दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (104)

 

 सृष्टि के रचयिता यूके पर बहुत कृपालु रहे हैं। वहाँ की मिट्टी और जलवायु अपेक्षाकृत अधिक अच्छी है। मिट्टी अत्यंत उपजाऊ है और जलवायु जाड़े के तीन महीनों के सिवा बहुत अनुकूल है। वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के लिए मुफीद है यहाँ की आबोहवा। किन्तु यही आबोहवा मनुष्य को परेशान करने वाले जीवों के लिए अनुकूल नहीं है। हम एशिया वासी आम तौर पर मच्छर, मक्खी, खटमल, घुन, दीमक, कीट-पतंगे, बिच्छू, तेलचट्टा, गोजर, छिपकली, विषैले साँप और चूहों आदि से परेशान रहते हैं। यूके के लोग इनके आतंक से मुक्त हैं। फसलों को नुकसान पहुँचाने के लिए कुख्यात हानिकारक कीड़े, भैंस, बकरी, नीलगाय और बन्दर भी नदारद हैं। ऐसा लगता है कि विधाता ने पृथ्वी के इस भूखंड को खासकर मनुष्य के रहने के लिए ही बनाया है।

        एक बहुत बड़ा फर्क जनसंख्या में भी है। यूके ने अपनी जनसंख्या वृद्धि को कई दशकों से नियंत्रित कर रखा है। इस लिए सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाएँ सफल रहती हैं और इधर हम भारत के लोग हरेक साल एक ग्रेट ब्रिटेन जितनी जनसंख्या बढ़ाने में लगे हैं, इस कारण योजनाओं के धरातल पर उतरने तक लाभार्थियों की संख्या करोड़ों में बढ़ चुकी होती है। नागरिक सुविधाओं के बारे में भी तुलना का कोई मतलब नहीं है।

वहाँ रक्षा, विदेश, विधि-व्यवस्था, सड़क और रेल सरकारी नियंत्रण में है, बाकी सब निजी क्षेत्र के अधीन है। प्रत्येक नागरिक का स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य है और बीमार होने पर चिकित्सा अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त प्राइवेट अस्पतालों में होती है। ऐसे एक अस्पताल को देखने का अवसर मिला। वार्ड के 95 प्रतिशत बेड खाली थे। साफ बात है कि वहाँ लोग बीमार कम होते हैं। शिक्षा भी निजी क्षेत्र के अंतर्गत आती है। उच्च शिक्षा के लिए बहुत कम युवा नामांकन कराते हैं। इंटरमीडिएट तक अधिकांश युवा रोजगारोन्मुखी रास्ता चुन लेते हैं। ग्रेजुएशन करते-करते प्रायः नाव किनारे लग जाती है। शायद यही कारण रहा हो कि जब स्नेह मेरा परिचय किसी से प्रोफेसर और पीएचडी के साथ करवाता था तो सामने वाले के नेत्र विस्फारित हो जाते थे।

 वहाँ जाड़े में बर्फबारी होती है। अन्य मौसम में अच्छी बारिश होती है, किन्तु झड़ी नहीं लगती। तापमान इतना अच्छा होता है कि खुले आसमान में लकड़ियाँ बरसों बरस ज्यों-की-त्यों पड़ी रहती हैं। इसी कारण घरों की चारदीवारी और खेतों की घेराबंदी में मुख्य रूप से लकड़ियों का ही इस्तेमाल होता है। मैं अपने लिये पान के पत्ते इस डर से कम मात्रा में लेकर गया था कि सड़-गल जायेंगे। किन्तु जलवायु का कमाल था कि एक भी पत्ता बर्बाद नहीं हुआ। 

   वहाँ चारों तरफ समुद्रों की बहुतायत तो है ही, पर नदियों और झीलों के रूप में प्राकृतिक जलस्रोत भी प्रकृति ने मुक्तहस्त से दिये हैं। समुद्री किनारों और असमतल भूमि के कारण वहाँ चौबीसों घंटे तेज हवाएँ चलती रहती हैं। इस कारण मौसम सुहावना रहता है। वर्तमान में इन तेज हवाओं का इस्तेमाल बहुतायत में पवन ऊर्जा के दोहन के लिए किया जा रहा है।

   खेती के मामले में यूके चौंकाता है। बचपन से सुना और पढ़ा था कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह भ्रम वहाँ भ्रमण करने के बाद टूट गया। मैंने लगातार गौर किया कि सड़कों-गलियों के अतिरिक्त कहीं एक इंच भी खाली जमीन से नंगी मिट्टी नहीं झाँकती है। सर्वत्र घास, फसल और घने जंगल हैं। ऊँचे पहाड़ों पर भी हरियाली छायी रहती है। पथरीली चट्टानों के बीच भी झाड़ियों और पेड़ों का विकास होता रहता है। नदियों, तालाबों और झीलों में जलीय वनस्पतियों की भरमार है। स्वाभाविक है कि जलीय जैव विविधता उत्कृष्ट स्थिति में है। मवेशी पालन हमारे यहाँ से बिल्कुल भिन्न है। पालतू पशुओं में गाय, भेंड़, घोड़ा, सुअर, बत्तख, मुर्गी, टर्की और बटेर हैं।

खास बात यह कि किसी पशु को बांधकर बन्द रखने का चलन नहीं है। चौपायों के लिए शेड और बाकी के लिए दरबा जरूर है, किन्तु केवल रात में इस्तेमाल के लिए है। दिनभर सभी पशु खुले खेतों में अपना नैसर्गिक चारा चरते हैं। सड़कों के दोनों ओर फैले विस्तृत खेतों में फसल कम और घास अधिक दिखाई देती है। लकड़ी के फट्ठों से बने कमर भर ऊँचे घेरे में श्यामल कोमल हरियाली के बीच गाय, भेंड़ और घोड़ों के मिश्रित झुंड को चराई करते देखना काफी सुखद अनुभव है। इसी प्रकार अन्य पशु भी विस्तृत घेरों के अन्दर खुले रखे जाते हैं। गाय और घोड़े इतने स्वस्थ कि पीठ पर मक्खी बैठे तो जैसे फिसल जाय! भेड़ें ऊन के गट्ठर जैसी गोल और सुअर जैसे गुलाबी मांस का गोला। स्पष्ट है कि अंग्रेज एनीमल प्रोडक्ट की गुणवत्ता के प्रति समझौतावादी नहीं हैं। दूध केवल गाय का मिलता है वह भी भिन्न-भिन्न प्रोसेसिंग के अनुसार छः आठ किस्मों में बोतलबंद। सूखी, कच्ची और तरल सभी प्रकार की खाद्यसामग्री सीलबंद ही उपभोक्ताओं को मिलती है, वह भी उत्पादक के नाम, स्थान और एक्सपायरी डेट के स्टिकर के साथ।

             शारीरिक श्रम करने वाले लोगों का वहाँ बहुत अभाव है, इस कारण उद्योग, निर्माण व कृषि क्षेत्र में मशीनों का वर्चस्व है। अभाव होने के कारण समाज में मेहनतकश लोगों की बड़ी इज्ज़त और ऊँची कमाई है। मुझे लगा जैसे सामुदायिक खेती का प्रचलन अधिक है। खेत काफी बड़े-बड़े होते हैं, जिनमें स्वचालित मशीनों के द्वारा सभी प्रकार के कृषि-कार्य किये जाते हैं। कटी फसल की गट्ठरों को काले-उजले पॉलीथिन शीट में लपेटकर खेतों में पड़ा देखना मेरे लिए बड़ा कौतुक था। सौम्या ने बताया कि बारिश से बचाने के लिए यह इंतजाम किया गया है। वहाँ के गाँवों को केवल इस कारण गाँव कहा जायेगा कि वे शहरों से दूर हैं और वहाँ बहुमंजिले भवन तथा बड़े बाजार नहीं हैं। नागरिक सुविधाओं के मामले में गाँव शहरों से कमतर नहीं हैं।

             जिन इलाकों में तेज हवाएँ चलती हैं वहाँ भारी संख्या में पवन चक्कियाँ लगाई गयी हैं। कहते हैं कि कृषि क्षेत्र में खर्च होने वाली अधिकांश बिजली का उत्पादन इसी माध्यम से किया जाता है। औद्योगिक और नागरिक जरूरतों की बिजली के लिए गैस आधारित ताप बिजलीघर हैं। पर सम्पूर्ण यूके में एक भी कोयला आधारित बिजलीघर नहीं है। गैस वाले उत्पादन केन्द्रों को भी तेजी से परमाणु ऊर्जा केन्दों में तब्दील किया जा रहा है। एक और खास बात कि मुझे कहीं भी ओवरहेड विद्युत आपूर्ति लाइन और मोबाइल फोन टावर नहीं दिखा। हाँ, सड़कों पर सेंसर और सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी हर जगह दिखी।

         बड़ी कम्पनियों के आउटलेट्स में कच्चे-पके खाने के सामान की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होता है। मिर्च, टमाटर, प्याज, आलू की दर्जनों किस्में। सेंसबरी में एक दिन हमने अपने हरियाणा के किसान बंसीलाल के खेत की हरीमिर्च खरीदी थी। मालूम हुआ कि आयात होने वाली खाद्य पदार्थों को कड़ी जाँच के बाद ही उपभोक्ता तक पहुँचने दिया जाता है। अनुकूल तापमान के कारण फल और सब्जियाँ काफी दिनों तक ताजा रहती हैं। सभी कच्चे पदार्थों के पैकेटों पर उनका एक्सपायरी डेट छपा होता है।

        सम्पूर्ण यूके में रोशनी तो 24 घंटे में 18 घंटे रहती है किन्तु धूप के लिए लोग तरसते रहते हैं। गर्मियों के तीन-चार महीने के किसी-किसी दिन चमकीली तीखी धूप निकलती है जिसमें निकलने के लिए धूप चश्मे की अनिवार्यता हो जाती है। ऐसा मौसम अंग्रेजों के लिए उत्सव का कारण बन जाता है। सपरिवार अपने कुत्ते-बिल्लियों के साथ लोग घरों से बाहर पिकनिक मनाने चल पड़ते हैं। जितना सम्भव हो, खुले शरीर धूप-स्नान करते हैं। ऐसे मौसम में शहरों में भीड़ बेतहाशा बढ़ जाती है। अगर सप्ताहांत के दिन हुए तो कहना ही क्या! गर्मियों के सप्ताहांत में जहाँ-तहाँ पार्कों में सैकड़ों की संख्या में वैनिटी वैन का जुटान देखा जा सकता है। साधन-सम्पन्न लोग दो दिन और दो रात अपने वैनिटी वैन के साथ बाहर रहते हैं।

        वहाँ सीनियर सिटीजन लोगों की एक अलग ही अनोखी-सी दुनिया है। जिस उम्र और अवस्था में हमारे यहाँ के बुजुर्ग अपने आसपास निराशा, हताशा और नाउम्मीदी का वातावरण निर्मित करके मृत्यु की प्रतीक्षा शुरू कर देते हैं, यूके के लोग इस नयी पारी में नये सिरे से जीवन आरम्भ करते हैं। परिवार, समाज, राष्ट्र और संसार की चिंताओं व जिम्मेदारी से निर्लिप्त यूके के बुजुर्ग अपने रिटायरमेंट को भरपूर इंजॉय करते हैं। भ्रमण करते हुए दर्जनों जगहों पर हमें ऐसे जीवंत और खुश बुजुर्गों के टूरिस्ट जत्थे मिले थे। थरथराते हाथों में भारी बीयर मग थामे बुजुर्ग दम्पतियों को दोस्तों के साथ ‘चीयर्स’ करते देखना दर्शकों को जीवन की ऊर्जा से सराबोर कर देता है।

       पर्यावरण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी के प्रति भी वहाँ के लोगों का नजरिया हमसे भिन्न है। वे नदियों, पहाड़ों, जीवों और वनस्पतियों को अपना हितैषी मानकर उनसे ममत्व का सम्बंध रखते हैं। हम इन्हें देवता का दर्जा देकर अपने पापों का भागीदार बनाते उनका सत्यानाश करते रहते हैं। वहाँ की पारिस्थितिकी देखकर ऐसा लगता है कि वह पाँच हजार वर्ष पहले जैसी रही होगी; अभी भी वैसी ही अक्षुण्ण पड़ी है। औद्योगिक विकास का लेशमात्र भी असर पर्यावरण पर नहीं दिखाई देता है। न तो झरनों या नदियों का कहीं मार्ग अवरुद्ध किया गया है, न डैम बनाये गये हैं और न ही गाँव, नगर अथवा उद्योग बसाने के लिए वृक्ष या जंगल उजाड़े गये हैं। यदि कहीं पेड़ काटने की जरूरत होती है तो काटने के बजाय उन्हें स्थानांतरित कर दिया जाता है। पानी के उपयोग के मामले में सरकार और आमजन अत्यंत संवेदनशील हैं। घरों में वाटर इनलेट और आउटलेट दोनों पाइपलाइन में मीटर लगाये जाते हैं ताकि पानी का अपव्यय न हो। वाटर प्यूरीफायर की आवश्यकता नहीं। सभी सीधे सप्लाई वाटर का पेयजल के रूप में इस्तेमाल करते हैं। एयरपोर्ट के सिवा कहीं बोतल बन्द पानी बिकते हमने नहीं देखा।

     बाजारों में कहीं हमें फुटकर या फुटपाथी दुकान नहीं मिली। हर शहर में बड़ी-बड़ी कम्पनियों के आउटलेट्स होते हैं। दुकानों या सर्विस सेंटरों में अधिकतम कैशलेस कारोबार होता है। उन जगहों पर सेल्समैन या सेवादारों की भी उपलब्धता नहीं होती है। सेल्फसर्विस का प्रचलन है। कार वाश, टायर प्रेशर और पेट्रोल भरने तक का काम खुद करना पड़ता है। जितने बड़े सेटअप में अपने यहाँ तीन-चार दर्जन लोग लगे रहते हैं, उतने में वहाँ बमुश्किल तीन-चार लोग होते हैं।

        अपने ऐतिहासिक स्मारकों के प्रति वहाँ के लोगों में गौरव और श्रद्धा की भावना है। जिस प्रकार उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास का अभिमान है, उसी प्रकार उनमें ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखने की आत्यन्तिक चेतनशीलता है। इस उत्तर आधुनिक युग में भी यूके के स्मारक पूर्णतः सुरक्षित हैं। यहाँ तक कि एक सदी से अधिक पुरानी निजी इमारतों को भी संरक्षण के कानून से बाँध दिया गया है वहाँ। प्राचीन निजी भवनों में तोड़-फोड़ करने की बिल्कुल इजाजत नहीं है। 

        नागरिक भावनाओं (सिविक सेंस) के मामलों में हमारा अंग्रेजों के साथ तुलना करने का कोई आधार नहीं है। आम तौर पर हमारे मन में अंग्रेज कौम के प्रति यह धारणा है कि वे स्वार्थी होते हैं। पर वास्तव में मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ। वे लोग अपनी सुविधा से पहले दूसरों की सुविधा का ध्यान रखते हैं। सभी इस बात के लिए सचेत, सतर्क और सचेष्ट रहते हैं कि उनके कारण किसी को कोई दिक्कत पेश न आये। उदाहरण के लिए पार्किंग स्थल पर कार पार्क करते हुए यह देखना कितना प्रेरणादायक है कि कार चालक बाहर आकर चारों ओर घूमकर आश्वस्त हो लेता है कि अन्य गाड़ियों को पार्किंग में बाधा न हो। कहीं बिजली पंखे और एसी का उपयोग नहीं होता है। सर्दियों में रूम हीटर का इस्तेमाल किया जाता है। इसीलिए अधिकांश घरों में दीवारों व छतों में लकड़ी की कोटिंग की जाती है। तापमान को संतुलित और अनुकूल रखने के लिए सभी घरों के मुख्य दरवाजे बन्द रखे जाते हैं। खुलने के बाद स्वतः बन्द करने वाले यन्त्र दरवाजों में लगाये जाते हैं। अब एक बानगी देखिये– एक कमरे से कई लोगों को बाहर निकलना है। जिस व्यक्ति ने दरवाजा खोला, वह हैंडल पकड़े खड़ा रहेगा। बाकी के लोग मंद स्मित के साथ ‘थैंक्स’ बोलते निकलते जाएँगे और पहला व्यक्ति सबके बाद निकलेगा।

      पारिवारिक ढाँचे के मामले में यूके और भारतीय समाज में बहुत बड़ा अंतर है। अपने यहाँ भी हाल के दशकों में संयुक्त परिवार की अवधारणा विखंडित हुई है, एकल परिवार का जमाना चल रहा है, किन्तु विवाह का बंधन फिर भी काफी सुदृढ़ है। वैवाहिक रिश्तों को बरकरार रखने में परिवार और समाज की भूमिका बची हुई है। वहाँ विवाह बिल्कुल व्यक्तिगत मामला है। स्त्री-पुरूष दोनों की रजामंदी हुई तो विवाह होगा अन्यथा बिना शादी के भी परिवार बस जाता है। बच्चे पैदा करने के लिए भी विवाह की अनिवार्यता नहीं है। प्रायः 30 की उम्र से पहले बच्चे पैदा करने की जिम्मेदारी पूरी कर ली जाती है। वैवाहिक रिश्ते टूटने के लिए भी किसी बड़े कारण का होना जरूरी नहीं है। हमारे यहाँ कुछ अपवादों को छोड़कर परिवार में बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक स्थान बचा हुआ है। वहाँ के युवा इस जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके हैं। युवाओं और बुजुर्गों की दुनिया एकदम अलग है। किन्तु आश्चर्यजनक रूप से वहाँ के वृद्धजन अपेक्षाकृत अधिक खुश नजर आते हैं। निर्बन्ध और निर्द्वंद्व होकर जिंदगी के मज़े लेते हैं।

       सड़कों पर ट्रैफिक नियमों का वहाँ अक्षरशः अनुपालन होता है। हॉर्न का उपयोग केवल खतरे की स्थिति में किया जाता है। एक पखवाड़े के भ्रमण में मैंने एक बार भी हॉर्न की आवाज नहीं सुनी। एक दिन स्नेह को कहा, “बेटा हॉर्न बजाओ न! लगता है कि कहीं बहरा तो नहीं हो गया हूँ!” उसने हँसकर जवाब दिया, “पापा, पुलिस दौड़ जायेगी और जवाबतलब करेगी।” यातायात के संदर्भ में बात करें तो गौरतलब है कि सड़कों पर सबसे ज्यादा महत्त्व पैदल चलने वाले लोगों को प्राप्त है। सड़क पार करने के लिए समुचित दूरी पर जेब्रा क्रॉसिंग तो है ही, किन्तु आपातकालीन स्थिति में यदि सड़क पार करनी हो तो हथेली ऊपर करते बेधड़क धँस जाइये, सारी गाड़ियाँ रुक जाएँगी और चालक मुस्कुराते हुए आपके निकल जाने तक इंतजार करेगा। पार करने वाला थम्सअप करते शुक्रिया अदा करेगा। साइकिल वालों को भी इज्ज़त की नजरों से देखा जाता है। साइकिल के लिए सड़कों पर अलग लेन बने हैं और जॉब पर साइकिल से जाने वाले को प्रोत्साहन भत्ता देने का प्रावधान है। इसके उलट बड़ी लग्जरी कार वालों को हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है। जितनी बड़ी गाड़ी, आमजन की नजरों में उतना ही बुरा आदमी!

        हमारे यहाँ के वीआईपी सिंड्रोम का तो कहना ही क्या है! साधारण विधायक या सांसद भी हमारे लिए तमाशा के पात्र हैं। वहाँ सड़कों या बाजारों में मंत्री और प्रधानमंत्री तक की नोटिस नहीं ली जाती है। अलबत्ता राज परिवार के प्रति जनता में अद्भुत श्रद्धा का भाव है। लोग अपने लिये प्रार्थना बाद में करते हैं; पहले “गॉड सेव द क्वीन/किंग” बोलते हैं। बकिंघम पैलेस की छोटी-से-छोटी गतिविधियों पर उनकी पैनी नजर रहती है। राज परिवार की बग्गी यदि सार्वजनिक स्थान पर दिख जाए तो वह तमाशा बन जाता है।

रानी या राजा को अंग्रेज राष्ट्रीय स्वाभिमान और संप्रभुता का प्रतीक मानते हैं। वैसे भी उनमें राष्ट्रीय भावना उच्चतम स्तर पर है। ऐसा कोई काम भूल से भी नहीं करते जिससे देश की प्रतिष्ठा को धक्का लगता हो। इस क्रम में वे भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की भावनाओं की इज्ज़त करने में कोताही नहीं बरतते हैं। कई अवसरों पर मुझे महसूस हुआ कि अतीत के ज़ुल्मोंशीतम के कारण हमारे लिए उनके मन में प्रबल अपराधबोध है। हमारे लोग कहते हैं कि हमें उनके जैसा बनने में पाँच सौ वर्ष लग जाएँगे, पर मुझे ऐसा लगा कि हम वैसा कभी नहीं हो पाएँगे। हममें न वैसी मानसिकता व शिक्षा है, न राष्ट्रीय भावना, न वैसी जलवायु और न वैसी नियंत्रित जनसंख्या ही है।

(क्रमशः)

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पवन कुमार सिंह

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919431250382, khdrpawanks@gmail.com
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