नो नेशन फ़ॉर वीमेन
पुस्तक-समीक्षा

बलात्कार के विभिन्न पक्षों की पड़ताल है ‘नो नेशन फॉर वीमेन’

 

गणेशन. एन. देवी अपनी किताब ‘countering violence’ में हिंसा के पश्चिमी और पूरब के दार्शनिक आधारों की खोज करते हैं और क्रिमिनोलॉजी, न्यूरोलॉजी, जैविक और मनोवैज्ञानिक मान्यताओं से गुजरते हैं। इसी क्रम में वो ‘डर और अपराध’ (fear and crime) के बारे में लिखते हैं कि ‘हिंसा जो खास तबके को बर्बाद करती है वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया जाता है। लेकिन इस तरह के हिंसा के समर्थक अपने कायरता से डरे हुए होते हैं जैसे एक दादा टाइप आदमी मनोवैज्ञानिक रूप से अपनी मर्दानगी खोने से डरा रहता है।’ बात जब स्त्रियों की हो तो पूरे भारतीय समाज ही स्त्रियों पर अपने वर्चस्व को खोने के ख्याल से डरा रहता है जो बार-बार उसे हिंसा के लिए उकसाते रहता है जिसका रास्ता स्त्री देह से होकर जाता है, जिसकी परिणति बलात्कार और उसके बाद हत्या पर खत्म होती है।

प्रियंका दूबे की रिपोर्ताज ‘नो नेशन फॉर वीमेन’ इसी मनोवैज्ञानिक पहलू को (जिसका ठोस आधार समाजशास्त्रीय, राजनीतिक,ऐतिहासिक और आर्थिक बदलावों के क्रम में सामंतवाद से पूँजीवादी व्यवस्था के परिवर्तन में संसाधनों के नियंत्रण और चेतना निर्मिति के परिवर्तन से जुड़ा हुआ है) पाठकों के सामने रखता है। पुस्तक में 13 अध्याय है जो बलात्कार के विभिन्न पक्षों और उससे जुड़े मंशा को जनता के सामने लाती है। हर रिपोर्टिंग बलात्कार को एक सनसनीखेज घटना के रूप में देखने का निषेध करती है। यह बलात्कार के बारे में न होकर बलात्कार होने की प्रक्रिया के बारे में है। यह देशभर में हुए बलात्कार का सूचनात्मक और विवरणात्मक संकलन नहीं है। यह देश भर में हुए बलात्कारों के अलग अलग पैटर्न के बारे में है। इसका संकेत लेखिका ने अध्यायों के शीर्षकों में किया है। जैसे: ‘त्रिपुरा’:- पॉलिटिकल नेचर ऑफ रेप/ सेक्सुअल क्राइम ।

‘लड़कियों को दब के रहना चाहिए’ यह भारतीय  पितृसत्तात्मक समाज का मुख्य स्वर है। इसे हर घर में हर रोज दोहराया जाता है जिसके पीछे मानसिकता यह है कि लड़के तो छेड़खानी करते ही हैं (मानो यह उसका अधिकार है)। दूसरा सर्वमान्य टिप्पणी जो नारे की तरह कहा जाता है कि  ‘लड़कों से गलती हो जाती है लड़कियों को चाहिए की थोड़ा मैनेज करके चले।’ लेखिका इसी को ‘करेक्टिव’ रेप ऑफ बुंदेलखंड के रूप में प्रस्तुत करती हैं। लड़की को जिंदा जला देना बुंदेलखंड के लोगों में शर्म और गुस्सा नहीं पैदा करती इसका एक बड़ा कारण यह है कि जिनके साथ ये घटनाएं घटती हैं वे वंचित तबके के लोग हैं। इनके बारे में पहले से ही धारणा बनी हुई है कि ‘ये लोग होते ही ऐसे हैं’। अमीर लोगों को फंसाते हैं उनके साथ मौज करते हैं और फिर ब्लैकमेल करते हैं।

इस तरह के प्रचलित नारे बनाए हैं इसलिए गए हैं ताकि इन अपराधों का सामान्यीकरण किया जा सके। जबकि हकीकत यह है कि आज भी किसी भी ईंट भट्ठे पर चले जाइये आपको पता चल जाएगा कि सेक्सुअल क्राइम किस हदतक जारी है। ये सब सह जाना उन औरतों और लड़कियों की मजबूरी है मजबूरी है भूख की जिसके आगे उन्हें हर तरह का शोषण कबूल करना होता है। करेक्टिव रेप और सेक्स क्राइम को रोकने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि इन चलताऊ  मुहावरों और नारों को मुखरता से दरकिनार किया जाए। ये मुहावरे देखने- सुनने में जितना सतही लगते हैं इसका व्यावहारिक असर उतना ही गहरा है।

उत्तर-पूर्वी राज्यों में बलात्कार राजनीतिक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए किया जाता है। मीनाक्षी जैसी औरत इसके उदाहरण हैं। जब उन्होंने लेफ्ट पार्टी छोड़कर  भाजपा ज्वाइन किया तो उसके  साथ लेफ्ट के कार्यकर्ता ने बलात्कार किया। ये वही लेफ्ट पार्टी है जो  औरतों की बेहतरी के लिए नारे देते रहते हैं और जब उनके कार्यकर्ता  बलात्कार करते हैं तो यही  सरकार बलात्कारी को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करती है। भाजपा वाले सहानुभूति जताते हैं,फोटो खिंचवाते हैं और अपना राजनीतिक हित साधने के बाद किनारे हो जाते हैं। असल में भारतीय समाज राजनीति में प्रभावती तो चाहते हैं जो दान पुण्य कार्य में लगी रहे लेकिन, रजिया सुल्तान उन्हें अखरती हैं। फलस्वरूप, उसकी हत्या करवा दी जाती है या द्रौपदी की तरह चीरहरण किया जाता है जिससे रक्षा करने कोई कृष्ण नहीं आते।

गणेशन. एन. देवी लिखते हैं कि ‘जब किसी समाज में आर्थिक समृद्धि बढ़ती है तो उस समाज के भीतर हिंसा में भी इजाफा होता है। उदाहरण के लिए फ्रांस में 19वीं शताब्दी में 300% तक हिंसा में बढ़ोतरी हुई थी।’ लेकिन भारत में स्थिति और गंभीर है यहां जब कोई समाज आर्थिक और सामाजिक रुप से समृद्ध होने की कोशिश करता है तो उस प्रक्रिया के दौरान ही हिंसा बढ़ जाती है। पारधी समुदाय के लोगों को अंग्रेजों ने जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया था जो कि 1956 में कानून बनाकर समाप्त किया गया।

इसके बावजूद भी घृणा, अफवाह और पूर्वाग्रह के कारण  बेतूल जैसे जगह पर पुलिस, बीजेपी और कांग्रेस के नेता मिलकर सामूहिक बलात्कार करता है। इस  तरह के बलात्कार के मूल में जमीन और संसाधन पर कब्जा का विचार है। कहीं भी दलित बस्ती, आदिवासियों के जमीन या वंचित समाज को आवंटित की गई जमीनों और सुविधाओं पर सवर्ण जाति और सुविधा संपन्न समूह को कब्जा करना होता है तो वह यही पैटर्न का सहारा लेते हैं।

स्त्री देह को भी एक संसाधन के रूप में देखते हैं और यह मानते हैं कि अगर उस पर हमला किया गया तो इज्जत के नाम पर वहां का पूरा समाज खुद ही वह जगह छोड़ देगा और इस  तरह उनके संसाधनों पर कब्जा हो जाएगा। यही पैटर्न भारत विभाजन के दौरान देखा गया। पूरी दुनिया में यह पैटर्न देखने को मिला है। नादिया मुराद ने अपनी किताब ‘द लास्ट गर्ल’ में जीवंत वर्णन किया है कि कैसे यजीदी होने के कारण इस्लामिक स्टेट ने उनके पूरे गांव के पुरुषों को मारकर उनकी जमीनें हड़प ली और महिलाओं को सेक्स स्लेव के रूप में बेच दिया।

क्योंकि  इस्लामिक स्टेट यह मानता है कि यजीदी लोग नास्तिक होते हैं और यह इस्लाम नहीं अपनाएंगे। इनका बलात्कार और हत्या करना उनका धार्मिक कर्तव्य है।

जब भी पुरुषवादी व्यवस्था को अपना अहंकार और वर्चस्व को स्थापित करना होता है तो औरतों का शरीर इसका माध्यम बनता है। यही वजह है कि सुजाता अपनी किताब ‘आलोचना के स्त्री पक्ष’ में विस्तार से बताती हैं कि ‘जब देह, यौनिकता ही पितृसत्ता के निशाने पर हैं तो देह विमर्श से तकलीफ़ तो होनी स्वाभाविक है।’ इसके साथ ही जरूरी यह है कि ‘बलात्कार और धर्म’, ‘बलात्कार और जाति’, ‘बलात्कार और प्रशासनिक संस्थाओं’ को बलात्कार और स्त्री हिंसा के अध्ययन का हिस्सा बनाया जाए।

नीलम,जाहिरा (आशियाना रेप केस) और ज़ोया के केस में उपर्युक्त मुद्दे को देख सकते हैं। नीलम का बलात्कारी एक बसपा का नेता है जो एमएलए और ब्राह्मण जाति के विशेषाधिकार के नशे में अपनी बेटी के उम्र के लड़की निर्ममता से बलात्कार करता है। जाहिरा को छह लोग चलते कार में बलात्कार करता है, उसको सिगरेट से दागता है। पुलिस उसे बार-बार ‘आशियाना वाली लड़की’ कहकर उसे कलंकित स्त्री के रूप में देखता है। शिक्षक उसे पढ़ाने से मना कर देता है। ज़ोया को पुलिस उठाकर ले जाती है और बलात्कार करके फाँसी पर लटकाकर आत्महत्या करार कर देती है। उसके बाद पुलिस पाँच लाख देकर मामला को दबाने की कोशिश करती है,जाँच रिपोर्ट बदलती है।

गांववाले यह दवाब बनाते हैं कि जो मुस्लिम पुलिस वाले हैं उसका नाम मत लो क्योंकि वह हमारे धर्म का है। औरत के मना करने पर उसका चरित्र हनन किया जाता है, पति भी उसपर लाँछन लगाता है। ऊपर के तीनों केस में जाति, राजनीति, धर्म, प्रशासन सब के पितृसत्तात्मक रवैये का ब्यौरा है। लेखिका अपनी रिपोर्टिंग में यही बार-बार बताना चाहती हैं। भारतीय समाज का समाजशास्त्रीय एप्रोच ही पितृसत्तात्मक यौनिक कुंठाओं से ग्रस्त है।

इसलिए जितने भी संवैधानिक और गैर-संवैधानिक संस्थायें होंगी सब जगह यह यौनिक हिंसा दिखाई देगी। याद कीजिए 2004 के मणिपुर की घटना जब सेना के जवान द्वारा किए गए बलात्कार के विरोध में ‘इंडियन आर्मी कम एंड रेप अस’ के बैनर बनाकर महिलाओं ने नंगा प्रदर्शन किया था। लोगों की भावनाएँ सेना के नाम पर तुरंत आहत हो जाती है। लोग समझने को तैयार ही नहीं हैं कि समाज के मूल विचार में ही स्त्री भोग्या है। तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं में सेवा देने वाले लोग इसी समाज से जा रहे हैं। ऐसे में इस तरह की क्रूरता को अंजाम किसी भी संस्थान का व्यक्ति दे सकता है।

अकारण नहीं है कि पूरे पुलिस विभाग में अभी भी 6 प्रतिशत से कम महिलाएँ हैं। नीतू जैसी पुलिस कर्मी का बलात्कार होता है तो वह चुप रहती है। क्योंकि उसे पुलिस विभाग ने उस तरह प्रशिक्षित नहीं किया जिस तरह एक पुरुष को किया जाता है। उसके साथी उसे चरित्रहीन कहते हैं। वे नीतू का पक्ष नहीं सुनना चाहते हैं। आए दिन महिला कांस्टेबल की आत्महत्या की खबरें आती हैं जिसके मूल में यौनिक हिंसा का केस है जो उसके सीनियर करते हैं। यहाँ तक कि सीनियर महिला अधिकारी भी इससे पीड़ित हैं। आखिर क्या कारण है कि वो चुप रहती हैं? वही पुरुषवादी दवाब है जो अमरबेल की तरह हर लोकतांत्रिक संस्था में पसरा हुआ है जो आज़ाद ख्याल के ऊर्जा को जड़ समेत सूखा देना चाहता है।

चाइल्ड एब्यूज से हम सब परिचित हैं। इसे अंजाम देने वाले प्रायः परिवार वाले होते हैं या जेलों में बंद बच्चों के साथ ये हिंसा पुलिस वाले और क्रिमिनल करते हैं। स्कूलों में यह काम प्रायः प्रिंसिपल और मध्य आयु वर्ग के शिक्षक होते हैं। ऐसा ही एक केस बीएड के प्रशिक्षण के दौरान लड़कियों ने बताया था कि कैसे ऑडियो कॉल करके प्रिंसिपल अश्लील बातें करता था।

यही कारण है कि हम जैसे युवा लोग किसी बच्चे को चाह कर भी गोद में लेकर प्यार नहीं जता पाते। क्योंकि पूरा माहौल अविश्वसनीय है। अब बच्चों को गुड टच और बैड टच नाटक करके सिखाना हम सब की मजबूरी है। यह आधुनिक सभ्य समाज पर एक कलंक ही है कि हमारे बच्चे इस अतिरिक्त भय से ग्रसित रहें। काश! कि ‘हाईवे’ फ़िल्म की कहानी काल्पनिक होती। प्रियंका जी ने जिस गुड़िया की घटना का जिक्र किया है उसमें सकारात्मक यह है कि उसके पिता अब अपनी बेटी को पढ़ाने को लेकर दृढ़ संकल्पित हैं। यही वह रास्ता है जो हमारे बच्चों को मजबूती देगी।

इसी तरह  आदिवासी लड़कियों के अपहरण, खरीद-बिक्री और जबरन वैश्यावृत्ति से हर कोई वाकिफ़ है। इस प्रक्रिया में दलालों का लम्बा नेटवर्क है। दक्षिण एशिया में इसकी जटिल प्रक्रिया है जिसमें बॉर्डर पर तैनात पुलिस के अलावा नेता, लोकल दादा लोग शामिल होते होता है। लुइज ब्राउन ने अपनी किताब ‘एशिया का सेक्स बाजार’ में विस्तार से लिखा है। गरीबी, बेरोजगारी और भूख से बेहाल लोग अपनी बेटियों को बाहर कमाने के उद्देश्य से भेजते हैं और बाद में पता चलता है कि वह बेच दी गयी। कई बार पेरेंट्स सब जानते हुए चुप रह जाते हैं। यह शोधपरक पुस्तक इस मामले में कई महत्वपूर्ण सूचनाओं का स्रोत है।

2003 में एक फ़िल्म आयी थी मनीष झा के निर्देशन में ‘मातृभूमि:- A Nation without woman’ । फ़िल्म भ्रूण हत्या और उसके दुष्प्रभाव पर है। इसमें दिखाया गया है कि एक इलाके में लड़कियों की आबादी ही खत्म हो गयी है। बड़ी मुश्किल से एक लड़की शादी के लिए मिलती है। उस लड़की का यौनिक शोषण (बलात्कार) उसका पति, ससुर सब करते हैं। भ्रूण हत्या बुरा है। लेकिन जिस समाज में वर्चस्वशाली जातियाँ वंचित जातियों के लड़कियों को अपनी संपत्ति समझकर बलात्कार करके, उसके योनि में काँच की बोतल ठूँस दें उस समाज में लड़कियों के जन्म पर क्या प्रतिक्रिया होगी?

याद कीजिये हरियाणा का ‘भागना रेप केस’ और बदायूँ में 12 और 14 साल की लड़की का बलात्कार करके आम के पेड़ से लटका देना। याद कीजिये हाथरस केस। इसलिए वर्तमान स्त्री विमर्श में ‘जाति’ का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है। उसपर भी हास्यास्पद यह है कि अदालत कह देती है कि 14 साल की लड़की रात को पेड़ पर चढ़कर खुद आत्महत्या कर ली! बलात्कारी बरी हो गए। नेता आश्वासन देकर  चले जाते हैं। उनके द्वारा किया गया कोई वादा पूरा नहीं किया जाता।

मुझे हरियाणा वाले केस की वो बच्ची का कथन याद आता है जब वह कहती है ‘वह 5वीं से आगे भी पढ़ना चाहती है। वह वकील बनना चाहती है, दोनों बड़ी बहनों को पुलिस और डॉक्टर बनते देखना चाहती है। उसकी प्रेरणा नाजिया नाम की वो लड़की है जो बलात्कार पीड़िता रही है और आज खूब पढ़ रही है। वह मानती है कि बलात्कार के जीवन समाप्त नहीं हो गया। मुझे बरबस ही अपनी प्रिय वक्ता-लेखिका कमला भसीन की याद आ गई जब वो आमिर खान को इंटरव्यू में कहती हैं ‘किसने मेरी योनि में इज्जत रखा?मैंने तो नहीं रखा। मेरा बलात्कार हुआ तो इज्जत बलात्कारी की जानी चाहिए थी।’

भागना में जहाँ जाट अपनी रसूख के कारण बचे रहे वहीं बदायूँ में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में पप्पू यादव और उसके साथी बच निकला। यहाँ बलात्कारी अपनी जाति, धर्म, नस्ल, राजनीतिक एजेंडे के गठजोड़ से बच निकलता है। बंगाल में जहाँ सरकार बदनाम न हो इसलिए बलात्कार की घटना दबा दी जाती है तो विपक्ष इसलिए बलात्कार करता-करवाता है ताकि सरकार बदनाम हो। यह सब होता है स्त्री के देह पर। स्त्री देह युद्धभूमि है जिसके जरिये सरकार बनती है, बिगड़ती है, संसाधन पाया जाता है। कुछ भी पाना हो स्त्री देह को रौंद दो।

मैं फिर याद दिला रहा हूँ यह किताब बलात्कार होने के कारणों की पड़ताल करती है,उसकी अलग-अलग प्रक्रिया को समझने की कोशिश करती है। किताब अँग्रेजी के साधारण से भी साधारण पाठक को समझ आए, उसे संवेदनशील करे, झकझोर कर पितृसत्ता और उसके हिंसा पर सोचने को मजबूर करे यह सोच के साथ बेहद ही सरल शब्दों और वाक्यों में लिखा गया है। किताब बहुत तनाव में डाल सकती है। लिखा एक स्त्री ने है तो उनके नजरिये का असर है कि भाषा के प्रवाह में ही वह तनाव व्याप्त है।

पूरी शैली संवादात्मक है मानों दृश्य विधा में पढ़ रहे हों। हम पीत पत्रकारिता के दौर में हैं जहाँ बलात्कार की खबरें भी सनसनी और टीआरपी के लिए दिखाई जाती है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम है। जो भागीदारी है भी वे अपने पुरुषवादी मालिकों की भाषा में बोलती हुई कबका स्त्री वेश में पितृसत्ता के स्टार एंकर बन चुकी हैं और करोड़ों के पैकेज में अपना ईमान बेचकर स्त्रियों के संघर्ष को थोड़ा और लम्बा कर रही हैं। ऐसे में प्रियंका जैसी फील्ड रिपोर्टर स्त्रियों के संघर्ष के जमीन को सींचकर विविधता से भरे भारत में बलात्कार के विविध पक्षों को सामने लाने के लिए छह साल भटकती हैं। आप हमसब की प्रेरणा हैं। ऐसे में ऋचा मैम की कविता संग्रह ‘सुनी-सुनायी बातें’ की कविता ‘प्रियंका रेड्डी की लाश’ की पँक्तियाँ याद आ रही हैं कि

‘ सब के सब गुस्से में हैं
सब फांसी चाहते हैं
जिसने फेक आईडी बनाई मेरी
बदनाम किया
जिसने मजबूर किया कि
शोध बीच में रुक जाए
सब गुस्से में हैं
प्रियंका रेडी की लाश …
बहुत लोगों को गुस्सा दिलाती है
सिर्फ लाश ही गुस्सा दिलाती है।’

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लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया में स्नातकोत्तर (हिंदी विभाग) छात्र हैं। सम्पर्क +917050869088, manishpratima2599@gmail.com

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