चर्चा में

किसान आन्दोलनः सवाल तथा सन्दर्भ

 

केन्द्र सरकार की नयी कृषि नीति को लेकर किसान आन्दोलन रत हैं और दिल्ली के अगल-बगल शन्तिपूर्ण ढंग से अपने अभियान का प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि दिल्ली जाने से किसानों का जबरी रोक दिया गया नहीं तो वे दिल्ली ही जाना चाहते थे। किसानों का यह आन्दोलन पूणरूप से शान्ति पूर्ण तथा अहिंसक हैं। किसानों को तार्किक समझ है कि यह जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) है वह मात्र दिखावा है और पूरे देश में कहीं भी किसान एम.एस.पी. पर अपने कृषि उत्पाद नही बेच पा रहे हैं। एम.एस.पी पर जो भी सरकारी खरीद हो रही है वह दलालों द्वारा कहीं दस, तो कही बारह रूपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से खरीद हो रही है यानि प्रति कुन्तल करीब छह सौ, सात सौ रूपये कम कीमत पर।

मौजूदा किसान आन्दोलन का कारण मात्र एम.एस.पी नहीं है संविदा फार्मिग भी है। किसानों की मांग है कि एम.एस.पी को विधिक बनाया जाये तथा संविदा फार्मिग को सिरे से रद्द किया जाये। इन दोनों मुद्दो पर किसानों के हितों की कथित रूप से रक्षा करने वाली केन्द्रीय सरकार कत्तई विनम्रता नहीं दिखा रहीं, बहुत ही क्रूरता से बोल रही कि किसानों को भरमाया जा रहा है और किसान नहीं जानते कि उनके हित क्या है। शायद ही इस मजाक के आगे कोई दूसरा सरकारी मजाक टिक सके क्योंकि जिसके लिए कानून बनाया गया है वे उसे कानून को चाहते ही नहीं। किसान अहिंसक तर्क दे रहे हैं कि जो कानून हमने मांगा नही उसे क्यों दे रहे हो। तो यह है नयी कृषि नीति की सामाजिक स्थिति।

kisan andolan delhi latest news : सरकार और किसानों के बीच कहां फंसी बात, जानिए - Navbharat Times

एक ऐसा कानून जिसकी सामाजिक उपयोगिता ही उसके जन्म से ही संदिग्ध हो। मौजूदा किसान आन्दोलन किस परिणाम तक पहुचेगा, फिलहाल इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता पर इतना कहा ही जा सकता है कि किसानों के ऐतिहासिक आन्दोलनों का गरिमापूर्ण महत्व रहा है तथा उसके परिणाम भी सकारात्मक निकले हैं। हमें याद रखना चाहिए कि गांधी जी के नेतृत्व वाले चम्पारण आन्दोलन की, नील की जबरिया खेती कराने के विरोध वाले किसान आन्दोलन की।

केन्द्रीय सरकार को किसानों के प्रभावकारी आन्दोलनों के गरिमापूर्ण इतिहास को नहीं भूलना चाहिए। सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि गुलामी के दौर में पबना विद्रोह,तेभागा आन्दोलन,चम्म्पारण आन्दोलन आदि हो चुके है और इन आन्दोलनों के परिणामस्वरूप अंग्रेजी सरकार को किसानों के नैतिक विद्रोहों के सामने झुकना पड़ा है। किसानों के मांगों को सरकार ने माना है तथा कानूनों को खारिज भी किया है लेकिन आजादी के बाद वाली यह मौजूदा केन्द्रीय सरकार किसानों के आन्दोलन का समर्थन करेगी कि नही कुछ कहा नही जा सकता।

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हमे समझना होगा कि यह जो किसानों की एम.एस.पी वाली मांग है दरअसल वह है क्या? एम.एस.पी. सरकार द्वारा निर्धारित किया गया कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य हैं (घ्यान रहे लाभकारी मूल्य नहीं, जबकि लाभकारी मूल्य होना चाहिए था) यानि कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य पर कृषि उत्पाद नही खरीदा जायेगा। लेकिन व्यवहार में ऐसा नही हो पा रहा हैं। गरीब किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना में बहुत ही कम दर पर अपना कृषि उत्पाद बेचने के लिए विवश हैं और वे बेच रहे हैं क्योंकि सरकारी खरीद के लिए जो सरकारी केन्द्र हैं जैसे सोसाइटी, एफसीआई तथा दूसरे केन्द्र वे उन्ही किसानों का कृषि उत्पाद खरीद रहे हैं जिनका सरकारी प्रभाव है पर गरीब किसान जो दो तीन बीघे खेत के किसान हैं वे अपना कृषि उत्पाद सरकारी संस्थानों पर नही बेच पा रहे हैं वे दूसरे व्यापारियों के यहां बेच रहे है और यही व्यापारी सारा कृषि उत्पाद सरकारी संस्थानों पर बेच रहे हैं और दिखा दिया जा रहा है कि किसानों का उत्पाद एम.एस.पी. पर खरीद लिया गया है। विड्म्वना यही है इसी लिए किसान एमएसपी का विधीकरण चाहते हैं जिससे कि कोई भी व्यक्ति न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दर पर किसी भी किसान का चाहे वह अमीर हो या गरीब हो कृषि उत्पाद न खरीद सके,खरीदे तो दण्ड का भागी बने।

किसान की महत्वपूर्ण दूसरी मांग है संविदा फार्मिग को नयी कृषि नीति से रद्द कर दिया जाये। लेकिन सरकार इसपर झुकने के लिए तैयार नही है,सरकार कुतर्क दे रही है कि संविदा फार्मिग से किसानों को बहुत लाभ मिलेगा आइये देखते  है कि 1859-1860 में नील की खेती के खिलाफ बंगाल के किसानों ने जो आन्दोलन किया था उसमें क्या हुआ था? उस आन्दोलन में भी किसानों की मांग थी कि नील की खेती के लिए जो एकरारनामा कराया गया है, नील की खेती करने वाले जमींदारो,साहूकारो द्वारा यह गलत है हम इसे नही मानते। दरअसल होता यह था कि कुछ रूपया देकर किसानों से नील की खेती करने के लिए एकरारनामा करा लिया जाता था जिसे उस दौर में ददनी प्रथाकहा जाता था। किसानों ने इस प्रथा का विरोध किया और सरकार को किसानों की मांग माननी पडी। तो यह है अंग्रेजी दौर का किसान आन्दोलन जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा लेकिन मौजूदा सरकार संविदा फार्मिग के अनेक गुण और लाभ बताने में तरह तरह के कुतर्क गढ़ रही है।

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सामन्य सी बात है एक बीघे का काश्तकार अगर अपनी जमीन संविदा पर दे देता है तो उसे क्या मिलेगा महज आठ-दस हजार रूपये एक साल का मिलेगा जो दो तीन महीने में समाप्त हो जायेगा कुछ बच्चो की पढ़ाई में, कुछ दवाई में और वह किसान दस महीने के लिए बेकार हो जायेगा। उसके हाथ में कुछ भी काम नही रहेगा। उसे बेरोजगारी झेलनी पड़ेगी तथा उस महजन के यहां मजदूरी करने पड़ेगी जिसने उसके खेत को संविदा पर लिया है तो यह है संविदा फार्मिग का खुला हुआ चरित्र, यानी स्वतन्त्र हुए किसानों को फिर से बंधुआ मजदूर बनाना और उनकी स्वतन्त्रता छीनना। आज के समय में दो-तीन बीघे जमीन वाले वही किसान हैं जिन्हें कांग्रेसी सरकार ने जमीनदारी तोडने के बाद जमीन का मालिक बनाया था। उस समय माना गया था कि कम जोत होगी तो उपज अधिक होगी। वस्तुतः ऐसा हुआ भी। हमारे देश की पैदावार बढ़ी और हम आत्म निर्भर हुए। किसान मौजूदा आन्दोलन को अहिंसक ढंग से

संचालित कर रहे हैं, कुछ भी हो जाये नयी कृषि नीति के धोखेपूर्ण संविदा फार्मिग को हम नही मानते यह कानून ही किसानों के स्वतन्त्रता को,उनकी स्वरोजगारी को छीनने वाला सामंती कानून है जो लोकतन्त्र विरोधी है।

आइये 1859 ‘पबनाकिसान आन्दोलन को भी देख लेते है कि उसमें क्या हुआ था? यह एक ऐसा किसान आन्दोलन था जिसने अंग्रेजी सरकार की जड़े हिला दी थी और अंग्रेजी सरकार को 1885 में बंगाल काश्तकारी कानून पारित करना पड़ा था। पबना किसान आन्दोलन जमींदारो द्वारा मानमाने ढग से कर वसूले जाने तथा जमीन का अधिकार छीनने के विरोध में था किसानो का मानना था कि जमीन पर से हमारे अधिकारों से, न ही हमारे जमीनो से हमें बेदखल किया जा सकता है और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को किसानों के आन्दोलन के समक्ष झुकना पड़ा था। तो ये हैं अंग्रेजी दौर के आन्दोलन, पबना किसान आन्दोलन तथा ददनी प्रथा के विरोध में किसान आन्दोलन जहां अंग्रेजी सरकार ने पूरी तरह से झुक कर किसानों के हित में तत्कालीन कानूनों में सशोधन एवं बदलाव किया था पर मौजूदा सरकार तो किसानों की बातो को सुनने के लिए राजी ही नही। जान पड़ता है कि सरकार ने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है कुछ भी हो जाये किसानों की बात नही माननी है जब कि किसान आन्दोलन की धारा से मुड़ने वाले नही जान पड़ रहे हैं।

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उत्तर प्रदेश का किसान भी मानसिक रूप से आन्दोलन रत है तथा दुखी है अगर सोनभद्र की बात करे तो यहां के किसानों कृषि उत्पाद आज भी खलिहान में पड़े हैं उन्हें एमएसपी पर या उसके समकक्ष मूल्य पर खरीदने के लिए कोई तैयार नही। किसानों के पास कृषि उत्पाद रखने के लिए भण्डार गृह भी नही है। सारा कृषि उत्पाद खलिहान में भीग रहा है और उसकी गुणवत्ता समाप्त हो रही है। उत्तर प्रदेश किसान आन्दोलन में शामिल होने के लिए दिल्ली जा चुके है। सोनभद्र के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों के अनेक संगठन जिलाधिकारी को किसान आन्दोलन के समर्थन में ज्ञापन दे चुके है। सरकारी खरीद की हालत यह है कि एक खतौनी पर महज पचास से लेकर पचहतर कुन्तल कृषि उत्पाद खरीदा जा रहा है जबकि कृषि उत्पाद सरकारी खरीद के मानक से ज्यादा किसानों ने उत्पादित किया है वह उत्पादन कहां बिकेगा भगवान जाने निश्चित ही उस उत्पाद को सरकारी दलाल ही खरीदेगे। केवल कामना की जा सकती है कि सरकार किसान आन्दोलन के प्रति विनम्रता दिखाये तथा किसानों की मांगों को मान कर प्रमाणित करे कि सरकार जनता की होती है तथा जनता के लिए होती है। इसके अलावा कुछ अगर मगर न करे।

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लेखक 'असुविधा' पत्रिका के सम्पादक हैं। सम्पर्क +917376900866, ramnath.shivendra@gmail.com

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