व्यंग्य

वे गम्भीरता से ले रहे हैं – वेद प्रकाश भारद्वाज

 

 

  • वेद प्रकाश भारद्वाज

 

वैसे बात है कबीर की उलटबासी की तरह फिर भी कहानी पड़ रही है कि यह दिन जनता पर भारी हैं। चुनाव के जोश में जनता बेहोश नहीं है और न ही मतान्धता (मत+अंधता) का ख़तरा ही हमारी चिन्ता का सबब है। हक़ीक़त तो यह है कि हमें गाहे-बगाहे चिन्तित रहने की बीमारी है जो बुद्धिजीवियों में आम पाई जाती है। हालाँकि बुद्धिजीवी होते तो विशेष हैं फिर उनमें कोई चीज आम होना उसके ख़ास होने को संशयग्रस्त कर देता है। पर हम बात कर रहे थे जनता की जिस पर ये दिन कुछ भारी हैं। वैसे हमारे मित्र छोटेलाल जी का कहना है कि जनता पर तो हर दिन भारी होता है पर हमारा मानना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। इसीलिए जब अखबार में नेताजी का बयान पढ़ा कि वह जनता की बात को बहुत गम्भीरता से लेते हैं तो उसी क्षण हमारी चिन्ता का दौर शुरू हो गया। पिछले कुछ दिनों से चुनाव के हो-हल्ले में जनता के लिए ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त’ मार्का उदगार तो सुनाई पड़ रहे थे पर ऐसा जुलम होगा हमने सोचा न था। वह जनता को गम्भीरता से लेना शुरू कर देंगे इस बात की आशंका किसी को न थी। अब उन्होंने कह ही दिया है कि वह जनता की हर बात को गम्भीरता से लेते हैं तो हमें लगता है कि जनता का भी फ़र्ज है कि वह उन्हें गम्भीरता से ले और ऐसा कुछ न करे जो उसकी गम्भीरता को नकारता हो।

जनता का हिस्सा होने के नाते हमने भी गम्भीरता ओढ़ ली। हँसी-ठट्ठा को मन की संदूकची में बन्द करके दृढ़ इच्छाशक्ति का ताला लगा कर हमने इसे विस्मरण की कोठरी के किसी कोने में रख दिया। अखबार पटक कर हम घूमने निकल पड़े। घर से बाहर निकल कर देखा, सड़क पर पैदल चलता हर शख़्स गम्भीर नज़र आ रहा था। कार वालों के बारे में कुछ बता पाना सम्भव नहीं है क्योंकि वे सब इतनी तेजी में थे कि कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। यदि वे जनता हैं और आम हैं तो यकीन करने में कोई हर्ज़ नहीं कि गम्भीर होंगे। हमें लगा सारा देश आईसीयू में है। यह विचार आते ही हम और गम्भीर हो गए।

हमें लगा कि कुछ करना चाहिए, पर क्या यह पता नहीं था। तभी सारे जहान का दर्द अपने सीने में रखने वाले छोटेलालजी सामने आते दिखाई दिए। हमने तत्काल उन्हें लपका। ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना’ के फ़रियादी अन्दाज में हमने उन्हें देखा। वह अपनी आदत के अनुरूप गम्भीर थे और हम अपनी आदत के खि़लाफ़। गम्भीरता की राष्ट्रीय नौटंकी में हम दोनों की भागीदारी जरूरी थी। हमें देखते ही वह बोले, ‘हाँ, ऐसे आप ठीक लग रहे हैं। ऐसे ही रहना।’

‘क्या मतलब! हम समझे नहीं’, हमने पूछा।

‘आपको हमेशा ऐसे ही गम्भीर रहना चाहिए। वह हास्य-व्यंग्य वाला छिछोरापन आपको शोभा नहीं देता। हमारे नेता जनता की बातों को गम्भीरता से लेते हैं। आज सारा देश गम्भीर है।’ उन्होंने हमें समझाया।

‘पर नेता तो गम्भीर नहीं लग रहे। वो तो लगता है होली के मूड़ में हैं। एक-दूसरे पर कीचड़ ही उछाल रहे हैं।’ हमने कहा।

यह सुनकर छोटेलाल जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। बोले, ‘आप लोगों में यही खराबी है। हमेशा नकारात्मक सोच रखते हैं। नेता कह रहे हैं कि हम आम जनता की बातों को गम्भीरता से लेते हैं पर आप हैं कि अपने मन की करेंगे। नेताओं की बातों को होली का हुल्लड़ ही समझेंगे।’

‘पर नेता ऐसा क्या गम्भीर कह रहे हैं?’, हमने प्रश्न दागते हुए कहा, ‘जिसे देखो वही एक दूसरे के कपड़े उतारने पर लगा है। कोई जाति की बात करता है तो कोई धर्म की। कभी लगता है राष्ट्रीय स्तर पर हास्य कवि सम्मेलन चल रहा है। जनता न हुई बकरा हो गयी कि जिसका जैसे जितना मन चाहे काटता रहे।’

‘आप से तो बात करना ही बेकार है। आप जैसे लोग ही जनता को सरकार के खिलाफ भड़काते हैं।’ कहकर वह आगे बढ़ने लगे। हमने टोका, ‘इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं?’

उन्होंने आँखें तरेर कर हमारी तरफ देखा, फिर बोले, ‘नेताजी के पास जा रहे हैं। उन्होंने कहा है कि कुछ गम्भीर मन्त्रणा करनी है।’ कह कर वह सरपट चल पड़े।

हम फिर सड़क पर बैल-सा खुद को ठेलते हुए आगे बढ़ने लगे। थोड़ी दूरी पर पार्क था। हम अन्दर घुस गये। वहाँ कई लोग सेहत बना रहे थे। वह सब के सब गम्भीर नज़र आ रहे थे। एक कोने में मोहल्ले के भैयाजी कुछ लोगों को गम्भीरता से कुछ समझा रहे थे। भैयाजी स्थानीय नेता हैं जो हमेशा राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करते हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस में थे तो वो हार गयी। इस बार भाजपा में आ गये हैं। हम उनके पास जाकर उनकी बातें सुनने लगे।

वह लोगों को समझा रहे थे कि विपक्ष के बहकावे में न आएँ। सरकार उनको लेकर बहुत गम्भीर है। आगे भी वह इसी तरह गम्भीरता से काम करेगी। सुनने वालों ने गम्भीर मुद्रा में सिर हिलाकर सहमति जताई। हम पार्क से निकले और एक गली में घुस गये। वहाँ दूसरे भैयाजी कुछ लोगों को घेरे खड़े थे। वह लोगों से कह रहे थे कि कांग्रेस ने हमेशा जनता की बातों को गम्भीरता से लिया है और पूरी गम्भीरता से उसके लिए काम किया है। अब जनता की बारी है। उसे भी कांग्रेस को गम्भीरता से लेना चाहिए। हम उनके निकट पहुँचे। भैयाजी ने हमारी तरफ गम्भीरता से देखा। हम और गम्भीर हो गये। उन्हें नमस्कार कर आगे बढ़ गये।

चारों तरफ फैली गम्भीरता से बचते-बचाते हम घर पहुँचे। श्रीमती जी ने हमें देखते ही पूछा, ‘क्या हुआ? इतने सीरियस क्यों हो? तबीयत तो ठीक है? किसी ने कुछ कह दिया क्या? कोई मिला था रास्ते में?’

एक साथ इतने प्रश्नों ने हमें और गम्भीर कर दिया।

हमने ठंड़ी साँस भरते हुए कहा, ‘हुआ कुछ नहीं है। आज का अखबार पढ़ो। नेताजी ने कहा है कि वह जनता की बातों को गम्भीरता से लेते हैं।’

‘हाय राम! अब क्या होगा?’ श्रीमती जी ने आँखें फाड़ते हुए कहा।

‘होगा क्या?’, हमने कहा, ‘सब्जी महँगी हो जाएगी, राशन के दाम बढ़ जाएँगे। अब उन्होंने जनता को गम्भीरता से लेना शुरू कर ही दिया है तो क्या किया जा सकता है।’

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं|

सम्पर्क-  +919871699401,  bhardwajvedprakash@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
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