पर्यावरण

इकोसोफी : संकीर्ण आत्म-बोध बनाम विस्तीर्ण आत्म-बोध

 

संपूर्ण विश्व पर्यावरणीय समस्याओं के उपर गंभीर एवं अतिसुव्यवस्थित बौद्धिक विमर्श कर रहा है और अपने जीवन-मूल्यों, जीवन-पद्धतियों, जीवन- दर्शन आदि को नए सिरे से सूत्रबद्ध करने की कोशिश कर रहा है। फ्रांसीसी दार्शनिक एवं मनोविश्लेषक फेलिक्स गुआटरी एवं नॉर्वे के दार्शनिक अर्ने नैशने इकोसोफी (Ecosophy) नामक एक महत्वपूर्ण पद के प्रयोग को गढ़ा (क्वाइन् किया), प्रचलन में लाया। नैश ने ‘डीप इकोलॉजी’ और ‘शैलो इकोलॉजी’ पद को क्वाइन किया। इकोसोफी सापेक्षतया एक नवीन दर्शन है जो पारिस्थितिकी संतुलन एवं सद्भाव पर केन्द्रित माना जाता है।

यह पूंजीवाद एवं मानव व प्रकृति के अलगाववादी संबंध की स्वरूप के विरुद्ध समस्त जीव एवं अ-जीव के मध्य स्थित व व्यवस्थित समग्रतापूर्ण संबंध को महत्व प्रदान करता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पर्यावरणीय संकट की विकरालता उपस्थित होने के पश्चात् इकोसोफी जैसा दर्शन प्रचलन में आया। इकोसोफी को लेकर दो दृष्टि अत्यधिक चर्चा में हैं-

  1. मानव केन्द्रित (एंथ्रोपोसेंट्रिक/ शैलो इकोलॉजी) और
  2. ब्रह्मांड केन्द्रित (कोस्मोसेंट्रिक/ इकोसेन्ट्रिक/ डीप इकोलॉजी)

भारतीय दृष्टि के लिए संकीर्ण आत्म-बोध और विस्तीर्ण आत्म-बोध जैसे पदों को क्वाइन करना अधिक उपयुक्त है। भारत में आत्मविस्तीर्ण दृष्टि वैदिक काल से ही विद्यमान रही है। प्रकृति के साथ मानव के गहरे संबंध को व्यक्त करने वाले कई सूत्र वेदों, उपनिषदों, पुराणों आदि में मौजूद हैं। (ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं, पूर्णात् पूर्णमुदचयते । पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते। अर्थात परमतत्त्व सभी प्रकार से सदैव परिपूर्ण है) पिंड और ब्रह्मांड को पृथक नहीं किया जा सकता। एक नये ढंग से मानववादी दृष्टि का विस्तार समग्रतावादी दृष्टि में करने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है । इसे समझने के लिए हिंसा और अहिंसा के बीच की दृष्टि-बोध को समझने की जरूरत महसूस होने लगी है ।

हिंसा का प्रत्यक्ष या स्थूल रूप (युद्ध, हत्या, बलात्कार, आदि) आज जितना भयावह है उससे कहीं अधिक भयावह और वीभत्स उसका अप्रत्यक्ष अथवा सूक्ष्म रूप (शोषण, दमन, भय, भेदभाव, दोहन आदि) का है। हिंसा के व्यापक रूप को जानने एवं अनुभूत करने के लिए हमें आत्म-परिष्कार एवं आत्म-विस्तार की जरूरत होगी। हमारी संकीर्ण आत्म-दृष्टि हिंसा को मानव की परिधि के इर्द-गिर्द ही देखते, अनुभूत करते और उससे कांपते और भयभीत रहने तक सीमित कर दिया है। आज हमारी हिंसा- दृष्टि के ज्ञानमीमांसीय प्रमाण-शास्त्र का विस्तार कुछ हद तक पशुओं, पक्षियों, मछलियों आदि तक किया गया है लेकिन पेड़-पौधों के प्रति होने वाले हिंसा के बोध को विकसित करने में, हम, अब भी असफल रहे हैं।

खून से लथपथ, रोते बिलखते, दर्द से कराहते अपने सगे-संबंधियों के साथ होने वाली हिंसा की भयावहता का अनुभव तो, हम, करते हैं और कुछ हद तक अपने पालतू कुत्ते, खरगोश, गाय, बैल, घोड़े आदि के दर्द भी महसूस करते हैं लेकिन अब इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि इसका विस्तार मानव व पशुओं के अलावा वनस्पति, जल वायु, धरती आदि तक की जानी चाहिए। डीप इकोलॉजी की इकोसोफी  संपूर्णता और अद्वैत की दृष्टि से युक्त है। मोरल आब्लिगेशन (नैतिक आबंध) को प्रायः मानव और जीव (सेंसिएन्ट बीइंग) तक ही सीमित कर दिया जाता है। ऋण की अवधारणा को भी मानव तक ही सीमित कर दिया जाता है । क्या प्रकृति से मिलने वाले भोजन, हवा, पानी, धूप के लिए ऋण की अवधारणा का विस्तार अपेक्षित नहीं है? भारतीय परंपराओं में पाँच यज्ञ को विस्तार दिया जा रहा है। गांधी इस ऋण को महत्व देते हैं। हम प्रकृति से उतना ही ग्रहण करें जितनी हमारी आवश्यकता हो, प्रकृति से लेने वाली आवश्यक चीजों के लिए हमें आभारी होना चाहिए। उसके ऋण के लिए नैतिक दायित्व का निर्वाह भी करना चाहिए।

इसी वर्ष प्राकृत भारती अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक “हन्ना आरेंट: हिंसा का उत्खनन” (2021) में प्रोफेसर अम्बिकादत्त शर्मा लिखते हैं “समुद्री शैवाल की तरह हिंसा के आयाम इतने विस्तृत हो चुके हैं कि जब तक उसका एक सिर पकड़ में आता है, दूसरा छूट जाता है। ऐसे में हम अनचाहे हिंसा को सहते जाते हैं और अनजाने ही उसका समर्थन करते रहते हैं। यह निर्मित की गई मानव- परिस्थिति मानवता के लिए आशा के खो जाने जैसी है । इसको फिर से अर्जित करने के लिए मनुष्य की नैतिक एवं आत्मिक शक्ति को उसी वास्तविक भूमि और भूमिका में प्रतिष्ठित किया जाना जरूरी है, जिसे हिंसा ने विस्थापित कर रखा है।”

हिंसा संबंधी यह विचार मानव केन्द्रित लग सकता है पर इसके उद्देश्य का फलक व्यापक है। हिंसा का मानव केन्द्रित  सहस्रबाहु रूप ही मानव के लिए इतना भयानक है कि हम आज तक उनके निदान की कोशिश कर रहे हैं लेकिन बहुत गौण सफलता मिली है और जिसकी जलती धू-धू लपटें, आज, मानव से इतर पशु, पक्षी, सरीसृप, पानी में रहने वाले जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, पानी, पर्वत, आकाश, ओजोन स्तर, हवा आदि तक पहुंच गई हैं। हिंसा की लपट (परिणाम) जैवमंडल, वनस्पतिजगत से आगे बढ़ते हुए जल-मंडल, वायु-मंडल, थल-मंडल तक इस कदर पहुंच जाएगी- इसे समझने के लिए जिस ज्ञानमीमांसीय विवेचना का सहारा हम लेते हैं उससे वहां तक पहुंच पाना सभंव नहीं है।इन दिनों पर्यावरणीय ज्ञानमीमांसा के स्वरूप के निर्धारण का विमर्श भी किया जा रहा है।

हमने अपने हिंसा-बोध का ज्ञानमीमांसीय विस्तार मानव-केन्द्र से आगे बढा़ते हुए कुछ पालतू  पशु व पक्षी, अपने बाग-बगीचे के कुछ पेड़-पौधों और घर की कीमती समानों तक ही विस्तृत कर पाये हैं। हमें यह समझना होगा कि आत्म-संकीर्णता ही समस्त हिंसा का, दुःख का, समस्याओं का कारण है। हिंसा को प्रत्यक्ष से जोड़कर और मूलतः मानव से जोड़कर देखने के हमारे संकीर्ण हिंसा-बोध के आयाम ने और हमारी ज्ञानमीमांसीय अज्ञानता ने पर्यावरण के संकट की दास्तान लिखी है। यह दास्तान हमारे ही अस्तित्व के संकट की पटकथा लिख देगा, यह, हम समझ नहीं पाए। जब तक समझते काफी देर हो चुकी थी। सच पूछिए सभ्यता के संघर्ष का इतिहास मानव केंद्रित हिंसा और अहिंसा के संघर्ष की यात्रा  पर केंद्रित रहा जबकि मानव और मानव से आगे बढ़ते हुए मानव व मानवेतर संघर्ष की कहानी सभ्यता के इतिहास के रूप में लिखना बाकी है, जिसे बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से चिह्नित करने की कमजोर कोशिश की जाने लगी है।

दृष्टि का एकपक्षीय या अंशपक्षीय, पृथक्कारी होना, प्रकृति-पर्यावरण के साथ अन्याय के विशाल रूप को अंजाम देने का काम किया है। हमारे आत्मज्ञान की गति जितनी सीमित होगी पर्यावरणीय अन्याय का रूप उतना ही विस्तारगामी होता चला जायेगा और हम पर्यावरणीय न्याय (पर्यावरण का समुचित उपयोग और पर्यावरण के साथ समुचित दायित्व-निर्वहन) स्थापित नहीं कर पायेंगे। सच पूछिए पर्यावरणीय समस्या हमारे ही हिंसा- विस्तार का नतीजा है और यह हमारे ही आत्म-संकीर्णता की विराट और विकट परिणति है। यह हमारे कुछ ऐसे जीवन-सिद्धांतों को सर्जित करती है जिससे हिंसा को बहुआयामी विविध रूप मिला करता है। 1.भौतिकवाद, 2.भोगवाद 3.सुखवाद, 4.स्वार्थवाद, 5.उपभोक्तावाद, 6.पूंजीवाद 7. साम्राज्यवाद 8.औद्योगिकी- प्रौद्योगिकी निर्भरपरस्तता वाद, 9.अधिकारिता वाद 10.अनियंत्रित स्वच्छंदता 11.आभासीय आवश्यकता एवं उपभोगका विस्तीर्ण-बाजारवाद आदि ऐसे ही कुछ जीवन- सिद्धांत हैं जो समस्त पर्यावरणीय संकट को बहु विविध रूप देने का काम करते हैं। यह पर्यावरणीय अन्याय को एक विशाल रूप देने का काम किया है।

प्रश्न उठता है जब पर्यावरण की समस्त समस्याओं के मूल में आत्म-संकीर्णता है और उसके द्वारा सृजित हिंसा एवं हिंसा के सिद्धांतों का विस्तार है तो आखिर वह कौन सा मौलिक सिद्धांत होगा जिससे पर्यावरण की अक्षुण्णता, दूसरे शब्दों में अस्तित्व की अक्षुण्णता बनी रहेगी? वस्तुतः अहिंसा जीवन का आधारभूत सिद्धांत है और वही अस्तित्व की अक्षुण्णता का सिद्धांत है। चूँकि हिंसा के व्यापक आयाम एवं विस्तार ने अहिंसा के अस्तित्व को विस्थापित किया है इसलिए अहिंसा का बहु विविध व्यापक विस्तार ही पर्यावरणीय समस्याओं का अंत कर सकता है । लेकिन प्रश्न उठता है कि अहिंसा का विस्तार कैसे संभव है? बिना-आत्म परिष्करण और आत्म-विस्तीर्णता के यह संभव नहीं है । पुनः प्रश्न उठता है कि यह परिष्करण कैसे संभव है?

इस बात को समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि अहिंसा हमारा आत्म-स्वभाव है, हिंसा नहीं। हिंसा बाह्य परिस्थिति-जन्य एवं समय और काल में प्रकट होता है और इस हिंसा के अभिव्यक्ति-करण के कई रूप क्रोध, अहंकार, अज्ञान, स्वार्थ, लालच, तृष्णा आदि में वह शामिल है। इनको नियंत्रित करने के अनेक उपाय हमारी शास्त्रीय दार्शनिक परंपराओं में बताया गया है। योग में अभ्यास-वैराग्य, अष्टांग- योग, मैत्री, करुणा, मुदिता, प्रतिपक्ष भावना आदि बताया गया है, अद्वैत वेदांत में नित्य-अनित्य वस्तु विवेक, इहामुत्रार्थभोग विराग, शमदमादि साधन-संपत्त और मुमुक्षत्व को बताया गया है। जैन में त्रिरत्न और बौद्ध में अष्टांग मार्ग को महत्वपूर्ण रूप से स्वीकार किया गया है।

जैसे-जैसे आत्म-संयम से हिंसा के विस्तार को शिथिल और निष्क्रिय किया जाता है वैसे ही अहिंसा अपने मूल रूप में स्थापित होने लगती है। मैत्री, करुणा, प्रेम, दया, क्षमा, त्याग, आत्मीयता निस्वार्थता आदि की अभिव्यक्ति उद्दात रूप में होने लगती है। तब मानव आत्म-विस्तीर्ण जीवन- सिद्धांतों एवं मूल्यों की सर्जना करता है। वह भोग परित्याग, स्वार्थ परित्याग, लोभ परित्याग, आभासीय बाजार से विमुख होने वाले सिद्धान्तों की ओर मुड़ने लगता है। पूरी प्रक्रिया आत्म-संकीर्णता से आत्म-विस्तीर्णता की ओर मुड़ने की है। मानव पर्यावरण का केवल उपभोग मूल्य, आर्थिक मूल्य, आस्था का धार्मिक मूल्य, औषधीय मूल्य अथवा यों कहें केवल साधन मूल्य (इन्सट्रूमेंटल वैल्यू) मान लेता है जबकि सच तो यह है कि मानव के उपभोग न किये जाने पर भी उसका स्वयं अपने-आप में मूल्य (इन्टरिन्सिक वैल्यू) है, उसका मानव व मानवेतर समस्त अस्तित्व के लिए निरपेक्ष जीवन-मूल्य और परम सौंदर्य-मूल्य है

गांधी-विचार इस दृष्टि से अनोखे हैं कि वे अति उपभोग और अतिशय बर्बादी पर अंकुश लगाते हैं। भोग की सीमा निर्धारित करते हैं, सादगी, आवश्यकता आधृत जीवन शैली को जीवन में अपनाते हैं। वे शाकाहार, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, ग्राम-स्वराज, कुटीर उद्योग के अपनाने की प्रेरणा भी बनते हैं। प्रौद्योगिकी आशावादी (टेक्नोओप्टिमिस्ट) भी नहीं हैं और वैयक्तिक संपत्ति के विचार को एक समग्रतावादी समाज (आज समग्रतावादी पारिस्थिति की) की संकल्पना में बाधक समझते हैं।

इतना ही नहीं उनकी सत्याग्रही विधि को आत्म-संकीर्णता से आत्म-विस्तीर्णता की ओर मोड़ने की महत्वपूर्ण विधि के रूप में विस्तार दिया जा सकता है। चिपको आंदोलन भी  सत्याग्रह का ही एक परिमार्जित रूप  है। पेंड़  के काटने और लगाने के लिए भी सत्याग्राह और सविधाओं की कटौती के लिए सत्याग्रह करने की आवश्यकता है।मेरा  मानना है कि पर्यावरणीय संकट और पर्यावरणीय न्याय के लिए गांधी की सत्याग्रह-विधि को इस क्षेत्र में प्रयोग में लाने का प्रारूप तय करना चाहिए। उसके अनुप्रयुक्त रूप को विस्तारित करने की महती जरूरत है। सत्याग्रही विधि को आत्मविस्तीर्णता की विधि के रूप में विकसित किया जा सकता है।

दुरूपयोग को नियंत्रित करने के चार ‘आर’(R) संबंधी उपयोग सिद्धांत (यूजथ्योरी)- रिड्यूशयूज, रिफ्यूजयूज, री-यूज़ और री-सायकल और साथ ही साथ अधिक से अधिक वृक्षारोपण, बैटरी चालित कार, सोलर पैनल के प्रयोग  आदि  जैसे सर्जनात्मक सिद्धांत विस्तीर्ण आत्म-बोध की ही अभिव्यक्ति हैं।माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने छः आर का विचार (रीयूस,रीड्यूस,री साइकल,री-कवर,री-डिजाइन,री-मेनुफेक्चर ) संपोष्य विकास के लिए बतलाया है। ऐसे सिद्धांतों, जीवन मूल्यों, जीवन-दर्शन को आचरण में अनुप्रयोग करने की,आज,अत्यधिक जरूरत है

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पूर्णेन्दु शेखर

लेखक तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर में दर्शनशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919471606701, pgps262626@gmail.com
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