सामयिक

प्रेम करने से पहले प्रेम को पढ़िए भी

 

  • सलिल सरोज

 

“कौन सा गुनाह ? कैसा गुनाह ?

किसी से जिन्दगी भर स्नेह रखने, प्रेम करने का गुनाह।

स्नेह और प्रेम जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगे तो उसका त्याग करने का गुनाह।

है ना अजीब बात!

पर यही तो किया चन्दर ने अपनी सुधा के साथ!

इस भुलावे में कि दुनिया प्यार के ऐसी पवित्रता के गीत गाएगी।

प्यार भी कैसा।

घर भर में अल्हड़ पुरवाई की तरह तोड़-फोड़ मचाने वाली सुधा, चन्दर की आँख के एक इशारे से शांत हो जाती थी। कब और क्यूँ उसने चन्दर के इशारों का यह मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, ये उसे खुद भी मालूम नहीं था और ये सब इतने स्वाभाविक ढंग से इतना अपने आप होता गया कि कोई इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं था – दोनों का एक दूसरे के प्रति अधिकार इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता या सुबह की रोशनी-“

हिन्दुस्तान की सबसे दुखांत प्रेम कहानियों में से एक है – धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’। अगर इस कहानी को किसी रेगिस्तान में भी पढ़ा जाए तो पाठक की आह से उत्पन्न हुए करुणा से झमाझम बारिश हो सकती है। प्रेम हर युग में अलग रंगों में दिखता है चाहे वो हीर रांझा का प्यार हो, सोहनी महिवाल की मोहब्बत हो या लैला मजनू का इश्क़ हो पर जो एक बात प्रेम के साथ हर युग में साथ चलती आती है वह है विरह की वेदना और समर्पण का ऐच्छिक भाव। ऐसा कोई ही पाठक होगा जिसने यह पूरी कहानी बिना पलकें भिगोये पढ़ी हो या उसे सुधा की मौत का करूण चित्रण अन्दर से चीर कर न रख देता हो। धर्मवीर भारती ने न जाने किस समय यह कहानी सोची होगी लेकिन यह कहानी कालजयी है जिसे हर युग में पढ़ने वाला दर्द के आईने की तरह पढ़ेगा। मैंने भी इस कहानी को दसियों बार पढ़ा है और जहाँ से सुधा की मौत का वर्णन शुरू होता और जब तक उसकी राख को नदी में प्रवाहित नहीं कर दिया जाता, मेरी आँखों से नमी पल भर के लिए भी नहीं जाती। यह कहानी पढ़ने के बाद मैंने यह किताब अपने कई साथियों, बुजुर्गों और अपने से छोटे उम्र के लड़कों को भी दी।

जब इश्क़ बहुत ही उलझे हुए दौर से गुजर रहा है तो प्रेम के सही मायने उनको जरूर पता होना चाहिए। प्रेम आज भटक कर दैहिक सुख तक सिमट कर रहा गया है नहीं तो प्रेम किसी अपेक्षा के साथ किया जाने लगा है। हालाँकि दैहिक सुख या अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन समर्पण की भावना का नगण्य होना और दुःख झेलने की बिलकुल भी ताकत और इच्छा नहीं होना, प्रेम की अधोगति और उसके प्रतीक को झूठा ठहराने लगा है। प्रेम अगर सिर्फ पा लेना ही है तो राधा और कृष्ण बिलकुल हाशिए पर खड़े दिखते हैं। और इस कहानी में सुधा, चन्दर को देवता मान कर प्रेम करती है, लेकिन अन्त तक उसे पा नहीं पाती है।  कहानी वही अमर होती है जो दिल के अन्तः तक पहुँच सके और पाठकों की जिन्दगी में शामिल हो सके। प्रेम कहानी पढ़ते हैं और पढ़कर प्रेम करना चाहते हैं तो त्याग के लिए तैयार भी रहिए।

भले ही प्रेम के अलग रूप फिल्म ‘लव आज कल’ ,’रॉकस्टार’, ‘कबीर सिंह’ में दिखती हो लेकिन दीगर बात ये है कि दर्द हर जगह मौजूद है। धर्मवीर  भारती ने लिखा भी है – ‘शरीर की प्यास भी उतनी ही पवित्र और स्वाभाविक है जितनी आत्मा की पूजा। आत्मा की पूजा और शरीर की प्यास दोनों अभिन्न हैं।’ चन्दर सुधा से प्रेम तो करता था, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए अहसान ने उसे कुछ ऐसे घेरे रखा कि वह चाहते हुए भी कभी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाया।  सुधा की नजरों में वह देवता ही बने रहना चाहता था, और होता भी यही है।  गुनाहों का देवता में सुधा से उसका नाता वैसे ही रहता है, जैसे एक देवता और भक्त का होता है।  प्रेम को लेकर चन्दर का द्वंद्व पूरे उपन्यास में इस कदर हावी है कि सुधा की शादी कहीं और हो जाती है, और अन्त में वे पूरे जीवन दर्द भोगते हैं। इस उपन्यास की आखिरी लाइनें हैं।  ‘सितारे टूट चुके थे। तूफान खत्म हो चुका था। नाव किनारे पर आकर लग गयी थी- मल्लाह को चुपचाप रुपये देकर बिनती का हाथ थामकर चन्दर ठोस धरती पर उतर पड़ा। मुर्दा चाँदनी में दोनों छायाएँ मिलती-जुलती हुई चल दीं। गंगा की लहरों में बहता हुआ राख का साँप टूट-फूटकर बिखर चुका था और नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।’

विरजन-क्या तुमको मेरा तनिक भी मोह नहीं लगता? मैं दिन-भर रोया करती हूँ। तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती ? तुम मुझसे बोलते तक नहीं। बतलाओं मैने तुम्हें क्या कहा जो तुम रूठ गये?

प्रताप-मैं तुमसे रूठा थोडे ही हूँ।

विरजन-तो मुझसे बोलते क्यों नहीं?

प्रताप-मैं चाहता हूँ कि तुम्हें भूल जाऊं। तुम धनवान हो, तुम्हारे माता-पिता धनी हैं, मैं अनाथ हूँ। मेरा तुम्हारा क्या साथ ?

विरजन-अब तक तो तुमने कभी यह बहाना न निकाला था, क्या अब मैं अधिक धनवान हो गयी?

यह कहकर विरजन रोने लगी। प्रताप भी द्रवित हुआ, बोला-विरजन। हमारा तुम्हारा बहुत दिनों तक साथ रहा। अब वियोग के दिन आ गये। थोडे दिनों में तुम यहॉ वालों को छोड़कर अपने सुसुराल चली जाओगी। इसलिए मैं भी बहुत चाहता हूँ कि तुम्हें भूल जाऊं। परन्तु कितना ही चाहता हूँ कि तुम्हारी बातें स्मरण में न आये, वे नहीं मानतीं। अभी सोते-सोते तुम्हारा ही स्वप्न देख रहा था।

संजय सहाय

प्रेमचन्द पर  हंस पत्रिका के सम्पादक संजय सहाय का यह कहना है कि वो कूड़ा लिखते थे तो समय निकाल कर प्रेमचन्द की कोई भी कहानी ध्यान से पढ़ें, बिना किसी पूर्वाग्रह के और कोई नाम याद न आ रहा हो तो जरूर पढ़ें -‘निष्ठुरता और प्रेम’। कहानी बहुत ही ख़ुशी के साथ शुरू होती है लेकिन प्रेम में दर्द के एँगल को कभी भी खारिज नहीं किया जा सकता है।  दर्द की वजह चाहे परिस्थिति हो, धन का अभाव हो, शक्ति की कमी हो लेकिन दर्द को प्रेम का अंग मान कर ही चलना होगा। वो कहते हैं कि कुछ  पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है तो प्रेम के सफल होने के लिए दर्द सहने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। हालाँकि पाकिस्तानी शायर परबीन शाकिर लिखती हैं –

“तुम भी जुल्म कहाँ तक करते, मैं भी दर्द कहाँ तक सहती,

तुम भी इतने बुरे नहीं हो, भी इतनी भली नहीं हूँ।”

लेकिन गौरतलब बात यह है कि परबीन शाकिर अपनी पारिवारिक जिन्दगी के दर्द को ही बयान करती नज़र आ रही हैं भले ही वो इस रिश्ते को ख़त्म करने की कवायद कर रही हैं। प्रेमचन्द की इस कहानी में विरजन और प्रताप की प्रेम कहानी ऐसे मोड़ पर आकर ख़त्म होती है जब नायक को लगता है कि वो उसके लायक नहीं है।  इश्क़ और मोहब्बत में लायक बनाना पड़ता है या लायक होना पड़ता है।  भागने से या रिश्ते तोड़ने से प्रेम को कोई मंज़िल हासिल नहीं होती और कई दफे तो कई प्रेमियों को दर्द भी नहीं मुकम्मल नहीं मिलता जिसके सहारे जिन्दगी के बाकी दिन काट दिये जाएँ।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी  ‘सूनी चौखटें’ भी इसी लीक में बहुत ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है। दर्द का ऐसा भावुक चित्रण ऐसे ही मर्म को छूने वाले लोग किया करते हैं।  जिन्दगी से जब वो निकल जाए जो जिन्दगी बन गयी हो तो जिन्दगी सूनी चौखट के अलावे और कुछ नहीं बचती।  मुझे लगता है कि यह रचना बहुत कम पढ़ी गयी है या इसे सही ढंग से पाठकों तक पहुंचाया नहीं गया। प्रेम किन किन दशाओं से गुजरता हुआ दिशाएँ तय करता है यह कहानी बहुत ही बारीकी से यह दिखाती है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी कविता में लिखते हुए प्रेम और दर्द की बात कही है :-

 

“कितना अच्छा होता है

एक-दूसरे को बिना जाने

पास-पास होना

और उस संगीत को सुनना

जो धमनियों में बजता है,।।।

उन रंगों में नहा जाना

जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

 

शब्दों की खोज शुरु होते ही

हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं

और उनके पकड़ में आते ही

एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं।

 

हर जानकारी में बहुत गहरे

ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,

कुछ भी ठीक से जान लेना

खुद से दुश्मनी ठान लेना है।

 

कितना अच्छा होता है

एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,

और अपने ही भीतर

दूसरे को पा लेना।”-

प्रेम में फना होना ही हमेशा प्रेम की नियति नहीं होती। प्रेम भी दूसरे अहसासों की तरह एक अहसास है। क्या होगा अगर आप उसे नहीं पा सके जिसे आप चाहते है लेकिन आप उस अनुभव के मालिक जरूर बन जाते हैं जिसे दुनिया के हर साहित्य में उच्च दर्जा प्राप्त है और जिसे मानवीय भावनाओं में भी सबसे ऊँचा दर्जा प्रदान किया गया है।

salil saroj

लेखक संसद भवन, नई दिल्ली में कार्यकारी अधिकारी हैं|
सम्पर्क- +919968638267, salilmumtaz@gmail.com

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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