बेटी के बड़ी हो जाने का अहसास माँ को पहले और पिता को बाद में होता है। बल्कि कहना यह चाहिए कि माँ ही पिता को याद दिलाती है कि अब बेटी के विवाह का कर्तव्य पालन करने का समय आ गया है। शुरुआत में हफ्ता-पंद्रह दिनों में तगादा होता है और समय बीतने के साथ-साथ ‘खोंचा’ मारने की फ्रिक्वेंसी बढ़ती चली जाती है। खाना-पीना और नींद तक हराम कर देती हैं जवान हो चुकी बेटी की माँएँ।

  हमारी लाड़ो प्रीति सागर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद अपने भैया-भाभी के साथ दिल्ली में रहकर नेट की तैयारी शुरू कर चुकी थी। इधर सुधा ने मुझे यह याद दिलाने का सिलसिला चालू कर दिया था कि बेटी बड़ी हो गयी है। वह लगभग हर फोन कॉल में बेटी का काउंसेलिंग कर रही थी कि अब वह शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाये। बिटिया अपना कॅरियर बनाने को थोड़ी मोहलत चाहती थी, पर मम्मी की ओर से राहत की बिल्कुल गुंजाइश नहीं बन रही थी।

  बेटी की माँ की मनोदशा का यह हाल था कि हर भोज- भात या समारोह में उनकी नजर अपनी पुत्री के योग्य वर की तलाश में लगी रहती थी। कोई स्मार्ट लड़का दिखाई देता कि उसकी जन्मकुंडली पता लगाने को व्यग्र हो जाती थी। बेटे की शादी को अभी एक साल ही बीता था। दोनों की उम्र में पाँच वर्ष का अंतर था। मैं इस अंतर का हवाला देता तो मेरा मुँह यह कहकर बन्द कर दिया जाता कि लड़के और लड़की की उम्र में यह अंतर तो होना ही चाहिए। साथ में यह साक्ष्य भी कि मेरी और उसकी उम्र में सात साल का फासला है।

   दिन बीतने के साथ-साथ मेरी दशा बहुत दयनीय होती जा रही थी। मैं जिस-तिस प्रकार के बहाने बनाकर टालने की कोशिश करता, पर वह निष्ठुर जैसा बर्ताव करने लगती। घर पर मिलने के लिए आने वाले स्वजातीय हितैषियों को भी सुधा का दबाव झेलना पड़ता था। इसी क्रम में सरबदीपुर के परमानन्द बाबू ने अपनी रिश्तेदारी में एक लड़का बताया और सुधा की जिद पर मुझे उनके साथ पटना जाना पड़ा था। लड़का आईटी इंजीनियर था और पोस्टिंग यूरोप के किसी देश में थी। लड़के वाले सहमत हो गये थे। पता चला कि लड़का आध्यात्मिक प्रकृति का है और खानपान के प्रति इतना सात्विक है कि वहाँ भी खुद पकाकर खाता है। उसकी जो दो तस्वीरें हमें दी गयी थीं उनमें से एक में वह अपने कमरे में पूजा करता हुआ दिख रहा था। पटने से लौटकर मैंने बायोडाटा और फोटोग्राफ बच्चों को भेज दिया। उनकी सहमति हम दोनों से ज्यादा जरूरी लग रही थी। पर, आश्चर्यजनक रूप से तीनों ने इन्कार कर दिया था। सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया बिटिया की थी। बायोडाटा में वेजिटेरियन और पूजा वाली तस्वीर देखकर उसने कहा था, “इस ‘जैनी’ ‘पुजारी’ से मैं शादी नहीं कर सकती।” परमानन्द बाबू को मना करते हुए मुझे बहुत अखरा था।

  लड़के वाले की अपेक्षा लड़की वाले को रिश्ता खोजने में अधिक स्वतंत्रता होती है। लड़की के पिता के लिए पूरी दुनिया खुली है। वह जहाँ चाहे, जाकर प्रस्ताव दे सकता है और अपनी कन्या के योग्य वर का चुनाव कर सकता है। लड़के के पिता के पास बहुत सीमित विकल्प होते हैं। जो प्रस्ताव आये, उसी में से एक चुनने की उसकी विवशता होती है। एक और बात कि जमाना बदलने के साथ बेटे का ब्याह कठिन होता जा रहा है। बहू के मन-मिजाज पर पूरे परिवार का भविष्य निर्भर करता है। इस कारण लड़के वाले बहुत आशंकित रहते हैं। जोड़ कर चलने वाली हुई तो बड़ा अच्छा, नहीं तो परिवार बिखर जाता है। इसलिए आज के दौर में लड़के वाले अधिक फिक्रमंद नजर आते हैं। एक बार मैंने प्रश्नपत्र सेट करते हुए निबंध लेखन के विकल्प में “शादी के लिए चिंतित लड़के वाले” विषय दिया तो अधिकांश सहकर्मियों को लगा था कि प्रिंटिंग मिस्टेक है!

  सुधा की चिंता अब मेरे लिए आतंक का रूप धारण करती जा रही थी। उठते-बैठते, सोते-जागते किसी भी समय बात शुरू करती और रट लगा देती थी। कई बार माहौल में कड़वाहट भर जाती। रविवार के दिन लाल कलम लेकर अखबार के वैवाहिक विज्ञापन वाला पन्ना गौर से देखने लग जाती। अपने हिसाब से सम्भावित योग्य वर तलाशकर टिक लगा देती और मुझे कहती कि फोन लगाऊँ। कई बार उसकी जिद पर मैंने फोन किया भी लेकिन संयोग ऐसा कि कॉल रिसीव नहीं किया गया। बढ़ते दबाव से बचने के लिए मैंने एक अनोखा और अव्यावहारिक बहाना बना लिया था या विधाता मेरे मुँह से बोल रहे थे–“चिन्ता क्यों करती हो? हमारी बेटी इतनी गुणी है कि कोई लड़का वाला घर से माँगकर उसे ले जायेगा।” घुमा-फिराकर यही बात मैं दुहराया करता तो वह चिढ़ जाती। हितैषियों के सामने इस बात को लेकर मेरी खिल्ली उड़ाती कि “ये तो बौरा गये हैं। अनखाय की बेटी पाये हैं। यात्रा करने से घबराते हैं इसीलिए बहाना बनाते हैं।” मैं कहता, “कोई उपयुक्त लड़का बताये तो वहाँ जाऊँ। ऐसे ही कहीं चला जाऊँ क्या?”

   इसी तरह खिटिर-पिटिर में समय बीत रहा था। एक दिन हमारे रिश्तेदार श्री प्रभुनाथ सिंह सुबह-सुबह लिट्टी-चोखा का न्योता देने घर पर आये। कहलगाँव में जाड़े के दिनों में लिट्टी पार्टी की बड़ी समृद्ध संस्कृति है। इसका सबसे बड़ा श्रेय लिट्टी के कारीगर किशन को है। लिट्टी तो और लोग भी बनाते हैं किंतु किशन की बात ही कुछ और है। किशन की बनाई लिट्टी जिसने एक बार खा ली वह जीवन भर भूल नहीं सकता और जिसने नहीं खायी है वह तो उस स्वाद की कल्पना भी नहीं कर सकता। जाड़े में किशन की एडवांस बुकिंग होती है। तिथि तय हो जाने पर अतिथियों की लिस्ट तैयार करके न्योता दिया जाता है। इसी सिलसिले में मुनमुन जी पधारे थे। चाय-बिस्किट देकर सुधा ने बेटी की शादी का प्रसंग छेड़ दिया–“खाली भोज-भात करते रहिए आप लोग! घर में कुँवारी लड़की पड़ी है; उसका ध्यान नहीं है। ये तो महा आलसी हैं। आप लोग तो देखिए!”
“शादी के लिए तैयार हैं? कैसा लड़का चाहिए?”
“बेटी शिक्षक बनेगी। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाला लड़का देखिए।” मैंने कहा।

उन्होंने तपाक से जवाब दिया, “मेरे एक दोस्त का लड़का है। पवन नाम है उसका। किसी यूनिवर्सिटी में काम करता है। काम क्या है, मैं नहीं जानता हूँ। बात करके खुद पूछ लीजिए।” और उन्होंने लड़के को फोन लगा दिया। उधर से जवाब मिलने पर उन्होंने कहा, “पवन, तहार बियाह के बात चल$ता। ल$ बात कर$। प्रोफेसर साहब बाड़न, आपन हीत हउअन।” और फोन मुझे पकड़ा दिया। एक बार तो मैं सकपकाया, फिर चेतकर बात शुरू की। लड़के के बात करने के सलीके और शिष्टता से मैं काफी प्रभावित हुआ था। अद्भुत संयोग कि वे मेरे हमनाम थे और ओ पी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत में एडमिशन सेल में मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। जाते-जाते मुनमुन जी लड़के का एक फोटोग्राफ और उनके पिता व उनका फोन नम्बर अपने मोबाइल से निकालकर दे गये थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मैं उनके दोस्त से एकाध बार उनके घर पर मिल भी चुका हूँ। वे रेलवे में अफसर हैं और लिलुआ (हावड़ा) में पोस्टेड हैं।

  पता-ठिकाना मिल जाने के बाद मैंने लड़के को फेसबुक में ढूँढ़ लिया। प्रोफाइल खोलकर कुछ फोटोग्राफ निकाल लिये। तस्वीरें देखकर तो सुधा लट्टू हो गयी थीं। फिर तुरंत सबकुछ बच्चों को भेज दिया था। बेटे ने जवाब दिया था, “माँ तुम तो फोटो देखकर फिदा हो। पापा शिक्षक हैं; उन्हें सारे बच्चे अच्छे ही लगते हैं। थोड़ा ठहरो! मुझे लड़के से बात करने दो।” अगली सुबह उसने लड़के से फोन पर लम्बी बातचीत की और फिर मुझे फोन किया, “पापा, लड़का अच्छा है। बाकी सब आप देख-समझकर संतुष्ट हो लीजिए।” इसके बाद तो अभियान को जैसे पंख लग गये थे। मुनमुन जी के घर जाकर लड़के के पिता श्री अनिरुद्ध सिंह को फोन किया। कोलकाता आने की इच्छा प्रकट की तो उन्होंने बताया कि अगले सप्ताह उन्हें विभागीय कार्य से जमालपुर रेल कारखाना जाना है। वापसी में कहलगाँव होते आयेंगे और हमसे मिलेंगे तब हमें कोलकाता जाना है।

 मुझे पुनः आभास होने लगा था कि विधाता ने खेल रच दिया है। सबकुछ स्वचालित ढंग से होने लगा है। हम केवल उपकरण की भूमिका में हैं। अनिरुद्ध बाबू अपने छोटे पुत्र ओंकार जी को साथ लेकर कहलगाँव आये थे। हमने उन्हें रात के खाने पर आमंत्रित किया। बिटिया भी छुट्टी में घर पर थी। माँ-बेटी ने सबको खाना खिलाया। अनिरुद्ध बाबू और ओंकार जी ने अलग-अलग प्रीति से बात की। खूब प्रसन्न होकर मुझे कोलकाता आने का निमंत्रण दिया। अगले सप्ताह मैं मुनमुन जी के साथ कोलकाता गया। हम अहले सुबह उनके रेलवे क्वार्टर पहुँच गये थे। चाय पीने के बाद मैंने पूछा, “ठहराना कहाँ है?” तो उन्होंने अप्रत्याशित उत्तर दिया था, “रउआ हमार परिवार के देखे आइल बानी नूँ? हमनी के साथे घर में रहीं आउर देख के, तसल्ली करके जाईं।”

   मैं तो उनके इस जवाब से दंग रह गया था। बड़े कलेजे वाले मर्द हैं ये तो! ऐसा भी कहीं होता है! कोई लड़का वाला किसी बरतुहार को अपने घर के अन्दर ठहराता है भला! “धन्य हैं आप अनिरुद्ध बाबू!” हम तीन दिन वहाँ ठहरे थे। पास में ही स्वामी विवेकानंद जी द्वारा स्थापित वेलूर मठ था। वहाँ घूमते हुए स्वामी रामकृष्ण परमहंस की मूर्ति के सामने अनिरुद्ध बाबू ने मुझे गले लगाकर कहा था, “हमनी के बियाह त हो गइल। अब बचवन के बियाह विधाता जानस। जे होखी से निमने होखी।” बेटे के विवाह की तरह ही मैंने वही शर्त रखी थी कि लड़का-लड़की को मिलवाया जाये और यदि दोनों की सहमति हो तो ब्याह कर दिया जाये। कुछ दिनों बाद दिल्ली के एनटीपीसी गेस्ट हाउस में दोनों परिवार का मिलन हुआ था। इस शुभ अवसर पर हमारे मित्र एनटीपीसी के मेडिकल अफसर डॉ0 बी के बेहरा हमारे साथ थे और डायरेक्टर (एचआर) श्री यू पी पाणि ने मेजबानी की व्यवस्था की थी। ऑन स्पॉट ही बच्चों की सहमति मिलने के पश्चात रिश्ता तय हो गया था। इसके बाद हम सभी एक दिन सोनीपत जाकर यूनिवर्सिटी और पवन जी का क्वार्टर देख आये थे। उनसे मिलकर आश्वस्ति मिली थी कि हमारा चुनाव सही था।

  यह विवाह समारोह भी बेटे की बारात की तरह तीन रात और दो दिन का होने वाला था। हावड़ा-जमालपुर एक्सप्रेस से बारात आनी थी और अगले दिन उसी ट्रेन से  लौटना था। कहलगाँव में बारात का ठहराव कुल चालीस घण्टों का था। रस्म-रिवाज की समझदारी बनाने जब मैं दुबारा लिलुआ गया था तो अनिरुद्ध बाबू के एक मित्र ने सहानुभूति जताते हुए कहा, “चार टाइम का भोजन और नाश्ता की व्यवस्था में आपको तो बहुत कष्ट हो जायेगा प्रोफेसर साहब, नहीं?”
मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए जवाब दिया था, “समधी जी, आप उलटा सोच रहे हैं। हमें तो मौका मिलेगा कि आपलोगों को हर प्रकार से संतुष्ट कर सकूँ।”

समधी मिलन

   2 जुलाई 2016 को लिलुआ में सगाई की रस्म हुई थी। हम लगभग तीन दर्जन लोग वहाँ गये थे। अच्छी पार्टी थी, किन्तु पानी बहुत बरसा था। मेरे जन्म से लेकर अब तक के सभी आयोजनों में वर्षा अवश्य हुई है। राँची में भी मिलन के ठीक पहले एक टुकड़ा बादल आकर बरस गया था। मेरी शादी में भी वर्षा हुई थी। बेटे के रिसेप्शन में रातभर टिप-टिप होती रही थी।

  बिटिया के विवाह की तारीख 5 फरवरी 2017 थी। इस बार भी मैं ‘चट मँगनी पट ब्याह’ के सिद्धांत का पालन करने में असमर्थ रहा था। जनबासा, मिलन समारोह और भोज-भात एनटीपीसी के सामुदायिक भवन ‘आम्रपाली’ में और वैवाहिक कार्यक्रम प्रतापनगर में घर पर हुआ था। रात व मरजाद के लिए एक गज़ल गायक को बुलाया था, जो सुपरहिट हो गया था। समधी साहब उस गायक को रिसेप्शन में लिलुआ ले गये थे, जो शादी के तीन दिन बाद हुआ था। बारात में आये लोग स्वागत-सत्कार से इतने खुश हुए थे कि रिसेप्शन पार्टी में समधी साहब को कहना पड़ा था, “यदि अभी आप हावड़ा से चुनाव लड़ जाएँ तो जीत सुनिश्चित होगी।” बहुत भव्य भोज हुआ था कोलकाता में। सचमुच कई लोग मुझसे मिलकर बोले थे कि उन्हें बारात नहीं जा सकने का बहुत अफसोस है।

इस बार सड़क यात्रा की गुंजाइश नहीं थी। शराब, हर्ष फायरिंग, डीजे और आतिशबाजी मेरी ओर से फिर प्रतिबंधित थी। सो दुर्घटना की संभावना को तो मैंने टाल दिया था, किन्तु इस विवाह में भी राक्षसी ताकतें पिछले से भी अधिक सक्रिय रही थीं। मैं तो और अधिक सतर्क था इस बार। “सदा भवानी दाहिने, सन्मुख रहे गणेश।” भोज-भंडोल करने और बारातियों को रुष्ट करवाने में ऐसे लोग संलिप्त थे, जिनके विषय में सपने में भी सोचा नहीं जा सकता था। हाल ही में बिहार सरकार ने शराबबन्दी घोषित की थी पर उपद्रवियों ने मुझे फँसाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। इसके अलावा विवाह के तीन दिन पहले मुहल्ले में भी बड़ा झगड़ा मेरे माथे थोपने का षड्यंत्र रचा गया था। मैं अपने घर के सामने चारदीवारी के बाहर अपनी जमीन पर खुला शेड बनवा रहा था कि धूप-बारिश में कार रख सकूँ और सवारी का इंतजार करने वाले मुहल्ला वासियों को सुविधा मिल सके। इस मुद्दे पर उकसाकर मुहल्ले के रहवासी विधायक को मुझसे भिड़ा दिया गया था। मैं अपनी जमीन पर था इस लिए विधायक को मुँह की खानी पड़ी थी, किन्तु संबंध तो जीवन भर के लिए खराब हो ही गया है। दूसरी बड़ी बाधा बैंक की ओर से खड़ी की गयी थी। दो महीने पहले मोदी सरकार ने नोटबन्दी लगाई थी। एसबीआई के किसी मोदी विरोधी अधिकारी ने मेरे दो चेक अकारण बाउंस करवा दिये थे। मैंने आरबीआई को कड़ा शिकायती पत्र लिख दिया था और बैंक के अधिकारियों की वाट लगा दी थी। शादी की तैयारियों के बीच बैंक के अधिकारियों का घर पर आकर खुशामद करने का सिलसिला चल रहा था।

 इस बार भी विधाता की असीम कृपा मेरे परिवार के साथ रही थी। फिर से मैं डिस्टिंक्शन मार्क्स से पास हो गया था। बिटिया हमारी साक्षात लक्ष्मी का प्रतिरूप है। उसके रहते और विदा होने के बाद भी हमारे घर में आर्थिक अभाव में कोई जरूरी काम कभी नहीं अटका है। हाँ, विदाई के समय उसने सबको रुलाया बहुत था। हम सभी कलेजा मजबूत करके बिना रोये उसे विदा करना चाहते थे। पर मित्र डॉ0 अरुणजय राय ने, जिन्होंने निक्की के असामयिक जन्म के बाद सुधा के अलावा सबसे पहले हाथ में उठाने का जिगर दिखाया था, वही बात छेड़कर आँसुओं का सैलाब बहा दिया। “सर, कितनी छोटी थी! तलहथी भर की! आज ब्याह करके हमलोगों को छोड़कर जा रही है!” इसके बाद तो दरवाजे पर उपस्थित सभी पुरुष सदस्य जार-बेजार रो पड़े थे। स्त्रियाँ पहले से ही कन्ना-रोहट मचाये हुए थीं। गाड़ी में बैठते हुए उसकी “पापा” की करुण पुकार आज भी मेरे कानों में गूँजती रहती है। मैं विदाई का वह दृश्य और वह रुलाई भूल नहीं पता। भूल नहीं सकता।
(क्रमशः)

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मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919431250382, [email protected]

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