आदिवासी

समान नागरिक संहिता में आदिवासी

 

भारत के विधि आयोग द्वारा पिछले महीने समान नागरिक संहिता पर सार्वजनिक प्रस्ताव आमंत्रित किए जाने के बाद से ही यूसीसी चर्चा में है। चूंकि इसका सीधा सम्बन्ध सभी देशवासियों के सामाजिक जीवन से है, विविध राज्यों, संस्कृतियों और समुदायों से विभिन्न प्रतिक्रियाओं का आना स्वभाविक है। मुख्य रूप से एक बड़ा वर्ग यूसीसी (यूनिफार्म सिविल कोड) के समर्थन में है और कई समुदाय इसके विरोध में। इस समर्थन या विरोध का आधार विभिन्न समुदायों के सामाजिक जीवन पर यूसीसी के संभावित प्रभाव हैं, जिनकी व्याख्या या लोग विभिन्न तर्क, समझ और अनुमान से लगा रहे हैं। चूंकि अब तक विधि विभाग द्वारा सराकर को इसका प्रारूप सौंपा नहीं गया है, यह कह पाना मुश्किल है कि भारत में समान नागरिक संहिता किस रूप में लागू होगी और इसका क्या असर पड़ेगा। लेकिन कई जानकार और पत्रकार इस बात पर बल दे रहे हैं कि यूसीसी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए न सिर्फ बड़ा मुद्दा बनेगा, बल्कि निर्णायक भूमिका में रहेगा।

समान नागरिक संहिता दरअसर भारत के नागरिक या कहें कि सामाजिक पहलू को संहिताबद्ध करने की प्रक्रिया है, जिसके तहत शादी, तलाक, संपत्ति बंटवारा, बच्चा गोद लेने आदि विषयों पर एक समान कानून पूरे देश पर लागू होगा। जैसे अपराध के संदर्भ में भारत के हर नागरिक के लिए एक अपराध के लिए समान सजा का प्रावधान (इंडियन पीनल कोड) है, फिर चाहे वो किसी भी धर्म, समुदाय या जाति का हो जबकि सामाजिक पहलू पर धर्म और समुदाय के आधार पर नियम या विधान अलग हैं। हालंकि यह एक बहस का विषय है कि इसकी जरूरत इस देश को है या नहीं और यह हासिल करना कितना आसान या मुश्किल है, लेकिन फिलहाल देश में यही बहस चर्चा में है और लोग अपनी अपनी राय विभिन्न माध्यमों से सरकार तक पहुंचा रहे हैं।

समान नागरिक संहिता को सभी धर्मों और समुदायों के परिपेक्ष्य में रख कर देखा जा रहा है। इस बीच देश की लगभग 8.5 फीसदी जनजातीय आबादी अपनी अनूठी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था पर यूसीसी के प्रभाव को लेकर चिंतित है। देश भर में यह बहस शुरु हो चुकी है कि चूँकि आदिवासी समुदाय अपनी परंपरागत विधि-विधान और कानून से संचालित होते हैं और उनपर हिंदु धर्म कोड लागू नहीं होता, यूसीसी उनपर किस प्रकार लागू होगा? इधर लगभग सभी आदिवासी समुदायों की माँग है कि उन्हें यूसीसी से बाहर रखा जाए। झारखंड के आदिवासी समुदायों ने राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन से इस बारे में मुलाकात कर मांग की है कि राज्य के 32 जनजातियों (27 फीसदी) को यूसीसी से अलग रखा जाए। चूंकि झारखंड पांचवी अनुसूची का क्षेत्र है और राज्यपाल यहां संरक्षक (कस्टोडियन) की भूमिका में हैं, उन्हें अधिकार है कि केंद्र अथवा राज्य द्वारा पारित किसी भी कानून अथवा संहिता में यथोचित संशोधन कर लागू करें। आदिवासी समन्वय समिति ने राज्यपाल से इसी बात की गुहार लगाई है। इस सम्बन्ध में भाजपा सांसद और यूसीसी पैनल के अध्यक्ष सुशील मोदी ने कहा है कि आदिवासी समान नागरिक संहिता से बाहर रहेंगे।

भारत में 730 अनुसूचित जनजातियाँ हैं, जिनकी संख्या 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 10.4 करोड़ है। इनमें से झारखंड में 32 अनुसूचित जनजातियां हैं, जिनकी संख्या 86.5 लाख है। इन सभी जनजातियों के अपने अनूठे सामुदायिक रीति-रिवाज, परंपराएं और प्रथागत कानून हैं। यही वजह है कि राज्य के आदिवासी विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के तहत संरक्षित हैं, जैसे अनुच्छेद 13 (3) (क), 25 (धर्म की स्वतंत्रता), 29-30 (सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार), पांचवीं अनुसूची आदि। यह बात सही है कि यदि यूसीसी लागू होता है, तो आदिवसियों के प्रथागत कानून प्रभावित होंगे। 1965 में आई भीम नारायण लोकुर समिति की रिपोर्ट में भी आदिवासियों की “विशिष्ट संस्कृति” की बात कही गई है, जो उन्हें अन्य धर्मों या समुदायों से अलग करती है। इनपर कोई विशिष्ट धार्मिक संहिता लागू नहीं होती और न्यायालयों ने भी आदिवासियों को उनके रीति-रिवाज के आधार पर हिंदू कानूनों से अलग रखा है। ऐसे में आदिवासी संगठनों और बुद्धीजीवियों को भय है कि यूसीसी में प्रथागत कानूनों के अभाव में उन्हें हिंदू माना जाएगा और उनपर हिंदू कानून लागू होंगे।

आदिवासियों पर यूसीसी के प्रभावों का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पेसा – पंचायत (एक्सटेंशन टू शिड्यूल्ड एरिया) एक्ट, वनाधिकार कानून और सीएनटी कानून भी है। पेसा कानून अनुसूचित क्षेत्रों में “रीति-रिवाजों और परंपराओं”, “विवाद समाधान के पारंपरिक तरीके”, “ग्राम सभा की शक्ति” तथा अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक निकायों (पड़हा, मुंडा- मानकी, मांझी-परगनैत, ढोकलो-सोहर आदि) द्वारा “स्व-शासन” का अधिकार देता है। इसी तरह वनाधिकार कानून भी जंगल में रहने वाले आदिवासियों को वन संसाधनों पर उनके अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन यूसीसी के प्रभाव से पेसा सहित वनाधिकार कानून जैसे विशिष्ट नियम स्वतः खत्म हो जाएंगे। जिसका राज्य की आदिवासियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

आदिवासी योगदान से वंचित इतिहास

कहने को इसका एक रास्ता यह भी हो सकता है कि आदिवासियों को हिंदू या किसी और धर्म कोड में शामिल किए बिना अलग कोड बनाकर संहिताबद्ध किया जाए। लेकिन यह प्रक्रिया आसान नहीं है। पहली बात तो यह कि देश में आदिवासियों के लिए कोई धर्म कोड नहीं है। 2020 में झारखंड विधानसभा से पारित सरना/आदिवासी धर्म कोड का प्रस्ताव केंद्र में लंबित है। दूसरी बात, सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए अगल से धर्मकोड बनाना बेहद मुश्किल है। देश के सभी जनजातीय समुदायों के अपने रीति-रिवाज हैं, जो एक दूसरे से भिन्न है। मसलन झारखंड में बहुसंख्यक अनुसूचित जनजाति समाज पितृसत्तात्मक है, और वे विरासत और उत्तराधिकार की पितृसत्तात्मक पद्धति का पालन करते हैं, लेकिन मेघालय सहित कुछ अन्य पूर्वोत्तर राज्यों और केरल आदि में मातृसत्तात्मक संरचना है। वहीं लक्ष्यद्वीप और अंडमान आदि में दोनों प्रणालियां मौजूद हैं। ऐसे में सभी समुदायों के लिए एक समान कोड मुमकिन नहीं लगता। हालाँकि लगभग यही समस्या हिंदू कोड के संदर्भ में भी है, क्योंकि दक्षिण भारतीय हिंदू समाज में जिन रिश्तों में शादियां मान्य हैं, उत्तर भारतीय समाज में वे न सिर्फ अवैध माने जाते हैं, घोर आपत्ति के भी विषय हैं।

झारखंड में आदिवासी जमीनों के संरक्षण में सीएनटी (छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम) और एसपीटी (संताल परगना कास्तकारी अधिनियम) की महत्वपूर्ण भूमिका है। ये दोनों कानून भी विशिष्ट कोड के अभाव में यूसीसी से प्रभावित हो सकते हैं। हालाँकि सीएनटी के बावजूद राज्य में आदिवासी जमीनों का अवैध हस्थातंरण हो ही रहा है, लेकिन यदि यूसीसी का प्रभाव सीएनटी पर भी होता है, तो जमीनों का (विशेषकर खुटकट्टी और भुंईहरी जमीनों का) हस्तांतरण बढ़ेगा।

समान नागरिक संहिता बेहद पेचीदा और संवेदनशील मामला है। भारतीय संविधान के ही कई कानून और प्रावधान इस संदर्भ में विरोधाभासी दिखाई पड़ते हैं। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि देश समान नागरिक संहिता के लिए बढ़ रहा है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा पर वोट की राजनीति और मुस्लिम विरोधी होने के आरोप लग रहे हैं, लेकिन इस बात में सच्चाई है कि 1957 में ही पहली बार समान नागरिक संहिता की बात हुई थी, खुद बाबा साहेब अंबेडकर भी इसके समर्थन में थे। बकौल वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, तब हिंदुवादी नेताओं ने समान नागरिक संहिता का विरोध किया था, जिसके बाद अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

यह भी सत्य है कि भारतीय संविधन के नीति निर्देशक तत्व में लिखा है कि सरकारें समान नागरिक संहिता लाने के लिए कार्य करेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारें यह किसी भी समुदाय या देश के लोगों पर थोपेगी। ये तमाम तर्क सतह पर हैं और लोग इसी के इर्द-गिर्द यूसीसी पर चर्चा भी कर रहे हैं। यूसीसी लागू हो या नहीं, लेकिन यदि यह लागू होता है, तो यह सरकार की जिम्मेवारी है कि इस प्रक्रिया में किसी भी समुदाय की अपनी पहचान, संस्कृति, परंपरा या रीति-रिवाजों पर विपरीत प्रभाव न पड़े। भारत अपनी विविध संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। और यही इस देश में सभ्यता का आधार भी है। शासन पक्ष को मजबूत या सुदृढ़ करने के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यवहारिक पक्षों की अनदेखी देश को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

आदिवासियों की विविध परंपराएं और संस्कृति केवल सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन का आधार भी है। इसी अनूठे रहन-सहन के कारण उन्हें विशेष कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है। यदि उन यूसीसी के प्रभाव से विशिष्ट कानून में बदलाव आते हैं, या वे खत्म हो जाते हैं, तो यह आदिवासियों के साथ अन्याय होगा

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विवेक आर्यन

लेखक पेशे से पत्रकार हैं और पत्रकारिता विभाग में अतिथि अध्यापक रहे हैं। वे वर्तमान में आदिवासी विषयों पर शोध और स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क +919162455346, aryan.vivek97@gmail.com
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