साहित्य

नेहरू मॉडल और एक श्रावणी दोपहरी की धूप (भाग-2)

 

  •       मृत्युंजय पाण्डेय

 

नेहरू मॉडल और एक श्रावणी दोपहरी की धूप (भाग-1)

 

रेणु की ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’ प्रेम कथा है। पंकज और झरना की प्रेम कहानी। उनके प्रेम भरे जीवन को कैसे शहरीकरण और औद्योगीकरण प्रभावित करता है, इसको रेणु ने बहुत बारीकी से दिखाया है। पंकज और झरना दोनों एक-दूसरे को शादी के पहले से जानते हैं। साथ-साथ सिनेमा देखे हैं, घूमे हैं। शादी के तीन वर्षों के बाद झरना को लगता है कि पंकज अब उससे पहले की तरह प्रेम नहीं करता। पहले वह हर बात का जवाब हँसकर देता था, लेकिन अब कभी-कभी वह झुझला जाता है। चिढ़ जाता है। प्रेम भरे दिनों को याद करती हुई वह सोचती है— “पहले, ऑफिस से लौटने के बाद, कम-से-कम पन्द्रह मिनट तक इस तरह अँकवार में जकड़े रहते थे मानो मुद्दत की खोई हुई चीज मिली हो। हर बात का जवाब चुम्बन से देते थे। दिन-भर परिश्रम करने के बावजूद, रात में देर तक जगे रहते, जगाते रहते। अब तो बिस्तर पर पड़ते ही कुम्भकरन की नींद उतर आती है, आँखों में। और, खुर्राटे की आवाज इधर इतनी कर्कश हो गयी है कि…” इस स्थिति से हम आए दिन दो-चार होते रहते हैं। हर घर की यह कहानी है। आखिर ऐसा क्यों होता है इसपर भी सोचने की जरूरत है। क्या वजह है कि पंकज और झरना के बीच से प्रेम गायब होता जा रहा है? क्यों वे पहले की तरह नहीं मिल रहे? क्या पंकज बदल गया है? क्या वह किसी और से प्रेम करने लगा है? ऐसे बहुत-से प्रश्न आपके मन में उठ सकते हैं। आपके सारे प्रश्नों के जवाब इसी कहानी में छिपे हुए हैं। पंकज ‘मेरी एण्ड मेरी’ नाम की एक पाइवेट कंपनी में नौकरी करता है। आजादी के बाद तरह-तरह की प्राइवेट कंपनियों का विकास हुआ। ये कंपनियाँ कम पैसे में अधिक-से-अधिक काम लेना चाहती हैं। इनको दस-बारह घण्टा देने के बाद हमें अपनों के लिए समय नहीं बचता। पंकज के साथ भी ऐसा ही था, लेकिन झरना इस बात को नहीं समझ पाती है। काम का बोझ और समय की कमी का परिणाम यह हुआ कि वह अपने ही घर में ‘पेन गेस्ट’ की तरह रहने लगा। उनके प्रेममय जीवन से प्रेम गायब होता गया।I Remember (Melukis cinta di saat senja) // SeoKyu | Autumn Tale's ...

      भरपूर समय न दे पाने की वजह से झरना पंकज पर शक करने लगती है। उसे लगता है कि पंकज उसकी उपेक्षा कर रहा है, जबकि अब भी लोग उसकी एक झलक पाने के लिए टकटकी लगाए रहते हैं। वह अपने महत्त्व और आकर्षण को जानने के लिए तरह-तरह के तिकरम करती है। वह चाहती है कि नीम की छाँव में बैठा हुआ युवक उसे देखे। इसीलिए न तो वह खिड़की बन्द करती है और न ही अपने कपड़े ठीक करती है। वह बिना किसी लज्जा या शर्म के युवक के सामने साड़ी पहनती है। उसे साड़ी पहनता हुआ देखकर युवक का चेहरा तेज ज्वर की तरह तमतमा जाता है। गली के बदमाश लड़के उसे लक्षित करके जो गीत गाते हैं उसे वह अच्छा लगता है। जो झरना कभी गाड़ीवाला दादा से बचती फिरती थी, आज वही उसे आवाज देकर घर में बुलाती है। उसके साथ, उसकी गाड़ी पर बैठकर घूमने जाती है।

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प्रेमचन्द के ‘रंगभूमि’ में जिस अपसंस्कृति की बात सूरदास करता है, वह अपसंस्कृति हमें रेणु की इस कहानी में भी देखने को मिलती है। शहरीकरण और औद्योगीकरण के बाद गाँव से लोग शहर की ओर पलायन किए। जगह-जगह से कई शहरों से मजदूर आकर बसे। अपने साथ ये अपनी संस्कृति और अपसंस्कृति दोनों लेकर आए। लाज-लिहाज का दायरा कम होता गया। आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता की ओर बढ़ने लगे। इस चीज को रेणु ने अच्छी तरह से दिखाया है। पंकज को जब कभी भी ऑफिस पहुँचने में देर होती है, उसका बॉस अभद्र भाषा में कहता है— ‘क्यों दास! ‘मार्निंग-शो’ में जाना हुआ था’। उसके मुहल्ले का हलवाई उसकी पत्नी झरना को देखकर ‘रसगुल्ला-रसगुल्ला’ चिल्लाता है। फलवाला का लड़का हाथ में संतरा लेकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता है— ‘चार आने जोड़ा, जोड़मजोड़ा—मीठा केंवला !!’ वहाँ के पुरुष ही नहीं औरतें भी कुछ अभद्र थीं। ये सारी चीजें झरना को विचलित करती हैं। इनसे बचने के लिए वे एक जगह से दूसरी जगह और दूसरी जगह से तीसरी और चौथी जगह भी जाते हैं। लेकिन कहीं भी इन कुप्रवृतियों से उन्हें निजात नहीं मिलता। अन्त में पंकज झरना के शिकायत पर ध्यान देना छोड़ देता है। वह कहता है— “मुहल्ला अच्छा हो, पड़ोसी अच्छे हों, गली के कुत्ते रात में शोर न मचाएँ, ऐसा घर कहाँ मिलेगा शहर में?”Children and staff of CBSE schools will wear Khadi clothes

      इस कहानी में इस बात के संकेत भी हैं कि खादी के कपड़ों की अब कोई कीमत नहीं रही। कपड़े से बर्तन बदलने वाला भी अब उसे लेना नहीं चाहता। गाँधी के सपनों पर कल-कारखाने दल बाँधकर उतर चुके हैं। उनके चरखे का संगीत लोग भूल चुके हैं। गाँधी जिस मानवीयता और मानवीय मूल्यों की बात किया करते थे, वे सभी इन कारखानों की आवाज में कहीं दब गयी हैं। शहर की गलियों में खो गयी हैं। इस कहानी में इसका भी हल्का-सा संकेत है कि शहर के भीड़ में हम अपने लोगों को खोते जा रहे हैं, शायद खुद भी खोते जा रहे हैं। गाँधी मैदान के भीड़ में झरना को कुछ समय के लिए लगता है, उसका पंकज खो गया है। यहाँ पंकज का खोना किसी व्यक्ति का खोना नहीं है, बल्कि उस प्रेम का खोना है, जो उनमें है। उस विश्वास और भरोसे का गुम होना है जिसे वे खोते जा रहे हैं। आज जो हम शहरीकरण का दुख रो रहे हैं, वह हमारा खुद का चुना हुआ दुख है। यदि समय रहते गाँधी के मॉडल को हमने आजमाया रहता तो शायद यह स्थिति उत्पन्न न हुई होती। गाँधी जी का मानना था कि “आजाद भारत दुख से कराहती हुई दुनिया के प्रति अपने कर्तव्य का ऋण अपने गाँव का विकास करके ही चुका सकता है।” गाँवों का विकास न होने के कारण ही आज किसान आत्महत्या कर रहे हैं। गाँव उजड़ रहे हैं। लोग बिखर रहे हैं। यदि गाँवों का सही समय से विकास हुआ रहता तो आज ‘कोरोना’ के चलते लाखों मजदूरों की यह दशा न होती। आंबेडकर ने कहा था ‘शहर की ओर चलो’। लेकिन आज मुसीबत की घड़ी में यही शहर उन्हें स्वीकार नहीं कर रहा। अपना काम निकल जाने के बाद उन्हें ‘चूसे हुए आम की तरह’ फेंक देता है। गाँव छोड़कर भागने से कुछ बदलने वाला नहीं है, जरूरत है गाँव को बदलने की। उसके विकास की। जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। पर दुख के क्षण में, मुसीबत के समय यही गाँव उन्हें आश्रय दे रहा है। अन्त में यहीं लौटना है।

नेहरू मॉडल और एक श्रावणी दोपहरी की धूप (भाग-3)

लेखक देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित युवा आलोचक एवं सुरेन्द्रनाथ कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं।  

सम्पर्क- +919681510596, pmrityunjayasha@gmail.com   

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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