आवरण कथादेशशिक्षा

शिक्षा नीति और सामाजिक विभेद

नीति राजसत्ता की वह परिकल्पना होती है, जो यह दिखाती है कि व्यवस्था को किन रास्तों से होकर कहाँ तक ले जाना है। इसकी भूमिका दिशा-निर्देशक की होती है। राज्य नीतियाँ बनाता है और फिर उन नीतियों को अमल में लाने के लिए क्रियान्वयन की योजना का निर्माण करता है। यद्यपि नीतियाँ न तो बाध्यकारी होती हैं और न ही उनका कोई कानूनी आधार होता है। फिर भी एक नैतिक दबाव बनाने में इनकी भूमिका होती है। अन्य नीतियों की तरह इस शिक्षा नीति का भी यही महत्त्व है कि यह शिक्षा का अवसर मुहैया कराने और उसका परिणाम प्राप्त करने के दृष्टिकोण को उजागर करती है।

पाँच वर्षों की लम्बी कवायद के बाद मंत्रिमंडल से स्वीकृत होकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अब आकार ले चुकी है। शिक्षा चूँकि सामाजिक परिवर्तन का सर्वाधिक शक्तिशाली माध्यम है, इसलिए इस शिक्षा नीति में बच्चों तक शिक्षा की सर्वव्यापी पहुँच और बच्चों के विनिर्माण की दिशा का अवलोकन महत्त्वपूर्ण हो जाता है। भारतीय सामाजिक श्रेणीबद्धता की परिस्थितियों में सबसे अन्त में खड़े बच्चे तक किस तरह पहुँच बनाने और फिर उनका किस तरह का निर्माण करने की दृष्टि इस शिक्षा नीति की है, यह परखने की जरूरत है।

सबसे पहले बात करते हैं विद्यालयों की उपलब्धता की नीति पर। भारत की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण विद्यालय की पहुँच को सुगम बनाना आधारभूत आवश्यकता है, अन्यथा किसी भी योजना का, चाहे वह कितना भी सुविचारित और महत्वाकांक्षी क्यों न हो, कोई अर्थ नहीं रह जाता है। भारत में पहले से ही विद्यालयों की आवश्यकतानुसार पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, उसमें भी माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तक पहुँच, अनेक इलाकों में, अभी भी सुलभ नहीं है। देश में पहले से ही विभिन्न राज्य सरकारें लाखों विद्यालयों को बन्द कर चुकी हैं और यह सिलसिला लगातार जारी भी है। अब तक बन्द किए गये वे विद्यालय किसी नीति के तहत नहीं, बल्कि भूमि, भवन, छात्र संख्या आदि अनेक प्रकार के बहानों के तहत किए गये। लेकिन भारत के स्वातंत्र्योत्तर इतिहास में पहली बार इस शिक्षा नीति के द्वारा अब विद्यालयों को बन्द किए जाने को नैतिक आधार प्रदान किया गया है। शिक्षा नीति 2020 में स्कूल कॉम्प्लेक्स के वर्णन पर आधारित अनुच्छेद 7 की शुरुआत ही यह बताने से होती है कि 28% प्राथमिक और 4.8% उच्चतर प्राथमिक विद्यालयों में 30 से कम छात्र हैं और 2016-17 में ही 1,08,017 एकल स्कूल थे (7.1)। यह माना गया है कि इन छोटे विद्यालयों में संसाधन उपलब्ध कराना ‘व्यावहारिक’ नहीं है (7.2) और ऐसे विद्यालयों के होने से शिक्षण-प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है (7.3)। इसलिए विद्यालयों का समेकन ही उपयुक्त उपाय है (7.4)। समेकन की प्रक्रिया को अंजाम देते हुए 2025 तक विद्यालयों की संख्या को समुचित रूप दिया जाएगा (7.5) और इसके लिए 5 से 10 किलोमीटर की परिधि के आँगनबाड़ी और अन्य छोटे स्कूलों को समाहित करके विद्यालय परिसर या क्लस्टर का निर्माण किया जाएगा (7.6)। इसका अर्थ होता है कि यह शिक्षा नीति बड़े पैमाने पर विद्यालयों को बन्द करने की अनुशंसा करती है। शब्दों में तो यह नहीं कहा गया है कि सभी बच्चों तक  शिक्षा की पहुँच को सुलभ बनाने की नीति से वह अपने हाथ खींच रही है। प्रकट रूप में वह ऐसा कह भी नहीं सकती है, क्योंकि ऐसा कहने से रोकने के लिए शिक्षा अधिकार अधिनियम की संवैधानिक व्यवस्था सामने खड़ी हो जाएगी। मगर उपर्युक्त बातों से यही मंशा जाहिर होती है। इस नीति पर अमल करते हुए प्रत्येक प्रखण्ड में पीएमश्री विद्यालयों की शुरुआत कर दी गयी है, जो शिक्षा नीति के अनुच्छेद 7.1 के अनुकूल है कि 5 से 10 किलोमीटर की परिधि में पड़ोस की आँगनबाड़ियों और अन्य छोटे स्कूल को समाहित कर विद्यालय परिसर का निर्माण किया जाएगा। इसका सबसे ज़्यादा और घातक प्रभाव कमजोर वर्ग के बच्चों, विशेषकर बच्चियों और दिव्यांगों पर पड़ेगा। विद्यालय की दूरी हमेशा नामांकन दर में कमी और छीजन दर में वृद्धि का कारण बनता है।

इतना ही नहीं है। व्यापार की चारित्रिक विशेषता व्यापारिक अवसरों के खाली स्थान को तलाशना है। जब बड़े पैमाने पर सरकारी विद्यालयों को बन्द किया जाएगा तो उन खाली स्थानों  को निजी विद्यालयों से भरने का अवसर भी इस नीति में सृजित किया गया है। इन निजी विद्यालयों को ‘प्रोत्साहित’ करने के लिए मूल्यांकन, प्रमाणन, मापदण्ड, बेंचमार्क और प्रक्रियाओं में ‘पूरी छूट’ दी जाएगी (8.7)। अर्थात किसी में पढ़ने की लालसा है और उसकी जेब में पैसा है, वह उस पैसे को हड़पने के तिकड़म में बैठे उन निजी विद्यालयों में जाये। यह सब नीतिगत स्तर पर होगा।

मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा हर बच्चे का जन्मसिद्ध और संवैधानिक अधिकार है, यह मानकर कल तक सार्वजनिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण के लिए गाँव-गाँव, टोले-टोले में विद्यालय खोले जा रहे थे कि एक भी बच्चा अशिक्षा के अंधकार में डूबा हुआ न रह जाए। और अब, नीतिगत रूप से यह तय किया जा रहा है कि 2025 तक बहुतेरे विद्यालयों को बन्द कर दिया जाए। प्रश्न केवल उन संवेदनशील बुद्धिजीवियों का नहीं है, जो सार्वजनिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के पक्ष में खड़े हैं, प्रश्न असल में उन करोड़ों आदिवासियों, दलितों-महादलितों, गरीबों के बच्चे-बच्चियों और दिव्यांगों की पहुँच का है, जिनमें से बहुतेरों को सूरज की लालिमा का अभी आभास ही हुआ था। समृद्ध लोग तो महँगी फीस देकर और दूर भेजकर भी अपने बच्चों को पढ़ा लेंगे, लेकिन सर्वहारा समुदाय के उन असंख्य बच्चों का क्या होगा, जो पहली बार घर की दहलीज लाँघकर अभी स्कूल की ओर जाने वाले रास्ते में ही थे? इससे ‘अवसर की समानता’ का संवैधानिक संकल्प और ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा का सपना मंजिल पर पहुँचने के पहले ही दम तोड़ देगा।

एक तरफ तो विद्यालयों को बन्द किया जाना है, उसके बदले दूसरी तरफ कमजोर और वंचित वर्ग के उन बच्चों के लिए, जो सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक या शारीरिक कारणों से विद्यालय पहुँचकर औपचारिक शिक्षा में शामिल नहीं हो सकते हैं, उनके लिए ऑनलाइन, दूरस्थ और डिजिटल शिक्षा का विकल्प प्रस्तुत किया गया है। इन विकल्पों की जिस तरह अनुशंसा की गयी है, उसे देखकर तो विश्वास ही नहीं होता है कि यह भारतीय सामाजिक सन्दर्भों में की गयी अनुशंसा है। इस नीति के दो लम्बे-लम्बे अनुच्छेद – 23 और 24 – प्रौद्योगिकी के उपयोग और डिजिटल एवं दूरस्थ शिक्षा में इसका उपयोग सुनिश्चित करने पर ही केन्द्रित हैं। इन दोनों अनुच्छेदों के अलावा बीच-बीच में भी बच्चों की शिक्षा, यहाँ तक कि कक्षा तीन के बच्चों की भी शिक्षा, दलित, आदिवासी, बच्चियों और दिव्यांगों की शिक्षा, परीक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण और मॉनिटरिंग के लिए भी इसके निर्भर-योग्य उपयोग-प्रयोग की अनुशंसा की गयी है (6.5)।

जिस एलेक्ट्रोनिक डिवाइस आधारित शिक्षा पर इतना जोर दिया गया है, उस आभासी शिक्षा के शिक्षाशास्त्रीय पहलू की तो बात ही अलग है। पहले तो उस तक बच्चों की पहुँच का सवाल ही प्रश्नों के घेरे में है। जिस समय इस नीति के माध्यम से दूरस्थ और डिजिटल शिक्षा की पैरवी की जा रही थी, उसी समय जनवरी से मार्च 2019 के बीच नेल्सन के सर्वेक्षण ‘इंडिया इण्टरनेट 2019 के अनुसार भारत में महज 36% लोगों की पहुँच इण्टरनेट तक है। खुद एनसीईआरटी के सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक सीबीएसई के केंद्रीय, जवाहर और अन्य विद्यालयों में 27% छात्रों के पास फोन और लैपटॉप की सुविधा नहीं है। 84% छात्र केवल फोन के जरिए क्लास में शामिल होते हैं और केवल 17% के पास ही लैपटॉप की सुविधा है। यह नतीजा उन बच्चों पर किए गये सर्वे का है, जो अपेक्षाकृत खाते-पीते परिवारों से आते हैं और प्राय: शहरों या कस्बों में रहते हैं। इस शिक्षा नीति के लागू होने के छह वर्षों के बाद आज भी हालात बेहतर नहीं हैं। ग्लोबल डिजिटल ग्लोबल डिजिटल रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत में यद्यपि 76.6% लोग सेलुलर फोन का इस्तेमाल करते हैं, मगर उनमें 652 मिलियन अर्थात् 44.7% लोग अभी भी इण्टरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इसका अर्थ है कि क़रीब 45% लोग डिजिटल शिक्षा के दायरे से बाहर होंगे। ये वंचित और पिछड़े हुए समुदाय के लोग ही हैं।

इस दौड़ में बिहार जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य का चेहरा तो और भी उदास करनेवाला है। 25 मई, 2020 को द वायर में ‘व्हाट अ सर्वे ऑफ चिल्ड्रेन इन बिहार रिवील्ड अबाउट ऑनलाइन स्कूलिंग’ शीर्षक से प्रकाशित ज्योत्स्ना झा और नेहा घटक की रिपोर्ट के अनुसार पटना और मुजफ्फरपुर जिले में सरकारी स्कूल में पढ़नेवाले वर्ग 7 और 8 के 733 बच्चों से फोन पर बातचीत करने की कोशिश की गयी। इसमें 253 बच्चे और 480 बच्चियाँ थीं। रिपोर्ट कहती है कि इन 733 बच्चों में से 202 (अर्थात 28%) के पास फोन नहीं था और 154 (अर्थात 21%) का फोन ऑपरेशनल नहीं था। अर्थात इनमें से आधे के पास मोबाइल के माध्यम से पहुँच नहीं बनाई जा सकी। 277 (38%) के पास स्मार्ट फोन और 114 (16%) के पास दूसरे फोन थे। स्मार्ट फोन रखने वाले आधे ऐसे थे, जिनके पास हमेशा इण्टरनेट नहीं रहता है। इनमें 36% बच्चे की तुलना में 28% बच्चियाँ ही स्मार्ट फोन का इस्तेमाल कर पा रही थीं। 95% फोन घर के पुरुष सदस्य के थे, जो दिन में काम के सिलसिले में घर से बाहर रहते हैं।

इसीलिए क्वाक्वेरेली साइमंड्स (क्यूएस) की रिपोर्ट “कोविड-19 : अ वेक अप कॉल फॉर टेलीकॉम प्रोवाइडर” के अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत अभी ऑनलाइन लर्निंग में शिफ्ट होने के लिए तैयार नहीं है।

इतनी कमजोर पृष्ठभूमि वाले समाज में भी सरकार किस तरह डिजिटल शिक्षा बहाल करने पर आमादा है, यह देखना बेहद दिलचस्प है। केंद्रीय शिक्षामन्त्री ने इस वैकल्पिक राह को व्यापक रूप से अपनाए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए ट्वीट किया था कि इससे 3.7 करोड़ उच्च शिक्षा के छात्रों को लाभ होगा और उनकी क्षमता-वृद्धि होगी। उनकी प्रसन्नता का विषय था कि 20% से 40% तक ऑनलाइन शिक्षा में वृद्धि होगी। यह प्रसन्नता जाहिर करती है कि यह सब सरकार की इच्छा और सोच के अनुरूप हो रहा है। शिक्षा नीति 2020 में कक्षा 3 से शुरू कर उच्च शिक्षा तक जिस तरह ऑनलाइन शिक्षा को अमल में लाने का प्रस्ताव दिया गया है , इससे भी जाहिर होता है कि यह सरकार की दीर्घकालिक सोच का परिणाम है। नयी शिक्षा नीति आने के पहले ही ई-विद्या कार्यक्रम के तहत वित्तमन्त्री निर्मला सितारामन ने 17 मई को ‘स्टडी फ्रॉम होम’ की शुरुआत करते हुए देश के 100 शीर्षस्थ विश्वविद्यालयों में 30 मई, 2020 तक ऑनलाइन कोर्स के स्वत: प्रारम्भ होने की घोषणा की। 182 पृष्ठों में वर्णित ‘वन कंट्री, वन डिजिटल प्लेटफॉर्म’ के तहत शुरू किए गये दीक्षा द्वारा 14 भाषाओं में सीखने-सिखाने की तैयारी कर ली गयी है। ‘वन क्लास, वन चैनल’ की योजना के तहत कक्षा 1 से 12वीं तक की प्रत्येक कक्षा के लिए एक स्वतंत्र रूप से समर्पित टीवी चैनल होगा। 289 सामुदायिक रेडियो को स्कूली शिक्षा के लिए चिन्हित कर लिया गया है। सीबीएसई का पॉडकास्ट ऐप शिक्षावाणी प्ले स्टोर में उपलब्ध है। 32 डीटीएच चैनल्स स्वयंप्रभा के नाम से इन शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए समर्पित हैं। किशोर मंच (चैनल नं. 31) एनसीईआरटी के द्वारा व्यवहार में लाया जाता है। ये चैनल डीडी, डिश टीवी और जियो टीवी ऐप पर उपलब्ध हैं। एनआईओएस अपने यहाँ नामांकित माध्यमिक, उच्च माध्यमिक और व्यावसायिक कक्षा के छात्रों के लिए वेब आधारित पर्सनल कॉन्टैक्ट प्रोग्राम (पीसीपीज) मुक्त विद्या वाणी कार्यक्रम चलाता है। एनआईओएस ही दृष्टिबाधितों के लिए डेज़ी चलाता है, जो स्वयंप्रभा के चैनल 30 ज्ञानमित्र पर भी उपलब्ध है। बधिरों के लिए भी एनआईओएस के द्वारा उसके वैबसाइट और यूट्यूब पर सामग्री उपलब्ध है।

यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि सरकारी विद्यालयों में, विशेषकर बिहार-जैसे प्रांत के सरकारी विद्यालयों में, उस तबके के विद्यार्थी पढ़ते हैं, जो पढ़ाने के बदले अपने बच्चों को किसी के यहाँ बर्तन माँजने के काम पर लगाना ज्यादा लाभदायक समझते हैं तो बड़ी स्वाभाविकता से इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि विद्यालयों को बन्द करने और उसके बदले ऑनलाइन का मायाजाल पसारने के पीछे एकमात्र उद्देश्य कमजोर समूहों को शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर ढकेल देना है। जिस टेक्नोलोजी-निर्भर शिक्षा का प्रयोग सहायक साधन के रूप में होना चाहिए था, वह सहायक साधन भी केवल समृद्ध समूहों के लिए ही उपलब्ध हो सकेगा, उसे ही मुख्य साधन बना दिया गया है। यह उसी तरह है, जैसे भोजन नदारद करके केवल नमक परोस दिया जाय। परिणाम यह होगा कि जिन आँखों में सपनों के पंख अभी उगने ही लगे थे, अब उन करोड़ों तृषित आँखों के सपने अशिक्षा की कालकोठरी में फिर से बन्द कर दिये जाएँगे।

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अनिल कुमार रॉय

लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता और ‘आसा’ के संयोजक हैं| सम्पर्क +919934036404, dranilkumarroy@gmail.com
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