
मुख्यधारा के सिनेमा की रणनीति यह है कि वह दर्शकों को माध्यम बनाता है। ब्रजेश्वर मदान (1953–2017; 1987 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म क्रिटिक का पुरस्कार मिला था) ने ऐसा लिखा है। वे आगे कहते हैं कि दर्शकों को एक खेल में शामिल करता है। समाज और भीड़ के अन्तर को सिनेमा देखने वाला न समझे तो मुख्यधारा का दर्शक भीड़ को सम्बोधित कर सकता है और दर्शक की भूमिका गौण हो जाती है। समाज को भीड़ में बदलने से रोकने के लिए जागरूक फिल्मकार अपनी ओर से कोशिश करता रहता है। वे 1990 में लिखी अपनी पुस्तक ‘सिनेमा नया सिनेमा’ को इकबाल मसूद और चिदानंद दासगुप्ता (सत्यजीत राय के मित्र और अपर्णा सेन के पिता) को समर्पित करते हैं, क्योंकि उन्होंने फिल्म लेखन को प्रतिष्ठा दिलायी। पुस्तक में वे इस बात पर खेद प्रकट करते हैं कि अच्छी फिल्मों को सम्प्रेषणीय बनाने के लिए हमारे पास समीक्षक नहीं हैं। व्यावसायिक फिल्मों का सही-सही मूल्यांकन करने वाली समीक्षा पद्धति विकसित ही नहीं हो पायी है। अच्छी कलात्मक फिल्मों की पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती। उनको लगता है कि व्यावसायिक सिनेमा और कलात्मक फिल्मों की समीक्षा एक ही तरह से नहीं की जा सकती। इस घालमेल के कारण उनको लगता है कि ‘अर्धसत्य’ जैसी व्यावसायिक प्रवृत्ति की फिल्म भी कला फिल्म का दर्जा पा जाती है। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमारे यहाँ घनघोर व्यवसायीकरण का एक कारण सही समीक्षा का न होना है। दिमाग-रहित समीक्षा के कारण अब व्यावसायिक फिल्मों में भी उतनी मेहनत नहीं होती, जितनी पहले होती थी।
मदान का मानना है कि व्यावसायिक फिल्मों के पीछे भी एक राजनीति और सांस्कृतिक दृष्टि का ध्यान रखना जरूरी होता है। ‘मर्द’ जैसी फिल्म में जनसंघर्ष को नकारने और ‘आक्रोश’ जैसी फिल्म में परिवर्तन की शक्तियों को असफल दिखाने के पीछे एक राजनीतिक दृष्टि काम करती है। ये फिल्में समाज में पैसे के प्रभाव को ग्लैमरस तरीक़े से दिखलाती हैं और इन फिल्मों को अपनी संस्कृति से जोड़ने की कोशिश नहीं होती। कुल मिलाकर इन फिल्मों के जरिए एक ऐसी संस्कृति तैयार की जाती है, जो हॉलीवुड से आयातित है। हमारी फिल्मों से अन्य चीजों के अलावा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धार्मिक कट्टरवाद को ही बढ़ावा मिलता है। वे इस बात पर बल देते हैं कि हिंसा को दिखलाकर दर्शकों को अपनी ओर लाने का जो चलन सत्तर के दशक में आया, उस ओर भारतीय निर्माताओं को लाने के कारण की खोज भारतीय समाज में ढूँढने की कोशिश होनी चाहिए। समाज में हिंसा की जड़ें कहाँ हैं, यह सवाल सबसे महत्त्वपूर्ण है।
मदान की पुस्तक में यह भी उभरकर आया है कि सिनेमाघर सांस्कृतिक केन्द्र बनने के बजाय एक तरह से पतनशील संस्कृति की ओर ले जाने का माध्यम बने। वे इसके साथ यह भी 1990 में लिखते हैं कि दूरदर्शन भी हमारे यहाँ पतनशील सिनेमा का विस्तार है। सिनेमा ने दर्शकों को समूह में बैठाकर उन सांस्कृतिक रूपों को नष्ट किया है, जो आदमी को आदमी से जोड़ते हैं।
सरकारी तन्त्र कैसे सिनेमा जैसे माध्यम का इस्तेमाल लोगों को भुलाने वाली चीजों में उलझाने में करते हैं, उसका उदाहरण उन्होंने बलराज साहनी की आत्मकथा में वर्णित प्रसंग से किया है। उसमें बताया गया है कि अँग्रेज सरकार ने आजादी के पहले नग्न और अर्धनग्न तस्वीरों वाले मनोरंजन से लोगों को ऐसे मानसिक पतन का शिकार बनाया गया कि विभाजन के दौरान देश की बहू-बेटियों को सरेआम नंगा किया जा रहा था और लोग दर्शकों की तरह तमाशा देख रहे थे। यह बात उन्होंने उन फिल्मों के बारे में कही है, जो ब्रिटिश सरकार दिखा रही थी। उस समय ऐसे फिल्मकार भी थे, जो विदेशी सिनेमा से होने वाले सांस्कृतिक संकट को पहचानते थे।
ऐसे भारतीय दृष्टि-सम्पन्न फिल्मकारों ने अँधेरे के खिलाफ संघर्ष किया, लेकिन आजादी के बाद ऐसे सिनेमा का बनना अधिक होने लगा, जो ‘अँधेरा बोता था।’
भारतीय दर्शक कैसी फिल्में देखना चाहता है?
ब्रजेश्वर मदान का कहना है कि भारतीय दर्शक की रुचि अपने देश के यथार्थ को भारतीय ढंग से देखने की है। वह उसे अपने देशी मुहावरे में ही सराह सकता है, समझ सकता है। अपने यहाँ का यथार्थ वह उस रूप में नहीं देखना चाहता, जिस रूप में विदेशी लोग देखना चाहते हैं।
देखा जाए तो यह एक आजमाई हुई बात लगती है। दो उदाहरण दिए जा सकते हैं। फेलिनी की एक फिल्म है ‘ला स्ट्रैडा’ (सड़क), जिसमें एक खटारा गाड़ी में हीरो एक जगह से दूसरी जगह जाता है। उसके साथ हीरोइन है। ओरिजिनल में जो नायक है, वह थोड़ा कठोर किस्म का है और अन्त में वह मासूम हीरोइन को मरने के लिए छोड़ जाता है, जिसके लिए बाद में उसे पश्चाताप होता है। देव आनंद के भाई विजय आनंद ने इस फिल्म से प्रेरणा लेते हुए एक फिल्म बनायी, जिसमें हीरो को भारतीय रूप दिया और उसे सहृदय बनाकर पेश किया। यह फिल्म सफल हुई। ‘गाइड’ में भी यही बात दिखलाई पड़ी। विदेशी निर्देशक ने जब इसे अपने ढंग से बनाया, तो किसी को पसन्द नहीं आयी, लेकिन जब विजय आनंद ने इसे भारतीय रंग में रंगकर पेश किया, तो बावजूद इसके कि इसकी थीम बोल्ड थी, लोगों ने इसे बहुत पसन्द किया।
इस सम्बन्ध में मदान की एक बात से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी उसका उल्लेख किया जा सकता है कि सत्यजीत राय की ‘चारुलता’ को नारी समाज से वह प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती, जो ‘दुनिया न माने’ की निर्मला को मिलती है।
मदान की एक स्थापना बहुत महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि तीसरे और चौथे दशक में सिनेमा में कुछ ऐसी परम्पराएँ थीं, जिनका आजादी के बाद विलोप हो गया। इसके लिए वे ‘चन्द्रलेखा’ (1949) को दायी मानते हैं, जिसने भव्य सिनेमा और स्टार को ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बना दिया। उसके बाद हर बड़ा फिल्मकार भव्य फिल्में बनाने की सोचने लगा। राज कपूर ने अपनी फिल्मों के सेट को तैयार करने में पैसा पानी की तरह बहाया, महबूब खान ने ‘आन’ में और के. आसिफ ने ‘मुगले आजम’ में बहुत पैसा खर्च किया, ताकि फिल्म बहुत भव्य बन सके।
‘नीचा नगर’, ‘धरती के लाल’ और अन्य फिल्में इस तरह की सफल और बड़ी फिल्मों के आगे दब गयीं। मदान विशेष रूप से व्ही. शांताराम की प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने अच्छी फिल्में भारतीय मुहावरों के साथ बनायी।
इस प्रसंग में मदान ने यह भी लिखा है कि आजादी के पहले स्त्री चरित्रों को अधिक महत्त्व मिलता था, पर आजादी के बाद की फिल्मों में हीरो को अधिक महत्त्व देने का चलन शुरू हो गया। अपवादों को छोड़ दिया जाए और बिमल राय जैसे फिल्मकारों की फिल्मों को हटा लें, तो यह आकलन सही ही प्रतीत होता है।
भारतीय और विदेशी मुहावरों की चर्चा के प्रसंग में एक दिलचस्प बात मदान ने की है। वे पश्चिमी फिल्मों में पत्नी को पति से दूरी का एहसास प्रेमी के सम्पर्क में आने के बाद होता है, जबकि भारतीय नायिकाएँ पति से जुड़ने के लिए प्रयत्न करती दिखलाई जाती हैं। ‘अनुभव’ का जिक्र किया जा सकता है, जिसके बारे में निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने कहा है कि पत्नी (तनुजा) को अपने पति (संजीव कुमार) की उपेक्षा का अन्दाजा पार्टी में एक बच्चे को देखकर होता है, जबकि पश्चिमी ढाँचे की दृष्टि वाली ‘चारुलता’ में स्त्री अपने पति से उपेक्षित होने का अहसास तब करती है, जब एक प्रेमी उसके जीवन में आता है। पति का पत्नी के साथ आना ही हिन्दी फिल्मों में दिखलाया जाता रहा है। यहाँ तक कि ‘क्रैमर वर्सेस क्रैमर’ के अनुकरण पर बनी फिल्म में भी अँग्रेजी फिल्म के अन्त को हिन्दी में बदल दिया जाता है और पति और पत्नी को मिला दिया जाता है। यह बहुत-सी फिल्मों में किया जाता रहा है।
फिल्मों की इन सीमाओं के बावजूद हिन्दी फिल्मों में विमल राय और गुरुदत्त जैसे निर्देशकों और ख्वाजा अहमद अब्बास (राज कपूर की फिल्में विशेष रूप से) और राजेन्द्र सिंह बेदी (‘दाग’, ‘देवदास’ और ‘सत्यकाम’ जैसी फिल्में उन्होंने लिखीं) जैसे लोगों ने जिस तरह हिन्दी फिल्मों को अपना मुहावरा विकसित करने की कोशिश की, उसकी मदान प्रशंसा करते हैं। गुरुदत्त ने दस वर्षों तक (1952 से लेकर 1962 तक) व्यावसायिक फिल्में बनायीं, लेकिन उनमें नये मुहावरे देने की कोशिश की।
हिन्दी सिनेमा का भारतीय समाज में स्थान दूरदर्शन के आने के बाद एक चुनौती के सम्मुख आया, जब मध्यवर्गीय परिवारों ने अपने-अपने ड्राइंग रूमों में ही टीवी के पर्दे पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू किया। बाद में यह चुनौती और अधिक बढ़ गयी, जब प्राइवेट चैनलों की बाढ़ आ गयी। सिनेमा के दर्शक बँटे और धीरे-धीरे बिखर गये। अब सिनेमा हॉल की जरूरत बदली और इसके साथ ही एक नया युग शुरू हुआ, जिसके तार परोक्ष और अपरोक्ष रूपों में ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं।
ग्लोबलाइजेशन ने एक पैराडाइम शिफ्ट इस अर्थ में सिनेमा जगत में पैदा किया कि अब दर्शक को सिनेमा हॉल में जाने की जरूरत नहीं रही, अब सिनेमा ही दर्शकों तक पहुँचने लगे और वह भी विविध रूपों में। इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि विज्ञापन की दुनिया में सिनेमा की दुनिया का हस्तक्षेप इस रूप में हुआ, जिसने विज्ञापन की दुनिया को सिनेमा की दुनिया बना दिया। इससे एक प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने सिनेमा से लेकर विज्ञापन और समाज की भाषा सबको प्रभावित किया।
यह “दिल माँगे मोर” का नया रूप था, जिसने मेलोडी की दुनिया को ट्यून की दुनिया में तब्दील कर दिया।
इस नयी पीढ़ी की दुनिया में सिनेमा की दुनिया बची रही, लेकिन अपने पूर्ववर्ती रूप से एकदम अलग रूप में। आज 2026 से अगर हम फिल्म जगत के पिछले नब्बे बरस को देखने की कोशिश करेंगे, तो मोटे तौर पर हम इन चरणों में इसे बाँटकर देख सकते हैं:1936 से 1947,1947 से 1975,1975 से 1990,1990 से 2000,2000 से 2014,2014 से अब तक। 1936 से 1975 तक में जिस अन्तर की ओर मदान ने संकेत किया है, उसका विश्लेषण विशेष रूप से हमारे लिए उपयोगी इस अर्थ में है कि सिनेमा का लोक बदल गया। सोहराब मोदी से दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद की दुनिया अलग है—इस बात पर ध्यान देना होगा। अक्सर लोग इसको संवाद-अदायगी के तरीके में आए अन्तर के रूप में देखते हैं, लेकिन असली चीज है आजाद भारत में पश्चिमी ढाँचे की फिल्म-दृष्टि का बढ़ता प्रभाव। 1947 के बाद अन्तर के बावजूद हिन्दी फिल्में पश्चिमी फिल्मों के बहुत नजदीक पहुँच गयीं। सत्यजीत राय ने मृत्यु-शय्या पर ऑस्कर पाने के बाद एक वक्तव्य दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि फिल्म निर्माण में उन्होंने जो कुछ सीखा, वह अमेरिकी सिनेमा से सीखा। बहुत सारे फिल्मकार इस तरह की बात कह सकते हैं।
अक्सर इस बात का जिक्र किया जाता है कि 1952 में भारतीय सिनेमा विश्व सिनेमा से जुड़ा और ‘बाइसिकल थीव्स’ से प्रभावित होकर ‘दो बीघा जमीन’ जैसी फिल्में बनीं। 1947 के पहले के दौर में कुछ अपवादों को छोड़कर यह कहना सम्भव नहीं है कि भारतीय फिल्में पश्चिमी तर्ज पर बनती थीं। तकनीक के स्तर पर सीखने की कोशिश होती थी, लेकिन हिन्दी फिल्म का अपना एक भारतीय मुहावरा था।
1947 से 1975 के दौर की फिल्मों के साथ हमारी पीढ़ी का एक भावनात्मक लगाव है, लेकिन आज हम ध्यान से देखें तो यह लगाव अधिकतर गीत-संगीत से जुड़ा है। गीत-संगीत की दुनिया में भारतीयता के तत्व विविध रूपों में रहे। 1975 के बाद के दौर में यह घटने लगा। जिन फिल्मों में गीत-संगीत के स्तर पर यह भारतीयता बची रही, वह उनके कारण बची, जो 1975 के पहले की परम्परा में रचे-बसे रहे।
जिस बात की ओर हमारा ध्यान जाना चाहिए, वह यह कि भारतीय सिनेमा पर व्यावसायिक होने का जो असर देखा जाता रहा है, उसके साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि समाज के साथ इसका रिश्ता किस तरह का रहा। हिन्दी फिल्मों की लोकप्रियता का स्वरूप कितना बदल गया—इसको समझने के लिए हमको राजेश खन्ना–धर्मेंद्र–अमिताभ की दुनिया से शाहरुख खान–सलमान खान की दुनिया के अन्तर को समझना होगा।
ये सभी पॉपुलर रहे, लेकिन इनकी लोकप्रियता में गुणात्मक अन्तर है। वैजयंती–वहीदा–हेमा मालिनी–रेखा की दुनिया से माधुरी–ऐश्वर्या–प्रियंका में बहुत अन्तर है।
जिस समय हम रह रहे हैं, वह उत्तर शाहरुख–माधुरी युग है। भले ही आज भी अमिताभ हैं, हेमा भी हैं, लेकिन वे उसी तरह हैं जैसे बुजुर्ग होते हैं—उपस्थित, लेकिन कोई उनके हिसाब से नहीं चलता।
निश्चित रूप से यह अति-सरलीकृत रूप से एक जटिल सांस्कृतिक प्रक्रिया को पेश करना है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 90 बरस में दुनिया ने कम से कम तीन-चार बार अपना स्वरूप बदल लिया है। इन तीन-चार युगों के भीतर की दुनिया और उनके विश्लेषण के लिए अलग टूल्स चाहिए।
यह दिलचस्प है कि ऊपर से देखने पर सब निरन्तरता में ही दिखता है, लेकिन ट्रोप/रस्सी, जिस पर हम कपड़े (पढ़ें विचार) टाँगते हैं—
क्या राजनीति, अर्थतन्त्र, सांस्कृतिक संरचना का सम्बन्ध हमारे बदलते सामाजिक तन्त्र से नहीं है? आज सोहराब मोदी से लेकर नौशाद मध्ययुगीन हो चुके हैं और किसे याद है भरत व्यास, नरेंद्र शर्मा, वजाहत मिर्ज़ा, राजेंद्र सिंह बेदी और यहाँ तक कि राही मासूम रजा और मनोहर श्याम जोशी की!
जिस तरह ट्यून की दुनिया ने मेलोडी की दुनिया को ढँक (कवर) लिया है, वह इसलिए हो सका क्योंकि हमने यह तो सोचा कि समय के बदलाव के साथ माध्यम और मुहावरा (इडियम) बदलता है, लेकिन यह नहीं समझा कि इन बदलते मुहावरों में पश्चिमी दबाव कैसे आया और कैसे हम अपनी जमीन से धीरे-धीरे हटते रहे।
सांस्कृतिक बदलाव के इतिहास का एक अजीब पहलू यह है कि पहलवी से परेशान होकर लोग अयातुल्ला खुमैनी को बुलाते हैं। भारतीय आधुनिक बौद्धिकता की जड़ों को हमने भारतीय तरीके से अपनी मिट्टी से जोड़ा नहीं (जोड़ नहीं सके), इसलिए आज भारतीय बौद्धिकता परम्परा की आँधी में उखड़ रही है और लोग दर्शक बने हुए हैं। ‘धुरंधर’ की सफलता को समझने के लिए यह कहना पर्याप्त नहीं है कि ये सब फासिस्ट समय की आहट है।
आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले अपनी गलती को स्वीकार करना होगा, फिर आगे की रणनीति तय होगी; वरना नपुंसक विलाप के अलावा कुछ और हासिल नहीं।










