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शिक्षा नीति और अवसर की समानता

भारत का संविधान अवसर की समानता पर विशेष जोर देता है। इस समानता की प्राप्ति के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण औजार है। शिक्षा को सामाजिक न्याय और समान अवसर का सबसे सशक्त माध्यम माना गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया। यह नीति 1986 की शिक्षा नीति के स्थान पर लागू हुई, जो कि शिक्षा को अधिक समावेशी, गुणवत्तापूर्ण और समान अवसर प्रदान करने वाली बनाने का संकल्प व्यक्त करती है। अवसर की समानता का तात्पर्य है, हर विद्यार्थी, चाहे उसकी सामाजिक-आर्थिक, जातीय, लैंगिक या भौगोलिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, उसे शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिले। डॉ. अम्बेडकर के शब्दों में, शिक्षा ही वह साधन है जो असमानताओं को कम कर समाज में गतिशीलता और समानता ला सकती है।

सामान्य संदर्भ में समानता का अर्थ है-सबको एक बराबर अवसर देना, जबकि न्याय का अर्थ है जरूरत के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराना। शिक्षा समाज में समान अवसर का आधार बनती है, किन्तु ऐतिहासिक रूप से भारत में जाति, वर्ग और लिंग आधारित असमानता रही है। भारतीय समाज में कमजोर तबका, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग लम्बे समय तक शिक्षा से वंचित रहीं।
समय, परिस्थितियों और परिवेश में बदलाव के साथ शिक्षा सम्बन्धी नीतियों में भी परिवर्तन की आवश्यकता होती है। इसी सिलसिले में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया गया।

सैद्धांतिक रूप से इस नीति को समानता और समावेशी शिक्षा को केन्द्र में रखकर तैयार किया गया है, जिसके अन्तर्गत किसी भी पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति अथवा विशेष जरूरत वाले बच्चों एवं युवाओं को शिक्षा के अवसरों से वंचित नहीं किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पहुंच, समानता, गुणवत्ता और जवाबदेही को चार मुख्य स्तंभों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें समानता वास्तविक अर्थों में अवसर की समानता से जुड़ी हुई है।

इस नीति में सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवारों के बच्चे, दलित एवं आदिवासी समूह, अल्पसंख्यक तथा थर्ड जेंडर से संबंधित वर्गों शामिल हैं, पर विशेष ध्यान दिया गया है। यह नीति लड़कियों और थर्ड जेंडर समूह के लिए विशेष वित्तीय सहायता और सुरक्षित वातावरण बनाने पर भी जोर देती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में विशेष जरूरत वाले बच्चों, जिन्हें पारिभाषिक रूप से दिव्यांग कहा जाता है, तथा अल्पसंख्यक भाषा समूह वाले विद्यार्थियों को सामान्य विद्यार्थियों के समान ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए व्यापक प्रयासों की बात कही गयी है। मुख्यधारा की शिक्षा में उनके समायोजन एवं समावेशी पाठ्यक्रम पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति मातृभाषाओं एवं स्थानीय भाषाओं में प्रारम्भिक शिक्षा के जरिए, भाषा के कारण उत्पन्न असमानता को दूर करने पर भी जोर देती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि आर्थिक एवं सामाजिक रूप से संपन्न समुदाय अपने बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से दिलाते हैं। यह समुदाय तकनीक के उपयोग के संदर्भ में भी उच्च स्तर पर होता है। इससे शुरुआती स्तर पर ही बच्चों में भाषा और डिजिटल विभाजन की परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं। इससे बचने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति भाषा-आधारित असमानता को समाप्त करने और मातृभाषा में प्रारम्भिक तथा माध्यमिक शिक्षा देने की आवश्यकता को विशेष रूप से रेखांकित करती है। इस नीति में आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक एवं भौतिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्र-छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति, वित्तीय सहायता और अनुपातिक आरक्षण को भी प्राथमिकता में रखा गया है।

संरचनात्मक बदलाव की दृष्टि से भी यह नीति प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की एक ऐसी धारा का निर्धारण करती है, जिससे यदि कोई बच्चा बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ता है, तो उसके दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा में सम्मिलित होने की संभावना बनी रहती है। इसी को ध्यान में रखते हुए मल्टी एग्जिट और मल्टी एंट्री का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान को देश के अधिकांश शिक्षण संस्थानों में लागू भी किया जा चुका है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बहु-वैचारिक, बहु-व्यावसायिक और बहु-शैक्षिक दृष्टिकोण को इस प्रकार सम्मिलित किया गया है, जिससे भिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों के लिए वैकल्पिक कैरियर एवं कौशल आधारित शिक्षा के रास्ते समान रूप से खुले रहें। अवसर की समानता को विस्तार देने की दृष्टि से डिजिटल और दूरस्थ शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाए जाने पर भी जोर दिया गया है। इसी का परिणाम है कि आईआईटी और आईआईएम जैसे राष्ट्रीय स्तर के संस्थान अब डिजिटल माध्यम से विभिन्न उपाधियों का संचालन करने लगे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अन्तर्गत ऐसे लक्ष्यों का निर्धारण किया गया है, जो अपने स्वरूप में काफी चुनौतीपूर्ण और महत्वाकांक्षी हैं। इस क्रम में दो प्रमुख लक्ष्यों—वर्ष 2035 तक प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर 100 फीसद तथा उच्च शिक्षा में 50 फीसद सकल नामांकन अनुपात  को प्राप्त करना शामिल है।

यह नीति अपनी दार्शनिक अवधारणा और व्यावहारिक यथार्थ के बीच खड़ी दिखाई देती है, जहाँ सिद्धांत और क्रियान्वयन के बीच स्पष्ट अंतर मौजूद है। लंबे समय से यह कहा जाता रहा है कि शिक्षा पर कुल बजट का 6 प्रतिशत व्यय होना चाहिए, किंतु वास्तविकता में यह खर्च केंद्र स्तर पर भी लगभग 3 प्रतिशत के आसपास ही सीमित है। इससे स्पष्ट है कि वित्तीय संसाधनों की कमी नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में एक बड़ी बाधा है। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब राज्यों, क्षेत्रों और स्थानीय स्तर पर असमानताएँ अत्यधिक गहरी हों। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के जनपदों की तुलना बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश के दूरस्थ इलाकों से नहीं की जा सकती। अतः जब तक इन पिछड़े और दूरस्थ क्षेत्रों को अतिरिक्त वित्तीय सहयोग और संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाएंगे, तब तक समानता और समान अवसर का लक्ष्य व्यावहारिक रूप से हासिल नहीं किया जा सकेगा।

समानता और समावेशन का लक्ष्य केवल नीतिगत घोषणाओं से प्राप्त नहीं हो सकता, इसके लिए पर्याप्त शैक्षिक मानव संसाधन और भौतिक आधारभूत संरचना अनिवार्य है। वर्तमान परिदृश्य में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक शिक्षकों के बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं; उच्च शिक्षा में ही यह संख्या पाँच लाख से अधिक आंकी जाती है, जो नई संस्थाओं के खुलने के साथ निरंतर बढ़ रही है। दूसरी ओर, निजी क्षेत्र में कार्यरत अनेक शिक्षक आवश्यक प्रशिक्षण से वंचित हैं, जिसका सीधा दुष्प्रभाव उन विद्यार्थियों पर पड़ता है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं और बेहतर संस्थानों तक उनकी पहुँच नहीं बन पाती।

सरकारी संस्थानों में अब भी व्याख्यान-केंद्रित शिक्षण पद्धति का वर्चस्व है, जो न तो समावेशी वातावरण तैयार करती है और न ही विद्यार्थियों में भविष्य के प्रति विश्वास जगाती है। इसके साथ ही समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता, जाति और लिंग आधारित भेदभाव समान अवसरों के मार्ग में गंभीर अवरोध उत्पन्न करते हैं।

यद्यपि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समानता और समावेशन का दृष्टिकोण प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया है, किंतु उसका क्रियान्वयन अभी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सका है। भौगोलिक असमानताएँ डिजिटल विभाजन को और गहरा करती हैं—विशेषकर पर्वतीय और दूरदराज़ क्षेत्रों में इंटरनेट की अनुपलब्धता या कमजोरी इस अंतर को बढ़ाती है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों के ठोस एवं निरंतर प्रयासों के बिना समान अवसरों की परिकल्पना साकार होना कठिन प्रतीत होता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में भी कई स्तरों पर विरोधाभास दिखाई देते हैं। जैसे उच्च शिक्षा की नीतियों का निर्धारण अभी तक यूजीसी द्वारा किया जा रहा है। (भविष्य में इसके स्थान पर एक नयी नियामक संस्था यह दायित्व संभालेगी।) जब यूजीसी नियमों, परिनियमों और निर्देशों का निर्धारण करती है, तो वह औसत मानकों को ही ध्यान में रखती है। उदाहरण के लिए किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए भवन एवं भूमि के जो मानक मैदानी क्षेत्रों के लिए निर्धारित हैं, वही पहाड़ी क्षेत्रों पर भी लागू किए जाते हैं, जबकि यह स्पष्ट है कि पहाड़ी क्षेत्रों में भूमि की उपलब्धता उतनी सरल नहीं होती। इस नीति के अन्तर्गत समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य स्तरीय नीति निर्माण, बजट आवंटन, शिक्षा विभाग की दक्षता तथा स्थानीय भाषा और संस्कृति की उपेक्षा से जुड़े मुद्दे भी अनेक असंगतियों को जन्म देते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समानता, समावेशन और ‘किसी को भी पीछे न छोड़ने’ की अवधारणा उच्च आदर्शों से जुड़ी हुई है, जबकि भौतिक स्तर पर संसाधनों की कमी (एवं वितरण में अन्तराल), नीतिगत अपेक्षाएं और सामाजिक-आर्थिक भेदभाव इस लक्ष्य की प्राप्ति में गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति अवसर की समानता की दिशा को स्पष्ट रूप से परिभाषित एवं रेखांकित करती है, लेकिन इसकी सफलता वास्तविक संसाधन आवंटन, सक्रिय लोक भागीदारी तथा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त नियमों और उपनियमों के निर्माण पर निर्भर करती है।

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सुशील उपाध्याय

लेखक चमन लाल महाविद्यालय, लंढौरा (रुड़की) के प्रिंसिपल हैं. सम्पर्क +919997998050, gurujisushil@gmail.com
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