आदिवासीसाहित्य

‘कब्र की जमीन’ और आदिवासी जीवन यथार्थ

 

भारतीय भाषा परिषद् की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘वागर्थ’ के मार्च 2020 अंक में हिन्दी की युवा कवयित्री व कहानीकार जसिन्ता केरकेट्टा की कहानी “कब्र की जमीन” प्रकाशित हुई है। जसिन्ता केरकेट्टा खासतौर से आदिवासी हिन्दी कवयित्री के रूप में बहुचर्चित हैं। इस बीच कहानी लेखन में भी रुचि ले रहीं हैं।

“कब्र की जमीन” इस कहानी के शीर्षक से ही अंदाजा लगया जा सकता है कि कब्रिस्तान की समस्या की ओर इशारा है। इस कहानी में मुख्यतः झारखण्ड के सरना आदिवासियों में ईसाई धर्म परिवर्तन के बाद कब्रिस्तान में मुर्दाओं को दफनाने पर लगाई गयी पाबन्दी से उपजी समस्या का चित्रण किया गया है। यह गम्भीरतापूर्ण लिखी एक महत्वपूर्ण कहानी है। इसका कैनवास काफी विस्तृत एवं व्यापक है। इसमें आदिवासियों की धार्मिक समस्या के समानान्तर सामाजिक, आर्थिक जैसी कई समस्याओं को लेखिका ने एक साथ उठाया है। जिसमें नशे की समस्या प्रमुख है क्योंकि आदिवासियों में यह एक ऐसी समस्या है जो कि पूरे परिवार को ही तबाह कर देती है।

इस कहानी में फगुआ, पत्नी और सास मुख्य पात्र हैं। पति जिसका नाम ‘फगुवा’ है। यह एक नशेड़ी प्रवृति का आदिवासी है जिसे न अपनी फ़िक्र रहती है न ही घर परिवार की, जिसका मुख्य कारण नशे की आदत है। कहानी में फगुवा की पत्नी एक गर्भवती स्त्री है जिसने अब तक तीन लड़कों को जन्म दिया है परिवार वालों की इच्छा है कि एक लड़की हो जाये। लड़की की लालसा एक के बाद एक और तीसरी बार गर्भवती हो जाती है।

“कब्र की जमीन” का समयकाल 08 नबम्बर 2016 में हुई नोटबन्दी के बाद का है, जो कि स्त्री के इस वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि “अब हज़ार-पाँच सौ के नोट बन्द हो गये हैं। गाँव वाले ऐसा कह रहे थे। सरकार ने सारे पैसे बैंक में जमा करने को कहा है।” स्पष्ट है कि उस समय आर्थिक हालात कुछ ठीक नहीं थे वैसे भी हज़ारों सालों से आदिवासी लोग गरीबी और जहालत भरी जिन्दगी जीते आ रहे हैं लेकिन यह एक बड़ी समस्या थी कि जिनके पास थोड़े बहुत पैसों से गुजारा चलता हो, जो दिहाड़ी की मजदूरी करके अपना भरण-पोषण करता हो उसे यह एक गम्भीर एवं चुनौतीपूर्ण समस्या थी। अपने धर्म का बाजार नहीं चलाते आदिवासी

बहरहाल, आजादी के 72 वर्षों बाद झारखण्ड के आदिवासी समुदाय के लोग आज भी बिजली, पानी, सड़क, अस्पताल आदि बुनियादी जरूरतों से अछूते हैं और जटिल  समस्याओं से जूझ रहे हैं। यदि गाँव से काफी दूर शहरों में अस्पताल हैं भी तो उनमें गर्भवती औरतों के लिए प्रसव की उपयुक्त सुविधाएँ नहीं है। इन सभी समस्याओं की ओर इशारा करते हुए जसिन्ता लिखती हैं कि  “कोई गाड़ी-घोडा नहीं आधी रात को। सड़क भी गाँव से बहुत दूर। अस्पताल पहुंचना आसान नहीं। आजकल दाई भी गाँव से गायब है।”

गाँव में प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत जो कार्य हुए हैं वो काफी सालों से अधूरे हैं। यदि सड़क का निर्माण हुआ भी है तो आधा-अधूरा जहाँ सिर्फ पत्थर और मुरम डाल दी जाती है। ठेकेदारों और सरकारी कागजों में पक्की सडकों का निर्माण हो चुका होता है। सड़कों की खस्ताहालत पर चिन्ता जताते हुए तथा प्रशासन द्वारा चलाई गयी ग्रामीण सड़क निर्माण की असफल योजना का पर्दाफाश करती हुई वे लिखती हैं कि “मुरुम की कच्ची सड़क पर कुछ साल पहले मिट्टी और बड़े-बड़े पत्थर गिराए थे- प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत। मगर साल-दर-साल बीत रहा, अलकतरा अब तक नहीं चढ़ा। अब बरसात में पत्थर नुकीले हो उठे हैं।” सड़कें दुरुस्त न होने से तमाम आधुनिक सुख सुविधाओं से ये लोग आज भी वंचित हैं। यदि कोई बीमार हो जाये तो शहर तक आते आते बीच में ही दम तोड़ देता है।

आदिवासियों में कुपोषण की एक बड़ी समस्या है जिसे लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से उठाने का प्रयास किया है। कुपोषण के कारण छोटे-छोटे बच्चों में गम्भीर बीमारियां हो जाती हैं जो मृत्यु का भी कारण बन जाती हैं। इस कहानी में भी आदिवासी स्त्री के तीसरे बच्चे को ‘थैलिसीमिया’ की बीमारी है। जिसमें उम्र बढ़ने के साथ-साथ अलग से खून की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि खून बनाने की क्षमता कम होती जाती है। जिसके कारण उसे हर तीन महीने में खून की आवश्यकता पड़ती है।

गरीबी और पैसों के अभाव के कारण उचित इलाज न हो पाने की वजह से आदिवासियों के बच्चे ऐसी तमाम गम्भीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और वो कुछ कर भी नहीं सकते। सरकार द्वारा चलाई जा रहीं तमाम स्वस्थ्य सेवाएँ सब ठप्प पड़ी हुई हैं। आदिवासी समुदायों में आये दिन ऐसी तमाम घटनाएँ घटित हो रहीं हैं जिससे लेखिका के मन में खेद के साथ प्रतिरोध का स्वर भी दृष्टिगोचर होता है तथा इन समस्याओं की ओर समाज और सरकारों का भी ध्यान आकृष्ट करने का सार्थक प्रयास किया है।

आर्थिक संकट और बेरोजगारी की बात की जाये तो ‘फगुवा’ मैट्रिक पास होते हुए भी बेरोजगार घूम रहा है जिससे उसकी आर्थिक हालात बदहाल है। बेरोजगारी की वजह से उसे नशे की आदत हो जाती है और वह दिन रात नशे में धुत्त रहने लगता है। भूमिहीन आदिवासी औरतें दूसरों के खेतों में काम करके अपना जीवन यापन करती हैं। ‘फगुवा’ नशे में धुत्त अक्सर बाहर ही कहीं पड़ा रहता है जब कभी अपने घर आता है तो माँ-बाप और पत्नी से मारपीट करके शराब के लिए पैसे छीन ले जाता है। इस सन्दर्भ में लेखिका लिखती हैं कि “घर की औरतें दूसरों के खेतों में काम करतीं। फगुवा उनके पैसे पर घर-बैठ कर खाता। पैसे हमसे छीन कर पीने चला जाता। पीकर आता और रात मुझे दम भर कर मारता। माँ को भी नहीं छोड़ता।” अर्थात नशे की इतनी आदत हो गयी है कि मारपीट करके पैसे छीन ले जाना और शराब पीना शुमार हो गया है।

एक दिन बच्चा गम्भीर रूप से बीमार हो जाता है। गाँव में अस्पताल की सुविधा न होने के कारण शहर ले जाना पड़ता है। कच्ची खराब सड़कें और आधी रात को न कोई वाहन की सुविधा जैसे-तैसे सास किसी की साईकिल मांगकर लाती है। कोषों दूर चलते-चलते अस्पताल पहुँचने से पहले कइयों का तो रास्ते में ही दम टूट जाता है। ऐसा ही हाल कुछ इस बच्चे का हुआ। उबड़-खाबड़ रास्ते में कुछ दूर चलने के बाद अस्पताल पहुँचने से पहले ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है। 

इस सन्दर्भ लेखिका लिखती हैं कि “किसी की साईकिल मांगी गयी। जैसे-तैसे बच्चे को गोद में लेकर माँ साईकिल में बैठ गयी। मैं दूसरी साईकिल में बैठ कर पीछे-पीछे चल रही थी। वही पथरीला रास्ता। अँधेरा। साईकिल चलने लगी खड़-खड़-खड़। रस्ते में बच्चे ने अपना माथा एक ओर लुढ़का दिया। माँ चिल्लाने लगी।” और हुआ यह की बच्चे की साँसे थम चुकी थी सास बहू दोनों आधे रास्ते से ही वापिस घर लौट आईं। ऐसे तमाम लोग हैं जो अस्पताल की दहलीज तह पहुँचने से पहले ही अपना दम तोड़ देते हैं। ये समस्या किसी एक आदिवासी की नहीं है बल्कि पूरे जनजातीय समुदायों की समस्या है जिसके चलते हजारों बच्चे युवा, स्त्रियाँ और बुजुर्ग मौत के घाट उतर जाते हैं। सरकार उनकी बढ़ती हुई मृत्युदर पर महज़ अफसोस जताती रहती है।

“कब्र की जमीन” में लेखिका ने घरेलु हिंसा को भी मुस्तैदी के साथ अभिव्यक्त किया है। स्त्रियाँ घरेलु हिंसा के रूप में कई तरह की शिकार होती हैं। आर्थिक हालात अच्छे न होने से बाहर मजदूरी करना और घर के तमाम कार्य खुद करना, ऊपर से सास ससुर के ताने सुनना। नशेड़ी पति को दम भर शारीरिक सुख देना और न-नुकुर करने पर तमाम तरह के लांक्षन लगाना। साथ ही जी तोड़ मार खाना। जबाव देने का साहस कर पाना शेर के बिल में जाने जैसा है लेकिन एक दिन जब अपने पियक्क्ड़ पति फगुवा पर क्रोध आता है तो वह उसे ही बुरी तरह से पीट देती है तो सास-ससुर और उसके समुदाय के सारे लोग उसके चरित्र को लेकर सवाल खड़े करते हैं।

जसिन्ता लिखती हैं “मैं देखती हूँ, एक-दो परिवारों को छोड़कर पूरे गांव में सबके परिवार में स्त्रियाँ मार खाती हैं, गाली सुनती हैं। किसी ने भी मार घुराने का साहस नहीं किया अपने मरद को। इसलिए जल्द ही मैं पूरे गांव में बदनाम हो गयी। अब फगुवा गाँव-गाँव में कहता फिरता है, ‘दूसर मरद कईर के रईख हे। सहेले अपन मरद पर हाथ छोडेला। मेरे चरित्र को लेकर गाँव-घर में मुझे बदनाम करने लगा।” यदि पति रोज मारपीट करे तो ठीक है लेकिन यदि कभी किसी औरत ने जबाव दे दिया तो शामत आ गयी इतिहास, परम्पराएँ, प्रथाएँ, मर्यादाएँ सब की सब ध्वस्त होने लगती हैं। आखिर क्यों?

क्या सिर्फ औरतों को ही पिटने का अधिकार है और जो शराब पीकर अपनी पत्नियों को पीटते हैं वो? औरतों को भी अपने आत्म सम्मान और अधिकार के लिए लड़ना होगा। उन्हें स्वयं अपनी सुरक्षा करनी होगी। घरेलु हिंसा से खुद ही अपने स्तर से निपटना चाहिए। मैं भी इस बात का समर्थन करता हूँ कि जो फगुवा की पत्नी ने किया वह कोई गलत नहीं है। लेकिन यह इस समस्या का समाधान नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा होगा तो पारिवारिक सम्बन्धों में दरार पड़ेगी और सम्बन्ध भी टूट सकते हैं। इसलिए समस्या नशे को ख़त्म करने की है।

बच्चा तो मर गया अब एक और समस्या खड़ी हो उठती है। बच्चे को कब्रिस्तान में दफनाने की। गाँव के अधिकांश सरना आदिवासी ईसाई धर्म में शामिल हो चुके थे, तो कब्रिस्तान में वो अपना पूर्ण अधिकार जमाये बैठे थे। चूँकि फगुवा के आदिवासी समुदाय के लोग ईसाईयों के गिरजा घर नहीं जाते थे तो ईसाईयों का मानना था कि फगुवा के बच्चे को कब्रिस्तान में दफन नहीं करने दिया जायेगा। इस सन्दर्भ में यह कथन दृष्टव्य है- “बच्चा मर चुका है। आँगन में उसकी लाश कपडे में लिपटी हुई है। गाँव में सरना आदिवासी जो ईसाई हो चुके थे, कहने लगे- ‘इतवार तोहर घर से कोई गिरजा नी जावएना। ऐहे लगिन हमरे कब्रिस्तान में छउवा के गाडेक नी देवब।”

स्त्री धर्म को लेकर एक गम्भीर और मन में उथल-पुथल मचाने वाला सवाल उठाती हुई कहती है कि “आज बच्चे की लाश सामने पड़ी है तो बित्ता भर जमीन के लिए एक लाश का धर्म पूछ रहे हैं। “वास्तव में यह सवाल है हमारे समाज में विद्यमान उन तमाम धर्म की ध्वजा फहराने वाले ठेकेदारों से है। ये सवाल ख़त्म हो चुकी मनुष्यता से है। ये सवाल उस हरेक व्यक्ति से है जो अपने धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानता है। लेकिन इन धर्म के ठेकेदारों का ये हाल है कि जो पहले उसे दफनाने के लिए मना कर रहे थे वे फगुवा के घर वालों से गिरजा न जाने के एवज में दण्ड स्वरुप चंदा लेते हैं और उसी चंदे के पैसे से सभी लोग पेट भरकर खाना खाते हैं। शराब पीते हैं और मदमस्त होकर सब कुछ भूल जाते हैं।

लेखिका स्त्री पात्र के माध्यम मन ही मन कहती है कि “वे सारे लोग जो कुछ देर पहले बच्चे के दफ़न पर बहस कर रहे थे, बच्चे के नाम पर मिल रहे भोजन पे टूट पड़े। वे दारू और हड़िया पीकर मदमस्त हो गये।” इससे यह साबित होता है कि आज भी धर्म के नाम पर लूटखसोट मची हुई है। तमाम आस्थायें खंडित हो चुकी हैं और मानवीयता लंगड़ी, बहरी व गूंगी हो गयी है। लेखिका स्त्री पात्र के माध्यम से सवाल करती हैं कि क्या धर्म परिवर्तन से मूल्य और पुरखों द्वारा दिया गया भाईचारे और सहजीविता का ज्ञान ख़त्म हो गया? सभी के साथ मिल जुलकर रहने की भावना कहाँ दब गयी? और धर्म परिवर्तन से कब्रगाहों पर फहराती हुई धर्म ध्वजाओं का विरोध भी प्रकट करती हैं।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि जसिन्ता केरकेट्टा ने “कब्र की जमीन” कहानी के मार्फ़त महज़ झारखण्ड के ही आदिवासी समुदाय की समस्याओं को नहीं उठाया है बल्कि यह कहानी समस्त आदिवासी समुदाय की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, स्त्रियों पर घरेलु हिंसा, सरकार द्वारा आदिवासी विकास की षड्यंत्रकारी योजनाओं, कुपोषण जैसी स्वस्थ्य सम्बन्धी बदहाली, विकास के नाम पर जर्जर सडकों का निर्माण, बिजली, पानी, बेरोजगारी, उपयुक्त अस्पतालों का अभाव और ऊपर से नोटबन्दी की मार जैसी समस्याओं को बेहद संजीदगी के अभिव्यक्त किया है।

कहानी का शिल्प बेजोड़ है साथ ही देशज शब्दावलियों का प्रयोग इसका प्रमाण है कि कहानी झारखण्ड के आदिवासियों पर केंद्रित है। “कब्र की जमीन” की सफलता और सार्थकता यह कि एक व्यापक कैनवास में लिखी हुई महत्त्वपूर्ण कहानी है क्योंकि इसमें एक साथ तमाम समस्याओं को गम्भीरता और शिद्दत के साथ उठाने का सार्थक प्रयास किया गया है

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लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में शोधार्थी (हिन्दी विभाग) हैं। सम्पर्क: dineshsagarbhu19@gmail.com

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