चर्चा में

किसान घेराबंदी पर कुछ नोट्स

 

सितम्बर 2020 के माह में पारित तीन कृषि बिल – ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020’ ‘कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन, कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020’ और ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक’ – को निरस्त कराने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को क़ानूनी रुप दिलाने की मुख्य माँगों के साथ लगभग 28 दिन से कड़कती सर्दी में दिल्ली की दहलीज़ पर अनेक मोर्चों पर किसानों का प्रदर्शन जारी है। इन तात्कालिक माँगों से इतर इस आन्दोलन का सब से महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसने एक लम्बे अंतराल के बाद अस्मिता आधारित राजनीति से परे एक किसान चेतना को जन्म दिया है। इस आलेख के पहले भाग में इस आन्दोलन की आँखों देखी कुछ विशेषताओं की ओर इंगित करने की कोशिश की गयी है और दूसरे हिस्से में इस आन्दोलन की दो प्रमुख आलोचनाओं की संक्षिप्त समीक्षा की गयी है।

पहले दिन से ही दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर देश का एक सब से व्यस्त राजमार्ग मीलों तक ट्रैक्टर- ट्रॉलियों और अन्य वाहनों के कारवाँ से ठसा-ठस भरा हुआ है। दिल्ली के एक और महत्वपूर्ण प्रवेश मार्ग ‘टीकरी बॉर्डर’ पर भी किसानों का एक विशालकाय जमावड़ा है। इस के अतिरिक्त ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर, ढासा बॉर्डर, दिल्ली-जयपुर हाइवे पर भी किसानों के मोर्चे हैं। इतने विशालकाय विरोध प्रदर्शन के रहते हुए भी आन्दोलन व्यवस्थित और अनुशासित है। एक अनोखा आकस्मिक प्रबंधन प्रदर्शन स्थल पर हर वक्त उल्लेखनीय रूप से देखने को मिलता है। एक ओर आन्दोलनकारी एक दूसरे को अनुशासित रहने के लिए प्रोत्साहित और आश्वस्त करते देखे जा सकते हैं तो वॉलन्टियर्स रात में पहरा देते दिखाई देते हैं।

आन्दोलनकर्ता तीन कृषि कानूनों की जटिलताओं, निहितार्थों और संभावित प्रभावों को सटीक स्थानीय भाषा में व्यक्त करते देखे जा सकते हैं। किसानों और उन के संगठनों की एक शिकायत यह है कि विधेयक पारित करने से पूर्व उन से कोई सलाह मशवरा नहीं किया गया। एक हरियाणवी नौजवान ने इस बात को स्थानीय मुहावरे में इस प्रकार समझाया कि ‘घर की बही, अर काका लिखणिया’। कानूनों के विषय में ये जागरूकता पंजाबी गायकों के गीतों में भी देखी जा सकती है। यह जागरूकता व्यवस्था और नीति निर्माता अभिजात्य की इस सोच के विपरीत है की ये ‘भोले-भले’ किसान हैं जिन को भटका दिया गया है।

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प्रचलित प्रोपेगंडा के विपरीत आन्दोलन ‘अराजनीतिक’ है और ज़्यादातर आन्दोलनरत किसानों का तमाम राजनितिक दलों के लिए संशयवादी ही नहीं बल्कि अस्वीकृति का दृष्टिकोण हैं। ‘जाग गए हैं लोग, राजनेताओं का नहीं चलने देंगे ढोंग’ जैसे नारे लिखे बैनर सिंघु बॉर्डर पर आम हैं। पंजाबी गायक हर्फ़ चीमा और कँवर ग्रेवाल के गीत ‘पेंचा’ के बोल कबीले तारीफ हैं। जहाँ यह गीत एक तरफ किसानों को  कहता है कि ‘किथे किथे पये आ वंडे, केडी पार्टी दे केडे झंडे, ओ वोटा पाके खावें डंडे, ओ भोळ्या जट्टा समझ एजेंडे’, वहीँ यह गीत बुद्धिजीवियों से किसानों के पक्ष में कलम उठाने का आह्वान भी करता है।

प्रदर्शन स्थल पर युवा ट्रैक्टरों पर ‘पेंचा’, ‘एलान’, ‘जवानी जिंदाबाद’, ‘किसान वेर्सिस दिल्ली’, ‘हक’, ‘किसान एंथम’ सरीखे प्रतिरोध के गीत बजाते हुए गेड़ी लगाते देखे जा सकते हैं।ऐसी गतिविधियों से माहौल ऊर्जामय बना रहता है। स्थानीय गायक हर रोज प्रतिरोध के नए गीत गढ़ते जा रहे हैं। मुख्यधारा की राष्ट्रीय मीडिया से किसानों की खासी नाराज़गी है। हरियाणवी और पंजाबी यू-ट्यूब चैनल्स ने इस आन्दोलन के फैलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आन्दोलन का कोई एक नेता नहीं है और तमाम किसान जत्थेबंदियों में निर्णय निर्माण में समन्वयता और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया अपनायी जाती है. किसान जत्थेबंदियों के साँझे प्लेटफ़ोरम  ’संयुक्त किसान मोर्चा’ ने अपना एक वैकल्पिक मीडिया बनाने की भी कोशिश की है। लगभग एक महीने से सड़कों पर डटे किसानों का जीवट काबिले तारीफ है।

किसान आन्दोलन पर एक आरोप यह है कि यह ‘कुलकों’/धनी किसानों का आन्दोलन है। अनेक आर्थिक विश्लेषक जैसे एस.ए. अय्यर, अरविन्द पनगरिया, सुरजीत भल्ला आदि अलग अलग रूप में किसान आन्दोलन के विषय में ये राय रखते हैं। वैसे यह कोई नया आरोप नहीं है। जब भी भारत की राजनीति में किसानों की कोई स्वायत्त आवाज़ उठी है उसे इसी प्रकार से अवैधानिक दिखाने के प्रयास हुए हैं।1980 के दशक में, जब किसान आन्दोलन देश का सब से बड़ा आन्दोलन था, तब वामपंथी और मुक्त बाज़ार समर्थक दोनों ही विचारधाराओं के विद्वान इस आन्दोलन को कुलक आन्दोलन सिद्ध करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाते थे।New experiments in Aligarh more risk less in contract farming

भारत में 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत किसान हैं। यदि इन मे मज़ोले कृषकों को जोड़ दिया जाए तो ये आँकड़ा 99 प्रतिशत पार कर जाता हैं। किसान आन्दोलन पर उपरोक्त आरोप के जवाब में यह पूछा जा सकता है कि क्या बड़े किसानों की ये छोटी सी जमात, जिस की संख्या सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ एक प्रतिशत भी नहीं है, ऐसा विशालकाय आन्दोलन खड़ा कर सकती है? इसी प्रकार ये सवाल पूछा जा सकता है कि किस अन्य पेशे के ‘अमीर’ – व्यापारी, वकील या प्रोफ़ेसर – अपनी माँगों के लिए सर्द मौसम में पानी की बौछारों का मुक़ाबला करते और आंसू गैस के गोलों के साथ हॉकी खेलते हुए एक माह तक खुले आसमान के नीचे डेरा डाल सकते हैं? यहाँ ये बताना भी आवश्यक होगा कि जिन राज्यों में किसान अपेक्षाकृत खुशहाल है वहाँ भूमिहीन किसान और खेतिहर मज़दूर की स्थिति भी अपेक्षाकृत अच्छी है। धातव्य हैं कि इस आन्दोलन में खेतिहर मज़दूरों के संगठनों की भी भागीदारी है। दरअसल यह कृषि विरोधी पूर्वाग्रह का ही परिणाम है की देश के शहरी मध्यम और उच्च वर्ग के एक बड़े तबके को किसान अगर फटेहाल नहीं है तो ‘धनी’ और कुलक ही दिखाई देता है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एन.एस.एस.ओ.) ने अपने 70 वें दौर में कृषक परिवारों की आय का अनुमान लगाया था। सर्वेक्षण के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर जुलाई 2012 से जून 2013 के वर्ष में 2.5 से 5 एकड़ के किसान परिवार की वार्षिक आय 88,176 रूपये बताई गयी। 5 से 10 एकड़ के किसानों के लिए यही आंकड़ा 1,28,760 रूपये था। यहाँ तक कि 10 से 25 एकड़ के किसान परिवारों की आमदनी भी मात्र 2,35,644 रूपये सालाना पायी गयी। पंजाब जैसे कृषि उन्नत राज्य में भी इन में से किसी भी वर्ग के किसान परिवार की सालाना आमदनी 8 लाख के नजदीक नहीं थी। देश जिस तरह के कृषि संकट से गुजर रहा है, यह माना जा सकता है की उपरोक्त तथ्यों में  कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया होगा। यह उल्लेखनीय है कि सरकार 8 लाख सालाना आय को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग चिन्हित करने का एक पैमाना मानती है।

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इस आन्दोलन पर एक और आरोप ये है की यह मात्र एक राज्य, पंजाब, का आन्दोलन है। ये बात सही है कि पंजाब इस आन्दोलन का हरावल दस्ता है और इस ने आन्दोलन की अगुवाई की है पर आज समस्त उतर-पश्चिमी भारत (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी और पश्चिमी राजस्थान) इस का केंद्र बन चुका है और अब यह आन्दोलन अन्य इलाकों में भी फैल रहा है। कई विद्वान् ये कहते हैं कि उत्तर-पश्चिमी भारत के किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य और ए.पी.एम.सी मंडी व्यवस्था के लाभार्थी हैं और इसी लिए आक्रोशित हैं। हालाँकि ये व्याख्या अंशतः दोषपूर्ण है और अधूरी है परन्तु यदि इस कारण से इस इलाके का किसान अपेक्षाकृत खुशहाल है तो इस व्यवस्था को और विस्तृत बनने की आवश्यकता है न कि इसे कमजोर करने की। वस्तुतः ये व्याख्या वर्तमान सन्दर्भ में तथ्यों पर आधारित भी नहीं है। प्रांकुर गुप्ता, रीतिका खेड़ा और सुधा नारायणन का शोध ये दर्शाता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं  खरीद में अब मध्य प्रदेश पंजाब को पार कर चुका है। इसी प्रकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले कृषि परिवारों में 9% और 7% पंजाब और हरियाणा से आते हैं और 11% ओडिशा और 33% छत्तीसगढ़ से आते हैं।

ये व्याख्या अधूरी इसलिए है कि इस आन्दोलन को मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य और ए.पी.एम.सी मंडी व्यवस्था की दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। उत्तर पश्चिमी भारत में किसान चेतना का एक लम्बा इतिहास रहा है। आज़ादी से पूर्व ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा’ आन्दोलन से ले कर यूनियनिस्ट राजनीति और आजादी के बाद लोकदल जैसी पार्टियों के कारण किसानी और उस के मुद्दे इस इलाके की राजनीति का मुहावरा रहे है। राजनीति के अतिरिक्त इस इलाके में कृषि समाज और संस्कृति का हिस्सा रही है। मिसाल के तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के बरअक़्स खुद काश्तकारी इस क्षेत्र में न केवल आम है बल्कि गर्व का विषय है।अपने हाथ से खेत में काम करने, हल चलाने को हीन दृष्टि से नहीं देखा जाता बल्कि सामाजिक रूप से सराहा जाता रहा है।खेती व्यक्ति और समाज की खुदी और चेतन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी लिए प्रदर्शन स्थल पर सेवा करते एक डॉक्टर का बैनर कहता है ‘खेती हमारा व्यवसाय नहीं, विरासत है’, इसी लिए पीढ़ियों पहले विदेश जा कर बस चुके पंजाब के लोग इस आन्दोलन के समर्थन में विदेशों में रैली निकालते हैं, इसी लिए इस इलाक़े के आधुनिक गीतों में भी ट्रेक्टर और खेत आम हैं और इसी लिए इस क्षेत्र में जमींदार और किसान अलग नहीं बल्कि पर्यायवाची शब्द हैं। इन सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को समझे बगैर इस आन्दोलन को नहीं समझा जा सकता।

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लेखक इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, में राजनीति विज्ञान के शिक्षक हैं। सम्पर्क +919868594776, dhandapraveen@gmail.com

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