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हिन्दी लेखन में पञ्चामक्षर के अर्धस्वरूप की उपेक्षा

 

हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि की वर्तनी सम्बन्धी विभिन्न पहलुओं को लेकर 19वीं सदी के अन्तिम चरण से ही भगीरथ प्रयास शुरू हो गये थे। विभिन्न भाषाविदों, विद्वत समूहों ने इसके लिए श्रमसाध्य प्रयास किये और वर्तनी सम्बन्धी अनेक सुझाव आये, जिन पर यथासाध्य व्यावहारिक प्रयोग भी किये गये। इसी तारतम्य में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने 2003 ईस्वी में देवनागरी लिपि एवं हिन्दी वर्तनी के मानकीकरण के लिए अखिल भारतीय संगोष्ठी का आयोजन करके 2012 ईस्वी में मानकीकरण का एक रूप स्थिर किया और पूरे देश के हिन्दी लेखन के लिए सर्वमान्य बनाने हेतु दिशा निर्देश जारी किये।

इसी दिशा निर्देश में हिन्दी व्यञ्जन वर्ग के पञ्चमाक्षरों ( ङ, ञ, ण, न एवं म) के अर्धस्वरूप के लिए अनुस्वार (ं) के प्रयोग को मानकीकृत किया गया तथा एनसीईआरटी द्वारा छपी पुस्तकों में इसी मानक रूप को अपनाया गया। जबकि स्वभावतः इन पुस्तकों के कई स्थलों पर पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूप अपनी पहचान का संकेत देते रहे।

पण्डित किशोरी दास वाजपेयी के अनुसार “पञ्चमाक्षर अनुनासिक अल्पप्राण ध्वनि है। हिन्दी के रूप गठन में ङ, ञ एवं ण – वर्णों का कोई योग नहीं है। जो मिठास ‘न’ और ‘म’ में है, वह इन तीनों में नहीं है। इसलिए हिन्दी ने ‘न’ और ‘म’ को ही अपनाया है। संस्कृत तद्रूप शब्द जो हिन्दी में प्रयुक्त होते हैं उनमें वाङ्मय, चाञ्चल्य, पाण्डित्य आदि हैं। अनुस्वार का स्थान भी नासिका है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘म’ और प्रायः ‘न’ कभी-कभी अनुस्वार हुआ करता है। यही नासिका सहयोग का कारण है कि अनुस्वार लगने से भी स्वर-व्यञ्जन मधुर ध्वनि देने लगते हैं।”

बावजूद इसके हिन्दी के प्रबुद्ध वर्ग ने पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूपों को अनुस्वार के रूप में लिखना स्वीकार नहीं किया और अनवरत इसका प्रयोग करते रहे। किन्तु केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के निर्देश से विद्यालय से लेकर छापेखाने तक में पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूप की जगह अनुस्वार का प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा और कम्प्यूटर की नयी तकनीक के बावजूद सरलता-सुगमता के नाम पर अनुस्वार के प्रयोग को मान्यता मिलने लग गयी। फिर भी, पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूप के प्रयोग का मोह छूटा नहीं, खिचड़ी रूप में चलता रहा। मैंने अध्यापन के दौरान एक ही पाठ के एक ही अनुच्छेद में परंतु-परन्तु , किंतु-किन्तु, पांडित्य- पाण्डित्य आदि का लेखन देखा है। कहीं ‘हिंदी’ और कहीं ‘हिन्दी’ का प्रयोग तो आम है, जबकि एनसीईआरटी की पुस्तकों में अनुस्वार का प्रयोग सजग होकर किया गया है।

जैसा कि किशोरी दास वाजपेयी ने केवल ‘न’ एवं ‘म’ को अपनाने का तर्क दिया है, उसके अनुसार तथा उसके पहले से भी प्रयोग प्रवाह के रूप में तवर्ग तथा पवर्ग के पहले उसी वर्ग के नासिक्य व्यञ्जन ‘न’ तथा ‘म’ के अर्धस्वरूप के प्रयोग की परम्परा अनवरत रही है। डा. महावीर सरन जैन ने भी स्वीकारा है कि हिन्दी में परम्परागत दृष्टि से तवर्ग एवं पवर्ग के पूर्व नासिक्य व्यञ्जन से लिखने की प्रथा रही है। सिद्धान्ततः उपर्युक्त स्थितियों में दोनों प्रकार से लिखा जा सकता है। मगर कुछ शब्दों में नासिक्य व्यञ्जन के प्रयोग का चलन अधिक हो रहा है। उदाहरण के लिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के दशकों तक मार्गदर्शक डा. नगेन्द्र अपने नाम को ‘नगेंद्र’ न लिखकर ‘नगेन्द्र ‘ ही लिखते रहे। विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग के नामपट्ट में भी ‘हिंदी’ के रूप का नहीं अपितु ‘हिन्दी ‘ रूप का ही चलन रहा है।”

वस्तुतः अनुस्वार एक अलग व्यञ्जन वर्ण है। इसका उच्चारण अर्धस्वर(य, व), ऊष्म(श, ष, स) और ‘ह’ से पूर्व नासिक्य ध्वनि को बताने के लिए होता है, जबकि पञ्चमाक्षर अनुनासिक अल्पप्राण ध्वनि है।इसलिए अनुस्वार को इनका स्थानापन्न बनाकर प्रयोग करना उचित नहीं है। फिर भी, चूँकि संस्कृत में अनुस्वार तथा पञ्चमाक्षर का विकल्प से प्रयोग की प्रथा पाणिनि के नियम के प्रतिकूल चली थी, इसलिए हिन्दी में भी टंकण की सुगमता की आड़ में इस पद्धति को अपनाया जाने लगा। परन्तु टंकण की जिन समस्याओं का हवाला देकर अनुस्वार के प्रयोग की वकालत की गयी थी, वहाँ भी छपाई के बाद गलतियाँ समझ में आ जाती थीं क्योंकि लेखन तथा छपाई में अनुस्वार की बिन्दी छूट जाने, मिट जाने या वर्णों के नीचे गिर जाने के कारण अर्थ का अनर्थ होता रहता था। मतलब यह कि छपाई, टंकण आदि की दिक्कतों की आड़ में भी पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूप के प्रयोग को नकारा नहीं जा सकता। जबकि अब तो कम्प्यूटर ने सारी शिकायतें दूर कर दी हैं।

डा. कामेश्वर शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘ हिन्दी की समस्याएँ’ में लिखा है “हिन्दी में अनुनासिक ध्वनियों के प्रयोग की वैसे भी बहुत प्रवृत्ति है, इस कारण भी यदि वर्तनी में बिन्दुओं का प्रयोग कम किया जा सके तो सुविधाजनक होगा।” हिन्दी में तकनीकी टंकण यन्त्रों की समस्याओं से निजात पाने के लिए पञ्चमाक्षरों के अर्धस्वरूप का स्थानापन्न बिन्दु को बनाने का सुझाव तात्कालिक रूप में दिया गया था, किन्तु यह धीरे-धीरे सुगमता के नाम पर प्रचलित होने लगा और बिन्दु के प्रयोग की वरीयता दी जाने लगी और आगे चलकर जब केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने मानक रूप दे दिया तब तो इस ‘बिन्दी’ ने ऐसा कमाल कर दिखाया कि चन्द्रबिन्दु (ँ) को भी अपने में समाहित कर लिया और लिखने में लोग एवं छापेखाने भी चन्द्रबिन्दु की जगह बिन्दु का प्रयोग साधिकार करने लग गये। परन्तु ऐसा नहीं है कि पञ्चमाक्षरों का प्रयोग वर्जित किया गया था या पञ्चमाक्षर की जगह अनुस्वार के प्रयोग को अधिक शुद्ध माना गया था। यह केवल एकरूपता और मानकता को ध्यान में रख कर किया गया था। लेकिन डा. हरदेव बाहरी का यह कथन एक चेतावनी जैसा है -” एक बात और -मानकीकरण से एकरूपता तो आती है, परन्तु लिपि और उसके साथ भाषा का प्रवाह रुक जाता है। शैलीगत स्वतन्त्रता नहीं रह जाती है।”

डा. महावीर सरन जैन ने भी इस पर चिन्ता जताते हुए लिखा है -“केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा प्रकाशित ‘ देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ शीर्षक पुस्तिका में अनेक विरोध हैं। हिन्दी जगत में ‘हिन्दी’ तथा ‘हिंदी ‘ दोनों रूप मान्य रहे हैं। निदेशालय ने नियम बना दिया है कि केवल अनुस्वार का ही प्रयोग किया जाय। जो रूप सैकड़ों सालों से प्रचलित रहे हैं, उनको कोई व्यक्ति या संस्था अमानक नहीं ठहरा सकती। किसी भाषा का कोई वैयाकरण अपनी ओर से नियम नहीं बना सकता। उस भाषा का शिष्ट समाज जिस रूप में भाषा का प्रयोग करता है, उसको आधार बनाकर भाषा के व्याकरण के नियमों का निर्धारण करता है।”

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ऐसी स्थिति में कुछ भाषाविदों ने मध्यम मार्ग अपनाते हुए ये सुझाव दिये हैं–

(क) कवर्ग के ङ का प्रयोग- विशिष्ट ध्वन्यात्मक उच्चारणों को छोड़कर इसके लिए अनुस्वार का प्रयोग किया जा सकता है। विशिष्ट ध्वन्यात्मक शब्द हैं- पराङ्मुख, वाङ्मय।
(ख) चवर्ग के ञ का प्रयोग – ञ का प्रयोग चलन में न होने के कारण इसकी जगह अनुस्वार का प्रयोग किया जा सकता है।
(ग) टवर्ग के ण का प्रयोग – अगर हम ण की जगह अनुस्वार का प्रयोग (खंडन, तांडव, पंडित, कंठ आदि) करते हैं तो पुण्य, कण्व, विषण्ण जैसे शब्दों के लिए अनुस्वार का प्रयोग कैसे करेंगे? इसीलिए ण के सम्बन्ध में वाजपेयीजी ने ‘संस्कृत के तद्रूप ‘ का उल्लेख किया था। इसलिए भाषाविदों का मानना है कि ‘ङ’ एवं ‘ञ’ का प्रयोग सामान्यतः अन्य वर्णों के साथ भी अर्धस्वरूप में नहीं होता है तो इन दोनों की जगह अनुस्वार का प्रयोग तर्कसम्मत है, किन्तु जब ‘पुण्य’ आदि में ‘ण’ के अर्धस्वरूप का प्रयोग हम करते ही हैं तो खण्डन, पण्डित आदि में क्यों नहीं ?
(ध) तवर्ग के न का प्रयोग – ‘न’ के अर्धस्वरूप का प्रयोग हिन्दी में अन्य वर्णों के साथ होता ही है तो अपने ही वर्ग के साथ प्रयुक्त होने पर अनुस्वार के प्रयोग का हठ तार्किक नहीं है।
(ङ) पवर्ग के म का प्रयोग- ‘म’ का प्रयोग भी अन्य वर्णों के साथ अर्धस्वरूप में होता है तो अपने ही वर्ग के साथ अनुस्वार का प्रयोग युक्तिहीन है।

कुछ भाषाविद यह भी मानते हैं कि संस्कृत की सन्धि है ‘परसवर्ण सन्धि’ जो हिन्दी में स्वीकार्य है। पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी’ में लिखा है -” अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।”इसका मतलब यह है कि किसी पद अथवा शब्द के बीच में यदि अनुस्वार आता है और उसके बाद यदि कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग एवं पवर्ग का कोई वर्ण हो तो वह अनुस्वार अपने वर्ण के सवर्गीय अनुनासिक वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। कुछ भाषाविद उपर्युक्त नियम का कोई विकल्प स्वीकार नहीं करते एवं इसे अनिवार्य रूप से लागू होनेवाला नियम स्वीकारते हैं।

उमेश पाण्डेय तो पाँचों वर्णों के प्रयोग की अनिवार्यता बताते हुए लिखते हैं -” हिन्दी भाषा में पञ्चमाक्षर के स्थान पर हर जगह अनुस्वार का प्रयोग मजबूरी में किया गया था और नाम दिया गया था सरलीकरण का। पञ्चमाक्षर पद्धति वाला हिन्दी शुद्ध रूप है। अनुस्वार पद्धति वाला हिन्दी तो प्रमाद वाला रूप है(इसी तरह अन्य में भी)। इसलिए लिखते समय पञ्चमाक्षर को व्यवहार में लाइए अर्थात पञ्चम वर्ग में बिन्दी की जगह पञ्चम वर्ण यानि ङ, ञ, ण, न एवं म का प्रयोग कर हिन्दी भाषा को मौलिकता प्रदान करना ही हिन्दी के लिए हितकर होगा।” इसके लिए पाण्डेय जी ने ‘ उमेश- इन्सिकृप्ट’ भी बनाया हुआ है।

इसलिए केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने जब ये निर्देश दिया है कि पञ्चमाक्षर के बाद आने वाले अन्य वर्ग के वर्ण के साथ अनुस्वार का प्रयोग नहीं होगा। अर्थात चिन्मय, अन्य, उन्मुख की जगह चिंमय, अंय या उंमुख प्रयुक्त नहीं होगा तो एकरूपता कैसी? इसी तरह, निर्देश में यह भी कहा गया है कि पञ्चम वर्ण द्वित्व रूप में आएगा तो अनुस्वार का प्रयोग नहीं होगा। अतः, अन्न, सम्मेलन, सम्मति की जगह अंन, संमेलन या संमति रूप ग्राह्य नहीं होगा तो एकरूपता कैसी और इससे टंकन में क्या सुविधा आ जाएगी? इसलिए कुछ भाषाविदों ने ऐसे ‘एकरूपता’ को परस्पर विरोधी भी बताया है।

अब चन्द्रबिन्दु (ँ) पर थोड़ी चर्चा कर लें। चन्द्रबिन्दु अनुनासिक स्वर ध्वनि है जिसे अनुस्वार की तरह बदला नहीं जा सकता, जबकि अनुस्वार को पञ्चमाक्षरों में बदला जा सकता है। मतलब कि अनुस्वार से ध्वनि-भेद को स्पष्ट करने के लिए चन्द्रबिन्दु का प्रयोग यथास्थान अवश्य करना चाहिए। लेकिन, जैसे पञ्चमाक्षर की जगह अनुस्वार के बिन्दु का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है, उसी तरह अब चन्द्रबिन्दु की जगह बिन्दु के प्रयोग का चलन भी बढ़ता जा रहा है। अब माँग की जगह मांग और गाँधीजी की जगह गांधीजी का प्रयोग निर्बाध रूप से हो रहा है, जो चिन्तनीय है। यहाँ आश्चर्य की बात यह है कि हिन्दी निदेशालय ने निर्देश दिया है कि हिन्दी के शब्दों में उचित ढंग से चन्द्रबिन्दु का प्रयोग अनिवार्य होगा ;बावजूद इसके हमने और छापेखानों ने चन्द्रबिन्दु की उपेक्षा कर केवल बिन्दु का प्रयोग करना शुरू कर दिया! यहाँ अनुस्वार वाली एकरूपता तो ग्राह्य हो गयी, किन्तु चन्द्रबिन्दु वाली अनिवार्यता छोड़ कैसे दी?

Sarairasi Youth: बिंदु ( अनुस्वार ) का प्रयोग , पंचमाक्षर

जबकि उच्चारण की दृष्टि से अनुस्वार एवं चन्द्रबिन्दु में ध्वन्यात्मक अन्तर स्पष्ट परिलक्षित होता है और यह रहना भी चाहिए। अर्थ की स्पष्टता के लिए भी यह अत्यावश्यक है – संवार-सँवार, अंचल- आँचल, चन्द्र -चाँद-चाँदनी, हंस-हँस आदि। इसलिए अनुस्वार एवं चन्द्रबिन्दु के प्रयोग में सावधानी रखनी चाहिए और प्रयोग में शिथिलता नहीं होनी चाहिए।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी लेखन में अर्धस्वर , ऊष्म एवं ‘ह’ के अलावा कवर्ग, चवर्ग के नासिक्य के स्थान पर अनुस्वार के प्रयोग की छूट देनी चाहिए। किन्तु टवर्ग, तवर्ग एवं पवर्ग के लिए अनुस्वार का प्रयोग नहीं होना चाहिए।

अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी शब्दों में उच्चारण के अनुसार वर्गों के पञ्चम वर्ण का प्रयोग किया जा सकता है – सेन्ट, पेन्टर, सेन्टर आदि। ऐसे शब्दों को सेण्ट, पेण्टर, सेण्टर आदि की तरह लिखने की आवश्यकता नहीं है।

चन्द्रबिन्दु का प्रयोग सुविधा की दृष्टि से स्वरों में – अ, आ, उ, ऊ के साथ होना चाहिए, किन्तु जिन स्वरों के ऊपर मात्राएँ लगती हैं, उनके साथ बिन्दु का प्रयोग ही यौक्तिक है, जैसे- साईं, नहीं आदि। इसे ऐसे नहीं लिखना चाहिए – साईँ, नहीँ।

इस तरह कुछ समस्याओं को नजर अन्दाज करने या सरलीकरण की दुहाई देकर वर्षों से शिष्ट समाज द्वारा प्रचलित लिपि के रूप को विद्रूप करना मेरे विचार से अनावश्यक और भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से अनुकूल नहीं है। डा. हरदेव बाहरी ने लिखा है -“परन्तु याद रहे कि ‘समस्या ‘ नाम की समस्या बनी ही रहती है, और जिसे हम समस्या कहते हैं, वह एक कल्पित और मनगढ़न्त विचार हैं। कहते हैं कि नागरी लिपि में पाँच-छः अक्षर दो-दो तरह से लिखे जा रहे हैं, जबकि अंग्रेजी में दस-बारह अक्षर तीन-तीन तरह से लिखे जा रहे हैं।”

अंग्रेजी के अलावा रूसी, फ्रांसीसी आदि दुनिया की समृद्ध भाषाओं में भी बहुत से ऐसे शब्द हैं, जिनमें कई वर्णों का प्रयोग लिखने में होता है, लेकिन उच्चारण में नहीं। किन्तु क्या इन भाषाओं के उन शब्दों को उच्चारण के अनुसार बदला गया? क्या क्नालेज, जद्रावस्तवुईते, बोन्जुअर आदि को लेखन के स्तर पर नालेज, जद्रासवुई, बोजूँ- में बदला गया? तो हम अपनी भाषा हिन्दी में ऐसा क्यों करें? क्या लिपि में परिवर्तन हम बार-बार करते रहें? यह सही है कि दुनिया की किसी भी भाषा में बहुत से ऐसे शब्द हैं, जिनका लेखन उच्चारण से भिन्न होता है क्योंकि उच्चारण में वैविध्य मौखिक भाषा का स्वभाव होता है और इसके आधार पर हम मानकता की दुहाई देकर हड़बड़ी में लेखन में परिवर्तन नहीं कर सकते। हिन्दी के बहुतेरे शब्द देश के ही अन्य भाषा-भाषियों द्वारा भिन्न-भिन्न उच्चारणों के रूप में व्यवहृत होते हैं तो क्या एकरूपता के नाम पर हम लेखन का रूप बदलते जायें? यह संभव नहीं है।

और, आज कम्प्यूटर के युग में सब सम्भव है। थोडा़ धीरज से काम लें तो हम पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूप के प्रयोग को अपनी आदत में शुमार कर सकते हैं। आज मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता को कोलकाता और बम्बई को मुम्बई कह ही रहे हैं। यह तो अपने अभ्यास पर निर्भर है। इसलिए मेरा निवेदन है कि पञ्चमाक्षर के अर्धस्वरूप की जगह अनुस्वार का प्रयोग न करके यथाशक्य उसी वर्ण का प्रयोग करें जिस वर्ण के वर्ग का वह पञ्चमाक्षर है।

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