
ऐसे दौर में जब तथाकथित मुख्यधारा का रंगमंच घुटने के बल आ गया है, जिधर की हवा है उधर की दिशा में मुँह करके बैठ गया है। झाल – मंजीरा लेकर स्तुतिगान करने में लगा है। आम बोलचाल की भाषा में कहे तो गोदी मीडिया की तरह ‘गोदी थिएटर’ की संज्ञा पा गया है। ऐसे में दलित रंगमंच धारा के विरुद्ध खड़े होकर ज़ुल्मतों के दौर के गाना गाने लगे तो क्या होगा? वे आपको तब तक बर्दाश्त करेंगे जब तक उन्हें लगेगा कि आपसे उन्हें कोई खतरा नहीं है। या जब तक आप उसके अस्तित्व पर कोई सवाल नहीं खड़ा करेंगे। वे किसी भी हद तक आपके विरोध में जा सकते हैं। भले वर्षों से आप उनका अभिन्न हिस्सा हो, आपको विलगाते उन्हें एक मिनट भी नहीं लगेगा। भले ही अब तक वह उनके धर्म, समाज का महत्वपूर्ण भाग था, अलग कर दिया जाएगा। आप संभल भी नहीं पाएंगे तब तक वे आपको शत्रु की श्रेणी में खड़ा कर देंगे। और आप पर आक्रमण करना शुरू कर देंगे। ज़्यादा दिन नहीं हुए, एक ताजातरीन उदाहरण आपके सामने हैं। विश्वविद्यालयों में जातीय आधार पर भेदभाव होने के कारण दलित – पिछड़े समाज के छात्रों के साथ जो दुर्व्यवहार होता है, यहाँ तक कि आत्महत्या तक के लिए विवश कर देता है, उस उत्पीड़न को रोकने के लिए जब एक्ट लाया गया तो सवर्ण समाज की क्या प्रतिक्रिया हुई ? कल तक जो हिन्दू राष्ट्र बनाने का राग अलाप रहे थे, वे इस एक्ट को लेकर किस तरह रियेक्ट किये? न केवल दलित – वंचित समाज के लिए अभद्र भाषा का खुल कर प्रयोग किया बल्कि अपने लिए एक अलग देश की माँग करने से भी न चूके। एक क्षण भी न लगा, अपने से खुरच कर फेंक देने में। जैसे कि ये उनकी व्यवस्था का कोई हिस्सा ही न हो ! जब तक सेवा करते रहे, तब तक तो ठीक है। जहाँ हो रहे जुल्म के ख़िलाफ़, हक के लिए खड़े हुए नहीं कि सदन से लेकर अदालत तक आपको निस्तेज करने के लिए मुस्तैद हो गये।
फिर आप सोच सकते हैं कि रंगमंच पर खड़े होकर जब आप जातीय भेदभाव और ग़ैर बराबरी के ख़िलाफ़ कुछ कहेंगे, उस पर कुछ गीत गाएँगे, कोई नाटक दिखाएँगे तो वे मूक दर्शक नहीं बने रहेंगे ? उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आएगा? प्रतिकार नहीं करेंगे ? इसमें अड़ंगा लगाने की कोशिश नहीं करेंगे ? आपके सम्मुख कोई चुनौती नहीं आएगी ?
आज के दौर में दलित रंगमंच की जो चुनौतियाँ है, वह हर समय में रहा है। इस देश में बाहरी लोगों के आने के बाद भी यथावत रहा है। लम्बे समय तक इस्लाम का शासन रहा हो या दो – ढाई सौ साल साम्राज्यवादी मुल्क का लेकिन सांस्कृतिक संकट उसी तरह से बना रहा। यह जो ब्राह्मणवाद था, उस पर कोई आँच नहीं आती थी। जैसी व्यवस्था होती थी, उस रूप में वह ढल जाता था। लोग कहते हैं, विदेशी आक्रान्तों के आने से धर्म की अत्यन्त हानि हुई। ऐसा हुआ होता तो वर्ण व्यवस्था भी छिन्न – भिन्न हो जानी चाहिए थी । बहुजन समाज जिस ब्राह्मणवाद के पैरों तले दब कर नरकीय जीवन जी रहा था, मुक्त हो जाना चाहिए था। वर्णवादी दीवारें टूट जानी चाहिए थी । लेकिन वह तो नहीं टूटी। उल्टे उसने दूसरे धर्मों को भी संक्रमित कर लिया। अपने धर्म की बीमारी, उन्हें भी दे दिया। उनके यहाँ भी शेख़, सैयद, पठान जैसे लोग श्रेष्ठ होने लगे और अंसारी – कुंजरा- कुरैशी – कसाई – सुलेमानी जैसे लोग निम्न। मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के जो कवि थे, उनके लिए भी यह भेदभाव एक चुनौती के रूप में था। सत्ता द्वारा हाथ खींचने के बाद भले संस्कृत जैसे शास्त्रीय रंगमंच धीरे – धीरे लुप्त हो गया। ब्राह्मणों द्वारा घोषित देवभाषा मुख्यधारा से कट कर एक छोटी नाली में तब्दील हो गयी, लेकिन सदियों से जो लोक रंगमंच सत्ता से दूर रहा, वह जन – जन में बहता रहा। कभी सूखी नहीं, न इसका जल सड़ा। नये – नये रूपों – शैलियों में ढल कर गली – नुक्कड़ों – चौराहों पर सत्संग के रूप में कभी कबीर के दोहे के माध्यम से अभिव्यक्त होता रहा। तो कभी रैदास के कवित्त द्वारा कर्मकाण्ड, धार्मिक कट्टरता पर प्रहार करता रहा। पीपा, सेना जैसे दर्जनों ऐसे कवि थे जो सामाजिक अन्तर्विरोधों को लाते रहे। अपने समय में फुले ने भी यही किया। सामाजिक – सांस्कृतिक आन्दोलन में कई तरह के प्रयोग किये। ये सारी छोटी – छोटी लड़ाइयाँ जब एक बड़ी लड़ाई में बदल जाती हैं तो लड़ने वालों को जहाँ एक आत्मविश्वास मिलता है, वहीं शत्रु पक्ष के अन्दर एक असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो जाती है। एक डर का अहसास होता है लेकिन सामने वाले के सम्मुख उसे जाहिर नहीं होने देता है। अपनी कमजोरी से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए अगल – बगल तरह – तरह के भ्रम खड़े करता है। कभी कहता है कि कहाँ है जाति ? अब जाति व्यवस्था आउटडेटेड हो गया है। इस पर बात करने की कोई ज़रूरत नहीं है। जो बात कर रहे हैं, वे जातिवादी हैं। समाज को बाँटने वाले हैं।

यही कारण है कि दलित रंगमंच जब अम्बेडकर की अवधारणा के आधार पर जाति उन्मूलन की स्थापना रखता है तो मुख्यधारा यानी सत्ता पक्ष के रंगकर्मी बौखला उठते हैं। उन्हें ऐसे नाटकों से कोई एतराज नहीं जो जाति प्रश्न को नाटकों में उठाते हैं, जातिगत भेदभाव दिखा कर संवेदना प्रकट करते हैं। पौराणिक कथाओं से उठाए गये कर्ण जैसे चरित्र पर बनाए गये नाटकों के मंचन से भी उन्हें परेशानी नहीं होती हैं। परेशानी होती है शम्बूक जैसे पौराणिक चरित्र से जो राम के बहाने डायरेक्ट वर्ण व्यवस्था पर अटैक करता है। इसलिए कर्ण जैसे चरित्रों पर तो नाटक करने की इन दिनों होड़ मची है लेकिन इनसे अगर शंबूक पर नाटक करने को कहिए तो साँप सूंघ जाएगा। पौराणिकता में ऐसे अनगिनत पात्र हैं, लेकिन उनसे जानबूझ कर दूरी बना कर रखते हैं क्योंकि उससे ब्राह्मणवाद के घेरे में आने की सम्भावना रहती है जो उन्हें शूट नहीं करता है। सत्ता पक्ष को भी जाति प्रश्न पर ऐसे ही नाटक भाते हैं जो ज़्यादा मुखर न हो। ब्राह्मणवाद को चुनौती देता हुआ न हो। वरना उसे करने ही नहीं देंगे। और दलित रंगमंच भी वही कर सकता है जो इसकी पीड़ा को कुछ जानता हो। वैचारिक रूप से सहमत हो कि समाज में जो भेदभाव है, उसे दूर होना चाहिए। या इसके लिए जो दोषी है, उसे चिन्हित करना चाहिए। जो इससे असहमति रखता है, मेरे ख्याल से दलित रंगमंच के साथ ईमानदारी से न्याय नहीं कर सकता है। हालाँकि मैं यह नहीं मानता की दलित रंगमंच के लिए कलाकार को दलित ही होना चाहिए। ग़ैर दलित भी दलित रंगमंच कर सकता है। लेकिन तब यह जरूरी है कि रंगकर्मी को दलित रंगमंच की जो वैचारिकी है, उससे सहमत हो। अगर दिखावे के लिए आप दलित रंगमंच करेंगे तो आज नहीं तो कल आपके अन्दर का सच सामने आ जाएगा। आप अगर अन्दर से ब्राह्मणवादी विचारधारा के होंगे तो किसी न किसी दिन किसी राजनीतिक – सामाजिक मुद्दों पर आपके लिये गये स्टैंड से आपका असली रूप सामने आ जाएगा। आप वैचारिक रूप से उसके विरोध में खड़े हो जाएँगे। या कोई आपसे भूल हो जाएगी जिससे आप बेपर्दा हो जाएँगे। अगर आप दलित समस्या से नहीं जुड़े होंगे, उनके बारे में गहराई से नहीं जानते होंगे और केवल भावुकता वश दलित रंगमंच से जुड़ेंगे तो कहीं न कहीं भूल होने की सम्भावना हो जाती है। जब तक दलित समस्या को कोई करीब से नहीं देखेगा, वैचारिक रूप से ग्राह्य नहीं करेगा, तब तक जीवन्तता से रंगमंच पर नहीं उतार पाएगा। सरसरी तौर पर जानने और अखबारी कतरनों से उसकी संवेदना नहीं आ पाएगी। बल्कि अभिजात्य व कॉर्पोरेट वर्ग के दर्शकों के लिए रंगमंच में नया स्वाद की तरह लगेगा। बल्कि दलितों पर किए गये ऐसे नाटक उनके अन्दर आनन्द उत्पन्न करता है। दलित समस्या पर उन्हें सहानुभूति प्रकट करने का अवसर मिल जाता है। कहीं से भी इस तरह के नाटक उनके अन्दर तिलमिलाहट पैदा नहीं करता है। कहीं से वे बेचैन नहीं होते हैं। सत्ता को भी ऐसे नाटकों से कोई खतरा महसूस नहीं होता है। आज भी ऐसे नाटकों की कमी नहीं है जिसमें जाति पर होने वाले शोषण को मुलायम ढंग से दिखाया जाता है, उससे किसी को आपत्ति नहीं होती है। न दर्शकों को, न सरकार को। परेशानी तब होती है जब नाटक में केवल शोषण का यथार्थ ही नहीं, उन कारणों को सामने रखने का प्रयास किया जाता है। ऐसा नहीं है कि दलित रंगमंच के आन्दोलन के पहले दलित प्रश्न किसी नाटक में नहीं आया है। कई ऐसे नाटक हैं जिसमें अस्पृश्यता के सवाल को उठाया गया है। लेकिन जिस तरह अब तक उठाया गया है, उसमें संवेदना पक्ष ही अधिक होता है। उनका जोर उसके प्रति सहानुभूति जगाना तक ही सीमित होता है। दलित रंगमंच इससे आगे का है। किसी से छिपा नहीं है कि यह जो अस्पृश्यता है, जातिगत श्रेष्ठता पर जो जोर है, यह ब्राह्मणवाद के गर्व से निकला हुआ है। जो भी सामने प्रकट रूप में दिखता है, सबका संचालन ब्राह्मणवाद से ही होता है। वो सामने नहीं आता है, हमेशा पर्दे के पीछे धर्म की आड़ में होता है। दलित रंगमंच में इस पर्दे को खींच दिया जाता है जिसे ब्राह्मणवाद बेपर्दा हो जाता है। वर्णवादी व्यवस्था की डोर कौन पकड़े हुए है, सबको पता चल जाता है। दलित रंगमंच का यही खेल धर्मवादी सत्ता को अखर जाता है। और उन सवर्ण दर्शकों को भी। तभी तो चिढ़ जाते हैं। दलित रंगमंच के बारे में उल्टा – सुलटा बकने लगते हैं। ख़ारिज करने लगते हैं। दलित रंगमंच करने वालों को जातिवादी करार देते हैं। इसे नकारने के लिए हर दांव अपनाते हैं। इन पर कलाविहीनता और अनगढ़ता का भी आरोप लगाते हैं। कहीं दलित रंगमंच मुख्य धारा में न आ जाए, इसलिए उसे इग्नोर करने की कोशिश करते हैं। इनके नाटकों के प्रति ऐसा भाव प्रकट करते हैं जैसे उसके बारे में कुछ जानते ही न हो, या उनके लिए यह रंगमंच जानने योग्य भी है।

दलित रंगमंच की जो दृढ़ वैचारिकी है , उसे बर्दाश्त करना न मुख्यधारा के रंगमंच के वश में है, न सत्ता के उनलोगों के लिए जो संविधान पर हाथ रख कर संसद में जनतंत्र के हित में बड़ी – बड़ी कसमें तो खाते हैं। पर जहाँ दलितों को उनका अधिकार देने का समय आता है तो मुंह से ब्राह्मणवादी नुकीले दाँत बाहर आते देर नहीं लगती। लेकिन सत्ता की कुर्सी कोई खींच न दे, इसका डर भी सताता रहता है। संख्या में कम होने का उन्हें भान है, इसलिए आमने – सामने की लड़ाई का रिस्क लेने में वे होशियारी नहीं समझते हैं। उनके लिए आसान होता है, आन्दोलन को इधर – उधर भटका देना। पहली कोशिश तो यही करते हैं कि किसी तरह उनको रोके। उनकी धार को आगे न बढ़ने दे। इधर – उधर कहीं भटका दे। नहीं तो समाहित कर लें।
आज का जो दौर है, किसी से छिपा नहीं है। भले कुछ लोगों को इसका अहसास न हो, लेकिन फासीवाद अब घर के अन्दर आ गया है। इस सच्चाई को झुठलाने से आपकी शंका निर्मूल नहीं होगी। और जितनी जल्दी सत्ता के चरित्र को जान जायेंगे, आपके लिए लड़ना आसान होगा। नहीं तो आज तथाकथित मुख्य धारा के रंगमंच का जो हश्र हुआ है, दलित रंगमंच के साथ भी हो जाएगा। दलित रंगमंच की सबसे बड़ी ताकत उसका विचार है। वह विचार जो उसे फुले और अम्बेडकर से प्राप्त हुआ है। जिसकी जड़ में बुद्ध, कबीर और रैदास के धम्म, दोहे और सखियाँ हैं। इनकी सीख उसी तरीके से लड़ने का रास्ता दिखाएगी जैसे अपने समय में इन्होंने अपनी लड़ाई लड़ी। लेकिन समय के अनुसार सत्ता का चरित्र भी बदल गया है। अब वो उस रूप में नहीं है जो पहले था। इसका रूप केवल राजनीतिक नहीं है। उसके साथ है धर्म की सत्ता, पूँजी की सत्ता और वर्ण – जाति की सत्ता। यह सदा अतीत की गौरवशाली परम्परा की दुहाई देकर पुराणपंथी व्यवस्था को लाने का प्रयास करता है। जितना वो अखंड राष्ट्र की बातें करता है, लोगों को जातियों में बाँटने, धर्म के स्तर पर ध्रुवीकरण करने का प्रयास करता है। सत्ता की इस मुहिम में मीडिया एक सहयोगी की भूमिका निभाता है। किसी भी विरोध को किसी भी स्तर पर जाकर बदनाम और उसके बारे में दुष्प्रचार करने का काम करता है। सत्ता ने सभी को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया हैं। जो भी महिला, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक के हित में सामने आता हैं, उसे निष्क्रिय करने में अगर संविधान से परे जाने की जरूरत पड़ती है तो जाने में उसे हिचक नहीं होती है।
ऐसे में संस्कृति की भूमिका अहम हो जाती है। एक तरफ़ जहां नगरों – महानगरों में सक्रिय रंगमंच को सत्ता – संस्थान ने सरकारी अनुदान के रस्सी से बांध रखा है, एक अदृश्य भय से मुँह पर जाब लगा रखा है, दूसरी तरफ़ जो विरोध करने वाले हैं , उन पर तरह – तरह के एक्ट लगा कर जेल में डाल रखा है। या उन्हें चुप रहने के लिए विवश का दिया है। तो फिर तीसरा रास्ता क्या बचता है ? तीसरा रास्ता दलित रंगमंच का शेष है। इस रंगमंच को अब अपनी वास्तविक भूमिका में आने की जरूरत है। जो रास्ता अम्बेडकर और पेरियार ने दिखाए थे, उस पर चलते हुए सत्ता की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
जैसे अम्बेडकर ने अपनी लड़ाई को बुनियादी सवालों से प्रारंभ किया था, दलित रंगमंच को भी अपना कार्य क्षेत्र बहुसंख्यक लोगों को बनाना होगा। सरकार और कॉर्पोरेट ने शहरों के रंगमंच को इतना महंगा कर दिया है कि दलित रंगमंच से जुड़े रंगकर्मियों के हद से बाहर है। न आने वाले दिनों में सरकार की ऐसी कोई सांस्कृतिक नीति में ऐसी सम्भावना दिखी देती है कि रंगमंच सबों के लिए उपलब्ध हो सके। अब शहरों में नए विकल्पों की तलाश शुरू कर देना चाहिए। शहरों के रंगमंच को छोड़ना नहीं है। लेकिन केवल अपने रंगकर्म को शहरों – महानगरों के दायरे तक सीमित नहीं करना है। बल्कि गाँवों से शहर को घेरने की ज़रूरत है। हमें गाँवों में जाकर वहाँ की शैलियों को सामंती जकड़न से मुक्त कराकर बहुजन की व्यथा कथा को उतारने की ज़रूरत है। जिन कथ्यों से अभिजात्य रंगमंच अभी भी नाक – भौं सिकोड़ता है, जानबूझ कर उससे बचने कि कोशिश करता है, उसे केंद्र में लाने की ज़रूरत है। नए – नये कथ्य को रंगमंच पर जगह देना है।
और वर्तमान समय में अगर दलित – आदिवासी – पिछड़े समाज के लोगों के लिए रंगमंच पर गर जगह दिला पाने में सफल हो गये तो समझिए दलित रंगमंच ज़िंदा है। फिर चाहे सामने चुनौतियाँ की लहलहाती तूफ़ान भी क्यों न हो, दलित रंगमंच उसके सामने तन कर खड़ा रहेगा। पीछे नहीं मुड़ेगा, आगे बढ़ता रहेगा। सामने चाहे ब्राह्मणवाद हो या फासीवाद।










