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अंतरराष्ट्रीय

कोरोना संकट: नवउदारवादी नीतियों का ‘प्रोडक्ट’

 

पिछले महीने अप्रैल के आरम्भ में 91 वर्षीय नोम चोम्स्की  (7.12.1928) ने 37 वर्षीय क्रोट्शियाई दार्शनिक, लेखक, राजनीतिक कार्यकर्त्ता और ‘डेमोक्रेसी इन यूरोप मूवमेंट 2025(डीआईईएम25)’ के सहसंस्थापक स्रेको होर्बार्ट (28.2.1983) को अमेरिका के दक्षिण एरिजोना के सबसे बड़े शहर टक्सन के अपने आवास से, जहाँ वे स्वयं चयनित एकान्त में रह रहे हैं, अपने इन्टरव्यू में यह कहा कि कोरोना वायरस संकट नवउदारवादी नीतियों का ‘प्रोडक्ट’ है। कोरोना वायरस से सम्बन्धित उन्होंने जो कई इन्टरव्यू दिये हैं, उनपर अभी तक अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। उनके अनुसार लम्बे समय से नयी महामारियों के प्रकट होने की जानकारी थी। ‘सार्स’ वायरस 2002 में सबसे पहले चीन में दिखाई पड़ा था और कुछ ही महीनों के भीतर यह पूरी दुनिया में फ़ैल गया था। इस वायरस को शीघ्र ही रोक लिया गया था और 2004 के बाद इसका फैलाव पूरी तरह रुक गया।

 उस समय दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में सम्भावित कोरोना वायरस महामारी से सम्बन्धित सुरक्षा और बचाव पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। ऐसा क्यों हुआ? चोम्स्की साफ साफ यह बताते हैं कि हमने अपना भाग्य कॉर्पोरेशन के हवाले कर दिया है, जो जन साधारण के प्रति उत्तरदायी नहीं है। उनके लिए न्यू ‘बॉडी क्रीम’ एक टीका की खोज की तुलना में कहीं अधिक फायदेमन्द है। उन्हें साधारण लोगों की चिन्ता ना होकर अपने लाभ और मुनाफे की अधिक चिन्ता है।

पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। सौल्क वैक्सीन की खोज में सरकार की दखल थी। पोलियो वैक्सीन को जोनास सौल्क ने विकसित किया था जिसका पहला परीक्षण 1952 में किया गया था। 12अप्रैल 1955 को सौल्क ने पोलियो वैक्सीन की घोषणा की थी। पोलियो से लाखों करोड़ों लोगों की जानें बचीं। यह क्या इस समय या इस शताब्दी के आरम्भ से सम्भव नहीं था? चोम्स्की के अनुसार नवउदारवादी ‘प्लेग’ ने इसे अवरुद्ध कर दिया।

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संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन (20.1.1981- 20.1.1989) ने 20 जनवरी 1981 को राष्ट्रपति घोषित होने के बाद राष्ट्र के नाम उसी समय अपने पहले सम्बोधन में यह कहा था कि ‘सरकार हमारी समस्याओं का समाधान नहीं है, सरकार समस्या है’ (गवर्नमेंट इज प्रॉब्लम)। इन पंक्तियों के लेखक ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने से पूर्व अपने एक स्तम्भ लेख ‘नरेन्द्र मोदी और रोनाल्ड रीगन’(28.4.2014) में डेविड कोहेन के लेख ‘इज इण्डिया अबाउट तो इलेक्ट इट्स रीगन’ की चर्चा करते हुए कोहेन के लेख की अन्तिम पंक्ति उद्धृत की थी ‘अमेरिका को अपना मोदी कब मिलेगा?’ कोहेन ने मोदी को ‘अमेरिका का मूल्यवान साथी’ कहा था।

इस स्तम्भ लेख में यह कहा गया था कि 10 फरवरी 1981 को व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति की आर्थिक नीति के सलाहकार बोर्ड के गठन में ऑर्थर बर्न्स के बाद दूसरा नाम मिल्टन फ्रीडमैन ( 31.7.1912- 16.11.2006) का रखा था और ‘आज की नवउदारवादी व्यवस्था मिल्टन फ्रीडमैन के अर्थशास्त्रीय विचारों- सिद्धान्तों से जुड़ी है।’ मोदी ने अपने भाषणों में बार बार ‘मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस’ की जो बात कही है,वह फ्रीडमैन की नीतियों से जुड़ी है। रीगन की आर्थिक नीति में सरकारी खर्चों की वृद्धि को कम करना था, संघीय आय कर और पूँजीगत लाभ को कम करना था और सरकारी विनिमयन को भी कम करना था। उसका अर्थशास्त्र मुक्त बाजार का अर्थशास्त्र था। दुनिया जिसे ‘रिगनोमिक्स’ कहती रही थी, वह रीगन और अर्थशास्त्र का एक ‘सूटकेश शब्द’ था, जिसका निर्माता पॉल हार्वे (4.9.1918-28.2.2009) था- एक रेडियो ‘होस्ट’ और अमरीकी ब्राडकास्टर।

       नवउदारवादी नीतियों ने सरकार की भूमिका और जवाबदेही कम की। रोनाल्ड रीगन सरकार को ‘समस्या’ कह रहे थे और ब्रिटेन की प्रधानमन्त्री मार्गरेट थैचर (13.10.1925-8.4.2013) ने 1987 में एक इन्टरव्यू में कहा था कि कोई समाज नहीं है। 80 के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति सरकार को समस्या बता रहा था और ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर समाज के अस्तित्व को ही नकार रही थी। यह सब अकस्मात नहीं था। बाजार प्रभावशाली हो रहा था और यह बेशर्मी से कहा जा रहा था कि बाजार का कोई विकल्प नहीं है। चोम्स्की मानते हैं कि कोरोना वायरस के संकट को रोका जा सकता था। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अमेरिका में लगभग 20 लाख 45 हजार लोग इस वायरस से संक्रमित हैं और लगभग 1 लाख 14 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। अब तक पूरी दुनिया में इस वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 73 लाख 17 हजार हो चुकी है और मृतकों की 4 लाख 14 हजार के लगभग।

अमेरिका में इस वायरस से मृतकों की संख्या जर्मनी (8800), इंग्लैंड (40890), तुर्की (4700), इरान (8400), चीन(4600) और रूस(6140) की कुल मृतक संख्या से कहीं अधिक है।  ताजा आंकड़ों के अनुसार इंग्लैंड मृतकों की संख्या में दूसरा इटली तीसरा देश है,  इनमें से प्रत्येक से दोगुनी संख्या से अधिक मौतें अमेरिका में हो चुकी हैं। अमेरिका के कई राज्यों में जाँच किट की कमी है और जाँच लैब में जरूरी साधन भी नहीं हैं। यह अधिक विचारणीय है कि दुनिया का सर्वशक्तिमान देश अमेरिका आज ऐसी स्थिति में क्यों है? क्यों दुनिया के वैज्ञानिकों ने समय से पूर्व ऐसी महामारी की सम्भावनाओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया? अक्टूबर 2019 में अमेरिका में इस प्रकार की सम्भावित महामारी का एक बड़े पैमाने पर छद्म रूप मौजूद था।

अमेरिका ने इसकी अनदेखी की। 31 दिसम्बर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यु.एच.ओ.) को प्रकल्पित बैक्टीरिया जनित निमोनिया (प्री यूमोनिया) रोग लक्षण की सूचना दी थी, जिसका निदानशास्त्र ज्ञात नहीं था। एक सप्ताह बाद अर्थात जनवरी 2020 के पहले सप्ताह में चीनी वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान की कि यह कोरोना वायरस है और संसार को इसकी सूचना दी। कुछ देशों ने तुरत इस पर ध्यान दिया और भारत सहित कई देशों ने इसकी गम्भीरता की उस समय पहचान नहीं की। दो-ढाई महीने बाद भारत सरकार की नींद टूटी। इन दो-ढाई महीनों में देश में दिल्ली विधान सभा चुनाव, उत्तर पूर्वी दिल्ली के दंगे और ट्रम्प का भारत आगमन प्रमुखता में रहा। अब चारों ओर कोरोना-कोरोना और लॉकडाउन है। 24 मार्च से पूरे देश में ‘लॉकडाउन’ लगा। ‘लॉकडाउन’ कोरोना वायरस संकट का समाधान नहीं है।

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प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने अब तक देशवासियों से अपने सम्बोधन में केवल देशवासियों से अपेक्षाएँ की हैं। चिकित्सकीय सुविधा की दृष्टि से सरकार बहुत सफल नहीं रही है। अमर्त्य सेन और ज्याँ द्रेज सहित कई अर्थशास्त्रियों ने समय समय पर भारत सरकार का ध्यान उसके स्वास्थ्य-सम्बन्धी कार्यक्रमों की और दिलाया था, पर सरकार किसी की नहीं सुनती। स्वास्थ्य रैंकिंग में 190 देशों में भारत का स्थान 141 है। 2016-17 में भारत का स्वास्थ्य-बजट सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 1.28% था। अब मोदी सरकार ने 2025 तक जनस्वास्थ्य सेवा पर यह बजट  सकल घरेलू उत्पाद का 2.5% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

     कोरोना संकट ने नवउदारवादी अर्थव्यवस्था पर प्रश्न खड़ा कर दिया है। चोम्स्की मानते हैं कि कोरोना वायरस का टीका विकसित करने में जान बूझकर लापरवाही बरती गयी। वे इस संकट के मूल में ‘बाजार की जबर्दस्त नाकामी और नवउदारवादी नीतियाँ’ देखते हैं, जिसने सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को और बढ़ा दिया है। अब कोरोना केवल वायरस ही नहीं है। कोरोना इकॉनोमी, कोरोना पॉलिटिक्स, कोरोना कल्चर, कोरोना सायकोलोजी, कोरोना टेरर, कोरोना कम्युनल, कोरोना मैथेमेटिक्स और कोरोना ग्रामर भी है। आगामी दिनों में हम सब यह अच्छी तरह देखेंगे,समझेंगे कि कोरोना ने अन्य रूपों में भी अपना क्षेत्र कितना व्यापक कर लिया है। नोटबन्दी को हमने उस समय अधिक गम्भीरता से नहीं लिया था। घरबन्दी और देशबन्दी को भी अधिक गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा है।

     नवउदारवादी नीतियों और अर्थव्यवस्था को समझने के लिए पुराने पृष्ठ उलटने होंगे। यहाँ पाँच ‘महापुरुषों’ – ब्रिटिश अर्थशास्त्री फ्रेडरिक ऑगस्ट वॉन हायेक (8.5.1899- 23.3.1992), अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन (31.7.1912- 16.11.2006), ऑस्ट्रियाई ब्रिटिश दार्शनिक और प्रोफेसर कार्ल पौपर (28.7.1902-17.9.1994), अमेरिकी अर्थशास्त्री जोर्ज जोसेफ स्टिगलर (17.1.1911- 1.12.1991) और लुडविग वॉन मिसेस (ऑस्ट्रियन स्कूल के अर्थशास्त्री, इतिहासकार और समाजशास्त्री, 29.9.1881-10.10.1973) को याद करना इसलिए जरूरी है कि ये सभी 1947 में स्थापित माउंट पेलेरिन सोसाइटी (एमपीएस) के संस्थापक सदस्य थे।

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नवउदारवाद को तीव्र गति देने का श्रेय इसी संस्था को है। यह (एमपीएस) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक नीति का ‘थिंकटैंक’ था। फ्रेडरिक हायेक द्वारा संगठित दस अप्रैल 1947 की कॉन्फ्रेंस में इस सोसाइटी का गठन हुआ था। 8 अप्रैल 1947 को विद्वानों ने इसके ‘स्टेटमेंट ऑफ़ एक्स’ पर विचार किया था। पहले इसका नाम ‘एक्टन-टोक्वेविले सोसाइटी’ रखा जाना था, पर फ्रेंक नाईट ने दो रोमन कैथोलिक अरिस्टोक्रेट्स के नाम पर सोसाइटी के नामकरण का विरोध किया था।

फ्रेडरिक हायेक ने दस देशों से 39 विद्वानों को आमन्त्रित किया था, जिनमें अधिक अर्थशास्त्री और कुछ दार्शनिक तथा इतिहासकार भी थे। जर्मनी के अर्थशास्त्री वाल्टर यूकेन अकेले जर्मन थे। हायेक ने ही सभी प्रतिभागियों का चयन किया था। यह बैठक ‘राज्य’ और ‘क्लासिकल उदारतावाद’ के भविष्य पर विचार करने के लिए आयोजित की गयी थी। स्विट्जरलैंड के ‘वेवे’ शहर के नजदीक ‘होटल डू पार्क’ में पहली बैठक सम्पन्न हुई थी। माउन्ट पेलेरिन के कान्फ्रेंस के उद्घाटन भाषण में हायेक ने उन दो व्यक्तियों – हेनरी सिमन्स (जिन्होंने मिल्टन फ्रीडमैन को प्रशिक्षित किया) और जॉन क्लैफम को याद किया, जिनके साथ उन्होंने बैठक की योजनाओं पर विचार किया था और जो दिवंगत हो चुके थे। आमन्त्रित सभी व्यक्तियों ने स्वतन्त्रता पर समाजवाद और कीन्स (प्रमुख अर्थशास्त्री) के विचारों में से किसी एक के गम्भीर खतरों की बात कही थी।

इन प्रतिभागियों में से अनेक कीन्स के ‘द जेनेरल थ्योरी ऑफ़ इम्प्लोयमेंट, इंटरेस्ट एंड मनी’ (1936) के प्रमुख आलोचक थे। किन्सियन अर्थशास्त्र पर प्रहार माउंट पेलेरिन सोसाइटी (एमपीएस) और ‘शिकागो स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स’ ने आरम्भ किया। यहाँ यह उल्लेख आवश्यक है कि रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति चुनाव के ‘कैम्पेन स्टाफ’ में उनके 76 आर्थिक सलाहकारों में से 22 एमपीएस के सदस्य थे। लगभग 7 वर्ष पहले के अपने एक स्तम्भ लेख ‘हायेक फ्रीडमेन और आज की व्यवस्था’ (प्रभात खबर 25.11.2013) में इन पंक्तियों के लेखक ने यह प्रश्न किया था कि “भारतीय अर्थशास्त्रियों में ‘हायेकवादी’ और ‘फ्रीडमेनवादी’ कौन नहीं है….

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नवउदारवादी अर्थव्यवस्था ने हमारे चित्त और मानस को किस प्रकार प्रभावित किया है, हम नहीं सोचते। हम यह भी नहीं सोचते कि बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का केवल भ्रष्टाचार से ही नहीं, बलात्कार, यौन अपराध और ह्रिन्स आचरण से भी कोई सम्बन्ध बनता है या नहीं?” हायेक की पुस्तक ‘द कांस्तिच्युशन ऑफ़ लिबर्टी’ (1960) का उल्लेख करते हुए यह लिखा था कि हायेक ने अपनी इस पुस्तक में “खुले तौर पर सरकार को समाप्त करने, उद्योगों के निजीकरण, सब्सिडी समाप्त करने, सामाजिक सुरक्षा पर खर्च घटाने और ट्रेड युनियनों को समाप्त करने की बात कही थी…. हायेक और फ्रीडमेन के विचार मुख्य बाजार के हैं। मार्गरेट हैचर और रोनाल्ड रीगन ने इन्हें अपनाया… मुक्त बाजार को अपने लिए एक कठोर सरकार और तानाशाह की जरूरत होती है। तानाशाह किसी भी वेश में आ सकता है। मीडिया मुक्त बाजार के समर्थन में है और नरेन्द्र मोदी वहाँ छाए हुए हैं”

      नवउदारवादी नीतियाँ बाजार के पक्ष में है और बाजार में सारा ध्यान मुनाफे पर है। दुनिया के लगभग सारे देश इन्ही नीतियों और अर्थव्यवस्था के साथ हैं। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह देशवासियों को बार-बार घरों में बन्द रहने और हिदायतों का पालन करने को कहा है, वह महामारी का निदान नहीं है।

सरकार पूरी तरह जाँच करने में ही नहीं, डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों को आवश्यक उपकरण उपलब्ध करने में भी पूर्णतः सक्षम नहीं रही, इसने कई प्रश्न खड़े किये हैं। सरकार अपनी भूमिका का पूर्णतः निर्वाह नहीं कर पा रही है और केवल ‘लॉकडाउन’ और ‘सोशल डिस्टेंस’ की बात कर रही है। सोशल डिस्टेंस (या डिस्टेंसिंग) नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का पद है, जिसने मनुष्य के बीच दूरियाँ पैदा की हैं। शारीरिक दूरी (फिजिकल डिस्टेंस) को ‘सोशल डिस्टेंस’ कहना अकारण नहीं है। यह थैचर का सिद्धान्त है, जहाँ ‘समाज’ गायब है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है, थैचर ने हायेक की पुस्तक ‘द रोड टू सर्फ़डम (1944)’ के सम्बन्ध में कहा था कि ‘यह वही है, जो हम, मानते हैं’।

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कोरोना वायरस संकट पूँजीवाद के नवउदारवादी वृत्तान्त/ रूपान्तर की बृहद असफलता है। ‘सार्स’ महामारी के बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी महामारियों के प्रकट होने का अनुमान कर लिया था, पर उस समय और उसके बाद इसके समाधान की दिशा में प्रयत्न नहीं किये गये। ड्रग कम्पनियों के पास संसाधनों का आभाव नहीं है। वे ‘सुपर रिच’ हैं, पर उनके लिए बाजार का संकेत ही सब कुछ है, जो यह बताते हैं कि यहाँ लाभ नहीं है। फ़रवरी के मध्य में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 2021 का जो नया बजट प्रस्तुत किया था, उस समय यह महामारी फ़ैल रही थी और ट्रम्प ने बजट में महामारी के नियन्त्रण केन्द्र में कटौती की और उद्योगों के जीवाश्म इंधन के लिए फंडिंग  बढ़ायी।

       चोम्स्की कोरोना वायरस महामारी के मूल में जाते हैं, वे पूँजीवादी व्यवस्था की धोखेबाजी, चालबाजी को ध्यान में रखते है, जो ऐसी परिस्थियाँ उत्पन्न करती हैं, जिसमें उनके लाभ के ऐसी स्थितियाँ और बुरी हों। आज का पूँजीवाद कल के पूँजीवाद से भिन्न है। 80 के दशक से इसके अगुआ अमेरिका और इंग्लैंड थे। बाद में अन्य देश इस मार्ग पर बढ़े। भारत में विगत 30 वर्ष से जो अर्थव्यवस्था लागू है, वह सामान्य जन के हित में नहीं है।

नोम चोम्स्की ने भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को हंगरी के वर्तमान प्रधानमन्त्री विक्टर मिहाली ओरवान, मिश्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सीसी, सऊदी अरब के युवराज और प्रथम उपप्रधानमन्त्री मोहम्मद बिन सलमान अल सौद, इटली के पूर्व प्रधानमन्त्री सालविनी और ब्राजील के राष्ट्रपति जैक बोल्सोनारो, जिन्हें ब्राजील का ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ कहा जाता है, के साथ रखा है। उन्होंने क्रिश ब्रुक्स को दिए 10 अप्रैल के इंटरव्यू में यह कहा है कि भारत में मोदी जो कर रहे है, वह बोलने से परे हैं। सम्पूर्ण लॉकडाउन के पहले उन्होंने 4 घण्टों की नोटिस दी। भारत की आबादी का अधिसंख्य असंगठित अथवा अनियमित मजदूर हैं। उनका कोई घर नहीं है। चोम्स्की ने कई इंटरव्यू में भारत की चर्चा की ही।

       वायरस कभी कहीं से भी आ सकता है। उसकी रोकथाम का सम्पूर्ण दायित्व सरकार पर है, वैज्ञानिकों पर है। बाजार में वैज्ञानिक का महत्व केवल उनके हित को ध्यान में रखकर ही किया जाता है। कोरोना वायरस संकट ने नवउदारवादी नीतियों पर सवाल खड़े कर दिये हैं। इन उदारवादी नीतियों से मुक्त हुए बिना कोरोना संकट से मुक्त होना कठिन है। सम्भवतः असम्भव भी। वह टल सकता है, समाप्त नहीं हो सकता।

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लेखक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। सम्पर्क +919431103960, ravibhushan1408@gmail.com

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