भाषा

हिन्दी और हमारा समय

 

हिन्दी लेखक पाठक और समाज के बीच क्या किसी अन्तःसूत्र की तलाश की जा सकती है? क्या पिछले डेढ़ सौ वर्षों में हिन्दी समाज और हिन्दी साहित्य के बीच के सम्बन्ध शिथिल जान पड़ते हैं? अगर ऐसा है तो सचमुच इस पर विचार किया जाना चाहिए कि यह सम्बन्ध कब जीवन्त था और वह क्योंकर शिथिल होता गया। हिन्दी समाज और हिन्दी की संस्कृति के बीच एक गतिरोध जान पड़ता है। अगर यह बात गाहे-बगाहे की जाती है, कि हिन्दी में लिखी किसी साहित्यिक पुस्तक के एक संस्करण में मात्र तीन सौ प्रतियाँ प्रकाशित हो रही हैं और अमूमन प्रकाशक उन प्रतियों के भी नहीं बिकने की बात कह रहे हैं तो यह क्या समाज के किसी गहरे संकट की तरफ इशारा नहीं करता?

दूसरी तरफ हम हिन्दी के विषय में इस बात को आत्म-श्लाघा की पराकाष्ठा की तरह प्रचारित करते रहते हैं, कि यह विश्व की सबसे बड़ी आबादी तक़रीबन अस्सी करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। यह तो स्पष्ट ही है कि इस अस्सी करोड़ में तीन सौ की इस संख्या का कोई अर्थ नहीं। यानी हिन्दी का पाठक, हिन्दी साहित्य का पाठक नहीं है। इसका यह भी अर्थ हुआ कि हिन्दी समाज वर्तमान साहित्यिक-सांस्कृतिक बोध से रिक्त है या हिन्दी लेखकों का वर्तमान और हिन्दी पाठक के वर्तमान के बीच एक गहरी खाई है? हम चाहे लाख दावें कर लें हमारा लेखन हमारे किसी मूर्त पाठक तक नहीं जाता? इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि हिन्दी समाज संस्कृति-विहीन समाज है। इसका बस यह अर्थ है कि हिन्दी समाज समकालीन हिन्दी साहित्य-विहीन है। हिन्दी में समानान्तर संस्कृति-समय व्याप्त है, और वही परिलक्षित होता रहता है- एक हिन्दी समाज का और दूसरा हिन्दी लेखक का। दोनों दो भिन्न वर्तमान को सम्बोध्य हैं। 

अन्य भारतीय भाषाओँ में- मसलन बांग्ला, मराठी या मलयालम में भी यही स्थिति है –कहना सही नहीं लगता। भारतीय समाज और भारतीय संस्कृति की कोई सतत प्रवाहमान, अटूट या विश्रृंखलित धारणा है- यह वास्तविक कम और मनोगत या पूर्वाग्रहों से ग्रस्त धारणा ही प्रतीत होती है। समाज और संस्कृति का विलगाव, वस्तुतः सामाजिक बोध के बिखराव को दर्शाता है। और यह बिखराव हिन्दी समाज में सर्वाधिक है। ऐसा क्यों हुआ? अपनी मान्यताओं और पूर्वाग्रहों से किंचित मुक्त होते हुए -एक समाज के रूप में, एक संस्कृति के रूप में हम यहाँ क्यों पहुँच गये इस पर गम्भीरता से विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। 

अँग्रेज औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् आये। औद्योगिक क्रान्ति ने न सिर्फ वहाँ के समाज की आर्थिक-सामाजिक दशा को रूपांतरित कर दिया, बल्कि व्यक्ति और समाज के अन्तर्संबन्धों को भी बदल दिया। सांस्कृतिक रूपाकारों में भी परिवर्तन हुआ। गद्य साहित्य का आरम्भ हुआ। उपन्यास विधा का जन्म हुआ। यूरोपीय साहित्य में जब उपन्यास जैसी विधा साकार हुई तो उसके पीछे प्रबोधन के मूल्य और औद्योगिक क्रान्ति जनित सांस्कृतिक सामाजिक बोध की भूमिका थी। 

हिन्दी और हमारा समय

खड़ी बोली में जिस आधुनिक लेखन की शुरुवात हुई, वह औपनिवेशिक दासता के परिणामस्वरूप आकार लेती है। वहाँ प्रबोधन के मूल्यों को अभी आकार लेना था, अपना रास्ता ढूँढना था। एक अपरिपक्व सामाजिक सांस्कृतिक वातावरण में, एक संक्रमणकालीन सांस्कृतिक सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश में गद्य साहित्य ने खड़ी बोली में खुद को ढालना शुरू किया। उपन्यास की कोई भारतीय परिकल्पना नहीं थी। उसका एकमात्र उद्देश्य मनोरंजन था। खड़ी बोली उस तरह जन भावनाओं या जन आकाँक्षाओं की वाहक न थी, जैसा ब्रज या अवधि में था। इसलिए लम्बे समय तक जनता के साहित्यिक बोध की अभिव्यक्ति का माध्यम खड़ी बोली न थी। भक्तिकाल के कवियों की कविताओं या बिहारी के दोहे लोगों की स्मृति में मौजूद थे। खड़ी बोली का साहित्य जन स्मृतियों में जगह बनाने में असफल रहा।

धीरे-धीरे उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक वातावरण, एक दृष्टिकोण समाज में विकसित होने लगा। खड़ी बोली के साहित्य में इसकी अभिव्यक्ति होती थी। सरस्वती जैसी पत्रिकाएँ इसमें ऐतिहासिक भूमिका अदा कर रही थीं। बावजूद इसके खड़ी बोली सामाजिक सांस्कृतिक बोध की, जनचेतना या जन भावनाओं को प्रभावित नहीं कर सकी। एक पढ़े लिखे या उपनिवेशवादी शिक्षा पद्धति से निर्मित मानस तक ही खड़ी बोली के साहित्य की पहुँच थी। आमजन मानस का साहित्यिक संस्कार और अभिरुचि लोकभाषा क्षेत्र में ही बनी रही। वह मौखिक और लिखित के बीच की किसी जगह में अपनी भूमिका निर्धारित कर रहा था। भिखारी ठाकुर का साहित्य इसका प्रमाण है। उत्तरोत्तर खड़ी बोली के साहित्य में, बीसवीं शताब्दी में जो सामाजिक बोध आया- वह इतना अधिक उद्देश्यपूर्ण और यांत्रिक था कि उसने साहित्यिक संवेदनाओं को ख़ारिज ही कर दिया।

दूसरी तरफ छायावाद जैसी काव्य प्रवृति ने संवेदना के सूक्ष्मीकरण के नाम पर संवेदनात्मक विलगाव को और बढ़ा दिया। जनता का काव्यबोध और कवियों के काव्यबोध में जो फांक छायावाद के दौर से शुरू हुई वह आज भी मौजूद है। उपन्यास में मौजूद कथा-तत्त्व इतने अधिक उद्देश्यपरक हो चलें कि जीवन दृष्टि की व्यापकता का उसमें कोई महत्त्व ही नहीं रह गया।

आज़ादी के बाद एक कृत्रिम हिन्दी समाज, हिन्दी प्रदेश (डॉ. रामविलास शर्मा) बनाने की कोशिश होने लगी। उसकी व्याप्ति को मान लिया गया। यह तभी सम्भव था, जब खड़ी बोली की केन्द्रीयता को स्वतः स्फूर्त तरीके से स्वीकार कर लिया जाए। आज़ादी के उपरान्त यह देखा जा सकता है कि देसी भाषाओँ के अस्तित्व को नकारने की कोशिश होती रही। भाषा और बोली के कृत्रिम विवाद को हिन्दी प्रदेश में इसलिए लाया गया ताकि हिन्दी प्रदेश की अवधारणा को मूर्त किया जा सके। प्रश्न यह है कि जिसे हम हिन्दी प्रदेश कहते हैं क्या वह कोई सामाजिक राजनीतिक या सांस्कृतिक इकाई है? क्या वह किसी अर्थ में समग्रता को, सामाजिकता को अभिव्यक्त करता है?

आधुनिक हिन्दी

दिल्ली या आसपास के समाज को हिन्दी प्रदेश के केन्द्र के तौर पर देखें तो हम देख सकते हैं कि विभिन्न संस्थाओं का, स्कूल-कॉलेजों का, सांस्कृतिक समितियों का, अकादमियों का, जन अभिरुचि के क्षेत्रों का, कला प्रदर्शन केन्द्रों का निर्माण इस तरह से हुआ कि विविध भाषा समाज के लोग वहाँ एकजुट हों।

दिल्ली जैसे महानगरों में जो पलायन पिछले 40 वर्षों के दौरान हुआ उसने हिन्दी प्रदेश की अवधारणा को किस तरह प्रभावित किया? हिन्दी की केन्द्रीयता के कृत्रिम स्वीकार में किन भाषाओँ को अस्वीकार करने का बोध विन्यस्त किया गया- यह गौरतलब है। बात को अधिक स्पष्ट करें तो देख सकते हैं पिछले चार दशकों में लोग बिहार से, उत्तरप्रदेश से, बंगाल, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश आदि जगहों से दिल्ली में जीवन यापन और शिक्षण प्रशिक्षण के लिए आये।

एक बड़ी आबादी का हिन्दी प्रदेश में एक स्थान से दिल्ली की तरफ पलायन हुआ। इस पलायन में हिन्दी को एक कृत्रिम केन्द्र मान लिया गया, बना दिया गया। ऐसा करते हुए जो सबसे बड़ी घटना या दुर्घटना हुई कि इन पलायित लोगों को अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने साहित्य और अपने संस्कार को विस्मृत करना पड़ा। विस्मृति की यह प्रक्रिया इतनी तीव्र थी कि उसके मूल में हिंसा जैसी भावना को स्वतः स्फूर्त तरीके से होता हुआ हम देखते हैं। बिहारी या बंगाली जैसे सम्बोधन में व्याप्त हिंसा, हिन्दी प्रदेश की कृत्रिम सामूहिकता और सामजिक क्रूरता को दिखाती है। ‘बिहारी पानी की बीमारी’ जैसे मुहावरे इस तरह की क्रूरता का सांस्कृतिक प्रतिफल थें। घृणा का सार्वजनिक स्वीकार।

यहाँ खड़ी बोली हिन्दी की संस्कृति के विकास और विस्तार के साथ-साथ हिन्दी प्रदेश की अन्य भाषाओँ -जिन्हें अब बोली मान लिया गया है- सम्बन्ध देखना चाहिए। क्या यह भाषा की उपनिवेशवादी दृष्टि का ही विकास नहीं था? क्या यह विचित्र नहीं है, कि जिस हिन्दी का विकास साम्राज्यवादी दृष्टि के विरुद्ध हुआ, वही अपनी बहिन भाषाओँ के साथ एक वर्चस्ववादी दृष्टिकोण अपनाये। इस प्रक्रिया में एक और चीज़ घटित हुई वह है हिन्दी का अवमूल्यन। हिन्दी न तो लोक की भाषा रह गयी और न ही वह ज्ञान विज्ञान और शिक्षण प्रशिक्षण की।

दिल्ली में दो दशक तक रहते हुए, दिल्ली विश्विद्यालय के कई महाविद्यालयों में पढ़ते-पढ़ाते हुए यह महसूस हुआ कि हिन्दी विभागों में कार्यरत लोग भी हिन्दी से प्रेम नहीं करते। मौका-बेमौका वे खुद को अँग्रेजीदां ही मानना चाहते हैं। यह इसलिए हुआ क्योंकि हिन्दीदां होने की प्रक्रिया में उन्होंने अपने भीतर की स्वतः स्फूर्त भाषा संस्कृति को नष्ट किया। इस नष्ट करने ने जो विलगाव उनके भात्र पैदा किया- वह आज के हिन्दी प्रदेश की वास्तविकता है। एक ऐसी सच्चाई है जिसे हिन्दी समाज की विकृत चेतना, असामाजिकता संस्कृति विहीनता और यदा-कदा क्रूरता के रूप में चिन्हित करते रहते हैं।

मैथिली, राजस्थानी या बंगला को नष्ट कर अगर हिन्दी आयी तो उस हिन्दी को नष्ट कर अँग्रेजी ही आएगी। तीसरी दुनिया के राष्ट्रों में भाषा और बोली के कृत्रिम और गैरजरूरी विभाजन पर गम्भीरता से विचार न कर हमने भाषा की साम्राज्यवादी दृष्टिकोण की व्यापकता को ही स्वीकार किया है

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अच्युतानंद मिश्र

लेखक कवि,आलोचक और प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919213166256, anmishra27@gmail.com
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