Democracy4youलोकसभा चुनाव

लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर बड़ा खतरा – रामनरेश राम

 

  • रामनरेश राम

सत्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव होने जा रहे हैं. यह चुनाव बहुत सारे मायनों में अलग होने जा रहा है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यह आम सहमति की तरह बनता दिख रहा है कि अगर इस बार चुनाव में कोई सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ तो भारतीय लोकतन्त्र का यह अंतिम चुनाव होगा. पिछले वर्षों में नागरिकों बुद्धिजीवियों और लोकतन्त्र में विश्वास करने वालों के बीच सबसे प्रमुख मुद्दे के तौर पर संविधान बचाने का सवाल प्रमुख रहा है. यह मुद्दा ही अपने आप में इस बात का संकेतक है कि भारतीय लोकतन्त्र का भविष्य किस तरह की समस्याओं का इंतजार कर रहा है. जाहिर है ऐसे में यह चुनाव कई मायनों में निर्णायक होगा इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं हो सकती. एक समय लोगों को लगता था कि आजादी के बाद हमने जो लोकतन्त्र हासिल किया था वह निरंतर संघर्षों के कारण और समृद्ध होता जायेगा और बहुत हद तक उसने उपलब्द्धियां भी हासिल की लेकिन इसमें एक ऐतिहासिक ब्रेक आ गया लगता है. यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि लोकतन्त्र के विकास की गति में यह ब्रेक भारतीय समाज को चौतरफा बहुत गहरे से प्रभावित कर रहा है. सामाजिक, न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं की लम्बे समय से स्थापित गरिमा और वैधता दोनों खतरे में पड़ गए हैं. इस प्रक्रिया ने भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में इन संस्थाओं के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है. किसी भी राष्ट्र के लिए यह चीज कोई शुभ संकेत नहीं है. ऐसा लग रहा है जो भी हमने हासिल किया था वह खो रहा है और हम फिर से किसी पिछली सदी में वापस जा रहे हैं. इसका सबसे ज्यादा असर समाज की उभरती हुई सामाजिक शक्तियों की गतिशीलता पर पड़ा है. इसीलिए इसकी प्रतिक्रिया भी इन्हीं तबकों से आ रही है. इन परिस्थियों से कैसे बाहर निकला जा सकता है इसकी बेचैनी ही इस बार के लोकसभा चुनाव की आत्मा बना हुआ है.

पिछली लोकसभा के चुनाव के ठीक बाद से कुछ महीनों तक तो लगा कि अब भारत में विपक्ष का अंत हो गया है लेकिन नागरिकों के स्वतन्त्रता बोध को ज्यादा दिनों तक दबा कर नहीं रखा जा सकता है. उसने अपना रूप अख्तियार किया और चौतरफा प्रतिरोध की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं. सबसे अधिक प्रभावित बहुजन समाज की नयी पीढ़ी को एहसास होने लगा कि अब चुप बैठे रहे तो सब कुछ जो हासिल है वह भी चला जायेगा. इसी एहसास ने भारतीय लोकतन्त्र की खूबसूरती को वापस लौटाने का साहस जगाया. भारत में सामाजिक न्याय के संघर्ष का यह दूसरा चरण है जिसमें पुरानी पीढ़ी जहाँ भारतीय लोकतन्त्र में अपना एक मुकाम बनाकर भी लगभग अपनी वैधता को खो चुकी है. लेकिन इसके बाद भी बीच बीच में जो उनके भीतर जान होने का जो एहसास हो रहा है यह दरसल सामाजिक न्याय की परियोजना को पूरा करने का जज्बा लिए नयी पीढ़ी है. यह पीढ़ी भावनाओं से ऊपर उठकर अपनी विरासत का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर रही है और सामाजिक न्याय की पुरानी पीढ़ी के लिए दबाव समूह की तरह भी काम कर रही है. इस परिस्थिति को समझना हो तो चंद्रशेखर रावण के उद्भव का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए.

चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ दलित राजनीति का एक अलग चेहरा बन रहे हैं। इनके समर्थकों की समझ कुछ मुद्दों पर बेहद साफ है। वे कांशीराम के संघर्ष की विरासत को आगे ले जाने की बात कर रहे हैं। बसपा से उनका मोहभंग पूरी तरह तो नहीं हुआ है लेकिन विभाजन की एक बारीक़ रेखा तो बन ही रही है। जंतर-मंतर पर आयोजित बहुजन हुंकार रैली में जिन प्रतीकों का प्रयोग  हुआ उसमे कहीं मायावती जी नहीं थीं। लेकिन युवाओं से बात करके लगा कि वे नयी जमीन तलाश रहे हैं। सामाजिक परिवर्तन की बसपा शैली इन युवाओं को पसंद नहीं है। मैंने जब उनसे पूछा कि चंद्रशेखर की कौन सी बात उनको सबसे ज्यादा प्रभावित करती है तो उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर ने पूरे भारत के बहुजनों को एक मंच पर ला दिया है। यह बात वहां दिखी भी कि देश के कई हिस्सों से बहुजन युवा आये थे। दूसरी बात यह कि चंद्रशेखर एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में संविधान लेकर सामाजिक परिवर्तन की राजनीति में उतरे हैं। इसका मतलब यह है कि वे समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि अब हम हिंसा और अन्याय नहीं सहेंगे। हम किसी भी स्तर पर मुकाबला करने को तैयार हैं। एक कार्यकर्त्ता ने बताया कि अब हम संविधान के दायरे में रहकर सामाजिक परिवर्तन की इबारत लिखेंगे। यह बात जरूर है कि हुंकार रैली में  संख्या जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं थी। चंद्रशेखर ऐसे समय में भारतीय राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं जब बहुजन युवाओं का एक बड़ा हिस्सा पढ़ा लिखा बेरोजगार है। अब उत्तर भारत के गांवों से रोजगार के लिए पलायन उस तरह का नहीं है जो दलितों की पहली पीढ़ी के समय था। अब गांवों में नौजवान रुक रहे हैं। वे राजनीति के प्रभाव का आकलन करने लगे हैं। पहले सिर्फ इतना होता था कि वे गांव के सामाजिक कार्यों के लिए नवयुवक मंगल दल बना लेते थे लेकिन किसी विरोध प्रदर्शन आदि में मुखरता से शामिल नहीं होते थे। लेकिन इस समय यह महत्ववपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। अब वे दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ सजग हुए हैं तथा बहुत बार सीधे संघर्ष में उतर जा रहे हैं। ये ऐसे नौजवान हैं जिनके भीतर स्वाभिमान की नयी चेतना विकसित हुई है। अब ये भावनात्मक प्रतिबद्धता की बजाय अपने आन्दोलन की विफलता पर आलोचनात्मक रुख अख्तियार कर रहे हैं। क्योकि यह सही है कि जब तक कोई परिवर्तनकारी व्यक्ति या आन्दोलन अपने संघर्ष के इतिहास की आलोचनात्मक पड़ताल नहीं करता उसको सफलता नहीं मिल सकती।

चंद्रशेखर का नायकत्व: जंतर मंतर की रैली में बहुतेरे ऐसे नौजवान दिखे जो बार बार अपनी मूछों को ऊपर की तरफ चढ़ा रहे थे। यह साफ़ देखा और महसूस किया जा सकता है कि दलित राजनीति अपने दूसरे चरण में पहुँच गयी है जहाँ उसे ऐसे नायक की तलाश है जो समाज को अपनी ताकत का एहसास करा सके। जाहिर है अपने बॉडी लैंग्वेज और स्टाइल से चंद्रशेखर इस चीज का बखूबी एहसास कराते हैं। यही कारण है कि दलितों की नयी पीढ़ी इस संदर्भ में भी उनको फॉलो कर रही है। वैसे भी भारतीय राजनीति और समाज में इसकी एक लंबी परंपरा रही है। कहा जाता है कि नायक तभी अपनी ऊंचाई पर चढ़ पाता है जब खलनायक भी उसी के समानांतर खतरनाक हो।

सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव कुछ मामलों में विडम्बनाओं से भरा हुआ है. सत्तासीन राजनीतिक दल ऐसे ऐसे विमर्श खड़ा कर रहा है जो देखने सुनने में हाशिये की सामाजिक शक्तियों को केंद्र में रखकर महत्त्व देता हुआ दिखता है लेकिन सच्चाई यह है कि उसकी राजनीति, नीति और भावना उसके ठीक विपरीत है. प्रधान सेवक, चाय बेचने वाला, पिछड़ा प्रधानमंत्री और अब देश का चौकीदार ये पद इसी विमर्श को खड़ा करते हैं लेकिन इसकी मूल भावना यह है कि जो सदियों से सेवक है वह सेवक बना रहे, जो चाय बेचता है वह चाय ही बेचता रहे और उसकी पीढियां भी वही करें, पिछड़ा पिछड़ा ही बना रहे और चौकीदार बिना अपनी न्यूनतम मजदूरी के भी चौकीदारी करता रहे. इन विमर्शों में छुपी हुई वर्चस्व की राजनीति का मुखर विरोध तो आ रहा है लेकिन हर मुखर विरोध वैकल्पिक विमर्श के साथ आएगा यह जरुरी नहीं है. यही कारण है कि कई लोग विरोध करते करते ‘नेपाल से चौकीदार मंगा’ लेने की बात करने लगते हैं. कुछ भी हो इन कमियों के बाद भी आम नागरिक और विपक्ष एक बात पर एकताबद्ध दिख रहे हैं कि पहले तो सत्ता परिवर्तन करके हासिल को बचाना है. यही उम्मीद की किरण है.

लेखक जनपक्षीय मुद्दों पर नियमित लिखते हैं|

सम्पर्क- +919911643722, naynishnaresh@gmail.com

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सबलोग

लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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