पुस्तक-समीक्षा

जिनका अंजुमन कभी गुलज़ार न हो सका ‘इस जिन्दगी के उस पार’ की कहानियाँ

 

किन्नर विमर्श पर अभी तक केवल दो आत्मकथाएं पढ़ी थीं। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की ‘मैं हिजड़ा मैं लक्ष्मी’ और मानोबी बंधोपाध्याय की ‘पुरुष तन में फंसा मेरा नारी मन’ हालांकि एक आलोचनात्मक पुस्तक जो वाणी प्रकाशन से आई थी ‘किन्नर समाज संदर्भ तीसरी ताली’ उसे भी पढ़ा था और इन तीनों की ही समीक्षाएँ भी की थी। किन्नर विमर्श को अब तक सिनेमा, साहित्य और समाज के नजरिये से जितना देख और समझ पाया हूँ उससे उसे जानने की उत्सुकता और बलवती हो जाती है। ये तीसरा वर्ग समाज का है ही ऐसा जो है तो परित्यक्त किन्तु इसके राज हर कोई जानना चाहता है। हमारे घरों में खुशी का मौका हो तो हम इन्हें बधावा बाँटते हैं। इसके अलावा इन्हें सड़कों पर, रेल  में, बस में मांगते हुए भी देखते हैं। लेकिन वो कहते है न कि भगतसिंह पैदा होना चाहिए। लेकिन अपने घर में कोई पैदा होने नहीं देता और हो जाए तो उसे वैसा बनने नहीं देता। यही हाल कमोबेश इनके साथ भी है।

कभी पुरुष रूप में तो कभी स्त्री रूप में जब ये हमारे समाज में जन्म लेते हैं तो हम इन्हें हमेशा दुत्कारते हैं। इन्हें अपने से दूर करते हैं। क्योंकि ये हमारे लिए कलंक बन जाते हैं। समाज की ये सोच तो न जाने कब बदलेगी फिर भले इनके लिए कितने ही कानून बन गए या बन जाएं। खैर हाल ही में एक पुस्तक पढ़ी। ‘इस जिन्दगी के उस पार’ ग्यारह कहानियों का यह संग्रह किन्नर एवं समलैंगिक विमर्श पर केंद्रित है और हिंदी साहित्य का पहला कहानी संग्रह कहा जा रहा है इस विमर्श पर।

इस किताब की पहली कहानी ‘ मेरे बलम चले गए’ सुशीला नाम की किन्नरी की कहानी है। जो दक्षिणी दिल्ली में जन्म लेती है बड़ी होती है। उसके साथ बड़ा हो रहा है उसका दोस्त प्रदीप। सुशीला बचपन में प्रदीप को राखी बांधती है लेकिन कुछ सालों बाद जब वे बड़े होते हैं और एक अंतराल के बाद मिलते हैं तो दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, एक दूसरे को दिल दे बैठते हैं। उनके बीच सम्बन्ध भी बनते हैं। प्रदीप सुशीला से शादी करना चाहता है परंतु प्रदीप के पिता समाज का कहकर उसकी शादी लता नाम की एक लड़की से करवा देते हैं। प्रदीप तीन साल तक लता के साथ रहता है परंतु लता की देह प्यासी ही रह जाती है। प्रदीप को सुशीला से प्यार है और वह पत्नी के रूप में बिस्तर पर उसी को देखना चाहता था। ये कामना उसकी पूरी न हुई तो उसने मौत को गले लगा लिया। उसकी मौत का कारण क्या था यह तो लेखक नहीं बताते परन्तु जब सुशीला तमिलनाडु जाती है अपने आराध्य देव के दर्शन करने मंडली के साथ तो वहाँ कुछ दिन उत्सव में शामिल होकर पुनः लौटती है। वहाँ उसकी एक दोस्त बन जाती है जिसे वह कहानी सुनाती है अपनी। वापसी में बची हुई दास्तान भी सुना देती है पर बड़ी जल्दी में संक्षेप में। और कहानी का शीर्षक सिद्ध होता है मेरे बलम चले गए। कहानी में कुछ ऐसे कड़वे सच हैं जो हम आए दिन अखबारों में, न्यूज चैनलों पर सुनते हैं। पवित्र धागे की डोर से जिसे भाई माना बचपन में उसी के साथ बड़े होने पर सम्बन्ध स्थापित होते देखना। महसूस करवाता है कि समाज में जो घटित होता है उसका विभत्स आईना है यह कहानी। कहानी में कुछ एक अच्छी लाइने भी हैं।

इसके बाद संग्रह की दूसरी कहानी है – ‘मेरी बेटी’ कथा वस्तु और कथा विन्यास के मुताबिक यह कहानी मुझे अच्छी लगी। पहली कहानी जिस तरह व्यथित करती है तो उसके बाद बाकी कहानी पढ़ने का मन नहीं करता लेकिन जब मन मारकर पढ़ने लगा तो दूसरी कहानी मुझे प्रेरणादायक कहानी लगी। इसमें मुन्नी नाम की एक किन्नरी है जिसे परिवार ने निकाल दिया। निकाल तो क्या दिया एक वेश बदले हुए किन्नर गुरु के हाथ सौंप दिया। वह उससे भीख मंगवाता है। एक दिन अरोड़ा दम्पति उसे अपने साथ ले जाते हैं। उनके अपनी कोई संतान नहीं है। वह उनके यहाँ बड़ी होती है पढ़ लिखकर एम्स में बड़ी डॉक्टर बन जाती है। सालों बीतने पर उसकी मां का ऑपरेशन होता है एम्स में जिसकी जिम्मेदारी मुन्नी पर है जो डॉक्टर राधिका अरोड़ा है। वह अपनी मां को बचा लेती है। ऑपरेशन के बाद उसकी मां को पता चलता है कि वह उसकी बेटी राधिका उर्फ मुन्नी है तो दोनों बिसूर पड़ती हैं। कहानी प्रेरणा देती है। इसके अलावा मानवीयता के कुछ पहलू भी कहानी में उजागर होते हैं तो संवेदना के कुछ पल भी उस अहसासात में आपको भिगो कर चले जाते हैं।

संग्रह की तीसरी कहानी है – ‘दयाबाई’ दयाबाई भी घर से निकाली गई है कारण है उसका थर्ड जेंडर होना। परिवार की बदनामी होती है इसलिए उसे निकाल दिया जाता है। लक्ष्मीबाई नाम की अपनी गुरु को दयाबाई मां कहती है उसकी सेवा करती है। उसके साथ विरह के गीत गाती है। उसके पाँव दाबती है, सेवा करती है। लाखों रुपए दान भी करती है। लेकिन उसकी जिन्दगी में बावजूद इसके सन्तुष्टि और सुख, सुकून नहीं है। जिसका कारण उसका परिवार से परित्यक्त होना है। उसका एक प्रेमी भी है लेकिन वह भी शादी करके उससे दूर चला जाता है। वह व्यथित जीवन जीने को मजबूर हो जाती है तो उसकी गुरु एक दिन उसे उसके घर लेकर जाती है। घर वाले खुश होते है मिलते हैं। उससे सिक्का लेकर रख लेते हैं सिक्के के पीछे की मान्यता भी कहानी में अभिव्यक्ति पाती है। दयाबाई की भतीजी की शादी होती है उसमें वह भी भाई की खूब मदद करती है लेकिन जब लोग उसके बारे में पूछते हैं तो उसका भाई उसे रुपए में लाया है ऐसा कहता है तो दयाबाई व्यथित हो वहाँ से हमेशा से चली जाती है। यह कहानी बताती है कि किन्नर लोग जो अपने परिवार से दूर धकेल दिए जाते हैं वही समय आने पर अपने परिवार की मदद भी करते हैं। लेकिन बदले में उन्हें दो मीठे बोल भी सुनने को न मिलें तो उनका प्रतिरोध करना बनता है। यह कहानी समाज का आईना प्रस्तुत करती है।

संग्रह की चौथी कहानी है – ‘रक्तदान’ इस कहानी की पात्रा बिमला है जो पहले कभी बिमल हुआ करती थी। वह भी परित्यक्त वर्ग से सम्बन्ध रखती है। घर से बेघर कर दी जाती है। बड़ी होकर अपना रक्तदान करती है स्वेच्छा से ऐसा करके उसे आत्मिक शांति मिलती है। अपने गुरु के साथ रहकर उसे अपनापन मिलता है। कुतुबमीनार की तरह उसकी जिन्दगी भी एक जगह ठहर सी जाती है। जो बिमला दुनिया के लिए रक्तदान करके जिन्दगी बचाती है वही एक बार अपने भतीजे के लिए भी जीवनदायिनी रक्त की बूंदें दान कर देती है। इससे भतीजा तो बच जाता है बावजूद इसके उसका परिवार उससे घृणा करता है। इस कहानी में लेखक तीसरे वर्ग के साथ हो रहे घोरतम अन्याय को दिखाता है। जिनका रक्त हम अपने शरीर में ले लेते हैं लेकिन उनसे घृणा करते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है। यह कहानी हमारे समाज के छिछले वर्ग के लोगों की मानसिकता भी उजागर करती है। इस कहानी की कथा वस्तु औसत आधार की है किंतु इस कहानी का भावनात्मक पक्ष इतना मजबूत है कि यह कहानी सोचने पर और कुछ क्षण ठिठक कर विचार करने पर मजबूर करती है।

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संग्रह की पाँचवी कहानी – ‘रामवृक्ष दादा की याद में’ इस कहानी का प्रमुख पात्र मुरली है। जो बचपन में अपने दादा के सगे भाई यानी रामवृक्ष दादा के साथ सम्बन्ध बना चुका है। दरअसल दादा की घरवाली गुजर गई है और दादा अकेले हैं एक रात दादा बिस्तर में मुरली को मसल देते हैं उसके बाद यह सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ साल बाद वह अपने गांव से दिल्ली आ जाता है यहाँ आईआईटी में पढ़ते समय उसके सम्बन्ध उसके क्लासमेट और रूम मेट अमरेंद्र से भी बनते हैं। वहाँ से पास होते ही अमरेंद्र विदेश में नोकरी करने लगता है उसकी शादी हो जाती है। इधर न चाहते हुए भी मुरली को भी शादी करनी पड़ती है। खूब दान दहेज भी मिलता है। लेकिन दो बच्चों का बाप मुरली डायरी लिखने का भी शौक रखता है यही डायरी उसके जीवन में एक मोड़ लेकर आती है फिर वह अक्सर घूमने एक विश्वविद्यालय जाया करता है जहाँ उसकी दोस्ती दादा की तरह गठीले शरीर वाले जसवीर से हो जाती है। एक कार्यक्रम के दौरान मुरली जसवीर को गले लगा लेता है कहानी खत्म हो जाती है। कथात्मक रूप से कहानी औसत है लेकिन जिस तरह से इसका अचानक से अंत किया गया है वह आपको हैरान करता है और आप सोच में डूब जाते हैं कि फिर क्या हुआ। कहानी कई सारे सवालात आपके दिमाग में पीछे छोड़ जाती है और औसत से विशेष हो जाती है।

संग्रह की छठी कहानी है ‘सौतन’ कहानी के पात्र हैं सैलेश, जैकी और कल्याणी। जैकी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जे एन यू का छात्र रहा है। उसकी एक महिला मित्र है। यू पी एस सी में लगातार उसे असफलता मिल रही है लेकिन पीएचडी करके वह बेरोजगार घूम रहा होता है। विश्वविद्यालय का हॉस्टल खाली करके पास ही कॉलोनी में कमरे पर किराएदार बनकर रह रहा है। मालिक मकान सैलेश से उसके जिस्मानी रिश्ते जुड़ते हैं। जिसके बारे में उसकी पत्नी को भी पता चल जाता है वह उसे काफी भला-बुरा कहती है लेकिन एक दिन वह अपनी पत्नी से झूठ बोलकर जैकी के पास चला जाता है। जहाँ जैकी अब प्रोफेसर बन चुका है। कहानी एकदम से समाप्त हो जाती है और समलिंगी विमर्श पर पूरी तरह से अपनी बात भी नहीं कह पाती। कई प्रश्न पाठक के मस्तिष्क में छोड़ जाती है।

संग्रह की सातवीं कहानी है ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’ यह कहानी जसप्रीत की है पूरी तरह जो हृष्ट पुष्ट कंधे वाली और चौड़े बदन वाली लड़की है। छाती भी पूरी उभरी हुई है परंतु स्नातकोत्तर तक आते आते उसकी शारीरिक शुचिता बरकरार है। लेकिन एक दिन हरविंदर नाम के अच्छे खासे शरीर वाले टैक्सी ड्राइवर से उसकी दोस्ती हो जाती है। यह दोस्ती प्यार में बदलती है उसके बाद शादी में लेकिन शादी के आठ-नौ साल बाद तक बच्चा न होने की वजह से तलाक हो जाता है। जसप्रीत टूट कर किन्नर को गुरु बना लेती है। लेकिन वहाँ भी उसका मन नहीं रुचता वह फिर से अपनी दुनिया में लौट आती है एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाने लगती है। सोशल मीडिया का जमाना आते ही फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाकर अनजान लोगों से बात करके कुछ समय बिताती है और अपने लिए सुकून के पल तलाशती है इसी दौरान एक दिन उसे जसविंदर मिलता है जिसे वह पहचान नहीं पाती उसे अपनी आईडी में जोड़कर बातें करती है। अगले सप्ताह वे मिलते हैं तो पता लगता है कि वह उसका पति है। अब यहाँ जसविंदर भी अपनी कहानी सुनाने लगता है। जसप्रीत से अलग होने के बाद की और वे दोनों एक साथ होटल से निकल जाते हैं। कहानी बीच में काफी परेशान करने वाली है कि एक औरत जिसके बच्चा नहीं हो सकता तो वह बांझ कहलाएगी लेखक ने उसे किन्नरी कैसे बना दिया यह समझ से परे है। कहानी से पाठक अपने आप को बाकी कहानियों की तरह पूरी तरह जोड़ नहीं पाता इसी उलझन में कहानी भी खत्म हो जाती है। लेकिन इस कहानी का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि इसे पढ़ते हुए मुझे मनीषा कुलश्रेष्ठ के स्वप्नपाश की नायिका गुलनाज़ फरीबा भी बेसबब तरीके से याद आई।

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संग्रह की आठवीं कहानी ‘ट्रांसजेंडर’ है। यह कहानी पूरी तरह से देवराज की है जो पढ़ाई में नकारा है लेकिन प्राइवेट कॉलेज में पढ़कर एम बी बी एस डॉक्टर बन गया है लेकिन उसके भीतर वासना इस कदर है कि वह एक महिला दोस्त की मदद से लोगों को जबरन या अपने प्रेम पाश में फंसाकर उन्हें किन्नर बना देता है लिंग परिवर्तन करके। उनके साथ सम्बन्ध भी बनाता है लेकिन जब उसका लड़का ही बड़ा होकर एक दिन एक सेमिनार में चाँदनी से मिलता है तो वह उसका लिंग परिवर्तन करवा देती है। चाँदनी वही लड़की है जो पहले लड़का हुआ करती थी और राधेश्याम के पिता यानी डॉक्टर देवराज ने उसे लड़की बना दिया था। सत्रह साल बाद चांदनी और देवराज का आमना सामना होता है। यह कहानी छल और प्रपंच को सामने लेकर आती है। और समाज के उस वर्ग के निकृष्ट लोगों की प्रवृत्ति को भी उजागर करती है।

संग्रह की नवीं कहानी है ‘बधिया’ यह कहानी एक साधारण पुरुष जनार्दन की कहानी कहती है जो अपने यौवन के दिनों में अपनी दोस्त जो उसकी पड़ोसन भी है सुष्मिता उसके साथ इश्क लड़ाता है, हमबिस्तर होता है। लेकिन एक दिन किन्नरों को नाचते गाते देख उनके साथ नाचने लगता है। किन्नर मंडली की एक सदस्या उसे अपने साथ ले जाती है। कुछ दिन बाद उसे बेहोश करके उसका लिंग परिवर्तन कर दिया जाता है। जनार्दन व्यथित होने के अलावा कुछ नहीं कर पाता और न विरोध करता है। समय बीतता है मेट्रो में सफर करते हुए अधेड़ हो चली सुष्मिता उसे मिलती है जो अब विधवा है उसके नाती है बच्चे हैं। सुष्मिता उसे अपने घर ले आती है फिर से दोनों माजी की खूबसूरत यादों में खो जाते हैं। फिर नजदीक आते हैं तो सुष्मिता को जनार्दन का सच पता चलता है। कथावस्तु अच्छी बुनी गई है और एक और कहानी किन्नर समुदाय के छल-प्रपंच को बयां करती है। और जिन्दगी से समझौता करना सिखाती है। लेकिन साहित्य हमें सिखाता है कि हमें हालातों का समझौता करना चाहिए लेकिन जहाँ विरोध हो सके वह भी करना चाहिए। शायद यह जनार्दन की नियति थी कि उसे इस तरह बधिया बना दिया गया और वह उसे ही नियति मान बैठता है।

संग्रह की दसवीं कहानी है ‘तीन रंडियाँ’ शीर्षक से कहानी रोचक लगती है। कहानी का मूल सार है कि अर्जुन नाम का लड़का है जिसके बचपन से शौक और रहन-सहन लड़कियों जैसे हैं। किशोरावस्था में इश्क भी लड़ाता है। लेकिन जब शादी करने की बात आती है तो उसका स्त्रीत्व जाग जाता है और सोचता है कि मैं किसी को धोखा नहीं दे सकता। वह घर से भाग कर दिल्ली आ जाता है। यहाँ आकर कुछ समय किन्नरों के साथ रहता है वहाँ के नियम कायदे कानून उसे सुहाते नहीं तो अलग रहने लगता है। एक पार्टी में दो वेश्याएं उसे मिलती है उनके साथ दोस्ती हो जाती है अर्जुन अपने आप को द्रोपदी बताता है। उसी लहजे में ग्राहकों से बात करता है। कहानी रोचकता से आगे बढ़ती है और उनमें से एक वेश्या देवधर से गर्भवती हो जाती है। देवधर गायब हो जाता है उनसे मिलना बंद कर देता है जो महीने में एक बार कम से कम उनके पास आया करता था। वह वेश्या पारुल एक लड़की को जन्म देती है अस्पताल से छुट्टी पाते ही कमरे पर लौटते हुए दवाई लाने के बहाने गायब हो जाती है। अब द्रोपदी यानी अर्जुन उस लड़की को पढ़ाता लिखाता है और अपनी कहानी उसे शादी के बाद विदा करते समय सुनाता है। तो यह कहानी किन्नरों के प्रति मन में संवेदना उत्पन्न कर जाती है और बताती है कि हर किन्नर या हर किन्नर समुदाय छल-प्रपंच रचना ही नहीं जानता बल्कि उनके समुदाय के कुछ लोगों में ममत्व की भावना भी है। यह इंसानियत ही उनके समुदाय को आज भी जिंदा बनाए हुए है।

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संग्रह की ग्यारहवीं और अन्तिम कहानी संग्रह के शीर्षक से ही है। ‘इस जिन्दगी के उस पार’ कहानी है। इस कहानी में कई सारे पात्र हैं और सब अपनी-अपनी कहानी कहते हैं। मुख्य रूप से विष्णु और महेन्द्रनाथ ही इस कहानी के नायक रूप में हमारे सामने आते हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में लौंडा नाच की प्रथा भी इस कहानी में विस्तार पाती हुई नजर आती है। कुलमिलाकर यह कहानी इस जिन्दगी के उस पार दोराहे पर खड़े लोगों की बात करती है।

संग्रह की अधिकांश कहानियां बेहतरीन हैं। कुछ जो स्तरहीन लगी वे अपनी कथा वस्तु और कहानी कौशल का सामंजस्य अपने साथ लेकर या उसे बैठाते हुए नहीं चल पाई। इस तरह के विषय पर शोध भी बहुत हो रहे हैं साहित्य में। क्योंकि किन्नर अपने आप में एक रहस्यमयी दुनिया है। हर किसी के पास कहने के लिए अपनी-अपनी कहानियाँ हैं। लेकिन हकीकत क्या है यह तो एक वास्तविक किन्नर ही बता सकता है। हालांकि कानून की भाषा में जो एल जी बी टी क्यू आई संगठन है उसमें हर तरह के लोग इस समुदाय में शामिल किए जा रहे हैं। कहीं न कहीं आरक्षण का लाभ उठाने के लिए भी कुछ लोग इस समूह से अपना सम्बन्ध बताते हैं। लेकिन वास्तविक रूप में जो किन्नर हैं वे आज भी समाज से बाहर ही धकेले जा रहे हैं। उन्हें परित्यक्त वर्ग का दर्जा ही मिला हुआ है। इस संग्रह में बहुत सी दफ़ा किन्नरों को मदिरा पान करते हुए या जाम छलकाते हुए ही दिखाया गया है। तो कुछ जगहों पर वास्तविक रूप में उनके जीवन का दुःख दर्द इस संग्रह में समोने की कोशिश की गई। शोध कर रहे छात्र-छात्राओं के लिए भी यह संग्रह सहेजने योग्य है। लेकिन इस समाज के बारे में जितना कुछ कहा जा रहा है उसमें से अधिकांश जगह मिथ्या धारणाएँ ही सामने लाई जा रही हैं। लेखक राकेश शंकर भारती के इस संग्रह के अलावा ‘कोठा नँबर 64’ और उपन्यास ‘3020 ई’ जो कोरोना काल और खगोलशास्त्र पर आधारित कहानी कहता है अमन प्रकाशन कानपुर से प्रकाशित हो चुके हैं।

पुस्तक – इस ज़िंदगी के उस पार
लेखक – राकेश शंकर भारती
विधा – कहानी संग्रह
प्रकाशक – अमन प्रकाशन कानपुर

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लेखक स्वतन्त्र आलोचक एवं फिल्म समीक्षक हैं। सम्पर्क- +919166373652 tejaspoonia@gmail.com

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