
सामाजिक न्याय की अवधारणा हमारे देश में कई विडम्बनाओं की शिकार हो गयी है। इन विडम्बनाओं का वास्ता एक तरफ बहुत अल्पकालिक हितों के लिए चल रही तात्कालिक राजनीति के दाँव पेचों से है तो दूसरी तरफ उस ऐतिहासिक प्रक्रिया से भी है जो आजादी की लड़ाई के दौर में भी विकसित हो रही राष्ट्रीयता के समानान्तर चलती रही। यह महज इत्तिफाक नहीं है कि 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम के चार साल पहले 1853 में सावित्रीबाई फुले ‘बाल हत्या प्रतिबन्धक गृह’ नाम की संस्था खड़ी करती हैं और उसी साल लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के लिए आधुनिक शिक्षा नीति लागू करने का एलान करते हैं। स्कूलों के दरवाजे अछूतों के लिए भी कानूनी तौर पर खुल जाते हैं, हालाँकि इसमें सामाजिक अड़चनें बिल्कुल पहाड़ जैसी हैं। चंद्रभान प्रसाद जैसे दलित विमर्शकार मानते हैं कि दरअसल 1857 में आम जन की भागीदारी की एक वजह इस फैसले से पैदा हुआ असन्तोष भी था।
यानी इस दलील पर भरोसा करें तो स्वाधीनता संग्राम और समानता या सामाजिक न्याय के आग्रह के बीच एक फासला बिल्कुल प्रारम्भ से रहा।
उन्नीसवीं सदी में जो राष्ट्रवादी भावना भारत में विकसित हुई, उस पर हिन्दूवादी विचार की बहुत गहरी छाया थी। सुधीरचंद्र जैसे जाने-माने इतिहासकार बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी से ही हिन्दुत्व की एक धारा राष्ट्रीयता की मुख्यधारा का हिस्सा बनी रही। जाहिर है, सामाजिक बदलाव के जरूरी प्रश्न इस दौर में स्थगित से रहे।
निस्सन्देह बीसवीं सदी में दलित प्रश्न तरह-तरह से सामने आता है। गाँधी अस्पृश्यता निवारण और अछूतोद्धार को अपना मुख्य कार्यक्रम बनाते हैं और अम्बेडकर मूक नायक जैसा अखबार निकालते हैं। दक्षिण भारत में पेरियार ब्राह्मणवाद के किले को तहस-नहस करने में जुटे हैं। शुरू में वे कॉंग्रेस से जुड़ते हैं, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हो जाता है, वे कॉंग्रेस को ब्राह्मणों की पार्टी करार देते हैं। बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक तक आते-आते यह दलित-वंचित अभिव्यक्ति इतनी प्रबल हो उठती है कि 1932 में अँग्रेज सरकार कम्युनल अवार्ड लेकर चली आती है जिसमें दलितों सहित अलग-अलग वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक-मण्डल की सिफारिश की जाती है। गाँधी इस अवार्ड का प्रबल विरोध करते हैं। वे इसके विरुद्ध आमरण अनशन करते हैं और उनको बचाए रखने के दबाव में बीआर अम्बेडकर उनसे वह समझौता करने को मजबूर होते हैं जिसे ऐतिहासिक पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। दिलचस्प यह है कि इस पूना पैक्ट में भी जितनी सारी शर्तें हैं, उन पर अमल नहीं होता।
तो स्वाधीनता की लड़ाई और समानता की लड़ाई लगभग समानान्तर चल रही है। गाँधी दोनों के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन बाकी भारत को लगता है कि अगर स्वाधीनता मिल जाए तो उसके बाद समानता का मसला हल कर लिया जाएगा। हालाँकि अम्बेडकर इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट हैं कि जब तक सामाजिक गुलामी की बेड़ियाँ नहीं टूटतीं तब तक आजादी का दलितों के लिए कोई ज़्यादा मोल नहीं है। बरसों पहले अम्बेडकर के इन्हीं विचारों पर हमला करते हुए सम्पादक से सांसद और फिर एनडीए सरकार में मन्त्री बने अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फॉल्स गॉड्स’ में अम्बेडकर को अँग्रेजों का पिट्ठू बताने की नासमझी प्रदर्शित की थी। निश्चय ही आजादी के बाद का अनुभव बताता है कि अम्बेडकर का अन्देशा सही था- अँग्रेजों से आजादी मिल गयी, भेदभाव और अस्पृश्यता से आजादी अब तक नहीं मिल पायी है। सामाजिक न्याय का मुद्दा स्वाधीनता के जश्न में लगातार स्थगित होता चला गया।
हालाँकि संविधान सभा में लम्बी चली बहसों के बाद बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान के जिस अन्तिम प्रारूप को आकार दिया था, उसमें सामाजिक न्याय के लिए गुंजाइश थी। दलितों और आदिवासियों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गयी। यहाँ एक दिलचस्प भ्रम का जिक्र करना जरूरी है। अक्सर यह बात कही जाती है कि अम्बेडकर ने आरक्षण की यह व्यवस्था दस साल के लिए की थी। लेकिन यह सच नहीं है। सच यह है कि संसद और विधानसभाओं में आरक्षण की व्यवस्था बेशक, दस साल के लिए थी जिसे बढ़ाया जाता रहा, लेकिन नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण की ऐसी समय सीमा नहीं था। अम्बेडकर इतने भोले नहीं थे कि मान लें कि दस साल में भारतीय समाज सामाजिक न्याय के प्रति ईमानदार हो उठेगा। उनका यह वाक्य मशहूर है कि संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो, उसकी सफलता उसे लागू करने वालों पर निर्भर है।
इस ढंग से देखें तो हम पाते हैं कि अम्बेडकर का अन्देशा सही साबित हुआ है। सामाजिक न्याय और आरक्षण की अवधारणा के प्रति भारत के सवर्ण तबकों में गहरी वितृष्णा और असन्तोष का भाव है। वे तरह-तरह से इसे गलत ठहराते रहे हैं। उन्होंने इसे प्रतिभा और प्रतियोगिता के विरुद्ध पिछड़ेपन को मान्यता दिलाने का औजार मान लिया है। आरक्षण प्राप्त बच्चों और अधिकारियों के प्रति वे अपनी घृणा बिल्कुल सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित करने में हिचकते नहीं हैं।
इस मानसिकता के बीच भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान और प्रशासन तन्त्र पर अगड़ी जातियों के वर्चस्व ने दलितों-आदिवासियों में ही नहीं, अन्य पिछड़ी मानी जाने वाली जातियों में गहरा असन्तोष पैदा किया। साठ के दशक में परवान चढ़े समाजवादी आन्दोलन ने सामाजिक न्याय और आरक्षण को एक बड़ा मुद्दा बनाया। डॉ राममनोहर लोहिया ने उन्हीं दिनों नारा दिया था- संसोपा ने बांधी गाँठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ। हालाँकि अम्बेडकर इकहरे आरक्षणवाद के खतरों से वाकिफ थे और उन्होंने कहा था कि अगर सिर्फ जाति के आधार पर सारी लड़ाई लड़ी गयी तो भारत एक हजार जातियों में बँट जाएगा।
सामाजिक न्याय और आरक्षण की इस लड़ाई को 90 के दशक ने एक नया राजनीतिक आयाम दे डाला। भाजपा और वाम के बाहरी समर्थन से चल रही अपनी सरकार से देवीलाल के अलग होने के बाद प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ों के आरक्षण को लेकर बनाए गये बीपी मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू करने का एलान किया और भारतीय राजनीति भी हमेशा-हमेशा के लिए बदल गयी और सामाजिक न्याय की लड़ाई भी। देवीलाल तो इस लड़ाई में पीछे छूट ही गये, मध्यवर्ग के नायक रहे वीपी सिंह अचानक गरीबों के मसीहा की तरह उभरते नजर आये। ये वे दिन थे जब राम मन्दिर आन्दोलन से भाजपा अपने लिए ईंधन हासिल करने की कोशिश में थी और माना जाता है कि मण्डल के उफान से निबटने के लिए भी भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी राम मन्दिर यात्रा शुरू की। मण्डल और कमण्डल का यह टकराव आने वाले कई बरसों तक- बल्कि अब तक- भारतीय राजनीति की दिशा-दशा तय करता रहा है।
दरअसल नब्बे के बाद मण्डल के चले आन्दोलन के दौरान सबकी यह समझ साफ हुई कि आरक्षण बस नौकरियों का मामला नहीं है, यह संसधानों में हिस्सेदारी के सवाल से जुड़ा है। यह सामाजिक-राजनीतिक यथास्थिति को तोड़ने का एक बड़ा उपकरण साबित हो सकता था। बिहार में लालू यादव, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सहित कई राज्यों में जो पिछड़ा नेतृत्व उभरा, वह इसी प्रक्रिया की देन था। इस प्रक्रिया का ही दबाव था कि मण्डल और कमण्डल के इस झगड़े में भाजपा अपनी सोशल इंजीनयिरिंग ले आयी। कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे पिछड़े चेहरे भाजपा के मन्दिर आन्दोलन की अग्रिम नेतृत्व पंक्ति में आ खड़े हुए। दूसरी बात यह हुई कि मण्डल की मार्फत सामाजिक न्याय की पहचान और प्रतीक बने नेताओं के निजी आचरण और वैचारिक संघर्ष में जो फाँक दिखी, उसने एक बड़ी सम्भावना को एक नयी यथास्थिति में बदल दिया। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद पिछड़ा-दलित एकता का जो ऐतिहासिक रास्ता मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने मिलकर बनाया, वह भी अगले दो साल में राजनीतिक टकराव के कांटों से बिंध गया। बरसों बाद मायावती ने यूपी के मुख्यमन्त्री के तौर पर पहली दलित महिला मुख्यमन्त्री बनने का खिताब हासिल किया, लेकिन उसकी रचनात्मक सम्भावनाओं का वे पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाईं।
इस ढंग से देखें तो सामाजिक न्याय की राजनीति की कुछ जानी-पहचानी विडम्बनाएँ रही हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यही दिखती रही कि सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़े लगभग सभी राजनैतिक दलों ने अपने सांगठनिक विस्तार और अपनी जनतान्त्रिक प्रतिबद्धताओं के प्रति कोई निष्ठा नहीं दिखायी। सब व्यक्तिगत निष्ठाओं पर चलने वाली पार्टियाँ रहीं। सब पर वंशवाद के आरोप लगे। लालू यादव की राजनीति पहले राबड़ी देवी के नाम पर चली और अब उनके बेटे तेजस्वी यादव चला रहे हैं। मुलायम सिंह यादव की विरासत अखिलेश यादव और राम विलास पासवान की विरासत चिराग पासवान आगे बढ़ा रहे हैं। दूसरी विडम्बना यह रही कि इनमें से ज्यादातर दलों और नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। तीसरी विडम्बना यह रही कि इन सब नेताओं ने गठजोड़ की राजनीति के इस दौर में निजी महत्वाकांक्षाओं को इतनी अहमियत दी कि राजनीति पीछे छूट गयी।
लेकिन क्या ये सारे के सारे आरोप बिना किसी अपवाद के भाजपा और कॉंग्रेस पर नहीं लगाए जा सकते हैं? भ्रष्टाचार, वंशवाद, जातिवाद- इन सबका खेल ख़ुद को मुख्यधारा का मानने वाले राजनीतिक दल भी खूब खेलते रहे। भाजपा तो साम्प्रदायिकता का जो घिनौना खेल खेल रही है, उसमें पूरे भारतीय समाज की बुनावट को तार-तार करने की जिद और संविधान के लोकतान्त्रिक मिजाज को बदलने की मंशा साफ दिखाई पड़ती है। कॉंग्रेस भी अपनी ऐतिहासिक भूमिका को पीछे छोड़ अपने पुनर्संस्कार की कोशिश में लगी है, लेकिन उसे सांगठनिक और वैचारिक स्तर पर अभी कई इम्तिहान पास करने हैं।
बहरहाल, सतह पर देखें तो लगता है जैसे सामाजिक न्याय की राजनीति नाकाम हो चुकी है। लेकिन सच्चाई कुछ और है। भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय का चक्का कुछ इस तरह घूमा है कि अब बिहार-यूपी, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसी अगड़ी जाति के नेता का मुख्यमन्त्री बनना आसान नहीं रह गया है। 90 के दशक में लालू यादव पर यह इल्जाम लगा कि उन्होंने बिहार में भूरा बाल- यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला- को साफ करने की बात कही है। हालाँकि लालू यादव इससे इनकार करते रहे, लेकिन यह सच है कि प्रतीकात्मक तौर पर बिहार में तो उन्होंने भूरा बाल वाकई साफ कर दिया। 1980 से 1990 के बीच बिहार में अगड़ी जातियों के पाँच मुख्यमन्त्री बने- जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आजाद, सच्चिदानंद सिन्हा और चंद्रशेखर सिंह- लेकिन 1990 के बाद से अब तक यानी 35 साल में एक भी अगड़ा मुख्यमन्त्री नहीं बन सका। लालू यादव के राबड़ी देवी, नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी ने ही सत्ता संभाली। नीतीश कुमार ने भाजपा से बार-बार समझौता किया, लेकिन मण्डल की काट के लिए उन्होंने मण्डल में ही नयी तहें पैदा करने का काम किया। पिछड़ों में अतिपिछड़े खोजे, दलितों के बीच महादलित निकाल लिया। इसी तरह मुसलमानों में पसमांदा मुसलमान की बात की। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने गैरजाटव दलितों और गैरयादव पिछड़ों को जोड़ने की राजनीति पर अमल कर अपना काफ़ी विस्तार किया।
तो अंततः यह पिछड़ी राजनीति का ही मुद्दा है- सामाजिक न्याय का ही- जो कम से कम बिहार की राजनीतिक दिशा तय करता रहा है। यूपी में बेशक राम मन्दिर आन्दोलन ने हालात भिन्न कर दिए हैं। वहाँ एक घनघोर साम्प्रदायिक, अल्पसंख्यक विरोधी और कई अर्थों में कानून और संविधान के प्रति गहरी अवज्ञा से भरी सरकार काम कर रही है। वह फर्ज़ी मुठभेड़ों को न्याय की शक्ल दे रही है, अल्पसंख्यकों और आन्दोलनकारियों के घर बुलडोजर से ढहा रही है और कई लोगों पर जाली मुकदमे कर रही है। यह सबकुछ राम और विकास के नाम पर हो रहा है। सामाजिक न्याय की राजनीति को विकास-विरोधी भी बताया जा रहा है।
तो सामाजिक न्याय की राजनीति की जो आलोचना ऊपर की गयी है, उसका मकसद उसे ख़ारिज करना नहीं है। दरअसल यह सामाजिक न्याय ही है जो इस देश की विविधता को उसकी सारी क्षमता के साथ बचाए रख सकता है, उसे नये सोपानों तक ले जा सकता है। आरक्षण फिलहाल इस सामाजिक न्याय का अपरिहार्य जरिया है जो नौकरियों और शिक्षा में रिश्वत, सिफारिश, और पूंजी के दुष्चक्र तो तोड़ सकता है। जो लोग योग्यता को आरक्षण के विरोध में खड़ा करते हैं, वे दरअसल भूल जाते हैं कि इस तथाकथित योग्यता के पीछे ट्यूशन, कोचिंग और बहुत सारे संसाधनों की भूमिका है, जबकि आरक्षण हासिल करने वाले ज़्यादातर बच्चे ऐतिहासिक तौर पर अपने पिछड़ेपन के शिकार रहते हैं।
मगर यही पिछड़े लोग इस देश का भविष्य हो सकते हैं। वे आगे आ रहे हैं, वे आगे आएँगे, वे अपनी राजनीति बदलेंगे, अपना समाज भी बदलेंगे। इस सामाजिक न्याय की राजनीति और आरक्षण की व्यवस्था की अपरिहार्यता का ही नतीजा है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भी एक चुनाव से पहले कही गयी अपनी बात दूसरे चुनाव से पहले वापस लेनी पड़ती है और बताना पड़ता है कि आरक्षण बना रहेगा। अभी जो दलित-पिछड़ा नेतृत्व है, उसके सामने मॉडल के रूप में अब तक का अगड़ा नेतृत्व ही रहा है, जब उसके पास पहली बार ताकत आई है तो वह उस ताकत का इस्तेमाल उसी तरह कर रहा है जिस तरह उसने अपने पहले के शासक वर्ग को करते देखा है। लेकिन यह यथास्थिति बहुत देर तक टिकेगी नहीं। क्योंकि अंततः पिछड़ी जमातें देर-सबेर यह महसूस करेंगी कि उनका नेतृत्व भी उनका इस्तेमाल भर कर रहा है। वे नये विकल्पों की ओर- नयी वैकल्पिक राजनीति की ओर- जाएँगी। अगर वे नहीं जाती हैं तो फिर हम पाएँगे कि सामाजिक न्याय की कामना को साम्प्रदायिक राजनीति का तूफान नष्ट कर दे रहा है। तो चुनौती जितनी बड़ी है, अवसर भी उतना ही बड़ा है- सामाजिक न्याय कोई असंभव सम्भावना नहीं है- लेकिन इसके लिए जितना पिछड़ों को तैयार होने की जरूरत है, उससे कहीं ज़्यादा अगड़ों को, क्योंकि उन्हें अपने पूर्वग्रहों के प्रेतों से भी मुक्त होना है और नये रास्तों की नयी कल्पना भी करनी है जो इस माहौल में शायद सबसे दुष्कर है।










