कट्टरता
सामयिक

खण्ड-खण्ड नहीं एक अखंड पाखंड

(कट्टरता के साए में हम)

आज के ज़माने में पढ़ना ही सबसे ज्यादा बाधित हुआ है। सोशल मीडिया में नेट सिस्टम में लोग रमें हैं। फिर वस्तुनिष्ठ तरीके से बातें करने से लोग चिढ़ जाया करते हैं। बहुत संजीदा तरीक़े से सोचने-समझने-गुनने-पढ़ने से कई चीज़ें उजागर हो जाया करती हैं। हमें अपने भीतर झांकने का अवसर कभी छोड़ना नहीं चाहिए। यह दौर किसी भी तरह न तो आत्मालोचन का है और न वस्तुगत तरीके से किन्हीं चीज़ों को देखने का।

कभी भवभूति ने समानधर्मा साथियों की बात उठाई थी; जो बातें बार-बार रेखांकित की जाती हैं, उन सभी पर शायद पूरा-पूरा नहीं कहा जा सकता। फिर भी ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि सामाजिक सरोकारों और सच्चाइयों में तथा राजनीतिक हल्कों में मैनें कट्टरता की कई सीमा रेखाएं खींची जाती देखी और अनुभव की हैं। हां, यह ज़रूर कहना है कि अब उसकी विभिन्न कोटियों पर भी चर्चा करनी पड़ेगी। जैसे कट्टरता, सुपर कट्टरता और चरमोत्कर्ष कट्टरता।

प्रश्न है कि क्या हम अपने समय -समाज -परिवेश और सामाजिक-सांस्कृतिक अनुशासन से भाग सकते हैं? शमशेर बहादुर सिंह की दो पंक्तियां हैं– “लगी हो आग जंगल में कहीं जैसे/हमारे दिल सुलगते हैं।” कोई भी लेखक या अन्य काम में जुड़ा आख़िर कहां भाग सकता है। कट्टरता, क्रूरता, हिंसक प्रवृत्ति का क्रूर विकास क्या हमें विचलित नहीं करता? अपनी दुनिया में मस्त लोगों को छोड़कर जब लाशें बिछ रही हों, मौतों का तांडव नृत्य हो रहा हो तो क्या एक कमरे में बैठकर हम भजन-कीर्तन और कोई आयोजन कर सकते हैं? नहीं न! क्रूरता, कट्टरता एक-दो दिन की वास्तविकता कतई नहीं है। उसका रिश्ता एक-दो पार्टियों भर से नहीं है।

विचारधाराएं, सांप्रदायिक सोच, अलगाववादी मनोविज्ञान और श्रेष्ठता की अपरिमित इच्छाएं भी हमें कट्टर बनाती हैं। जिस समय के इर्द–गिर्द हम हैं और जिन चुनौतियों से हम लोग लगातर मुठभेड़ कर रहे हैं, वे किसी भी तरह सामान्य नहीं कही जा सकती हैं। शायद भजन–कीर्तन और जयकारा लगाने का समय नहीं है। हमें ग़लत चीज़ों से जूझना भी पड़ता है। हमारी चिंता यह है कि हमारे देश में बहुलता विशाल पैमाने पर अनवरत खंडित की जा रही है। सहयोग, सद्भाव, सौहार्द्र, भाईचारा तोड़ा जा रहा है।

नैतिकताओं और आचरणों से हम बहुत दूर आ चुके हैं; हमारे सामने जो चीजें हो रही हैं या घट रही हैं, उसे कोई कब तक अनदेखा कर सकता है। भारतीय नागरिकों ,अल्पसंख्यकों, ग़रीबों, मजलूमों, आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों के हाहाकार को कब तक अनदेखा किया जा सकता है? चीज़ों को सतही तौर पर नहीं देखा जा सकता। हकीकतों को अंदरूनी तहों में भी देखना पड़ेगा। यदि हमारे पास ज़मीर है तो क्या हम केवल हाथ पर हाथ धरे बैठे रह सकते हैं? मध्यकाल के एक कवि और संत कुंभनदास ने ठीक कहा था– ”संतन को कहां सीकरी सो काम/आवत जात पनहिया टूटी/बिसरि गयो हरिनाम/जिनको मुख देखे दुःख उपजात/तिनको करिवे परो सलाम।”

क्या कोई सामाजिक सरोकारों में उग आई विकृतियों से इंकार कर सकता है। हठधर्मिता की बात अलग है। हां, यह सच है कि ये सब एक दिन में नहीं हुआ। न 2014 के बाद की ही यह परिघटना है। यह सवाल भी इधर के दौर में शिगूफे की तरह जबर्दस्त तरीके से टहल रहा है। हां, इसके तमाम रूप वृहद हुए हैं और उन्हें संजीदा तरीक़े से परिपोषित भी किया जा रहा है। क्या हम विकास की यांत्रिक कवायद के मूक दर्शक होकर अपने नागरिक धर्म का सही-सही निर्वाह कर सकते हैं? क्या हमारे जीवन के विकास की धाराएं बिना तर्क के कठहुज्जती से ही बहेंगी? क्या हम ज़िंदगी बचाने को ही मोहताज हो जाएंगे? क्या किसी तरह जीना ही विकास के रूप में परिगणित कर लिए जाएगा? हम समय में तैरती हुई घुटन, तकलीफ़, नृशंसता के मूकदर्शक बने रहेंगे क्या?

जाहिर है समय हमें रचता है और हम समय को। यह एक बेहद गहन रिश्ता है। हमारे साथ चलती है दुनिया और उम्मीद भी। अब तो निराशा, भय और नृशंसता भी साथ–साथ चल रही है और हमें बार–बार छल रही है, कट्टरता, क्रूरता और उसके तमाम रूप पीछे पड़े हैं। लेखक, विचारक और नागरिक किसी भी सूरत में अपनी ज़मीन नहीं छोड़ सकते। इसे कोई माने या न माने; अब तो लोकतांत्रिकता नाम मात्र की बची है। उसकी केवल मुंह दिखाई चल रही है। इस दौर में मुसोलिनी, हिटलर के डरावने इरादे एकदम सतह पर आ गए हैं। डर को स्थाई बनाने के उद्यम हमारे एकदम सामने हैं। एक लंबा समय हो गया भारत में लोक तंत्र को देखते–देखते और विडंबनाएं अनुभव करते।

कट्टरता पूर्व में भी रही है– जैसे ज्ञान की कट्टरता, संस्कृति और सभ्यता के क्षेत्र में कट्टरता। अब तो मूर्खता की भी कट्टरता-क्रूरता उफान पर है।असली समस्या तो इन सबसे निपटने की ही है। बुद्धिजीवी वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा तरह–तरह की उन चीज़ें जमाने में लगा है जो उनके आगे के लिए किसी काम आए, उसे लाभान्वित करती रहें। कुछ निस्पृह की मुद्रा में हैं और कुछ हिस्सा लगा है अपनी वास्तविकता के साथ। दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस दौर में उन्माद का पुख़्ता इंतजाम अब सांस्थानिक स्वरूप लेता जा रहा है- एकदम खुलेआम।

प्रसिद्ध चित्रकार पाब्लो पिकासो ने कहा था– “कलाकार, जो आध्यात्मिक मूल्यों के साथ रहते और काम करते हैं, ऐसे संघर्ष के प्रति उदासीन न रह सकते हैं, न रहने चाहिए; जिसमें मानवता और सभ्यता के श्रेष्ठतम मूल्य दाव पर लगे हैं।” कोई भी समय समाज निरा झूठ और क्रूरता के नक्शेकदम पर नहीं चल सकता; जिन्हें नहीं दिखता और जो देखना ही नहीं चाहते उन्हें आप आंखों में उंगली डालकर दिखा नहीं सकते। हमारी स्वतंत्रता लगातार सिकुड़ती-सिमटती जा रही है; कई पक्ष और संदर्भ हैं इसके।

जब हमारे पास न स्वप्न बचेंगे, न सर्जनात्मकता, न प्रतिरोध; तो हम बेहतर दुनिया कैसे रच सकेंगे? वैसे यह नागरिकों के पराभव का समय है और इरादों में छिपे सपनों का भी। क्या हम डर–डर कर जीवित रह सकेंगे? क्या हम उजाड़ में ही संग्रहालय बचाए रख पाएंगे? हमारे पुराणों और इतिहास में क्रूरता और कट्टरता के अनेक विध्वंसक रूप रहें हैं। उसे बहुत दूर से न देखें तब भी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन, भारत-पाक बंटवारे की त्रासदी, आपातकाल, सिक्खों के नरसंहार और बाबरी मस्जिद विध्वंस के रूप में भी देख और अनुभव कर सकते हैं। हमारे जीवन में त्रासदी भी लगातार और अकूत है।

अंधेरे समय में रोशनी के लिए लालटेन जलाई जा सकती है। कुमार अंबुज की कविता ‘क्रूरता’ का यह अंश पढ़ें– “धीरे–धीरे क्षमा भाव समाप्त हो जाएगा/प्रेम की आकांक्षा तो होगी/ मगर जरूरत न रह जाएगी/झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा/क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा/एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग/पराजित होने के लिए नहीं/अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे।”

हम बेहद कठिन समय में हैं जहां असहमति के लिए लगभग कोई जगह नहीं है। खुशी केवल हमारे कल्पना लोक की चीज़ हो गई है। कट्टरता बहुरूपीय है। इत धरती उत आकाश में। कब किस रूप में वह भाषित होने लगे, इसका कोई ठिकाना नहीं। अब कट्टरता, क्रूरता, वहशीपन हमारे अत्यंत निकट है। यहां उसका स्थाई निवास हो चुका है। हम फासिस्ट हिंदुत्व के मनोविज्ञान और कट्टरता में आ गए हैं। मुस्लिम कट्टरता की बड़ी-बड़ी बातें हो चुकी हैं, उनका उखाड़-पछाड़ बहुत हुआ। उनका ज़माना बीत गया ऐसा नहीं है।

और ऐसा भी नहीं है कि हिन्दुत्व का इतना बड़ा वितान झटपट हो गया हो। उसकी जड़ें लंबे समय से रही हैं। इसकी छुटपुट लहरें 1920 से हम देखते आ रहे हैं। उसके तरह-तरह के प्रारूप बनाए गए। उसमें राजनीति से अपने को अलग कहने की बातें हुई हैं। दबी रह की शक्ल में उसके आनुषांगिक संगठन राजनीति का बाजा एक लंबे समय से बजाते रहे हैं। सफलता प्राप्त हुई तो उनकी छटाएं सामने आ गईं। उनमें हिंदू आईडेंटिटी व्यापक पैमाने पर आ गई। मुझे अकबर इलाहाबादी का कहा याद आया- “बूट डासन ने बनाया, हमें एक मजमूं लिखा/ मेरा मजमूं चल न पाया, उनका जूता चल गया।

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लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। सम्पर्क +919425185272, sevaramtripathi@gmail.com

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