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साहित्य की एक नयी दुनिया – अमित कुमार

 

  • अमित कुमार

 

‘साहित्य की एक नई दुनिया संभव हैं’, के नारों के साथ दलित साहित्य महोत्सव का आगाज ऐतिहासिक रहा. प्रसिद्द लेखक साहित्यकार मोहन दास नैमिशराय, लक्ष्मण गायकवाड़, बल्ली सिंह चीमा, निर्मला पुतुल, हेमलता महिश्वरी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, चौथीराम  यादव, कर्मानंद आर्य, बलवीर माधोपुरी, स्नेहलता नेगी, क्रांतिपाल सिंह, सूरज बहादुर थापा, राजेश कुमार मांझी, व कई अन्यों के वक्तव्यों ने पूरे माहौल को समाज के लिए आईने में तब्दील कर दिया था. विशेष अतिथि मेधा पाटकर ने संघर्षों की व्यापकता और विकास के नाम पर जारी सरकारी दमन से लोगों को अवगत कराया जो देश के युवाओं को मिल रही शिक्षा व्यवस्था से लगभग गायब हो चुकी है.

दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी, ट्रांसजेंडर समुदाय, किसान, मजदूर, व हर वंचित समुदाय के संघर्षों को पहचान देने वाला ‘दलित’ शब्द के ऊपर आधारित दलित साहित्य महोत्सव देश के विकास, राजनीति, और सामाजिक न्याय में एक सकारात्मक ऊर्जावान पहल है. दलित साहित्य अन्याय के खिलाफ संघर्षरत उन सभी समुदायों का है जो सत्ताधारियों और सामाजिक कुरीतियों को चुनौती देता हैं.

दलित शब्द के प्रयोग के खिलाफ सरकारी फरमान जारी होने के दौर में डॉ आनंद तेलतुम्बडे बताते हैं कि पूर्व में डॉ अम्बेडकर ने दलित शब्द को दमन और गरीबी के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए प्रयोग किया गया था और इसका स्वरुप जाति-विरोधी, और दमन के खिलाफ रहा था.

आज वर्तमान में उन्हीं स्वरों को हिन्दुत्ववादी और ब्राह्मणवादी समूह जाति के बंधनों में बाँधकर नाकाम करने में लगे हैं. समाज के अंतर्विरोध को नकार ऐसे जातिवादी-हिन्दुत्ववादी-पितृसत्तात्मक तत्वों को वर्तमान सरकार शुरुआत से संरक्षण देती नजर आ रही है. फिर चाहे गौरक्षा के नाम पर दलित-मुस्लिमों की भीड़ हत्या हो, या ऊना, भीमाकोरेगांव में हिंसा जैसी घटना हो जहाँ सरेआम ऐसे तत्त्व एक समुदाय विशेष पर हमला करते हैं, या फिर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की कोशिश करती आरक्षण व्यवस्था का विरोध हो, सरकारें इन सभी में विभिन्न समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करती नजर आती है.

ऐसे में दलित साहित्य महोत्सव के आयोजन द्वारा दलित समुदाय ऐसे मठों को चुनौती देता दिखाईदेता है. आयोजकों के अनुसार इसमें शामिल होने के लिए विभिन्न भाषा-भाषी लेखकों, कवियों, साहित्यकारों, और सामाजिक कार्यकर्ताओं को संपर्क किया गया और फलस्वरूप करीब 15 विभिन्न भाषा व संस्कृतियों से लोग इसमें शामिल हुए. देश ही नहीं बल्कि पड़ोसी देश नेपाल के प्रसिद्द दलित साहित्यकार बिश्वोभक्तदुलाल ‘आहुति’ ने इस पहल का समर्थन किया.

महोत्सव के दौरान दलित साहित्य महोत्सव को परिभाषित करते हुए प्रसिद्द साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय ने कॉर्पोरेट हावी सरकारी साहित्य सम्मेलनों की आलोचना करते हुए कहते हैं कि देश में चल रहे विभिन्न सरकारी साहित्य महोत्सव का आयोजन सिर्फ खानापूर्ति रहा है और वहां समाज की संवेदना रखने वाले उपयुक्त वक्ताओं की कमी है. सभी की उन्नति के लिए आवश्यक है अवसर मिलना. दलित साहित्य विलास का साहित्य नहीं बल्कि दलित समुदाय की पीड़ा, प्रखर आवाज, और उनके संघर्षों का साहित्य है. दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग, घुमंतू आदिवासी, महिलाओं और अन्य शोषित समुदायों के प्रतिभावों को समाजवाद, बाजारवाद, और ब्राह्मणवाद ने रोक दिया है, जिसका विरोध दलित साहित्यों में मिलता है. दलित साहित्य सिर्फ दलितों का ही नहीं बल्कि उन सभी लोगों का है जो अत्याचारों के खिलाफ एकजुट और संघर्षरत हैं.

‘दलित साहित्य, समाज में भेदभाव, जातिवाद खत्म करने का साहित्य है, पुनर्निर्माण का साहित्य है, वह जो सबका हित करें’, ऐसा महाराष्ट्र से आये प्रसिद्द साहित्यकार लक्ष्मण गायकवाड़ का कहना है. वह भेदभाव की पराकाष्ठा बताते हुए यह बतलाते हैं कि जब गाय ब्राह्मणों ने पाली तो उसे देवता का स्थान, और गधा, सूअर दलितों ने पाला तो उसे गाली मिली और उन्हें वंचित कर दिया गया. दलितों को इस लोकतंत्र परिधि में साहित्यिक भागीदारी के साथ-साथ राजनीतिक भागीदारी भी बढ़ानी होगी. जानवरों और पशुओं को अलग से बजट मिल रहा है लेकिन विमुक्त घुमंतू समुदायों को ना कोई बजट, ना उनके लिए कोई कानून बनाए गए. गाय के नाम पर इंसानों को मारा जा रहा है जिसका विरोध दलित साहित्य करता है.

विकास की गलत अवधारणा के खिलाफ और लोगों के अधिकारों के लिए दशकों से संघर्षरत नर्मदा बचाओ आन्दोलन से आई मेधा पाटकर ने देश में चल रहे सरकारी दमन और विनाशकारी विकास के बारे में बताते हुए कहती हैं कि वर्तमान बीजेपी सरकारें संविधान होने के बावजूद भेदभाव की राजनीति आगे लाकर लोगों के बीच हिंसा और बंटवारा कर रही है. जब संविधान समानता का अधिकार देती है, और देश में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़े कानून हैं तब यहाँ खुले आम भीड़ हत्या जारी है. किसान, मजदूरों, आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है जिसके खासकर दलित, आदिवासी, और अल्पसंख्यक शिकार बन रहे हैं. दलित साहित्य लोगों की वेदना, उसपर हो रहे जुल्मों को समाज के सामने का कार्य कर रहे हैं और समाज को इसे स्वीकारते हुए साहित्य की कमान सौंपनी चाहिए. दलित साहित्य देश के विकास और राजनीति में एक नई सकारात्मक दिशा और उर्जा लाती रही है और भविष्य में ऐसा होगा यह हमारा पूरा विश्वास है.

उद्घाटन सत्र के बादसमानांतर सत्रों में विभिन्न विषयों पर विमर्श महत्वपूर्ण विमर्श से लोग रूबरू हुए. दलित साहित्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य; दलित साहित्य आन्दोलन की चुनौतियां; दलित साहित्य और मार्क्सवादी साहित्य में अन्तःसंबंध और अंतर्विरोध; साहित्य में दलित एवं आदिवासी स्त्री की भागीदारी; दलित साहित्यों में स्त्री आन्दोलन;आदिवासी और घुमंतू समुदाय : साहित्य, समाज और संस्कृति; साहित्य में अल्पसंख्यक विमर्श और भागीदारी; दलित साहित्य में पहचान के सवाल; भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य : चुनौती और संभावनाएं; सामाजिक न्याय और जन आन्दोलन, जैसे कई विमर्श महोत्सव के दोनों दिन आकर्षण का केंद्र बने रहे.

इन्हीं विमर्शों के दौरान हिंदी के प्रसिद्द साहित्यकार अब्दुल बिस्मिल्लाह भेदभाव की जड़ें भाषाओं में दिखाते हुए कहते हैं कि यहाँ आपका धर्म देखकर लोग भाषाओं को जोड़ देते हैं जैसे एक समय मुसलमान हिंदी पढ़ना चाहे या संस्कृत तो उन्हें अलग नज़र से देखा जाता और वही बात उर्दू के साथ हो गयी थी. देश में अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए लोगों ने धर्म बदले लेकिन आज भी नए धर्मों में उनकी जाति नहीं बदली. कई लोग कहते हैं मुसलमान मुख्य धारा में नहीं बल्कि मैं मानता हूँ वो मुख्य धारा में लेकिन लोग उन्हें मानना नहीं चाहते. आज इस समाज के लोगों की स्थिति कहीं दलितों से भी बदतर हो गयी है. एक मुसलमान आज इस देश में गाय नहीं पाल सकता ऐसा माहौल बनाया गया है.

‘आदिवासियों – दलितों को जल-जंगल-जमीन के संघर्षों से आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा है, सरकार आज भी हमारी जमीनों, जंगलों पर कब्ज़ा कर रही है. पत्थलगढ़ी आन्दोलन में हम देख सकते हैं कि कैसे हमारे स्वशासन के प्रयासों को कुचला जा रहा है, संविधान को भी मानने से इनकार कर रही है सरकार. लेकिन हम एकजुट होकर लड़ेंगे और साहित्य के माध्यम से भी अपनी आवाज मुखर रूप से बुलंद करते हुए समाज को सही रास्ते पर लायेंगे’, झारखण्ड से आये निर्मलापुतुल ने कुछ इन शब्दों में झारखण्ड के संघर्षों को बयान किया.

ऐसा आयोजन देश के दलित संघर्षों और आंदोलनों से साहित्य के जुड़ाव का एक कदम हैं जिससे देश, दुनिया और आने वाली पीढ़ियों के सामने समाज में जड़ें बिठाए समस्याओं को दूर करने का रास्ता दिखाई दे सके. कुछ ऐसी ही आशा और संकल्पना के साथ दिल्ली समर्थक समूह से संजीवडांडा ने दलित साहित्य महोत्सव को महत्वपूर्ण बताते हुए इसे आगे ले जाने की दृढ़ता साझा की.

फरवरी का आधा महीना बीत चुका है लेकिन अभी भी इसके बारे में चर्चा जारी है, मशहूर हस्तियाँ इसके अगले आयोजन में जुड़ने की आशा अभी से जता रहे हैं. अगला आयोजन इसके मूल संकल्प और उद्देश्य को आगे ले जाएगा ऐसा संभव लगता हैं क्यूंकि जैसा कि महोत्सव ने आशा दिखाई है वैसे ही साहित्य की एक नई दुनिया संभव है और दलित साहित्य इसे रास्ता दिखाएगा. यह विश्वास इनके आयोजकों और इसमें शामिल हुए लोगों, साहित्यकारों, कवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, और सबसे महत्वपूर्ण आज के युवा और छात्रों में हैं.

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में एल.एल.बी. प्रथम वर्ष के छात्र हैं और पूर्व में जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के साथ जुड़े रहे हैं.

संपर्क – amitk.mayaganj@gmail.com

 

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी
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