चुनाव सुधार
चर्चा मेंमुद्दा

जरूरी हैं चुनाव सुधार

 

पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने चुनाव सुधार की दिशा में निर्णायक पहल की है। सरकार ने मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़ने, पंचायत/निकाय चुनावों और विधानसभा/लोकसभा चुनावों की मतदाता सूचियों को एक करने, नए मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए 18 वर्ष की आयु-निर्धारण करने हेतु एक तिथि (एक जनवरी) की जगह 4 तिथि (1 जनवरी,1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर) करने जैसे तीन महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। निश्चय ही, वर्तमान केन्द्र सरकार के ये निर्णय दूरगामी महत्व के हैं। भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी आदि ने इन सुधारों को ऐतिहासिक बताते हुए इन्हें लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में उठाया गया कदम करार दिया है।

मतदाता सूचियों को आधार कार्ड से जोड़ने से फ़र्जी मतदाताओं को चिह्नित करने और उनका नाम काटने का काम आसान हो जायेगा। भारत में अनेक व्यक्तियों का नाम जाने-अनजाने में एकाधिक जगहों पर मतदाता सूची में शामिल होता है। एक मतदाता का नाम कई जगह होने से न सिर्फ ‘एक व्यक्ति एक मत’ के संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होता है; बल्कि वास्तविक जनादेश का भी हरण हो जाता है। एक व्यक्ति का नाम एकाधिक मतदाता सूचियों में होने से मतदान का सही प्रतिशत पता करना भी मुश्किल होता है।

छद्म मतदाता सुनियोजित तरीके से एकाधिक मतदाता सूचियों में अपना नाम दर्ज कराते हैं और अपने मत का दुरुपयोग करते हुए चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं। इस तरह के लोग अपने मत को एकाधिक जगहों पर एकाधिक प्रत्याशियों को बेचकर लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। भारत का चुनाव आयोग इस समस्या के समाधान के लिए लम्बे समय से प्रयत्नशील है। कई सॉफ्टवेयर बनाकर भी मतदाता सूचियों में दुहराव को खत्म करने की कोशिश की गई, परन्तु अधिक सफलता नहीं मिल सकी है। मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़कर फर्जी मतदाताओं का उन्मूलन किया जा सकेगा। इससे दुहराव की समस्या का भी निस्तारण हो सकेगा। हालाँकि, विपक्ष ने इसे मतदाता की निजता में घुसपैठ बताया है।

दूसरा निर्णय पंचायत/निकाय चुनावों और विधानसभा/ लोकसभा चुनावों की मतदाता सूचियों को एक करने का है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, उड़ीसा,असम, मध्य प्रदेश, केरल, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में पंचायत/निकाय चुनावों और विधानसभा/ लोकसभा चुनावों में अलग-अलग मतदाता सूचियों का प्रयोग किया जाता है। पंचायत/निकाय चुनाव की मतदाता सूचियों का निर्माण सम्बंधित राज्य का निर्वाचन आयोग करता है, जबकि विधानसभा/लोकसभा चुनाव की मतदाता सूचियों का निर्माण भारत का निर्वाचन आयोग करता है।

राज्य विशेष के चुनाव आयोग को भारत के चुनाव आयोग द्वारा बनायी गयी सूची को पंचायत/निकाय चुनाव के लिए प्रयोग करने की स्वतंत्रता/अधिकार होने के बावजूद उपरोक्त राज्यों में ऐसा नहीं किया जाता है। ये राज्य अलग से अपनी मतदाता सूची तैयार कराते हैं। मतदाताओं के दुहराव की तरह मतदाता सूचियों के दुहराव से भी समस्या होती है। इस प्रक्रिया में अनावश्यक और अवांक्षित रूप से दोहरा श्रम और संसाधन लगते हैं।

मतदाता सूची का नवीनीकरण अत्यंत जटिल, श्रमसाध्य और चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसलिए इस कार्य को दो बार करने की जगह एकबार ही ठीक से कराना अधिक औचित्यपूर्ण और तर्कसंगत है। यह दुहराव इसलिए और हास्यास्पद लगता है क्योंकि पंचायत/निकाय चुनावों, विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों के मतदाता अलग-अलग न होकर एक ही हैं। एक ही मतदाता सूची को उपरोक्त तीनों चुनावों के लिए प्रयोग करने से बड़ी मात्रा में धन और मानव श्रम की बचत हो सकेगी। इस बचत को अन्य उत्पादक कार्यों में लगाया जा सकता है।

इस बात को समझते हुए ही भारत के अनेक राज्य भारत के चुनाव आयोग द्वारा तैयार करायी गयी मतदाता सूची को ही पंचायत/निकाय चुनाव के लिए प्रयोग करते हैं। अब यह कार्य भारत भर में अनिवार्यतः हो सकेगा। पंचायत/निकाय चुनावों में वार्ड प्रतिनिधियों का भी चुनाव होता है। इसलिए भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार कराई जाने वाली मतदाता सूची में वार्ड का कॉलम बढ़ाकर वार्ड प्रतिनिधियों का चुनाव भी सफलतापूर्वक कराया जा सकता है।

प्रत्येक वर्ष की 1 जनवरी को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल किया जाता है। 2 जनवरी से लेकर 31 दिसम्बर के बीच 18 वर्ष के होने वाले मतदाताओं को 1 वर्ष तक अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस बीच कोई चुनाव होने की स्थिति में युवा मतदाताओं की काफी बड़ी संख्या अपने मताधिकार के प्रयोग से वंचित हो जाती है। इस तथ्य के मद्देनज़र केन्द्र सरकार ने 18 वर्ष की आयु निर्धारण के लिए 1 जनवरी के अलावा सम्बंधित वर्ष की 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्तूबर तिथियां भी तय की हैं। इससे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या की समयबद्ध भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।

निश्चय ही, केन्द्र सरकार के ये तीन निर्णय चुनाव सुधार का मार्ग प्रशस्त करेंगे और भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और प्रगति सुनिश्चित करेंगे। लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं। आज धन पशुओं और अपराधियों ने भारतीय लोकतंत्र को बंधक बना लिया है। उसे उनके पंजों से मुक्त करने के लिए कठोर प्रावधान करने की आवश्यकता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एकाधिक रपटों में ग्राम पंचायतों से लेकर विधान मंडलों और संसद के दोनों सदनों में करोड़पतियों और अपराधियों की भरमार पर चिंता व्यक्त की गयी है।

आज साफ़-सुथरे और सीधे-सच्चे आदमी का चुनाव लड़ना और जीतना संभव नहीं है। इसीलिए संसद और विधान सभाएं भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की आरामगाह हैं। देश उनकी चरागाह है। डेलिगेट वाले (अप्रत्यक्ष) चुनावों को बंद करके कुछ सफाई की जा सकती है। गलत शपथ-पत्र देने वाले और अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक, कई जगह से चुनाव लड़ने या कार्यकाल पूरा होने से पहले ही दूसरा चुनाव लड़ने पर रोक, राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता, भड़काऊ बयान देने और लोक लुभावन घोषणाएं करने वाले प्रत्याशियों/दलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, चुनावी घोषणा-पत्र को शपथ-पत्र की तरह न्यायिक दस्तावेज बनाने, दल-बदल करने वालों और उनके परिजनों के लिए पाँच साल तक नयी पार्टी/सरकार में पद लेने पर रोक, एक पद के लिए एक व्यक्ति के पाँच बार से अधिक बार चुनाव लड़ने पर रोक जैसे प्रावधान भी अति आवश्यक हैं।

न सिर्फ दल-बदल करने वाले प्रत्याशी बल्कि उसके परिवार के लिए भी पाँच साल का “कूल-इन पीरियड” अनिवार्य किया जाना चाहिए। संपत्ति के विवरण और कूल इन पीरियड सम्बन्धी प्रावधानों के लिए परिवार का अर्थ संयुक्त परिवार किया जाना चाहिए क्योंकि ज्यादातर राजनीतिक दल अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के संयुक्त परिवार हैं।

मतदाताओं के नाम के दुहराव और मतदाता सूचियों के दुहराव को रोकने के लिए किये गए प्रावधानों की तरह चुनाव-प्रक्रिया के दुहराव को रोकने की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। “एक देश, एक चुनाव” इस दुहराव का सही समाधान है। लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एकसाथ कराकर श्रम, समय और संसाधनों की भारी बचत की जा सकती है।

पिछले दिनों कानून मंत्रालय के एक अधिकारी द्वारा केंद्रीय चुनाव आयोग को भेजे गये पत्र की भाषा और प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी द्वारा तीनों चुनाव आयुक्तों के साथ की गयी ऑनलाइन बैठक को लेकर अनेक सवाल खड़े हुए हैं। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और आयोग की कार्यप्रणाली में सरकारों का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। चुनाव आयोग नख-दंतविहीन सरकारी कार्यालय नहीं, बल्कि एक स्वायत्त, सक्षम और निष्पक्ष संवैधानिक संस्था है। यह लोकतंत्र का प्रहरी है। टी एन शेषन ने इसे साबित किया था। इस तथ्य के मद्देनजर चुनाव आयोग को चुनाव सुधार की दिशा में निरंतर सक्रिय रहना चाहिए

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लेखक प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। सम्पर्क- +918800886847, rasal_singh@yahoo.co.in

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