
सत्ता के खिलाफ मनुष्य की स्वतन्त्रता
संतोष दीक्षित का उपन्यास ‘खलल’ अपने समय की जटिल सामाजिक-राजनीतिक विडम्बनाओं को गहरी मानवीय संवेदना के साथ सामने लाता है। उनके अन्य उपन्यासों की तरह यहाँ भी समाज के प्रति गहरी चिन्ता केन्द्रीय है, लेकिन ‘खलल’ में यह चिन्ता अधिक तीखी, अधिक प्रत्यक्ष और अधिक राजनीतिक रूप में प्रकट होती है। पारिवारिक विघटन, सामाजिक असमानता, पूँजी का वर्चस्व, धार्मिक उन्माद और मानवीय रिश्तों का क्षरण—ये सभी तत्त्व यहाँ एक साथ सक्रिय हैं।
उपन्यास का केन्द्र पटना का एक मोहल्ला ‘मुर्गियाचक’ है, जो केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि समकालीन भारत का रूपक बनकर उभरता है। यहाँ रहने वाले लोग—कारीगर, मजदूर, छोटे व्यवसायी—अपनी रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझे हुए हैं। यह वह दुनिया है जहाँ गरीबी, असुरक्षा और असमानता के बीच भी मानवीय रिश्तों की एक सहज ऊष्मा मौजूद है। लेकिन यही दुनिया धीरे-धीरे नफरत, सन्देह और सत्ता-प्रेरित हिंसा की गिरफ्त में आती जाती है।
‘खलल’ का अर्थ यहाँ बहुस्तरीय है। यह केवल किसी मोहल्ले में उत्पन्न विघ्न नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सामाजिक विघटन है—सत्ता, पूँजी और साम्प्रदायिक राजनीति के गठजोड़ से पैदा हुआ व्यवधान। यह वह ‘खलल’ है जो लोगों को उनके घरों से बेदखल करता है, रिश्तों को तोड़ता है और नागरिकों को भयभीत तथा निष्क्रिय बनाता है।
उपन्यास का नायक सियाराम सिंह इस पूरे परिदृश्य का संवेदनशील साक्षी है। वह न तो परम्परागत अर्थों में नायक है और न ही क्रान्तिकारी, लेकिन उसके भीतर अन्याय के प्रति एक बेचैनी है। जब वह दीवारों पर नारे लिखकर अपना विरोध दर्ज करता है, तो उसे ‘अर्बन नक्सल’ घोषित कर दिया जाता है। यह प्रसंग आज के समय की उस विडम्बना को रेखांकित करता है, जहाँ असहमति को अपराध बना दिया जाता है और नागरिक अधिकारों की आवाज को देशद्रोह के रूप में चिह्नित किया जाता है।
मुर्गियाचक का सामाजिक ताना-बाना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ हिन्दू और मुसलमान लम्बे समय से साथ रहते आये हैं, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और साम्प्रदायिक उकसावे के कारण यह सह-अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। सुब्हान मियाँ जैसे पात्र इस साझा संस्कृति के प्रतिनिधि हैं, जो दोनों समुदायों के बीच संवाद और सन्तुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन अन्ततः वही सबसे पहले हिंसा के शिकार होते हैं—यह संकेत है कि विवेक और सन्तुलन इस समय के सबसे असुरक्षित मूल्य बन चुके हैं।
उपन्यास यह भी दिखाता है कि किस तरह ‘धर्म’ आज सत्ता और पूँजी के लिए एक औजार में बदल गया है। मन्दिर निर्माण, चन्दा उगाही और धार्मिक उत्सवों के नाम पर एक ऐसा माहौल तैयार किया जाता है, जिसमें आम लोगों की असली समस्याएँ—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य—हाशिए पर चली जाती हैं। विधायक और उनके समर्थक इस प्रक्रिया को सुनियोजित तरीके से संचालित करते हैं, ताकि जनता भावनात्मक उन्माद में उलझी रहे और सत्ता पर सवाल न उठाए।
मुर्गियाचक में प्रस्तावित ‘कॉरिडोर’ इसी प्रक्रिया का चरम उदाहरण है। मन्दिर के नाम पर एक पूरी बस्ती को उजाड़ने की योजना बनाई जाती है। यहाँ केवल मुसलमान ही नहीं, कुछ हिन्दू परिवार भी प्रभावित होते हैं, लेकिन साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण इतना गहरा है कि लोग अपने ही नुकसान को समझ नहीं पाते। जमीन के कागजात का अभाव, प्रशासनिक दमन और बुलडोजर की राजनीति—ये सब मिलकर आम नागरिक को असहाय बना देते हैं।
इस सन्दर्भ में जयराम सिंह का चरित्र विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। कम पढ़ा-लिखा होने के बावजूद उसके भीतर न्यायबोध अधिक तीखा है। वह अपने भाई सियाराम को याद दिलाता है कि यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं, अस्तित्व का है। इसी तरह प्रोफेसर महतो जैसे पात्र विवेक और प्रतिरोध की उस परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो लगातार हाशिए पर धकेली जा रही है, फिर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह प्रतिरोध की सीमाओं और विफलताओं को भी ईमानदारी से सामने लाता है। सियाराम, नागेश्वर और गुलाम—तीनों अन्ततः समझौतों और परिस्थितियों के दबाव में आते दिखाई देते हैं। यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की ताकत का प्रमाण है, जो आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लोगों को इस हद तक निर्भर बना देती है कि वे अपने आदर्शों से समझौता करने को मजबूर हो जाते हैं।
फिर भी ‘खलल’ पूरी तरह निराशावादी उपन्यास नहीं है। इसमें प्रतिरोध की छोटी-छोटी चिंगारियाँ लगातार मौजूद हैं—चाहे वह महिलाओं का मोर्चा हो, दीवारों पर लिखे गये नारे हों या सुब्हान मियाँ की अन्तिम पुकार। ये चिंगारियाँ संकेत देती हैं कि मनुष्य की स्वतन्त्रता की आकांक्षा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
उपन्यास के अन्त में सियाराम सिंह का रूपांतरण एक गहरे प्रतीक के रूप में सामने आता है। वह समाज से कटकर एक तरह के ‘पागल’ व्यक्ति में बदल जाता है, जो सड़कों पर घूम-घूमकर लोगों से सवाल करता है—न्याय और अन्याय के बीच उनकी स्थिति क्या है। यह पागलपन दरअसल उस विवेक का अन्तिम रूप है, जिसे समाज ने अस्वीकार कर दिया है।
प्रेमचंद का यह कथन कि ‘स्वाधीनता मन की एक वृत्ति है’—उपन्यास के सन्दर्भ में और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। जब बाहरी स्वतन्त्रता लगातार सीमित की जा रही हो, तब भीतर की स्वतन्त्रता ही प्रतिरोध का आधार बनती है। ‘खलल’ इसी आन्तरिक स्वतन्त्रता की खोज और उसकी त्रासदी का आख्यान है।
यह उपन्यास हमें उस दौर की पहचान कराता है, जहाँ लोकतन्त्र के शब्द खोखले होते जा रहे हैं, न्याय की प्रक्रिया कमजोर पड़ रही है और नागरिक धीरे-धीरे भय तथा भ्रम के बीच जीने को अभ्यस्त होते जा रहे हैं। लेकिन इसी अँधेरे में कहीं न कहीं एक सम्भावना भी छिपी है—एक नयी शुरुआत की, जो सत्ता के इस ‘खलल’ के विरुद्ध मनुष्य की स्वतन्त्रता को फिर से स्थापित कर सके।










