लोकनायक जयप्रकाश नारायण
शख्सियत

सम्पूर्ण क्रान्ति के शिल्पी : लोकनायक जयप्रकाश नारायण

 

आजाद भारत के असली सितारे – 12

 

सक्रिय राजनीति से डेढ़ दशक तक दूर रहने के बाद 1974 में “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” के नारे के साथ जब मैदान में उतरे तो सारा देश जिनके पीछे हो लिया, बतौर अटल बिहारी वाजपेयी ‘दुर्गा की अवतार’ कही जाने वाली इंदिरा गाँधी को जिनके डर से इमरजेंसी लगानी पड़ी और उसके बाद के चुनाव में वे और उनकी पार्टी बुरी तरह पराजित हुईं, वे थे जयप्रकाश नायायण (11.10.1902 – 8.10.1979) जिन्हें संक्षेप में जेपी कहकर पुकारा जाता है।

आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण की पहचान खासतौर पर उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति के ऐतिहासिक आन्दोलन के कारण है लेकिन सम्पूर्ण क्रान्ति सिर्फ इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटाने के लिए नहीं थी अपितु, उसका उद्देश्य बहुत व्यापक था।

जेपी के अनुसार सम्पूर्ण क्रान्ति में सात क्रान्तियाँ शामिल है – राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रान्ति। इन सातों क्रान्तियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है। उन्होंने कहा था कि, ’’सम्पूर्ण क्रान्ति से मेरा तात्पर्य समाज के सबसे अधिक दबे-कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर पर देखना है ।’’ पत्रकार अरविन्द मोहन के शब्दों में, “उनका आन्दोलन भ्रष्टाचार के विषय पर शुरू हुआ था। बाद में इसमें बहुत कुछ जोड़ा गया और यह सम्पूर्ण क्रान्ति में परिवर्तित हो गया और व्यवस्था परिवर्तन की ओर मुड़ गया। इसके तहत जेपी ने कहा कि यह आन्दोलन सामाजिक न्याय, जाति व्यवस्था तोड़ने, जनेऊ हटाने, नर-नारी समता के लिए है। बाद में इसमें शासन, प्रशासन का तरीका बदलने, राइट टू रिकॉल को भी शामिल कर लिया गया।“

 बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में 5 जून 1974 को जेपी ने सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया था। मैदान में उपस्थित लाखों लोगों ने जाति-पांति, भेद-भाव,शादियों में तिलक- दहेज आदि छोड़ने का संकल्प लिया था। उस मैदान में हजारों ने अपने जनेऊ तोड़ कर फेंके थे। वहाँ नारा गूंजा था,

लोकनायक जयप्रकाश नारायण

“जाति-पांति तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो।

समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो।“

स्पष्ट रूप से इस क्रान्ति का मतलब परिवर्तन और नवनिर्माण दोनों से था। उन्होंने घोषणा की कि, “भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रान्ति लाना आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं; क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है।” इस तरह सम्पूर्ण क्रान्ति के आह्वान के मूल में इंदिरा गाँधी की सत्ता को उखाड़कर फेंकना भी था। उन्होंने इंदिरा गाँधी से इस्तीफे की माँग की।

असल में इसके पूर्व जयप्रकाश नारायण, विनोबा के सर्वोदय और भू-दान आन्दोलन से भी जुड़े थे लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। इससे वे संतुष्ट नहीं थे। वे लोकतन्त्र को दोष मुक्त बनाना चाहते थे। धनबल, बाहुबल और चुनाव में बढ़ते खर्च को वे कम करना चाहते थे। आजादी के आन्दोलन में संघर्ष के दौरान गाँधी के साथ जिस आजाद भारत का उन्होंने सपना देखा था, वह बहुत कुछ सपना ही रह गया था। ऐसे में जब गुजरात और उसके बाद बिहार के विद्यार्थियों ने उनसे नेतृत्व संभालने का आग्रह किया तो उन्हें उम्मीद की किरण दिखाई दी और उन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान कर दिया।

 जेपी, महात्मा गाँधी के सहयोगी रह चुके थे। आजादी के आन्दोलन में उनके योगदान के लिए लोगों में बहुत सम्मान का भाव था। इसलिए जब उन्होंने युवाओं का आह्वान किया तो नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ा। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रान्ति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी। वे क्रान्ति का पर्याय बन गये। 

जेपी का आन्दोलन अभी चल ही रहा था कि राजनारायण द्वारा दायर किए गये एक मुकदमें में 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गाँधी के चुनाव को ही अवैध घोषित कर दिया और अगले पाँच साल तक उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दिया। इंदिरा गाँधी इसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटकटातीं, इसके पहले ही 25 जून को जेपी ने नागरिकों सहित, सरकारी अमलों से भी इंदिरा सरकार के ‘असंवैधानिक’ आदेशों की अवज्ञा की अपील कर दी। इंदिरा गाँधी ने उसी दिन आधी रात को इमरजेन्सी लगा दी और जेपी सहित सभी प्रमुख विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गये। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गयी। जेपी पहले से ही अस्वस्थ चल रहे थे। जेल में उनकी तबीयत और भी खराब हुई। 7 महीने बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। 1977 में जेपी के प्रयासों से विपक्ष एकजुट हुआ। चुनाव की घोषणा हुई और उस चुनाव में इंदिरा गाँधी बुरी तरह पराजित हुईं।

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताबदियारा नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम देवकी बाबू और माता का नाम फूलरानी देवी था। बचपन से ही जयप्रकाश नारायण राष्ट्रवादी विचारों के थे। विद्यार्थी जीवनसे ही वे स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सा लेने लगे थे।  उन्होंने जलियांवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में ब्रिटिश शैली के स्कूलों को छोड़कर बिहार विद्यापीठ से अपनी शिक्षा पूरी की थी। बिहार विद्यापीठ को प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गाँधीवादी डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह ने स्थापित किया था। इसके बाद जेपी 1922 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गये, जहाँ वे 1929 तक रहे और कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र का अध्ययन किया। अमेरिका में महँगी पढ़ाई के खर्च को वहन करने के लिए उन्हें खेतों, कम्पनियों और रेस्त्रां में भी काम करना पड़ा था। वहीं पर उन्होंने मार्क्सवाद का भी अध्ययन किया और उससे प्रभावित भी हुए। उन्होंने एम॰ ए॰ की डिग्री हासिल की। उनकी माताजी की तबीयत ठीक न होने के कारण वे भारत वापस आ गये और पी-एच॰ डी॰ पूरी न कर सके।

 

अमेरिका जाने के पहले ही 1920 में जयप्रकाश नारायण का विवाह ब्रजकिशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती से हो चुका था। ब्रजकिशोर प्रसाद गाँधी जी के परम अनुयायी थे और जब गाँधी जी चंपारन गये थे तो प्रभावती के साथ वे अमूमन गाँधी जी से मिलने जाते थे। जयप्रकाश नारायण से विवाह के बाद प्रभावती, गाँधी जी के आश्रम में कस्तूरबा के साथ रहीं। 1929 में जब वे अमेरिका से लौटे तो भारत में स्वाधीनता आन्दोलन चरम पर था। उनका सम्पर्क गाँधी जी के साथ काम कर रहे जवाहरलाल नेहरू से भी हुआ। वे आन्दोलन में शरीक हो गये। 1932 में गाँधी, नेहरु और अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद, उन्होंने भारत में अलग-अलग हिस्सों में आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्हें सितम्बर 1932 में मद्रास से गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक जेल में डाल दिया गया। नासिक जेल में ही उनकी भेंट मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, एन.सी.गोरे, अशोक मेहता, सी.के. नारायण स्वामी आदि कांग्रेसी नेताओं से हुई। इन नेताओं से जेल में हुए विचार विमर्श का नतीजा था कि काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ( सी॰एस॰पी॰) का जन्म हुआ। सी॰एस॰पी॰ समाजवाद में विश्वास रखती थी। जब काँग्रेस ने 1934 में चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया तो जयप्रकाश नारायण की सी॰एस॰पी॰ ने इसका विरोध किया।

जयप्रकाश नारायण ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1939 में अंग्रेजों के खिलाफ लोक आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाये।  टाटा स्टील कंपनी में हड़ताल कराकर उन्होंने कोशिश की कि अंग्रेज़ों को इस्पात की आपूर्ति न हो। इन गतिविधियों के कारण जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार कर लिए गये और उन्हें 9 महीने की कैद की सज़ा सुनाई गयी। जेल से छूटने के बाद उन्होंने गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में उन्हें बन्दी बनाकर मुम्बई की आर्थर जेल में रखा गया जहाँ से वे फरार हो गये।

जयप्रकाश नारायण ने स्वाधीनता आन्दोलन के लिए नेपाल में जाकर आज़ाद दस्ते का भी गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। उन्हें एक बार फिर सितम्बर 1943 में पंजाब में चलती ट्रेन से गिरफ्तार कर लिया गया और 16 महीने बाद जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल में स्थान्तरित कर दिया गया। इसके उपरान्त गाँधी जी ने यह साफ कर दिया था कि डॉ॰ लोहिया और जयप्रकाश नारायण की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नहीं करेंगे। बाध्य होकर अंग्रेजों ने दोनों को अप्रैल 1946 में रिहा कर दिया।

आजादी के बाद 1948 में जेपी ने कुछ गाँधीवादी नेताओं के साथ मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 19 अप्रैल 1954 को उन्होंने गया में अपना भावी जीवन विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन को समर्पित करने की घोषणा की। 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ने का निर्णय लिया। लेकिन सातवें दशक में वे राजनीति में पुनः सक्रिय हो गये।

8 अक्टूबर 1979 को पटना स्थित उनके आवास पर जयप्रकाश नारायण का निधन हृदय की बीमारी से हो गया। उन्हें मधुमेह की भी बीमारी थी। उनके सम्मान में तत्कालीन प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह ने 7 दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी। उनकी शव यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए थे।

      इस तरह जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रान्ति इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटाने तक ही सिमट कर रह गयी। यद्यपि उसकी कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी रहीँ। जे.पी. आन्दोलन से जुड़े रहने वाले जे.एन.यू. के प्रोफ़ेसर आंनद कुमार के अनुसार, “जयप्रकाश आन्दोलन के बाद देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की नागरिक चेतना का विकास हुआ। युवा आन्दोलन धीरे-धीरे पर्यावरण की तरफ़, नर-नारी समता की तरफ़, जाति प्रसंग की तरफ़ और सांप्रदायिक सद्भाव की तरफ़ बढ़ा। आज देश में काम कर रहे कई हज़ार जनसंगठन के पीछे, देश में 1974 से 1979 के बीच जयप्रकाश की मेहनत और प्रेरणा है।” और प्रो. मणीन्द्र नाथ ठाकुर के अनुसार इस आन्दोलन ने “यह तो तय कर दिया कि कोई भी नेता या दल इस तरह शासन नहीं कर सकता है। भारत स्वतन्त्रता संग्राम के बाद भी आन्दोलन के लिए तैयार है।”

      बहरहाल, जेपी के आन्दोलन का जो भी परिणाम हुआ हो किन्तु इस आन्दोलन में जेपी ने जिन शक्तियों का समर्थन लिया उनमें से सभी उनके सिद्धान्तों और विचारधारा के अनुकूल नहीं थीँ। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके राजनीतिक संगठन जनसंघ ने जेपी को अपने हित में इस्तेमाल किया। 1977 के आम चुनाव में जेपी की पहल पर जनसंघ ने जनता पार्टी में विलय तो किया और चुनाव भी जीते किन्तु 1980 में जनता पार्टी के टूटने पर वही जनसंघ, भारतीय जनता पार्टी के रूप में अधिक ताकतवर बनकर उभरा। अरुण कुमार त्रिपाठी ने लिखा भी है कि, “जयप्रकाश नारायण पर यही आरोप भी है कि उन्होंने 1974 के आन्दोलन के माध्यम से आरएसएस और जनसंघ को मुख्यधारा की राजनीति में वैधता दिलवाई और आज अगर देश पर हिन्दूवाद का खतरा है तो उसकी जड़ में 1974 का वह आन्दोलन और 1977 की सरकार मेंअनेक नेताओं की भागीदारी है।“ ( द वायर,17 फरवरी 2019)

सच तो यह है कि जेपी की सम्पूर्ण क्रान्ति, इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटाने की क्रान्ति बनकर रह गयी। भ्रष्टाचार, तिलक- दहेज, जाति-पांति सबकुछ पूर्ववत चलता रहा। सम्पूर्ण क्रान्ति से होकर राजनीति में आने वाले लालूप्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी आदि नेता बाद में भी जाति की ही राजनीति करते रहे। हालांकि, कुछ लोग मानते हैं कि ये नेता जेपी आन्दोलन की उपज नहीं हैं अपितु, मंडल राजनीति से उभरकर आए है।

जनसंघ के एक कार्यक्रम में जेपी ने कहा था कि,“यदि जनसंघ फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट हूँ।“ आन्दोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि जेपी के निकटतम सहयोगियों ने जेपी को उस अधिवेशन में न जाने की सलाह भी दी थी लेकिन जेपी नहीं माने। बाद में उनके इस कथन को खूब उछाला गया।

इसी तरह की गलती राममनोहर लोहिया ने भी की थी, जब काँग्रेस को हराने के लिये उन्होंने जनसंघ से हाथ मिलाया था। उस समय भी लोगों ने साम्प्रदायिक शक्तियों से हाथ मिलाने पर सवाल किया था तो लोहिया ने कहा था कि काँग्रेस को हराने के लिए वे शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं। जेपी और लोहिया जैसे समाजवादियों की नीतियों का परिणाम हुआ कि उन्हीं के द्वारा घोषित की गयी ‘साम्प्रदायिक’ और ‘फासिस्ट’ ताकतें सत्ता पर काबिज हुईं।

दरअसल महात्मा गाँधी दूसरे समाजवादियों से इसी अर्थ में भिन्न और महान थे। वे साध्य को पाने के लिए साधन की पवित्रता के भी उतने ही हिमायती थे। चौरीचौरा काण्ड के बाद उन्होंने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था जबकि इस मुद्दे पर उनका समर्थक कोई भी नहीं था। लोग कहते थे कि यह जालियांवाला बाग काण्ड का बदला है। खुद नेहरू ने भी उनसे कहा था कि अब तो आजादी बहुत करीब है और ऐसे समय आन्दोलन वापस लेना ठीक नहीं है किन्तु गाँधी अपने संकल्प पर अडिग थे। उन्हें हिंसा के रास्ते आजादी नहीं चाहिए थी।

सच तो यह है कि अवसर को परखते हुए जनसंघ के नेताओं ने अपनी रणनीति बदल ली थी। 1977 के चुनाव में उन्होंने कट्टर हिन्दुत्व का प्रचार नहीं किया था और न तो अपने झंडे का ही उपयोग किया था। जनसंघ के प्रत्याशियों ने जनता पार्टी की सदस्यता पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसमें लिखा था, ‘मैं महात्मा गाँधी द्वारा देश के समक्ष प्रस्तुत मूल्यों और आदर्शों में आस्था जताता हूँ और समाजवादी राज्य की स्थापना के लिए खुद को प्रस्तुत करता हूँ।’ (द्रष्टव्य, सोशलिस्ट कम्युनिस्ट इंटरेक्शन इन इंडिया, लेखक – मधु लिमये)

किन्तु वह सब तात्कालिक था। बाद की राजनीतिक घटनाओं से प्रमाणित होता है कि जनसंघ तथा आरएसएस ने अपने दूरगामी लक्ष्य के लिए इस तरह के दिखावे किए। उन्होंने अपना मूल लक्ष्य कभी नहीं बदला और उस लक्ष्य तक पहुंचने के तरीकों को भी याद रखा।

जेपी को भ्रम था कि वे संघ को सांप्रदायिकता-मुक्त कर देंगे। उन्होंने सत्ता की राजनीति को कभी महत्व नहीं दिया। वे तो राजनीति से सन्यास ले चुके थे। जीवन के अन्तिम पहर में देश की स्थिति को देखकर उन्हें पीड़ा का अनुभव हुआ और बिहार के छात्र आन्दोलन में शामिल हुए। कम्युनिस्ट पार्टी आन्दोलन का विरोध कर रही थी और इंदिरा गाँधी के साथ थी। गाँधीवादी संगठनों की स्थिति दयनीय थी। विनोबा भी इंदिरा गाँधी के साथ हो गये थे। समाजवादी खेमा भी आधे मन से उस आन्दोलन में शामिल हुआ। इन्हीं परिस्थितियों में आरएसएस व जनसंघ पर उनकी निर्भरता बढ़ी और उसने इन परिस्थितियों का फायदा उठाया।

लेकिन यह बात ध्यान रखने की है कि जेपी कभी भी संघ की सांप्रदायिक राजनीति के समर्थक नहीं थे। इसे जेपी की ऐतिहासिक भूल के रूप में देखा जाना चाहिए। इंदिरा गाँधी और जेपी के व्यक्तिगत रिश्ते या कह सकते हैं कि इदिरा गाँधी द्वारा जेपी को पर्याप्त सम्मान न दिया जाना भी इसका आंशिक कारण हो सकता है।

इंदिरा गाँधी के सचिव रहे पी.एन. धर अपनी किताब, “इंदिरा गाँधी, द इमरजेंसी एंड इंडियन डेमोक्रेसी” में लिखते हैं, “हमारे और जेपी के बीच मध्यस्थता कर रहे गाँधी पीस फ़ाउंडेशन के सुगत दासगुप्ता ने मुझसे कहा था, नीतिगत मामलों का उतना महत्व नहीं है। मेरी सलाह ये है कि उनको कुछ मान दीजिए। “धर आगे लिखते हैं, “बकौल राधाकृष्ण और दासगुप्ता, जेपी उम्मीद कर रहे थे कि प्रधानमन्त्री बनने के बाद इंदिरा गाँधी उनसे उसी तरह के सम्बन्ध स्थापित करेंगी जैसे नेहरू और गाँधी के बीच हुआ करते थे। इंदिरा गाँधी, जेपी की एक इंसान के तौर पर क़दर ज़रूर करती थीं लेकिन उनके विचारों से वे शुरू से ही सहमत नहीं थीं। ……..उनकी नज़र में वे एक ऐसे सिद्धांतवादी थे जो अव्यावहारिक चीज़ों को अधिक महत्व देते थे। एक दूसरे के बारे में ऐसे विचार रखने के बाद दोनों के बीच समान राजनीतिक समझ पैदा होना लगभग असंभव था। सच्चाई ये थी कि दोनों का अहम बहुत बड़ा था और नियति के पास उन दोनों के बीच टकराव होने देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।”

लोकनायक जयप्रकाश नारायण

जयप्रकाश नारायण अकेले ऐसे नेता थे, जिन्होंने गाँधी जी द्वारा देखे गये ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने के लिए आजादी के बाद से ही वैचारिक संघर्ष करने लगे थे। अरुण माहेश्वरी ने  ‘स्वराज से लोकनायक’ पुस्तक के अपने प्रकाशकीय वक्तव्य में सही लिखा है, “उनका लिखा हुआ दस्तावेज, ‘ए प्ली फॉर दि रिकांस्ट्रक्शन ऑव इंडियन पॉलिटी’ इस दृष्टि से अपने किस्म का अनूठा प्रस्ताव है जिसमें उन्होंने भारतीय लोकतन्त्र के वेस्टमिनिस्टर मॉडल की जगह देशज किस्म का भारतीय मॉडल बनाने की पेशकश की है। वे चाहते थे कि लोकतन्त्र में हर स्तर पर जनता की भागीदारी होनी चाहिए।“ ( पृष्ठ-10) जेपी की पहल पर 1948 में जो समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी बनी थी उसमें सोवियत संघ में बढ़ रही तानाशाही को ध्यान में रखा गया था और लोकतांत्रिक समाजवाद का ढांचा अपनाया गया था। जेपी को पता था कि सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी बहुत केन्द्रीकृत थी जिसके नाते स्तालिन जैसे तानाशाह पैदा हुए।

जयप्रकाश नारायण ने अनेक किताबें लिखी हैं। उनके लेखों, साक्षात्कारों और भाषणों के संग्रह भी कई खंडों में उपलब्ध हैं। अनेक विद्वान लेखकों और जेपी के समकालीनों ने भी उनपर खूब लिखा है। इनमें से बहुत सी किताबें हिन्दी समेत विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। जेपी द्वारा रचित कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं,‘व्हाइ सोशलिज्म’,‘टूवार्ड्स स्ट्रगल’, ‘इनसाइड लाहौर फोर्ट’, ‘फ्रॉम सोशलिज्म टू सर्वोदय’, ‘टूवार्ड्स ए न्यू सोसाइटी’, ‘जेपीज जेल लाइफ (निजी पत्रों का संग्रह)’, ‘टूवार्ड्स टोटल रिवोल्यूशन’ आदि।

जेपी के ऊपर लिखी गयीं पुस्तकों में एच.एल.सिंह द्वारा लिखित, ‘रेड फ्यूजिटिवः जयप्रकाश नारायण’, जे.एस.ब्राइट द्वारा लिखित ‘लाइफ एंड टाइम ऑफ जयप्रकाश नारायण’, सुरेश राम द्वारा लिखित ‘लोकनायक जयप्रकाश नारायण’, अजीत भट्टाचार्य द्रारा लिखित ‘जयप्रकाश नारायणः ए पॉलिटिकल बॉयोग्राफी’, एलेन एँड वेंडी स्कॉर्फ द्वारा लिखित ‘जेपीः हिज बायोग्राफी’, मीनू मसानी द्वारा लिखित ‘हू इज दिस मैन’, फारूक अकबर अली द्वारा लिखित ‘लोकनायक जयप्रकाश नारायण’ तथा यशवंत सिन्हा द्वारा संपादित ‘स्वराज से लोकनायक’ प्रमुख है।

      जेपी को मरणोपरान्त 1998 में भारत का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया। उन्हें लोकसेवा के लिए 1965 में रैमन मैक्सेसे अवार्ड मिल चुका था। जेपी के नाम पर देश में कई संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, हवाईअड्डों के नाम हैं। इस तरह हमारे देश में उन्हें समुचित सम्मान हासिल है। हम जेपी की पुण्यतिथि पर उनके द्वारा देश के लिए किए गये महान योगदान का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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