सामयिक

किसानों की त्रासदी के मंजर

 

किसान-आन्दोलन ने वह सब कुछ उजागर कर दिया है; जो अभी तक परदे में था या किसी तरह ढँका-मुँदा था। भारत वह देश है; जहाँ खेती-किसानी हमारे अधिकांश लोगों की जीवन-पद्धति है। वह हमारे जीवन की धुरी भी  है। यह सच है कि खेती-किसानी कभी भी लाभ के दायरे में नहीं रही। किसान इसे पूजा-अर्चना की तरह लेते और व्यवहार करते हैं। किसानों का आन्दोलन कोई छोटी-मोटी घटना नहीं माना जा सकता। वह सत्‍ता के हठ की पराकाष्‍ठा भी बताता है। कोई नहीं समझ पाता। अनेक बार तरह-तरह की चर्चायें हुई हैं। उनके एजेण्‍डे साफ हैं कि कानून वापस नहीं लेंगे। यह किसी विस्फोट से कम नहीं है। अनिल त्रिवेदी मानते हैं कि “किसी भी समाज में होने वाले आन्दोलन उस समाज की जीवन्तता का प्रतीक होते हैं और इस लिहाज़ से देखें तो दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान-आन्दोलन अपने तमाम सवालों के अलावा कृषि-क्षेत्र की जिन्दादिली का प्रतीक है।” पूर्व में यह आन्दोलन दिल्‍ली के आसपास था। अब इसका स्‍वरूप राष्‍ट्रीय सीमाओं तक यानी अखिल भारतीय हो चुका है। किसान आन्दोलन के सौ दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन सत्‍ता के कानों में जूँ तक नहीं रेंगी। उसके लिए सत्‍ता और संसद के पास संवेदनशीलता के दो शब्‍द नहीं हैं। ढ़ाई सौ से ज्‍़यादा किसान काल-कलवित हुए। इसी से समझा जा सकता है कि सत्‍ता का पक्ष क्‍या है। उसक पास विधानसभा चुनावों के लिए समय ही समय है और तमाम तरह की गर्जनाएं भी हैं।

          युग का यथार्थ इतनी तेज़ी से बदल रहा है कि हर कोई आश्चर्य चकित है। यथार्थ के स्थान पर झूठोत्सव निरन्तर जारी है। मूल्यहीनता बह रही है और छलावा पाँव तोड़कर बैठ गया है। शब्दों की ख़तरनाक क्रीड़ा से बहकावे के भरम रचे जा रहे हैं। झूठ-झाँसे के ताने-बाने से जनतन्त्र, आज़ादी और मनुष्यता को कुचला जा रहा है। अपराधी, तस्कर, माफिया, हत्यारे जब संगठित होते हैं और सत्ता के साथ मिलकर गर्व का खेल खेलते हैं तब कुछ इसी तरह के परिणाम सामने आते हैं। समूचा किसान-आन्दोलन शांति, सद्भाव, सहयोग और अहिंसा के साथ चला; हालाँकि उसे बदनाम करने के लिए हज़ारों तरह के षड्यन्त्र रचने के प्रयास जारी रहे। तथ्य यह है कि खेतिहर समाजों में संघर्ष और अनकही पीड़ाओं की अंदरूनी हालातें हमेशा बहुत गंभीर रही हैं। यह तो उसी तरह है जैसे जंगल में मोर नाचा किसी ने देखा किसी ने नहीं।

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        खेती-किसानी करने वाले यूँ तो हमेशा अंतर्विरोधों, विसंगतियों में होते हैं; लेकिन जनतन्त्र के नाम पर काबिज़ सत्ताएँ उनकी तुलना में हमेशा क्रूरताओं-हिंसाओं से लैस हैं; जिसमें छल-छद्म की अनंत लीलाएँ जारी हैं। सरकार का दमन-चक्र किसान-आन्दोलन के प्रारम्भ से शुरू हुआ था। धरना-स्थलों को खाली कराने के जबरिया प्रयास हुए। आन्दोलन को परास्त करने की सत्ता की अनेक योजनाएँ थीं। इतने वर्षों से मीडिया, सत्ता के सरपरस्त और हिन्दुत्व की नकारात्मक प्रभाव-क्षमता से सम्बद्ध अभी वह नहीं देख पा रही हैं; जो राजनीतिक खेला भद्दे तरीके से होने वाला है। जब बुद्धिजीवी वर्ग भ्रमित है तब सत्ता की परिकल्पना और उसके वास्तविक स्थिति को ठीक से न समझने वालों की क्या हालत होगी? सबकुछ बिकने को तैयार है। राजेश जोशी की कविता का यह अंश पढ़ें— दुनियादार लोगो! तुम्हारी चुप्पियों ने ही बढ़ाई है/अपराधों और अपराधियों की संख्या हर बार/कि शरीफ़जादो! तुम्हारी निस्संगता ने ही बढ़ाए हैं/अन्यायियों के हौसलें/कि मक्कार चुप्पियों ने/छोटी-छोटी आवाज़ों ने ही/बदली है अत्याचारी सल्तनतें।”

        लोकतन्त्र को नेस्तनाबूद करना, सांप्रदायिकता के ज़हर को लगातार बोना, समूचे भारत में आपसी घृणा फैलाना, महत्त्वपूर्ण एजेंडा है। महँगाई चरम पर है। इसका आकलन पेट्रोल, डीजल के दामों भर से नहीं आंका जाना चाहिए। बाज़ार की वास्तविकता से भी इसे थाहा जा सकता है। जिस देश में सत्ता सब कुछ बेंचनें की आग्रही हो उसमें एक दिन सब कारपोरेट घरानों के हाथों जाना सुनिश्चित है। रेलवे, बैंक बी एस एन एल बिकने के लिए तैयार हैं। किसानों को फसलों समेत बेंच दिया जाय तो कोई हर्ज नहीं। बेंचना भी एक धंधा है ! शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवीय मूल्यों का अपहरण जारी है; जो भी अच्छी चीज़ें हैं, उन्हें नष्ट किया जा रहा है। केवल दिखावे की फ़िल्म चल रही है। बुद्धि को कब्जिया लिया गया है। आंशिक तौर पर ही सही लेखक और बुद्धिजीवी बचे हैं; बाकी हाच-पाच की लीलाओं में किल्‍लोल कर रहे हैं। साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और चुनिंदा लोग प्रतिरोध में खड़े हैं। संचार-साधनों में सत्ता और कारपोरेट घरानों का कब्ज़ा है। जनतन्त्र जनतन्त्र न होकर एक इन्द्रजाल बना दिया गया है। किसानों की आत्महत्या से सत्ता को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। किसानों का मरना-जीना मात्र सत्ता के गलियारों का एक खु़शनुमा खेल है। ग़रीबी में फँसे किसानों को लालच देकर उनकी ज़मीन ख़रीद ली गयी है। झूठे आँकड़ों से किसानों भर की खुशहाली नहीं टहल रही है; पूरा देश इस अन्धड़ में फँसा है। टी.वी. चैनलों में खुशनुमा इरादे नाच रहे हैं; यानी धुआँ-धुआँ मौसम किर्चा-किर्चा जिन्दगी। सत्ता द्वारा फेंकी गयी सब्सिडी में थोड़ी देर के लिए सब्सिडी, फिर अँगूठा यानी ‘कुच्छो नहीं’ की लीला।

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         किसानों की खेती-किसानी के लिए कोई ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ नहीं है। मानसून की कृपा पर सब छोड़ दिया गया है। खेती-किसानी के विकास के लिए यदि किसान बिजली पम्‍प लगवाता है या ट्रैक्‍टर खरीदता है, तो उसे किसान की श्रेणी से अलहदा कर दिया जाता है। किसानों और खेतिहर समाज के लोगों का शोषण-उत्पीड़न का मामला कोई आज भर का नहीं है। मज़दूर-ग़रीब भी इसी से पूर्व में भी सताए जाते थे; जब राजे-महाराजे, जागीरदार, जमींदार और बनिया-बक्काल होते थे। किसानों एवं अन्यों के अत्याचार पर बहुत कुछ लिखा गया है। दिन-दिन भर और रात-रात भर उनसे काम लिया गया। उन्हें भूखा-प्यासा रखा गया। किसान-जमींदार-संघर्ष के अनेक क्लाइमेक्स और चित्र इतिहास और साहित्य में दर्ज़ हैं। पहले जमींदार कई तरह के षड्यंत्र रचा करते थे। देश आज़ाद हुआ तो सरकारी नुमाइंदे आ गये; जिसमें पटवारी, थाना पुलिस और अन्य मोहकमें नत्थी हो गये और लूटतन्त्र के रूप बदल गये। सब कुछ उसी तरह हो रहा है।

अब तथाकथित प्रजातन्त्र के पैरोकार सीधे-सीधे सामने आ गये। प्रेमचंद ने जमींदार वर्ग की नृशंसता के भयावह रूप रखे हैं। किसानों की छाती पर कर्ज़ के पहाड़ हैं। प्रजातन्त्र आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी अपनी नाप-जोख रख रहा है। हमारा समाज साहित्य और धर्म की ठेकेदारी-प्रथा, किसानों-मज़दूरों के लिए उतनी ही यंत्रणादायक है। किसान-आन्दोलन दो माह पूर्व से चल रहा है। अरुण कमल की ‘धार’ नामक कविता के शब्दों में कहा कि — ‘’कौन बचा है जिसके आगे/इन हाथों को नहीं पसारा/यह अनाज जो बदल रक्त में/टहल रहा है तन के कोनेकोने/यह कमीज़ जो ढाल बनी है/बारिश सरदी लू में/सब उधार का, माँगा चाहा/नमकतेल, हींग, हल्दी तक/सब कर्जे का/यह शरीर भी उनका बंधक/अपना क्या है इस जीवन में/सब तो लिया/उधार/सारा लोहा उन लोगों का/अपनी केवल धार।‘’

किसान अब भी हाशिए पर है। वह क्रान्तिकारी नहीं हो सकता। अपने अस्तित्व रक्षा के लिए किए जाने वाला उसका संघर्ष भी ख़त्म किया जा रहा है। उसे अवहेलना की चिता में दफनाया जा रहा है। पहली बार इतने विशाल पैमाने पर वह संगठन के रूप में सामने आया है। और जीवन मरण की लड़ाई लड़ रहा है। जिसे आर पार की लड़ाई कहा जा सकता है। किसान की विशेषता उसकी सामूहिकता में रही है। भारत का किसान विकास की वास्तविकता से बहुत दूर है। उसे लॉली पॉप से सत्ता ने उलझाए रखा। सैकड़ों वर्षों बाद वह संगठित हुआ है क्योंकि वह हमेशा असंगठित रहा है। प्रश्न है कि क्या किसानों के लिए उसकी वास्तविक स्थिति को सुधारने के लिए हमारे देश में कोई जगह है। किसान की विशेषता और ताकत पहले भी और अब भी ज़मीन ही है। जिसे वह अपने जीने के लिए आवश्यक मानता है। बेटी की शादी विवाह में या अन्य कठिनाइयों में भी उसी धरती को बेंचकर वह किसी तरह बेटी की शादी या अन्य कोई कार्य कर पाता है। ज़मीन ही उसका छछिया भर छाछ है।

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अब तो किसानों की कोई औकात नहीं। वे बेचारे भले आदमी की तरह नहीं रहे। कृषि-कानूनों की वास्तविकता और वापसी के बारे में उन्होंने पुरजोर विरोध किया और सार्थक आवाज़ उठाई। लोकतन्त्र ने उन्हें भरपूर निंदा-रस में डुबो दिया। वे सत्ता की तन्त्र-साधना नहीं कर सके। सरकार की चौधराहट वे लम्बे अरसे से झेल-भुगत रहे हैं। सत्ता निंदा करना और जयकारा लगवाना जानती है। प्रजातन्त्र की उसने कभी परवाह नहीं की और न आगे करेगी। सरकार कहती है कि वह निर्दोष है। मिथ्यात्व उसकी रग-रग में समाया हुआ है। मिथ्या के बिना वह जीवित नहीं रह सकती। लोटन कहता है कि अब शायद राष्ट्र बचा नहीं। केवल राष्ट्रभक्ति और अन्ध राष्ट्रवाद उछल-कूद मचा रहा है। अन्धेपन को राष्ट्रवाद की स्थायी संपत्ति का अधिकार दे दिया गया है। द्वापर युग में एक धृतराष्ट्र था। दुर्योधन और शकुनि के रूप में वह फूलता-फलता था; अब तो धृतराष्ट्र के परम प्रतापी वैभवशाली न जाने कितने रूपाकार घूम रहे हैं। इस दौर में राष्ट्र की आत्मा कुचली जा चुकी है। लोकतन्त्र भी क्षत-विक्षत है। संविधान को करुण क्रंदन में बदला जा चुका है। संवैधानिक संस्थाएँ तानाशाही मनोविज्ञान के जुए के नीचे हैं। राष्ट्रवाद गरज रहा है; राष्ट्र नहीं तो अन्ध राष्ट्रवाद ही सही। हर जगह तरह-तरह का विष घुल चुका है। भक्त छाती ठोंक रहे हैं। असमानता और अन्धे हिन्दुत्व के अँधेरे में विकास की घोषणाएँ लगाई जा रही हैं। अन्धापन हमारी सांस्कृतिक विविधताओं को सुन्दर छवि की तरह पीट रहा है। आइडियालॉजी का वध किया जा चुका है और बाज़ार की ताक़तें विभिन्न माध्यमों से कई तरह के खेल खेल रही हैं।

        राष्ट्र और किसान के सम्बन्ध ध्वस्त हो चुके हैं। राष्ट्रवाद को न तो नागरिक चाहिए और न किसान-मज़दूर। राष्ट्रवाद ‘यस मैन’ चाहता है; यानी एक तरह का गुलाम। जो उसकी आज्ञाओं को शिरोधार्य कर मात्र ढ़ोता रहे। खेती-किसानी की दुनिया को अनुत्पादक बनाए जाने के इरादे और सपने अन्ध राष्ट्रवाद देख रहा है। समूचे देश में कारपोरेट घरानों का जाल बिछा हुआ है और उनका ही सभी जगह कब्ज़ा है। यह राष्ट्रवाद की नयी टेक्नोलॉजी की दिशा और दृष्टि है। माल संस्कृति और फ्राड संस्कृति ने लोकतन्त्र को घुटने-घुटने कर दिया है। खेतों को कंपनियों के मालिकों को सौंपे जाने का अनवरत खेल खेला जा रहा है; जो पुराने ज़माने के जमींदारों, इजारेदारों का स्थान ग्रहण कर लेंगे। इस तरह किसानों-खेतिहरों के शोषण, उत्पीड़न और अन्याय के घिनौने कृत्य जारी रखेंगे। किसानों के जीवन को बौना, अर्धपागल और बंधक बनाया जा रहा है। स्‍वतन्त्रता की ओट से किसानों का संहार किया जा रहा  है।

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        समय नये-नये ढंग के आस्वाद लेकर आता है। समय नयी-नयी तरह की कार्रवाइयाँ करता है और फिज़ा बनाता है। हम आज़ादी, जनतन्त्र, स्वाधीनता का विस्थापन देख रहे हैं; जो इस इक्कीसवीं शताब्दी की बहुत बड़ी त्रासदी है। जब सब कुछ दाँव पर हो तब भी हममें जिजीविषा और उम्मीद रहती है; बीज, फूल, फल का सपना देखते हैं। बार-बार कुछ लोग भटक जाते हैं और झाँसे में आ जाया करते हैं। किसान के बेटे भी सत्ता की चालाकियों और उनके इरादों की अनदेखी करते हैं और अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं। राजनीति आसमान से उतर रही है। और झूंठ का खेल, खेल रही है। उसके इरादों में अमानवीयता की सतत कार्यवाहियाँ जारी हैं।

         क्या प्रश्नों के बिना जीवन सम्भव है। विज्ञान-प्रविधि ने यही तो सिखाया है। जैसे मीडिया किसी को भी अपने ही लोगों का विरोधी बना सकता है, उसी तरह ऐसे-ऐसे व्यूह रचे जा रहे हैं; जिसमें कौन किसका विरोधी बना दिया जाए। अबू तालिब ने रसूल हमजातोव को समझाया था—यदि तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा।”  नागरिकों की अभिरुचियों पर तरह तरह के सेंसर्स लगा दिए गये हैं। उन्हें शारीरिक और वैचारिक गुलाम बनाए जाने की तमाम महत्वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं। तहखाने मन के भी होते हैं और सत्ता के भी। तहखाने स्वतन्त्र नागरिकों को उन्मुक्त नहीं कर सकते न निरापद। वे उनको तरह तरह से गुलाम ज़रूर बना सकते हैं।

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लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। सम्पर्क +919425185272, sevaramtripathi@gmail.com

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