोजनाएँ थीं। उन्होंने भूमिसुधार आयोग और कॉमन स्कूल सिस्टम के लिए भी आयोग गठित किया था और उनकी सिफारिशें भी आ गयी थीं। दुर्भागय से वे सिफारिशें आज भी ठंढे बस्ते में पड़ी हुई हैं। इन्हें लागू करने का साहस किसी के पास नहीं है।    दिल्ली-मुम्बई में फंसे बिहारी मजदूर आसानी से आ सकेंगे अपने गांव, मोदी सरकार ने आदेश किया जारी « Daily Bihar

आज की हालत यह है कि पंजाब हो या दिल्ली, मुंबई हो या सूरत, हर जगह सबसे अधिक बिहारी मजदूर ही काम करते दिखाई देते हैं। सबसे ज्यादा वे ही प्रताड़ित और उपेक्षित भी होते हैं। जबकि नालंदा, मगध, पाटलिपुत्र, वैशाली, बोधगया जैसी समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत बिहार की है। खेती के लिए उपयुक्त सर्वाधिक उर्वर भूमि बिहार की है। अनेक जीवनदायिनी नदियाँ बिहार में हैं।

मुझे लगता है कि बिहार में भूमि सुधार या सीलिंग का न होना इसका सबसे बड़ा कारण है। बिहार में सैकड़ों एकड़ भूमि के स्वामी मिल जाएंगे और इसीलिए असंख्य भूमिहीन भी। जबकि बगल के उत्तर प्रदेश में पाँच एकड़ से ज्यादा भूमि का मालिक किसान नहीं मिलेगा। सीलिंग के दौरान उनकी जमीन बहुत पहले अधिगृहित कर ली गयी। इसीलिए वहाँ भूमिहीन भी नहीं मिलेंगे। बंगाल में भी वाम मोर्चे की सरकार ने बहुत पहले भूमि सुधार का ऐतिहासिक कार्य कर लिया है।

अगर आज भी कर्पूरी ठाकुर की उक्त दोनो परिकल्पनाएँ बिहार में लागू हो जाएँ तो मेरा विश्वास है कि बिहार की गरीबी, जाति-भेद, असमानता, अशिक्षा और बेरोजगारी की समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।

कर्पूरी ठाकुर का निधन 64 साल की उम्र में 17 फरवरी 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हो गया था। हम जन्मदिन के अवसर पर जननायक कर्पूरी ठाकुर द्वारा गरीब व पिछड़ी जनता के हित में किए गये महान कार्यों का स्मरण करते हैं और उन्हे श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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